प्राची // जून 2017 // कहानी // किरचें // शिवप्रसाद ‘कमल’

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कमरे में अचानक अनु ने प्रवेश किया. उसका चेहरा क्रोध से तमतमाया हुआ था. आते ही सोफे में धंस गयी. मैं समझ गया, उसका राहुल से झगड़ा हुआ है. मैं...

कमरे में अचानक अनु ने प्रवेश किया. उसका चेहरा क्रोध से तमतमाया हुआ था. आते ही सोफे में धंस गयी. मैं समझ गया, उसका राहुल से झगड़ा हुआ है. मैंने भरपूर दृष्टि उसके ऊपर डाली. काफी दुबली हो गयी थी. आंखों के नीचे हल्के धब्बे दिख रहे थे. चेहरा क्रोध और आवेश के बावजूद अमलताश के फूलों-सा दिख रहा था. अभी एक महीने पहले ही अनु के पेप्टिक अल्सर का आपरेशन हुआ था. मैंने उसे जगह-जगह की भटकन बंद करने तथा तनावमुक्त रहने को कहा था. डॉक्टर कर ने भी स्पष्ट रूप से बता दिया था कि अधिक यात्रा तथा तनाव के कारण अल्सर की शिकायत रहती है.

कुछ पलों के बाद अनु सहज होती लगी तो मैंने उसकी ओर प्रश्नसूचक दृष्टि डाली. मेरे प्रश्न करने से पहले ही फफक उठी. उसकी छलछलायी आंखों ने मुझे भी द्रवित किया. मैंने पुचकारते हुए पूछा- ‘‘क्या बात है, बहुत अव्यवस्थित हो?’’

उसने आंसुओं को पोंछा और फिर बोली, ‘‘मैं राहुल को बरदाश्त नहीं कर पा रही हूं. अब जीने की इच्छा नहीं है.’’

‘‘लेकिन यह तो तुम्हारा अपना निर्णय था. आज इतना हताश क्यों हो?’’

‘‘मैंने राहुल को जो समझा था, उससे एकदम भिन्न है वह. उसने मुझे स्लेट पर लिखी इबारत समझ लिया है. जब चाहता है, रगड़ कर मिटा देता है.’’

मैंने उसे सांत्वना देने की कोशिश की और बोला, ‘‘आखिर ऐसा कब तक होता रहेगा? कोई न कोई निर्णय तो तुम्हें लेना ही होगा.’’

अनु चुप लगा गयी. मेरे बार-बार पूछने पर भी वह मौन रही. मैंने ही मौन तोड़ा- ‘‘अनु! तुम एक ऐसे विशाल महासागर में छलांग लगाकर कूद पड़ी हो, जिसका कोई तट नहीं है. सागर का ज्वार-भाटा कभी तुम्हें मीलों ऊपर उछाल देता है और कभी नीचे जल-स्तर पर लाकर पटक देता है. शायद तुम्हें अपने अस्तित्व का इसी तरह धराशायी होना पसंद है, क्यों?’’

अनु कुछ देर अपलक मेरी आंखों में देखती रही, फिर थके और निराश स्वर में बोली- ‘‘लगता है मेरा जन्म सूर्य ग्रहण में हुआ. मेरे अभिशापित जीवन की मुक्ति असंभव है.’’

‘‘तुम जिस दिन अपनी जिद् छोड़ दोगी और झूठ से दूर हो जाओगी, उसी दिन तुम्हें एक ऐसा ठोस धरातल मिल जाएगा, जिस पर अपने पांव ठीक से रखकर चलने लगोगी.’’ मैंने कुछ उत्तेजित होकर कहा.

मेरी बात सुनकर अनु व्यंग्य-विद्रूपता से मुस्करा उठी. उसने मेरे हाथों को सहलाते हुए कहा- ‘‘तुम्हारा कहना ठीक है, लेकिन मैं जिस ठोस जमीन की तलाश में हूं यदि वह मुझे मिल भी जाए तब भी मैं अपने पंखों के सहारे मुक्त गगन में उड़ने का अभ्यास जारी रखूंगी.’’

उसकी बात से मैं आहत हुआ और चुप लगा गया. उसकी इन्हीं बातों से मेरे और उसके बीच निरंतर एक वर्ष से मतभेद बढ़ते जा रहे थे. सच कहूं तो मतभेद तब से ही चल रहे थे, जब से अनु से परिचित हुआ था. अनु की आदतों से मैं अक्सर दुःखी होता रहा हूं. आवेश में अनु इतना अनियंत्रित हो जाती है कि उसे संभाल पाना मुश्किल हो जाता है. अपनी कमजोरियों और गलतियों को सुधारने और स्वीकारने के बजाय, उसका औचित्य प्रमाणित करते रहने के कारण ही आज तक वह कहीं स्थायी रूप से सेटल नहीं हो सकी.

‘‘क्या सोच रहे हो?’’ मुझे झकझोरते हुए अनु ने पूछा.

‘‘कुछ तो नहीं.’’

‘‘तुम झूठ बोलते हो.’’

मैंने अनु की बात का तब भी कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘मुझसे संयुक्त हो जाओ. मैं अब बेहद थक गयी हूं. तुम्हारे साथ रहकर मुझे वह खुशी मिल सकती है, जिसकी कामना हर लड़की करती है.’’

मेरी आंखें उसकी आंखों के सूनेपन में जाकर स्थिर हो गयीं. क्षण भर के लिए मैं अव्यवस्थित हो उठा. अनु का यह प्रस्ताव अप्रत्याशित न था मेरे लिए. आज से पहले भी वह कई बार ऐसा प्रस्ताव मेरे समक्ष रख चुकी है. मैं हमेशा ही टाल गया हूं. आज अनु ने फिर वहीं प्रस्ताव दोहरा कर मुझे अशांत कर दिया है. मैं चाहकर भी अंतिम और स्थायी रूप से अनु से जुड़ नहीं पाता. इसका उत्तर नहीं है मेरे पास.

‘‘हमेशा की तरह आज भी चुप ही रहोगे क्या?’’ अनु एकदम मेरे निकट खिसक आयी.

मेरे तब भी चुप रहने पर वही फिर बोली, ‘‘तुम यही चाहते थे न!’’

‘‘मैं ऐसी अंधी गुफा में घुस गया हूं, जहां से निकलना कठिन हो रहा है मेरे लिए. तुमसे शुरू में मिलने पर जुड़ने की बड़ी इच्छा थी मेरी...परन्तु अब लगता है जैसे वह कामना भाप बनकर उड़ गयी है मन से.’’ अपने को व्यवस्थित करते हुए किसी तरह बोल पाया मैं.

‘‘लेकिन क्यों?’’ अनु का प्रश्न टकराया.

‘‘तुम अच्छी तरह जानती हो अनुपम! तुम्हारे समक्ष मेरा अस्तित्व कई बार धराशायी हो चुका है. मेरा समग्र, जिसे मैंने तुम्हें कभी समर्पित किया था- तुम्हें याद होगा- तुम मुझे वापस कर चुकी हो.’’

‘‘ऐसा आवेश में ही हुआ है मुझसे. स्थिर और शांत होने पर तड़प कर रह गयी हूं. तुम जब भी मेरे यहां आना-जाना बंद कर देते हो, मेरा अन्तस घुट-घुट कर रह जाता है. इसे तुम अच्छी तरह जानते हो.’’ इतना कहते-कहते अनु करुण हो गयी.

मैंने व्यंग्य से कहा- ‘‘राहुल परछायी की तरह तुम्हारे साथ रहता है. आश्चर्य है, इसके बाद भी मेरी कमी महसूस होती है. राहुल मेरा दोस्त है सिर्फ, लेकिन तुम्हारा तो सर्वस्व है. वही दो साल पहले लेकर तुम्हें मेरे पास आया था. परिचय की इस अंधेरी सुरंग में कभी तुम उसे अपना सूरज बनाना चाहती रही हो और कभी मुझे. तुम्हें दोहरी जिंदगी पसंद है- मुझे नहीं. सच कहूं तो यही मेरे विवाद का कारण रहा है. असुरक्षा की भावना से ग्रस्त मन तुम्हें सही निर्णय नहीं लेने देता.’’

‘‘नहीं, सच्चाई यह नहीं है जो तुम कह रहे हो.’’ अनु की आकृति पर अस्वाभाविक और कृत्रिम दृढ़ता थी, जिससे मैं पूर्व परिचित हूं.

‘‘जब से तुम मेरे सम्पर्क में आयी हो, इसी झूठ भरे वातावरण की सृष्टि मेरे निकट करती रही हो और मैं इससे मुक्त होने के लिए छटपटा कर रह जाता हूं. तुम बार-बार क्यों संयुक्त होने की बात काटती रही हो. सच को छिपाने के पीछे तुम्हारा कौन सा मकसद है, मैं समझ नहीं सका हूं. उससे संयुक्त होने की मुझे काई पीड़ा नहीं है, लेकिन उसके साथ तुम्हारे होने वाले रोज-रोज के विवादों ने मुझे हमेशा लहूलुहान किया है. मुझे इन झगड़ों से सख्त नफरत है अनु.’’

‘‘तुम मेरी हर स्थिति से परिचित हो. अपनी कमजोरियों के सन्दर्भ में मैं कभी-कभी बेहद निःसहाय हो जाती हूं और यहीं कारण है कि मुझे झूठ बोलना पड़ जाता है. इसे तुम अच्छी तरह जानते हो.’’ अनु सफाई देने लगी.

‘‘नहीं, यह पूरा सच नहीं है. यदि सही कहूं तो तुम अब भी झूठ बोल रही हो. तुमने हमेशा सिर्फ उन्हीं स्थितियों को मेरे सामने रखा, जिनसे तुम्हारे स्वार्थ जुड़े थे और जिसे पूरा करने में मैं सहायक रहा हूं. आज तक तुम्हारा गोपन अन्तराल मेरे सामने कभी मुखरित नहीं हुआ.’’ न चाहते हुए भी यह कठोर बात मेरे मुंह से निकल गयी.

‘‘खैर छोड़ो, आखिर तुम चाहते क्या हो?’’ अनु विषय से हटने लगी.

‘‘मैं इस अनिश्चितता की स्थिति से मुक्त होना चाहता हूं अनु! पूर्ण मुक्त! इसके साथ तुम्हें भी मुक्त देखना चाहता हूं. जिस दिन तुम अपने सुखद भविष्य के लिए किसी सार्थक जीवन से जुड़ जाओगी. ये यायावर जिन्दगी छोड़कर, किसी सुखद छांव में ठहराव लोगी, मुझे बेहद खुशी होगी.’’ मैंने दृढ़ स्वरों में अनु को समझाया.

‘‘मुझसे अलग रहकर तुम कितने अव्यवस्थित हो जाओगे, इसे मैं अच्छी तरह जानती हूं. लेकिन तुम्हारा दम्भ इसे कभी स्वीकार नहीं करता- ठीक है न?’’ अनु के स्वर में व्यंग्य उभर आया था.

‘‘नहीं, यह बात नहीं है. मुझसे पूरी क्षमता है, तुम मेरे स्वभाव से परिचित हो.’’ दृढ़ता से कहा मैंने.

मेरे कथन पर अनु के सूखे होंठों में अविश्वास की एक हल्की-सी स्मित रेख खिंच गयी. आंखें मूंद कर वह कुछ सोचने लगी. शरीर शिथिल हो गया उसका.

कमरे में कुछ देर मौन तैरता रहा. मैंने इस घुटन को तोड़ते हुए कहा- ‘‘अच्छा, छोड़ो इन बातों को. यह तो बताओ इतना गुस्सा होकर क्यों आयी हो मुझसे मिलने? राहुल से फिर झगड़ा हुआ है क्या?

‘‘वह तो हमेशा ही होता रहता है.’’

‘‘क्यों, किस बात पर?’’ मैंने जानना चाहा.

‘‘मैं कोलकाता जाना चाहती हूं और राहुल को यह पसंद नहीं है.’’

‘‘वहां किसलिए जाना चाहती हो?’’

‘‘नौकरी के लिए. मुझे एक अच्छा ऑफर मिल रहा है.’’

‘‘वह तो तुम्हें यहां भी उपलब्ध है.’’

‘‘यहां रहकर मैं कभी व्यवस्थित नहीं हो सकूंगी. राहुल और तुम्हारे बीच कुम्हार के चाक की तरह मैं सारी उम्र चक्कर नहीं काटना चाहती.’’

‘‘तुम फिर झूठ बोल रही हो.’’ मेरे स्वर में आदेश था.

‘‘नहीं, यह सच है. मैं तुमसे अनुमति लेने आयी हूं.’’

‘‘अनु, लगता है तुम मेरी भावनाओं की आहुति देना बंद नहीं करोगी. यह मेरी भावुकता ही है जो तुमसे मुझे पृथक नहीं होने देगी. इतने दिनों तक साथ रहकर मैंने जाना है कि हर बार तुम ऊंचाई से गिरने के कारण जख्मी होती रही हो; मुझे आश्चर्य है तब भी तुममें परिवर्तन नहीं आया.’’ अनु के जाने के समाचार ने मुझे उद्वेलित कर दिया था. सच कहूं तो कहीं मन में आहत भी हुआ.

‘‘देखा, हो गये न नाराज! मैंने अभी-अभी तुमसे कहा था कि तुम मुझसे कहीं न कहीं जुड़े हुए हो, लेकिन तुम्हारा दम्भ इसे स्वीकार करने नहीं देता. परिचय के इन वर्षों में तुम्हें हमेशा क्षुब्ध करती रही हूं. यह आखिरी बार है. अच्छा अलविदा!’’

और अनु तेजी से कमरे से बाहर हो गयी. मुझे लगा कई आईने एक साथ फर्श पर गिर कर टुकड़े-टुकड़े हुए हैं और उनकी किरचें मुझे लहूलुहान कर रही हैं.

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सम्पर्कः कल्पना मंदिर, चुनार-231304,

मीरजापुर (उ.प्र.)

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रचनाकार: प्राची // जून 2017 // कहानी // किरचें // शिवप्रसाद ‘कमल’
प्राची // जून 2017 // कहानी // किरचें // शिवप्रसाद ‘कमल’
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