विज्ञान-कथा : जुलाई-सितंबर 2017 / विज्ञान-कथा फिनिक्स / - हरीश गोयल

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जेम्स डब्ल्यू क्रोनिन तथा उसके साथी अंतरिक्ष में सभ्यता की खोज में ग्रह मण्डल एच आर 4796 के निकट पहुँच गये। वे एक ऐसे रॉकेट में सवार थे जो द...

जेम्स डब्ल्यू क्रोनिन तथा उसके साथी अंतरिक्ष में सभ्यता की खोज में ग्रह मण्डल एच आर 4796 के निकट पहुँच गये।

वे एक ऐसे रॉकेट में सवार थे जो द्रव्य-प्रतिद्रव्य से प्राप्त ईंधन से चालित था तथा उसने प्रकाश से कई गुना गति को प्राप्त कर लिया था। प्रति-पदार्थ की धारणा ने आइन्स्टाइन के नियमों

में व्यापक परिवर्तन कर दिया था। रॉकेट उड़ाने के लिये भी पृथ्वी से ईंधन खर्च करने की आवश्यकता नहीं थी। न ही अधिक शक्ति की।

क्योंकि प्रति द्रव्य से चालित रॉकेट को स्वतः ही गुरुत्वाकर्षण के विरूद्ध बड़ी आसानी से जा सकते थे। उन्हें पृथ्वी की ओर आकर्षित करना कठिन था जबकि उड़ाना अत्यन्त आसान। और अब तक तो स्पेस वार्प भी बहुत आसान हो गया था। जेम्स डब्ल्यू क्रोनिन तथा उसके साथी जिस रॉकेट में सैर कर रहे थे उसका नाम था ‘प्रिऑन’। ग्रह मण्डल की डिस्क उसे नजर आने लगी थी ।

एच.आर. 4796 ग्रह मण्डल 200 प्रकाश वर्ष दूर था। जेम्स डब्ल्यू क्रोनिन को याद आया कि पृथ्वी पर हवाई व चिली में नये शक्तिशाली उपकरणों की सहायता से ब्रह्माण्ड का अवलोकन करने वाले खगोलविदों ने 200 प्रकाश वर्ष दूर एक तारे के आस-पास डिस्क के आकार की धूल का एक मण्डल देखा था। इस मंडल में दिखने वाले छिद्रों को नए ग्रहों की उत्पत्ति का कारण माना था। पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय के खगोलविद् डेविड कोअनर्स का कहना था कि इस डिस्क के मध्य में हमारे सौरमण्डल जैसा ही ग्रह बन रहा है। अध्ययन कर रहे खगोलविद्ों के दल ने इस ग्रह मण्डल का नाम फिर एच. आर. 4796 रखा। और अब तक न ही पूरा सौरमण्डल खोजा जा चुका है, बल्कि वहाँ कई ग्रहों पर उन्नत कोटि का जीवन भी पाया गया है। केवल यही नहीं ब्रह्माण्ड में यत्र-तत्र जीवन बिखरा हुआ है और अब तक यह बात अत्यन्त सामान्य बात हो चुकी है।

एच.आर. 4796 ग्रहमण्डल अब स्पष्ट नजर आने लगा था। सभी ग्रह स्पष्ट दिखाई पड़ रहे थे। इसके एक ग्रह ‘वेलेरोन’ पर जीवन हमारी पृथ्वी जैसा ही था। यह किसी और प्रणाली पर आधारित नहीं था। जैसे सिलिकोन या अन्य.....। हमारा जीवन कार्बन प्रणाली पर आधारित है लेकिन यह आवश्यक नहीं कि वे हमारी तरह के ही प्राणी हो ..... यानी मानव हो ...... वे मानव हमसे भिन्न प्रकार के हो सकते थे लेकिन हमने यह भी पाया कि वे मानव पृथ्वी से भिन्न किस्म के नहीं थे।

यही कारण था कि वेलेरोन ग्रह जेम्स डब्ल्यू क्रोनिन के आकर्षण का विशेष केन्द्र था। पृथ्वी पर एक ऐसा हादसा हो गया था कि उन्हें दो सौ प्रकाशवर्ष दूर की यात्रा करने के लिये विवश होना पड़ा।

यान दल के सभी सदस्य शीत निष्क्रियता से अभी जागृत हुए ही थे। उन्हें यान में सैर करते हुए पचास वर्ष से अधिक हो चुके थे। इतने अधिक वर्ष यान में बिना शीत निष्क्रियता के नहीं गुज़ारा जा सकता था।

यान की परिचारिका एक खूबसूरत रोबो महिला थी। लेकिन देखने में ऐसा नहीं लगता था कि वह रोबो है। वह निरन्तर निर्देश दे रही थी। यान में कुल बारह लोग थे। जेम्स क्रोनिन को इस बात का बड़ा दुख था कि पृथ्वीवासियों में प्रजनन का ह्रास हो चुका था।

जेम्स क्रोनिन तथा उसके साथी एक महान उद्देश्य से ‘वेलेरोन’ ग्रह की ओर निकले थे। उनके ऊपर इस पृथ्वी को बचाने का भार था।

यान ‘प्रियान’ में चार महिलाएं थी। उनमें से एक बला की खूबसूरत थी- झील-सी गहरी नीली आँखें ..... मोहक ..... इन आँखों ने ही जेम्स क्रोनिन को आकर्षित किया था ..... क्या सम्मोहन किया था कि वह उसके प्यार में बंध कर रह गया। उसकी मुस्कराहट ने ऐसा गजब ढाया था कि वह उसकी एक मुस्कान को पाने के लिये बेताब हो जाता। वह चाहता था कि वह हमेशा खिल-खिलाए..जब वह उससे दूर रहती थी तो उसे याद आया कि कैसे वह उसकी एक झलक पाने को बेताब रहता था।

यान में और कोई चारा भी नहीं था सिवाय इसके कि वे अपने भूतकाल को याद करें। दीर्घ यात्रा में वे बातें भी कितना करते। उसका ध्यान फिर वेलेरोन ग्रह की ओर खिंच आया।

क्या वेलेरोन वासी उनकी ओर ध्यान देंगे?

क्या वे पृथ्वी के मानवों को बचाने में उनकी मदद करेंगे।

क्या वहाँ भी पृथ्वी की तरह विश्व प्रमुख होगा?

यदि वेलरोन वासी ने उनकी मदद नहीं की तो क्या होगा? पृथ्वीवासियों ने पहले क्यों नहीं सोचा कि उनके गलत कार्यों की परिणति एक इतना भयानक रूप ले लेगी और उसे इस तरह एक सुदूर अंतरिक्ष यात्रा करनी पड़ेगी। जेम्स क्रोनिन को याद आया कि पृथ्वी पर मातृत्व के गुण में कमी होने का ही परिणाम था कि पृथ्वी पर भयावह स्थिति उत्पन्न हो गई। पृथ्वी पर सुन्दर महिलाओं ने शिशुओं को अपने स्तनों से दूध पिलाना बंद कर दिया था। उन्हें डर था कि इससे उनकी सुन्दरता में कमी आ जायेगी। उनकी फीजिक मैनटैन नहीं रहेगी। बाद में उनके देखा-देखी अन्य स्त्रियों ने भी इसी रास्ते को अपना लिया। कामकाजी महिलाओं के लिये तो यह बात अत्यन्त सामान्य बात थी। इन स्त्रियों का भी अन्य स्त्रियों पर बहुत असर पड़ा। लेकिन यह तो मातृत्व-ह्रास की प्रारंभिक अवस्था थी। इसे प्राश्रय मिला वैज्ञानिक खोजों से कालान्तर में महिलाएँ बच्चा-जनने को भी बोझ समझने लगी। आखिर नौ माह तक कोख में बच्चे को सहना असह्य हो गया। यदि सूक्ष्म रूप से देखा जाये तो इसका कारण भी वैज्ञानिक प्रगति ही थी। वैज्ञानिक प्रगति से भौतिक सुख-सुविधाएँ बढ़ी। इससे स्त्रियों में आराम-तलबी में भी बढ़ोतरी हुई। काम-काज में उन्हें आलस्य आता लेकिन बाद में यह प्रवृत्ति उनके खून में समा गई। घर का सभी काम-काज महिलाओं के स्थान पर रोबोट-संभालने लगे। परिणाम यह हुआ कि महिलाएँ काम-काज करना ही भूल गई। यहाँ तक कि खाना पकाने का कार्य भी रोबो महिला ही किया करती थी। धीरे-धीरे काम क्या होता है? यह भी वह भूल गई। अब केवल एक ही कार्य शेष रह गया था ‘शिशु जनना’। जेम्स क्रोनिन सोचता है पहले तो यह कार्य नहीं समझा जाता था। स्त्रियों की मातृत्व की भावनाओं की इससे तुष्टि होती थी। लेकिन धीरे-धीरे इसे एक बोझ समझा जाने लगा। अब माँ की कोख का स्थान किराये की कोख ने ले लिया था तथा स्त्रियों ने माँ की कोख से हमेशा के लिये निजात पा लिया था। जब से भ्रूण प्रत्यारोपण आसान हो गया तो नारियों को और राहत मिल गई। इन-विट्रो फर्टीलाइजेशन उर्फ टेस्ट ट्यूब बेबी अब केवल निस्संतान महिलाओं का ही गहना नहीं रह गई थी बल्कि आम औरतों ने भी इसे अपना लिया था। इसमें भी बहुतेरे परिवर्तन हुए। अब तक वीर्य बैंक तथा अंड बैंक सामान्य हो गये थे।

धीरे-धीरे ये बैंक विश्व बैंक में समाहित हो गये। कम्प्यूटर से इनके जेनेटिक गुणों का निर्धारण किया जाता तथा उसे फीड कर दिया जाता। अब मनचाहा भ्रूण मिलना सुलभ हो गया था। किराये की कोख या कृत्रिम प्लेसेन्टा उपलब्ध होने से अब मातृत्व के गुणों का लोप होने लगा। मातृत्व के गुणों के ह्रास होने से महिलाओं के स्तनों से दूध का स्रवण बंद हो गया और फिर एक ऐसी सीमा आई कि पुरुषों में वीर्य तथा स्त्री में अण्ड की संख्या का ह्रास होने लगा। लेकिन वीर्य-बैंक तथा अण्ड बैंक के रहते किसी को परवाह नहीं थी। फिर एक दिन एक ऐसी घटना घटित हो गई जिसकी सपने में भी कल्पना पृथ्वी के लोगों ने नहीं की थी। ओफियूकस तारामंडल के वासियों ने पृथ्वीवासियों पर आक्रमण कर दिया। कारण स्पष्ट था उक्त नक्षत्रा का ईंधन समाप्ति के कगार पर था। हर नक्षत्र का अपना जीवनकाल होता है अतः यदि वहाँ सभ्यता हो तो उस सभ्यता को नक्षत्र में ईंधन समाप्त होते-होते वहाँ से पलायन करना ही होगा।

यही आफियूकस वासियों के साथ भी हुआ। आफ्यूकस में ईंधन समाप्त होने जा रहा था अतः वह सूर्य दानव तारे में परिवर्तित होने जा रहा था। इसके एक ग्रह में सभ्यता विराजमान थी। अतः समय रहते वहाँ से पलायन करना आवश्यक था अन्यथा समुद्र खौलने से उनकी मृत्यु अवश्यंभावी थी। अतः उन्हें एक ऐसे ग्रह की तलाश थी जहाँ सभ्यता पाई जाती हो, ताकि उस पर अपना अधिकार किया जा सके। और फिर ऐसे ही ग्रह की खोज की गई जहाँ सभ्यता विद्यमान हो। उन्होंने हमारे सौरमण्डल के ग्रह पृथ्वी को सबसे उपयुक्त पाया।

शीघ्र ही उन्होंने पृथ्वी पर आक्रमण कर दिया। सर्वप्रथम आक्रांताओं ने यह कार्य किया कि उन्होंने पृथ्वी में समस्त वीर्य बैंकों तथा अण्ड बैंकों को घातक विकिरण फैलाकर नष्ट कर दिया। पृथ्वी के अंतरतारकीय ट्रुप ने आफियूकस आक्रांताओं का सामना किया तथा उन्हें पुनः खदेड़ दिया। इस अंतरिक्ष युद्ध में हमारी विजय अवश्य हुई लेकिन हमारे समस्त वीर्य तथा अंड बैंक नष्ट हो चुके थे। इससे पृथ्वी पर भी मानव के अस्तित्व का संकट आ खड़ा हुआ था। अब मानव के अस्तित्व को बचाने का केवल एक ही उपाय रह गया था- बाह्य अंतरिक्ष की किसी ऐसी सभ्यता की टोह जिनके वीर्य बैंक तथा अंड बैंक सुरक्षित हो। पृथ्वी पर लाकर उनसे पुनः सभ्यता को विकसित किया जाये और फिर एक और सभ्यता की टोह में निकल पड़े थे पृथ्वी के कुछ लोग.... उनमें से एक दल था जेम्स क्रोनिन का। जेम्स क्रोनिन को यह सब याद आ रहा था। अंतरिक्ष यान प्रियोन ग्रहमंडल एच आर 4796 के बहुत निकट पहुँच चुका था। अब उसे ग्रह की डिस्क स्पष्ट दिखाई पड़ने लगी थी। जेम्स क्रोनिन के दल ने वेलेरोन ग्रह पर संदेश भेजा कि वहाँ के प्राणियों को पृथ्वीवासियों से घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। वे किसी आक्रांता की भांति अंतरिक्ष युद्ध करने नहीं निकले हैं, बल्कि उनका मिशन शांतिपूर्ण कार्य के लिये है तथा सह-अस्तित्व के लिये है। वहाँ पर भी संयुक्त राष्ट्र संघ की तरह एक विश्व-संस्था थी जो शांति के प्रयासों में रत थी। लेकिन वहाँ अमेरिका की तरह चलती शक्तिशाली देश की है। संदेश को प्राप्त किया वेलेरोन विश्व के प्रमुख ने। विश्व प्रमुख ने तुरन्त एक मीटिंग बुलाई। मीटिंग में राष्ट्राध्यक्षों ने यह जानना चाहा कि पृथ्वीवासियों के वास्तविक इरादे क्या हैं? कहीं उनका इरादा शांति की आड़ में युद्ध करने का तो नहीं है। उन्होंने तुरन्त वेलेरोन की मिलिट्री को सचेत कर दिया था। लेकिन साथ में पृथ्वीवासियों के इरादे को जानने के लिये तीन वेरेलोन के व्यक्तियों का दल भी जेम्स क्रोनिन के पास भेजा। जेम्स क्रोनिन तथा उसके दल ने उनका गर्म जोशी से स्वागत किया। उनके बीच काफी देर तक वार्तालाप हुआ।

वेलेरोन पहुँचकर तीनों व्यक्तियों ने वेलेरोन प्रमुख को बताया कि वे वार्ता से संतुष्ट हैं। पृथ्वीवासियों का ऐसा कोई इरादा युद्ध करने का नहीं है। वेलेरोन वासियों को यह जानकर खुशी हुई कि उनकी तरह की ही एक सभ्यता दो सौ प्रकाश वर्ष दूर पृथ्वी पर पनपी थी लेकिन उन्हें यह जानकर दुःख भी हुआ कि वह सभ्यता अब विलुप्ति के कगार पर खड़ी थी। वेलेरोन तथा पृथ्वी की एक-सी सभ्यता होने के कारण उन्हें इतनी दूर होने के बाद भी अपनत्व सा लगा। वे तुरन्त मदद के लिये तैयार हो गया उन्हें आश्चर्य था कि इतनी दूर उनके जैसी ही सभ्यता पनपी थी जिसका उन्हें तनिक भी पता नहीं चला। लेकिन यहाँ तो वीर्य-बैंक बहुत कम थे। क्योंकि यहाँ अभी संतति सामान्य तरीके से ही उत्पन्न की जा सकती थी। जेम्स क्रोनिन तथा उनका दल वेलेरोन ग्रह पर पहुँचे। उन्हें पृथ्वी सदृश प्राणियों को देखकर अत्यन्त प्रसन्नता हुई। वेलेरोन स्त्रियां पृथ्वी की स्त्रियों की तरह ही थी लेकिन अतीव सुन्दर। उनकी सुन्दरता का बखान करना कठिन था। वेलेरोन प्रमुख ने उनका गर्म जोशी से स्वागत किया लेकिन अभी उन्हें स्वतंत्रा विचरण करने की इजाजत नहीं दी। शायद वेलेरोन प्रमुख उन्हें कड़ी निगरानी में रखना चाहते हों। अतः वे प्राकृतिक रूप से वेलेरोन वासियों से समागम नहीं कर सकते थ तथा संतति पैदा कर सकते थे। अभी इस कार्य में बहुत समय लगेगा। जेम्स क्रोनिन तथा उसका दल केवल वीर्य-बैंकों को लेकर ही संतुष्ट थे। शायद वे पृथ्वी की सभ्यता को विलुप्ति के कगार से बचा सकें। अपने महान उद्देश्य को पूर्ण कर वे पुनः पृथ्वी की ओर लौट रहे थे। जेम्स क्रोनिन तथा उसके दल को संतुष्टि थी कि वेलेरोन वासियों के सहयोग से वे पृथ्वी की विलुप्त होती सभ्यता का पुनरूद्धार करने में सफल होंगे।

एक महान मिशन की सफलता से उनके चेहरे पर हंसी थिरक आई।

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रचनाकार: विज्ञान-कथा : जुलाई-सितंबर 2017 / विज्ञान-कथा फिनिक्स / - हरीश गोयल
विज्ञान-कथा : जुलाई-सितंबर 2017 / विज्ञान-कथा फिनिक्स / - हरीश गोयल
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