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व्यंग्य / झांकी झूठ न बोले / विनोद शंकर शुक्ल

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गणतंत्र दिवस की झांकियों ने मुझे हमेशा मुग्ध किया है। यह अवसर देश के विकास को सजा-धजाकर प्रस्तुत करने का है। सारे सरकारी अमले अपने-अपने विका...

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गणतंत्र दिवस की झांकियों ने मुझे हमेशा मुग्ध किया है। यह अवसर देश के विकास को सजा-धजाकर प्रस्तुत करने का है। सारे सरकारी अमले अपने-अपने विकास की साज-सज्जा में गले तक डूब जाते हैं। सुसज्जित विकास को भव्य रथों पर आरूढ़ कर जनता के सामने यों पेश करते हैं जैसे आशिक घुटनों के बल बैठकर महबूबा को फूलों का गुलदस्ता भेंट करता है।

इस दिन देश का आम आदमी भी कृषि, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस ,वन, जेल आदि के क्षेत्र में हुए बहुमुखी विकास को एक साथ, एक जगह देख सकता है। दिव्य रथों पर भव्य विकास को देख उसका सीना गर्व से गज भर चौड़ा हो जाता है। विकास के स्वर्ग की झलक कुछ देर के लिए उसे राशन, महंगाई, बेकारी जैसे रोजमर्रा की मुसीबत से बाहर निकाल लाती है।

गणतंत्र दिवस सरकार के लिए विकास का ढोल पीटने का सर्वश्रेष्ठ अवसर होता है। जो लोग निजी अनुभवों के आधार पर सरकार के काम-काज से क्षुब्ध रहते हैं, झांकियों की चकाचौंध उनकी क्षुब्धता को भी मुग्धता में बदलने में सफल हो जाती है।

वैसे केन्द्र और राज्य सरकार के पास विकास के नगाड़े बजाने के लिए और कई वाद्ययंत्र होते हैं जैसे आकाशवाणी, सरकारी दूरदर्शन और पत्र-पत्रिकाओं के रंगारंग विज्ञापन वगैरह।

आकाशवाणी से तो विकास का भक्ति संगीत अनवरत प्रसारित होता रहता है। खबरें तो विकास के भार से इतनी दबी होती है कि एंकर का दम फूलने लगता है। उनके अलावा जब-तब प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी विकास का राग पक्के गवैइये की तरह अलापते रहते है। आकाशवाणी के प्रगति संगीत के सामने चाहे फिल्म संगीत हो, रवीन्द्र संगीत या कर्नाटक संगीत यों फीके पड़ जाते हैं जैसे खीर के आगे खिचड़ी और अफसर के सामने आदमियत।

दूरदर्शन का सरकारी चैनल तो जैसे विकास का आर्केस्ट्रा बजाने के लिए ही पैदा हुआ है। भगवान कृष्ण ने जैसे अपने श्रीमुख में अर्जुन को ब्रम्हाण्ड के दर्शन करा दिये थे, वैसे ही दूरदर्शन के छोटे पर्दे पर सरकार के विराट विकास के दर्शन करा देता है।

विकास की दुंदभि सरकार पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भी खूब बजाती है। इतनी ज्यादा की उनका पूरा पृष्ठ भी छोटा पड़ जाता है। परिणाम स्वरूप सरकारें पूरे अखबार को ही पोस्टर बना डालती है।

सरकार की लोक-कल्याणकारी योजनाएं अत्यंत लोक लुभावन होती हैं। ऐसी कि उन पर कुर्बान होने के लिए मन मचलने लगता है। ये अलग बात है कि अखबारों से उतरकर वे जमीन पर कभी कदम नहीं रख पाती। कमबख्त ऐसे सुनहले सपने दिखाती है कि सरकार से कहने का मन होता है-'हूजूरेवाला' आपकी मनभावन योजनाएं पढ़ी, बहुत खूबसूरत है। इन्हें जमीन पर मत उतारियेगा, मैली हो जाएंगी।

झांकियों में मुझे पुलिस विभाग की झांकी सबसे अच्छी लगती है। उससे पुलिस विभाग की शानदार प्रगति का पता चलता है। पिछले साल की झांकी में मैं पुलिस की प्रगति की रफ्तार देखकर दंग रह गया था। झांकी में पांच सौ की आबादी वाले एक देहात के थाने को प्रस्तुत किया गया था। विभाग ने गर्व से बताया था कि देहात में न बिजली पहुँची है, न पाठशाला और न ही अस्पताल लेकिन पुलिस पहुँच गई है। थाने की दीवार पर विभाग का नारा (मोटो) भी अंकित था-'विकास पल-प्रतिपल, पुलिस प्रत्येक से अव्वल' इस जबर्दस्त रफ्तार ने मुझे थोड़ा भयभीत भी कर दिया था। डर लगा कि कहीं यही गति रही तो विभाग हर घर के पीछे एक थाना स्थापित न कर बैठे?

इस बार की झांकी पुलिस के आचरण में सुधार पर केन्द्रित थी। शायद इसलिए कि भारतीय पुलिस जन्म से ही रिश्वतखोरी, कामचोरी और नेताओं की खुशामदखोरी के लिए 'विख्यात' है। झांकी में बताया गया था कि पुलिस के दाग-धब्बों की धुलाई के लिए विभाग ने 'आदर्श थाना योजना' संचालित की है। झांकी में एक आदर्श थाने का एक मॉडल भी प्रस्तुत किया गया था।

आदर्श थाने के लॉकअप में पन्द्रह-बीस सफेदपोश दिखाये गये थे। नुकीली मूंछ और थुलथुल पेट वाला थानेदार उन्हें इन शब्दों से डपट रहा था-'तुम सब श्रीमान शातिर और सिरफिरे हो। पुलिस को रिश्वतखोर समझते हो। एफ आई आर लिखने के लिए रिश्वत की पेशकश करते हो। यह आदर्श थाना है। यहां थाने के चारों ओर सौ गज तक रिश्वत का प्रस्ताव, ऊपरी पहुँच की धमकी-चमकी और पुलिस के काम में रूकावट पुलिस के बर्दाश्त के बाहर है। आदर्श थानों में पुलिस के आचरण की पव़ित्रता को प्राथमिकता दी जाती है। यहां हर दिन 'रघुपति राघव राजा राम' के भजन से काम शुरू किया जाता है। बापू की फोटो हमें निर्मल आचरण की प्रेरणा देती है। तुमने हमें भ्रष्ट करने की कोशिश की इसलिए अंदर हो।

थानेदार ने चार सेकंड का ब्रेक लिया क्योंकि दम फूलने लगा था। फिर उसके कठोर चेहरे पर हल्की मुस्कान उभरी। उसने आगे कहा-' चिन्ता मत करो। सौ गज के बाहर निर्मल आचरण की बाध्यता समाप्त हो जाती है। यहां लेन-देन और कानून की टिक्काबोटी जायज है।'

' आदर्श थाना योजना' मुझे अच्छी लगी। सौ गज के क्षेत्र में ही सही, पुलिस की निर्मल आचरण का प्रयोग मुझे चमत्कारिक लगा।

स्वास्थ्य विभाग की झांकी में भी आकर्षण र्प्याप्त मात्रा में था। उसकी प्रगति का भी ओर-छोर मुझे कहीं दिखाई नहीं दिया। झांकी में एक सरकारी अस्पताल के चिकित्सक स्वस्थ हो चुके मरीजों को अस्पताल छोड़ने के लिए कह रहे थे। दर्जन भर मरीज चिकित्सक के पैर पकड़कर छुट्टी न देने के लिए गिड़गिड़ा रहे थे। उनका कहना था कि इतनी शानदार सुविधाएं ऐसा शालीन व्यवहार, ऐसी अपूर्व सेवा, इतना पौष्टिक भोजन, इतनी उत्कृष्ट दवाएं हमें घर क्या कहीं भी उपलब्ध नहीं हो सकती। हम आजीवन इसी स्वर्ग में रहना चाहते है। यदि हमें छुट्टी दी गई तो हम सामूहिक आत्महत्या कर लेंगे।

झांकी देखकर मेरी आंखें फटी की फटी रह गई। विश्वास नहीं हुआ कि दुनिया में ऐसे सरकारी अस्पताल भी हो सकते है? मेरे मन में भी बीमार होकर अस्पताल में भर्ती होने की इच्छा ने जन्म ले लिया।

शिक्षा विभाग की झांकी भी श्रेष्ठता के प्रदर्शन में पीछे नहीं थी। श्रेष्ठता के नमूने के तौर पर विभाग ने एक सरकारी पाठशाला को प्रस्तुत किया था। शाला बच्चों को मुफ्त में असीमित ज्ञान-विज्ञान बांट रही थी। इतना कि बच्चे बाढ़ में बहते दिख रहे थे। शिक्षकों की कर्त्तव्यपारायणता का हाल यह था कि वे अवकाश के दिनों में भी पढ़ाई स्थगित नहीं करते थे। बच्चों का शाला से इतना लगाव बताया गया था कि सूर्य के पहली किरण फूटते ही वे मां-बाप से स्कूल भेजने की जिद करने लगते थे। शाम को सब मिलकर भगवान भुवन-भास्कर से अनुरोध करते थे कि वे दो-ढाई घंटे देर से अस्त हों ताकि उन्हें शाला में ज्यादा से ज्यादा रहने का अवसर मिल सके।

झांकी यह भी सूचित करती थी कि मीडिया की शिक्षकों और उपकरणों की कमी की खबरें बेसिरपैर की है। विभाग के पास शिक्षकों और उपकरणों का जंगी स्टाक मौजूद है। इतना कि मांगने पर पड़ोसी राज्य को भी शिक्षकों की सप्लाई कर सकते है। स्टाक के बहुतेरे उपकरणों में जंग लग रही है। उन्हें खपाने के लिए विभाग ने शालाओं के बीच 'उपकरण मांगो और पुरस्कार पाओ' स्पर्धा शुरू की है।

जेल विभाग की झांकी का ठाठ भी देखते ही बनता था। एक बड़ा-सा कक्ष दिखाया गया था। जिसमें तिपाइयों पर अनेक महापुरूषों की फूलमालाओं से सुसज्जित तस्वीरें रखी थी। कैदियों से कहा गया था कि जो जिस महापुरूष जैसा बनना चाहता है, उसकी फोटो के सामने बैठकर उस जैसा बनने का शपथ ले। महात्मा गांधी जैसा बनने वालों की संख्या सबसे ज्यादा थी। कैदी घुटनों तक खादी की धोती पहनकर पहले शपथ लेते थे फिर टोली में बैठकर 'वैष्णवजन तो--कहिए' भजन गाने लगते थे।

एक भूतपूर्व डकैत कैदी ने प्रस्तावित तमाम महापुरूष को ठुकराते हुए भगवान बुद्ध बनने की इच्छा प्रकट की। उसके लिए जेल अधिकारियों ने किसी तरह भगवान बुद्ध की फोटो की व्यवस्था की , जो असल में भगवान महावीर की थी। डकैत ने 'बुद्धम शरणम् गच्छामि' का उदघोष किया तो गांधी, नेहरू, पटेल पाले के कई कैदी बुद्ध शरण में आ गए। जेल लगभग बुद्धमय हो उठा।

जेल को' महापुरूष निर्माणालय' बनते देखकर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। मेरी नजरों में जेल विभाग की इज्जत एकाएक बढ़ गई। जैसे बीसियों वायदों में एकाध भी पूरा करने वाले मंत्री की इज्जत जनता में अचानक बढ़ जाती है।

झांकियां देखकर सरकारी विभागों के संबंध में मेरे मन में बैठी अनेक गलत धारणाएं ध्वस्त हो गई। पहले यही धारणा ध्वस्त हुई कि पुलिस और रिश्वतखोरी का संबंध नेता और नोट जैसे प्रगाढ़ और अविच्छेदय है। मेरी यह सोच भी गलत सिद्ध हुई कि सरकारी चिकित्सालयों और मरीजों का संबंध मीडिया और सामाजिक सरोकारों की तरह विरोधी है। मैंने यह भी जाना कि शिक्षा विभाग और शिक्षा का संबंध भगवान और भोग तथा मंडी और मिलावट की तरह अखंड और अटूट है। जेल और अपराधियों का संबंध शिशु और सोहर तथा हुस्न और इश्क की तरह प्यारा लगा।

कई चतुर सुजानों ने मेरे आंखिन देखे सत्य से असहमति व्यक्त की। उन्होंने कहा कि कृषि विभाग की झांकी को असली तभी माना जाएगा जब ऐसा पेड़ प्रदर्शित किया जाए, जिसकी हर शाख पर पत्तों की जगह किसानों के शव लटक रहें हों। और जेल की झांकी में हर कैदी टीबी का मरीज होते हुए पत्थर तोड़ रहा हो।

मुझे सुजानों की सोच बड़ा नकारात्मक लगी। मैंने उनसे कहा-''भाई मेरे! किसान कर्ज से नहीं मदिरा के मर्ज से मर रहे है और अगर टीबी के मरीजों से पत्थर तुड़वाए जा रहें हैं तो उनके फेफड़ों के परीक्षण के लिए कि उनमें कितनी जान बाकी है? अक्ल के दुश्मनों! अच्छी तरह जान लो कि दर्पण की तरह झांकियां कभी झूठ नहीं बोलती।

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विनोदशंकर शुक्ल

35 संस्कृति,

मेघ मार्केट के सामने

बूढ़ापारा रायपुर

492001

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प्रस्तुति - बीरेन्द्र साहू

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रचनाकार: व्यंग्य / झांकी झूठ न बोले / विनोद शंकर शुक्ल
व्यंग्य / झांकी झूठ न बोले / विनोद शंकर शुक्ल
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