नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

रमेशराज के प्रेमपरक दोहे


तुमसे अभिधा व्यंजना तुम रति-लक्षण-सार
हर उपमान प्रतीक में प्रिये तुम्हारा प्यार |
  

+मंद-मंद मुसकान में सहमति का अनुप्रास
जीवन-भर यूं ही मिले यह रति का अनुप्रास |
  


तुमसे कविता में यमक तुमसे आता श्लेष
तुमसे उपमाएं मधुर तुम रति का परिवेश |
  

तुमसे मिलकर यूं लगे एक नहीं हर बार
सूरज की पहली किरण प्रिये तुम्हारा प्यार |
  

गहरे तम के बीच में तुम प्रातः का ओज
तुमसे ही खिलता प्रिये मन के बीच सरोज |
  

नयन कमल से किन्तु हैं उनके वाण अचूक
बोल तुम्हारे यूं लगें ज्यों कोयल की कूक |
  

और चलाओ मत प्रिये यूं नैनों के वाण
होने को है ये हृदय अब मानो निष्प्राण |
  

तुम प्रत्यय-उपसर्ग-सी तुम ही संधि-समास
शब्द-शब्द वक्रोक्ति की तुमसे बढ़े मिठास |
  

तुम लोकोक्ति-मुहावरा तुम शब्दों की शक्ति
तुमसे गूंगी वेदना पा जाती अभिव्यक्ति |
 

चन्दन बीच सुगंध तुम पुष्पों में बहुरंग
हर पल चंदा से दिपें प्रिये तुम्हारे अंग |
 

छा जाता आलोक-सा मन के चारों ओर
गहरे तम के बीच प्रिय तुम करती हो भोर |
 

कमल खिलें, कलियाँ हंसें तुम वो सुखद प्रभात
तुम्हें देख जल से भरें सूखे हुए प्रपात |
 

तन में कम्पन की लहर प्रिये उठे हर बार
तुमको छूकर ये लगे तुम बिजली का तार |
 

तुम सावन का गीत हो झूला और मल्हार
रिमझिम-रिमझिम बरसता प्रिये तुम्हारा प्यार |
 
     

प्रिये तुम्हें लखि मन खिला, मौन हुआ वाचाल
कुंदन-काया कामिनी कल दो करो निहाल |
   

तू ही तो रति-भाव है, यति गति लय तुक छंद
प्रिय तेरे कारण बसा कविता में मकरंद |
 
------------------------------------------------------------------
रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001
Mo.-9634551630

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.