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व्यंग्य / शहरों की स्पिरिट / कमलेश पाण्डेय

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महानगरों की स्पिरिट अक्सर चर्चा में रहती आई है। मैं भी इस विषय पर अपने कुछ क्षुद्र विचार रखना चाहता हूं। बड़े शहरों की स्पिरिट की खोज हुए अभी जि़यादा वक़्त नहीं बीता। जब से शहर-दर-शहर हादसे होने लगे, कुछ बुद्धिमान लोगों ने, जिनमें जि़यादातर सोशल या अन्य मीडिया में पाए जाते हैं, नोट किया कि हादसे में सौ-पचास के मरने के बाद उस शहर विशेष में अगले रोज़ से ही जि़दगी वापस पटरी पर आ जाती है। मुबंइ के मामले में तो ये पटरी वाकई रेल की पटरी ही थी जिस पर चलती हुई कुछ गाडि़यों के यात्रियों समेत परख़चे उड़ जाने के अगले दिन से ही गाडि़यां वापस पटरी पर यों नज़र आईं, मानों उनकी रूहें हों। इसी से अंदाजा लगाया गया कि कोई कमाल की रूहानी ताक़त है जो हादसों के सदमे को झटपट बेअसर कर देती है। इसी वज़ह से शायद बुद्धिमानों ने इसे स्पिरिट कहा।

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स्पिरिट यानी आत्मा या कि हौसला या फिर शराब! आत्माओं से तो मुझे सचमुच डर लगता है। बड़े शहरों की आत्माएं तो बहुत ही ख़ूंख़्वार होती हैं। ये गांव देहातों तक जा घुसती हैं और वहां के लोगों से चिपट कर उन्हें शहर खींच लाती हैं। यहां लाकर वे उनकी जीवन-शक्ति चूस लेती हैं। फिर तो लोग जीना भूलकर पूरी जि़ंदगी अनजानी चीज़ों के पीछे भागते रहते हैं। बक़ौल शायर, इस शहर में हर शख्स परेशान-सा क्यों है। शायर को ये ज़रूर ख़बर होगी उसके शहर में हर शख्स परेशान नहीं है। हां जो परेशान हैं, उनकी परेशानी के सबब भी यहीं रहते हैं। उनका भी जि़क्र शायर ने कहीं और ज़रूर किया होगा। बहरहाल, इतिहास गवाह है कि पूरे देश की तमाम परेशानियों के सबब हमेशा से दिल्ली में निवास करते आए हैं। इस शहर की आत्मा के तो ख्याल भर से ही मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

कुछ साल पहले बम-धमाकों के अगले दिन मैं दिल्ली की सड़कों पर निकला तो ‘स्थिति नियंत्रण में और हालात सामान्य’ थे। लोग रोज़ की ही तरह बसों के पहियों के नीचे आने को बेताब दौड़-भाग कर रहे थे। बहुत-से वे लोग भी, जो अपने खुद के पहियों पर सवार थे, एक दूसरे को धकियाते, लाल बत्तियां फलांगते हुए जहां पर थे वहां से निकल भागने के फ़िराक में थे। मेरा ये शक पक्का होते-होते रह गया कि हो न हो ये लोग अपने पीछे लगी दिल्ली की स्पिरिट से ही जान बचाते भागते फिर रहे हैं।

पर आपकी तरह इतना तो मैं भी जानता हूं कि स्पिरिट से ज्ञानियों का मतलब हौसले और हिम्मत से है। ये लोग बस मुश्किल की घड़ी में शहर की स्पिरिट के जि़क्र से आपका हौसला बढ़ाना चाहते हैं कि बम फटे और आप उसकी चपेट में आकर ख़ामख़्वाह बेमौत मर भी जाएं जो हिम्मत न हारें। आगे चलते रहें अपनी मंजि़ल की ओर जो है आपका दफ़्तर या कोई काम-धाम की जगह, बनिये की दुकान या सब्ज़ी-मंडी। अस्पताल या किसी ऐसे रिश्तेदार का घर भी हो सकता है जहां ग़मी हुई हो। अगर हिम्मत टूटी तो वेतन या छुट्टी कटेगी, राशन रह जाएगा या रूखा-सूखा निगलना पड़ेगा। इन हिम्मतवालों को ग़ौर से देखने पर पता चल जाता है कि उनके हौसले दरअसल कुछ डर हैं - रोजी छिन जाने का डर या महज़ ब्रैकिटों में क़ैद अपनी बेरौनक़ रोज़मर्रा की ज़िन्दगी भी छिन जाने का डर। ये डर बम फटने से बेवजह मर जाने के डर पर हावी है।

हौसले वाली स्पिरिट के फुस्स साबित होने के बाद मेरा ध्यान शराब नामक स्पिरिट पर गया। तो यही है वो असली स्पिरिट- उत्तेजना और नशा- जि़ंदगी का नशा। हमें किसी भी हाल में जीना है, भले इसके लिए मर ही क्यों न जाना पड़े। शायराना खयाल। ये भगदड़ मचाती-सी भीड़ इसी जि़ंदगी के नशे में चूर है। गिरते, लड़खड़ाते सब अपनी-अपनी जान संभाले चले जा रहे हैं। उन्हें मालूम है जैसे इस शहर में अपनी रोटी ख़ुद कमानी है वैसे ही अपनी जान भी ख़ुद ही बचानी है। इस शराब में कई शराबों का नशा मिला हुआ है- किसी अपने को खो देने के दुख का गाढ़ा नशा, असुरक्षा, अनिश्चितता और हर पल एक अनजाने डर का नशा और सबसे बढ़कर इस गुरूर का नशा कि हम तो बचे हुए हैं अब तक। और इन सब नशों के साथ काकटेल बनाता मज़बूरी और हताशा का नशा।

पूरा शहर नशे में धुत है। चर्चा में चलती आई यही वो स्पिरिट तो नहीं जो सड़ चुकी राजनीति के बदबूदार शीरे से छन कर आती है और सारे शहर को हर हाल में बदमस्त रखती है।

(कमलेश पाण्डेय के फ़ेसबुक पोस्ट - https://www.facebook.com/kamleshpande/posts/10209534370416103  से साभार)

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