रु. 25,000+ के  नाका लघुकथा पुरस्कार हेतु रचनाएँ आमंत्रित.

अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://www.rachanakar.org/2018/10/2019.html देखें.

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

प्राची // जून 2017 // धारावाहिक आत्मकथा (छठीं किस्त) // अनचाहा सफर // रतन वर्मा

साझा करें:

आत्म संदर्भ धारावाहिक आत्मकथा (छठीं किस्त) अनचाहा सफर रतन वर्मा सोचा था कहां जाने के लिए गतांक से आगे ... म न में एक खटका तो था ही कि पहले ...

आत्म संदर्भ

धारावाहिक आत्मकथा (छठीं किस्त)

अनचाहा सफर

रतन वर्मा

सोचा था कहां जाने के लिए

गतांक से आगे...

न में एक खटका तो था ही कि पहले यह जान लूं कि मामी या भाभी ने तो मौसाजी से कुछ नहीं कहा है. इसी सोच के तहत बातों-बातों में मैंने मामी से कहा था, ‘‘मंजू की डिलेवरी तो देहरादून में भी हो ही सकती थी. बेकार ही आप लोगों को परेशान करने आ गया...’’ भाभी भी वहीं बैठी थीं.

मेरी बात सुनकर मामी की त्योरियां बुरी तरह चढ़ गयी थीं. भाभी की ओर देखकर बोली थीं, ‘‘सुन रही हो न दुलहिन, कैसी बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है. क्या समझता है यह? बाप बन गया है तो क्या मैं इसे पीट नहीं सकती? कह दो इससे, इसे जहां जाना है चला जाय. पर खबरदार कि दुलहिन और बच्चा को ले जाने की बात मुंह से निकाली. अब दुलहिन और बच्चा कहीं नहीं जायेंगे. इसे जहां जाना हो, जाय...’’ मामी देर तक गुस्से में बड़बड़ाती रही थीं.

उनकी बड़बड़ाहट ने मेरी शंका का समाधान कर दिया था. यानी मामी या भाभी ने मौसा जी को कुछ नहीं कहा होगा तथा मौसा जी की हिदायत उनकी अपनी ही सोच रही होगी. या फिर हमारे अभिभावकनुमां तो वे भी थे ही, इसलिए हमारे भविष्य की चिंता के तहत ही उन्होंने यह हिदायत दी होगी.

सोचा था कहां जाने के लिए

3 अगस्त 1977 को मैं एक पुत्री का भी पिता बन गया था. उसका नाम ज्योति रखा गया था. कामेश भैया ने ही उसका नामकरण किया था.

अब तक, जब से मैं देहरादून से आया था, भैया के स्वास्थ्य में थोड़ा भी सुधार नहीं आया था. बल्कि इस बीच उनकी छाती में छेद करके उनके फेफड़े की पर्तों से कई बार हवा निकाली जा चुकी थी. लगभग दो महीने तक अस्पताल में भर्ती रहे थे वे. जब अस्पताल से घर आये थे, तब चिकित्सक ने पूर्ण विश्राम की हिदायत देते हुए कहा था कि कवि जी को आजीवन दवा खाते रहना होगा.

मसलन, भैया अब बिछावन पर ही पड़े रहते. हालांकि पड़े-पड़े भी कवितायें वगैरह भी लिखते रहते थे.

मैंने मन तो बना लिया था, देहरादून लौट जाने का. पर असमंजस में भी था कि भैया का वैसी हालत में छोड़कर जाना कदापि उचित नहीं होगा. लेकिन न जाना भी एक तरह से अन्याय ही होगा उनके साथ. इसलिए कि उनके अपने परिवार का दायित्व तो ऊपर था, ऊपर से हमारा बोझ भी उन्हें ही वहन करना पड़ता. ऐसा नहीं कि मामा-मामी को हमारा खयाल ही नहीं था. पर जबकि हमने घर अलग कर लिया था, तो भैया का स्वाभिमान उन्हें शायद इस बात की इजाजत नहीं दे पा रहा था कि वे फिर से मामा-मामी की कोई मदद लें.

मेरे मझले भैया धनेश कुमार वर्मा की भी शादी हो चुकी थी. पर वे हमारे साथ न रहकर हमसे थोड़ी दूरी पर एक किराये के मकान में रहने लगे थे. फिर भी ऐसा नहीं कि उन्हें भैया-भाभी की चिंता ही नहीं थी. रोजाना वे और मझली भाभी घर आकर भैया की तीमारदारी करते रहते. भैया से छुप-छुपाकर भाभी को कुछ पैसे भी दिया करते. छुपकर इसलिए भी कि वे जानते थे कि भैया किसी का सहयोग स्वीकार करने वालों में से नहीं थे.

समय के अंतराल में भैया धीरे-धीरे चलने-फिरने लगे थे. अब मुझे लगने लगा था कि भैया को अपने निजी परिवार के दायित्व से मुक्त कर देहरादून लौट ही जाना चाहिए. इसकी भूमिका भी तैयार कर ली थी मैंने, जिसके लिए मामी का सहयोग लेना मुझे उचित लगा था.

पहले तो मामी नाराज हुई थीं, पर समझाया था मैंने उन्हें, ‘‘अब मुझे भी अपना दायित्व संभालने दीजिए मामी. मैं जानता हूं कि जबतक आप लोग हैं, तबतक हमें कोई दिक्कत नहीं होगी. पर कुछ तो करना ही होगा. इसीलिए अभी से मैं खुद को व्यवस्थित कर लेना चाहता हूं. अब तो मेरा परिवार भी बढ़ रहा है...’’

मामी को मेरा तर्क शायद अनुचित नहीं लगा था. जब मैंने लोहा ‘गरम’ देखा, तब भैया से सिफारिश करने के लिए उन्हें राजी कर लिया था.

बहुत मुश्किल से भैया-भाभी राजी हुए थे. मैंने तैयारी शुरू कर दी थी. इस आशय की सूचना मंजू (पत्नी) के पिताजी को भी पत्र द्वारा दे दी थी. हम जनवरी 1988 के प्रथम सप्ताह में प्रस्थान करने वाले थे. तभी तीन जनवरी को मेरी सासु मां का हमारे घर आगमन हुआ था. हमने ज्योति की छठी में भी निमंत्रण भेजा था वहां, पर डाक व्यवस्था की त्रुटियों के कारण उन्हें विलम्ब से पत्र मिला था. फिर बाद में विभिन्न पारिवारिक कारणों से उनका हमारे यहां आना संभव नहीं हो पाया था. लेकिन जैसे ही मौका मिला, मेरी सासु मां हमसे मिलने आ गयी थीं. या फिर जब उन्हें पता चला कि हम लोग फिर से देहरादून लौटने वाले हैं, तो जाने के पूर्व शायद मां हमसे मिल लेना चाहती थीं.

मेरे सबसे बड़े साले, जो अपने आठ भाइयों और तीन बहनों में सबसे बड़े थे, वे हजारीबाग जिले में कुजू के समीप तोपा कोलियरी में कार्यरत थे.

मेरी सासु मां ने एक दिन मुझसे कहा, ‘‘मेहमान, देहरादून तो जा ही रहे हैं आप! पता नहीं, फिर कब आप लोगों से भेंट हो. पिछली बार जब आप और मंजू हमारे घर आये थे; तब बाकी सबों से तो आपकी भेंट हो गयी थी, पर मेरे सबसे बड़े बेटे ने आपको नहीं देखा है. उसकी बहुत इच्छा है आपसे मिलने की. और मंजू के पापा का मन है कि आप लोग कुछ दिन हमारे पास भी रहें. क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप लोग हजारीबाग जाकर मेरे बड़े बेटे से मिल लें, फिर वहां से लौटकर बाल्मीकि नगर आ जायें और वहीं से कुछ दिन हमारे पास रहकर देहरादून चले जायें?’’

मेरी ससुराल, वैसे तो बेतिया में है, पर उन दिनों मेरे ससुर जी बाल्मीकि नगर में रहकर गंडक प्रोजेक्ट में काम करते थे और सपरिवार वहीं रहा करते थे.

अब सासु मां के अनुनय को टाल तो सकता नहीं था, पर इसमें खर्च बहुत था. वैसे भैया या मामा के समक्ष समस्या रखता, तो समाधान निकल सकता था, पर उन पर और बोझ मैं नहीं डालना चाहता था. मैंने कहा था, ‘‘अभी सभी को ले जा पाना तो संभव नहीं है, बच्चे छोटे हैं और ठंड भी काफी है.’’

कुछ पल सासु मां कुछ सोचती रही थीं, फिर बोली थीं, ‘‘अगर आपको एतराज न हो तो आप अकेले तोपा हो आइये. और मंजू तथा बच्चों को लेकर मैं बाल्मीकि नगर चली जाती हूं. देहरादून जाने के पहले कुछ दिन हमारे पास भी रह लेगी. और आप तोपा चले जाएंगे तो मेरे बेटे का भी मन रह जायेगा.’’

मैंने जवाब दिया था, ‘‘इसमें मुझे क्या आपत्ति हो सकती है, पर इसके लिए भैया और मामी से इजाजत लेनी होगी.’’

उल्लसित होकर बोल पड़ी थीं सासु मां, ‘‘तो ठीक है, मैं ही बात कर लेती हूं.’’

भैया और मामी से इजाजत मिल गयी थी और वह दूसरे ही दिन मंजू और बच्चों को साथ लेकर निकल गयी थीं.

मैं भी उसी रात की बस से हजारीबाग के लिए प्रस्थान कर गया था. तोपा कोलियरी हजारीबाग से लगभग चालीस किलोमीटर की दूरी पर है. उन दिनों जारीबाग से कुजू तक की यातायात व्यवस्था तो ठीक थी, पर कुजू से तोपा कोलियरी तक के लिए, किराए की कोई गाड़ी नहीं चलती थी. डटवां मोड़ से एक टूटी-फूटी सड़क तोपा के लिए जाती थी. जिसकी दूरी लगभग आठ कि.मी. थी. डटवां मोड़ से ही निजी ट्रक कोलियरी तक जाया करती थीं. किसी को यदि कोलियरी तक जाना है, तो या तो वह पैदल यात्रा करता था फिर ट्रक के चालक ने कृपा कर दी, तभी...

मुझे भी ट्रक चालक की कृपा का लाभ मिला था और मैं तोपा कोलियरी, अपने साले साहब के पास पहुंच गया था. मन में एक ही खटका था कि चूंकि हमने अपनी मर्जी से शादी की थी, सो पता नहीं मंजू के बड़े भैया का व्यवहार जाने कैसा हो मेरे साथ, पर साले साहब और उनकी पत्नी ने परिचय के साथ ही बड़ी ही आत्मीयता और आह्लाद के साथ मेरा स्वागत किया था. शिकायत सिर्फ इतनी रही उनकी कि मैं मंजू और बच्चों को साथ लेकर क्यों नहीं आया.

खैर, इतनी-सी शिकायत बनती भी थी उनकी. उसी दिन रात में साथ खाते हुए मेरे साले साहब ने, जिन्हें मैं भैया संबोधित करने लगा था, पूछा था मुझसे, ‘‘तो यहां से लौटकर आप सभी फिर से देहरादून चले जायेंगे?’’

‘‘हां! नौकरी तो करनी ही है न?’’

पुनः पूछा था उन्होंने, ‘‘अच्छा, वहां कितना वेतन मिलता है आपको?’’

उनके इस प्रश्न पर थोड़ा गड़बड़ाया था मैं, जिसे भैया शायद भांप गये थे, बोले थे, ‘‘नहीं....नहीं, नहीं बताना चाहते हैं, तो कोई बात नहीं. मैंने तो वैसे ही...’’

‘‘नहीं भैया, बताना क्यों नहीं चाहूंगा. वहां चार सौ रुपये प्रतिमाह मिलते हैं.’’

उस जमाने में चार सौ रुपये प्रतिमाह कम नहीं हुआ करते थे. फिर भी भैया के मुंह से अनायास ही निकल पड़ा था, ‘‘ठीक है.’’ लेकिन पुनः कुछ सोचते हुए बोले थे, ‘‘एक बात बताइए, उतने की नौकरी तो इधर भी मिल सकती है. अगर इधर मिल जाय, तब?’’

मुझे पता नहीं था कि भैया का परिचय बड़े-बड़े उद्योगपतियों से भी था. मुझे लगा था कि शायद वे मेरी नौकरी के लिए इसलिए परेशान थे, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि मैं बिहार से दूर देहरादून जाकर रहूं. मैं उन्हें परेशान नहीं करना चाहता था, बोला था, ‘‘क्या फर्क पड़ता है भैया, मैं यहां नौकरी करूं या वहां. आप झूठ-मूठ परेशान हो रहे हैं.’’

‘‘नहीं-नहीं, परेशानी कैसी.’’ बोले थे भैया, ‘‘दरअसल आपके लिए मैंने एक नौकरी तलाश कर रखी है. वहां भी चार सौ ही मिलेंगे. लेकिन आप सब हमारे नजदीक रहें, बस यही चाहता हूं मैं. मेरी मां भी यही चाहती है कि आप इधर ही कहीं नौकरी करें.’’

मैं समझ गया था कि मां ने पहले से ही भैया से मेरे संदर्भ में बात कर रखी होगी. तभी तो उन्होंने मेरे पहुंचने के पूर्व ही मेरी नौकरी के संदर्भ में कहीं बात कर रखी थी. शायद मां नहीं चाहती थीं कि उनकी बेटी अपनों से दूर रहे.

पुनः भैया बोले थे, ‘‘यहां जगेसर स्टेशन के पास एक कोलियरी है. उसका नाम भी जगेसर कोलियरी है. है तो वह प्राइवेट कोलियरी, लेकिन उसके मालिक नरेश देव बिहार के पूर्व डिप्टी एक्साइज मिनिस्टर के छोटे भाई हैं. उनसे मेरा बहुत ही अच्छा संबंध है. उन्हीं से बात की है मैंने. आपको कोलियरी पर ही रहना होगा. कोलियरी की दूरी यहां से लगभग डेढ़ घंटे की है. मंजू और बच्चों को आप मेरे पास छोड़ दीजिएगा और वहां ज्वाइन कर लीजिए. फिर वहां रहने की व्यवस्था हो जाय तो सभी को ले जाइएगा. बोलिये, मंजूर है?’’

मुझे भला क्या आपत्ति हो सकती थी?

तीन दिन भैया के पास रहकर चौथे दिन मैं बाल्मीकि नगर के लिए प्रस्थान कर गया था, फिर दो-तीन दिन वहां रहकर पत्नी और बच्चों के साथ तोपा लौट आया था. उसके बाद एक-दो-दिनों में ही मेरी नौकरी पक्की हो गयी थी और मैंने जगेसर कोलियरी में योगदान दे दिया था.

भैया ने एक काम और भी किया था- अखबार में आरक्षी प्रशिक्षण महाविद्यालय में क्लर्क की नौकरी के लिए रिक्तियां निकली थीं. जो सिर्फ महिलाओं के लिए आरक्षित थीं. भैया ने मंजू से भी आवेदन करवा दिया था. लेकिन वह आवेदन, महज आवेदन भर के लिए था. इसलिए कि मैं जानता था कि किसी को सरकारी नौकरी आसानी से तो मिल नहीं सकती, सो, हम भूल भी गये थे कि मंजू ने कोई आवेदन किया था.

कुछ ही दिनों में मुझे जगेसर स्टेशन पर एक चतुर्थ वर्गीय रेलवे कर्मचारी का क्वार्टर महज पंद्रह रुपये प्रतिमाह के किराये पर मिल गया था. एक रविवार को मैं तोपा जाकर मंजू और अपने दोनों बच्चे रितेश और ज्योति को साथ ले आया था.

जगेसर आकर मैं पूरी तरह अपनी नौकरी और परिवार को समर्पित हो गया था. मुझे लगने लगा था कि अब मेरा जीवन व्यवस्थित हो गया है. जबकि जहां मैं रहता था, वह क्वार्टर जगेसर गांव के अन्तर्गत आता था और जहां बच्चों के लिए किसी भी तरह की शिक्षा की व्यवस्था नहीं थी. लेकिन अभी मेरे बच्चे छोटे ही थे, इसलिए उनकी शिक्षा की चिंता करनी भी बेमानी थी.

मैं पूरी लगन के साथ अपने कार्य में संलग्न हो गया था. इस सोच के साथ कि अब अपना पूरा जीवन उसी नौकरी के सहारे काट लूंगा. पर मुझे कहां पता था कि वह कोलियरी पुलिस महकमे और राजनेताओं को मैनेज करके अवैध ढंग से संचालित था. सो, अभी नौकरी करते हुए मुझे तीन माह ही बीते थे कि अकस्मात एक दिन कोलियरी के कार्यालय को पुलिस के एक बड़े जत्थे ने घेर लिया था. फिर कार्यालय में कार्यरत अंकेक्षक तथा बड़ा बाबू को गिरफ्तार कर लिया था. कार्यालय के कागजात भी जब्त कर लिये थे. यहां तक कि कंपनी की एक जीप भी कार्यालय के बाहर लगी थी, उसे भी कब्जा में ले लिया था.

मेरी किस्मत अच्छी थी कि चूंकि मैं फील्ड वर्कर था, इसलिए कार्यालय से कोई दो किलोमीटर दूर की खदान का निरीक्षण कर मैं अपने क्वार्टर पर वापस लौट आया था. फिर दोपहर के भोजन के उपरांत थोड़ा विश्राम करने के बाद मैं कार्यालय में उस दिन की निरीक्षण रपट जमा करने के लिए बाहर निकला ही था कि स्टेशन मास्टर मुखर्जी साहब ने मुझे टोकते हुए पूछा था, ‘‘ऑफिस जा रहे हैं वर्मा जी?’’

मेरी, सहमति में सिर हिलाने के बाद बोले थे वे, ‘‘चुपचाप घर में जाइए, नहीं तो आप भी फंस जाएंगे.’’

मैंने विस्मित आंखों से उनकी ओर देखा था.

‘‘आपके ऑफिस को चारों तरफ से पुलिस ने घेर रखा है. आपके एकाउंटेंट और बड़ा बाबू को गिरफ्तार भी कर लिया है. आप जाइएगा तो कहीं आपको भी...’’

वे बोलते गये थे और मुझे लगता रहा था, जैसे मेरे सामने मुखर्जी साहब नहीं, बल्कि साक्षात यमराज आ खड़े हुए हों, जो मेरे प्राण ही निकाल लेने को आमादा हों. मेरे मुंह से हकलाहट भरी आवाज निकली थी, ‘‘ये...ये आप क्या कह रहे हैं मुखर्जी साहब! ऐसा भला कैसे हो सकता है?’’

‘‘लगता है, आपको कुछ पाता नहीं. ई कोलियरी गैर कानूनी तोरीके से चाल राहा है, ये ही वास्ते इ सब हुआ है. ऐसा पहले भी...’’

बाकी की बातें सुनने का धैर्य नहीं रहा था मुझमें. मैंने भागकर घर में रजिस्टर रखा था और तेजी से कार्यालय की ओर निकल गया था, ताकि दूर से ही वहां के हालात का जायजा ले सकूं.

मुखर्जी साहब ने ठीक ही कहा था. कार्यालय के सामने अफरा-तफरी मची थी.

इस प्रकार सरकार द्वारा कोलियरी को अवैध घोषित करके उसे बंद कर दिया गया था और वहां पर पुलिस की एक टुकड़ी बिठा दी गयी थी.

मैं लगभग एक सप्ताह तक इंतजार करता रहा था कि शायद हजारीबाग में अवस्थित हमारे हेड-ऑफिस, अर्थात कोलियरी मालिक की ओर से कोई सूचना आ जाय. पर वैसा कुछ नहीं हुआ था. हार कर मैं खुद हेड ऑफिस के लिए प्रस्थान कर गया था. मालिक नरेश देव ने मेरी परेशानी को सहजता से लिया था. बोले थे, ‘‘आप चिंता क्यों करते हैं? जाइए, वहीं जाकर रहिये. जब तक कोलियरी खुलती नहीं है, आपको वेतन मिलता रहेगा. दरअसल सरकार कोलियरी को टेकओवर करना चाहती है. वहां के मजदूर भी घबरा रहे होंगे. उन्हें भी समझा दीजिएगा कि कोलियरी जल्द ही खुलेगी. वह भी नेशनलाइज होकर. और अगर मजदूर वहां से चले गये, तो सरकारी नौकरी से वंचित रह जायेंगे.’’ फिर उस महीने के वेतन के चार सौ रुपये मुझे थमाते हुए वे पुनः बोले थे, ‘‘मजदूरों पर खास ध्यान रखियेगा कि वे वहीं बने रहें.’’

जैसा, नरेश देव ने कहा था, मैंने वैसा ही किया था. सारे मजदूरों को विश्वास दिला दिया था कि दोबारा कोलियरी जब खुलेगी तो नेशनलाइज होकर ही. उन्हें मेरी बातों पर तो कम, लेकिन चूंकि मैंने भी वहीं अड्डा जमा रखा था, इस कारण

अधिक विश्वास हो गया था कि मैं सच बोल रहा था. उनके चेहरे पर भविष्य की एक स्वर्णिम सपने सरीखाी आभा झिलमिला उठी थी.

लेकिन कोलियरी को न खुलना था, न खुली ही. महीने दर महीने बीतते चले गये. देखते ही देखते चार महीनों का लम्बा अंतराल बीत गया. मजदूर मेरे पास आते, मुझसे पूछते कि कोलियरी कब नेशनलाइज होगा बाबू. और मैं रटा-रटाया एक जुमला उनकी ओर उछाल देता, ‘‘जल्दी ही होगा.’’ पर अब मैं भी निराश होने लग गया था. निराशा का कारण यह था कि दो महीनों तक तो नरेश देव मेरे पास वेतन भिजवाते रहे थे, पर तीसरे महीने से उन्होंने मेरी सुध लेनी बंद कर दी थी. इसके बाद तो लम्बे संघर्ष का दौर गुजरा था मेरे साथ. ऐसी-ऐसी नौबत आयी थी कि कई-कई शाम भोजन पर भी आफत. लेकिन ऐसा नहीं कि नियति को मेरी सुध ही नहीं थी.

अचानक एक दिन मेरी सरहज और सासु मां का आगमन मेरे निवास पर हुआ- एक खुशखबरी के साथ. साले साहब के घर तोपा में रहते हुए, जो मेरी पत्नी ने आरक्षी प्रशिक्षण महाविद्यालय में नियुक्ति के लिए आवेदन दिया था, उस नौकरी के लिए उसकी शैक्षिक योग्यता के आधार पर नियुक्ति हो गयी थी. उसी नियुक्ति पत्र के साथ मेरी सरहज और सासु मां का आगमन हुआ था.

दूसरे ही दिन हम अपने बोरिया-बिस्तर के साथ हजारीबाग आ गये थे. आर्थिक संकट तो था, हमारे साथ, पर शुरुआती खर्च के लिए मेरे साले साहब श्री जार्ज लुक्स ने ही व्यवस्था कर दी थी. आरक्षी प्रशिक्षण महाविद्यालय के परिसर में ही मेरी पत्नी को आवास भी आबंटित कर दिया गया था.

इस प्रकार देखते ही देखते हमारे जीवन की सारी समस्याओं का समाधान हो गया था. वह भी असालतन (परमानेंट). बाद में चलकर कोलियरी के प्रकरण पर मैंने ‘कठपुतली’ शीर्षक एक कहानी भी लिखी थी, जिसे सदानंद सुमन ने अपने द्वारा संपादित पत्रिका ‘सरोकार’ में प्रकाशित की थी.

--

क्रमशः....

सम्पर्क : क्वा. नं. के-10, सी.टी.एस. कॉलोनी,

पुलिस लाइन के पास, हजारीबाग-825301

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

-----****-----

-----****-----

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1

.... प्रायोजक ....

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधाएँ ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=blogging$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3843,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,336,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2786,कहानी,2116,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,486,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,329,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,50,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,9,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,17,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,834,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,7,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,315,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1921,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,648,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,688,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,55,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: प्राची // जून 2017 // धारावाहिक आत्मकथा (छठीं किस्त) // अनचाहा सफर // रतन वर्मा
प्राची // जून 2017 // धारावाहिक आत्मकथा (छठीं किस्त) // अनचाहा सफर // रतन वर्मा
https://lh3.googleusercontent.com/-KpDONCkLJ98/WXcT77FgHiI/AAAAAAAA5sc/Qz4be43QYW0VUVeWjNDgu7opDdN6DcyUwCHMYCw/image_thumb%255B1%255D?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-KpDONCkLJ98/WXcT77FgHiI/AAAAAAAA5sc/Qz4be43QYW0VUVeWjNDgu7opDdN6DcyUwCHMYCw/s72-c/image_thumb%255B1%255D?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2017/07/2017_85.html
https://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2017/07/2017_85.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ