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कहानी // कसते बंधन : छलकते आँसू - // डॉ० कुसुमाकर शास्त्री

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अग्रहायण की शीत भरी धुंधली शाम थी। चारों ओर शांति एवं ठंडक का साम्राज्य था। ऐसे शांत एवं ठंडे वातावरण में भी सविता अशांत थी। वह सोच रही थी अ...

पूनम चंद्रिका त्यागी की कलाकृति

अग्रहायण की शीत भरी धुंधली शाम थी। चारों ओर शांति एवं ठंडक का साम्राज्य था। ऐसे शांत एवं ठंडे वातावरण में भी सविता अशांत थी। वह सोच रही थी अपने पति संजय के बारे में।

कुछ दिनों पूर्व जिन्हें एक क्षण का भी वियोग सह्य न था, वही आज महीनों से, न जाने क्यों, घर बहुत कम आते हैं ,आते भी हैं तो फ़ाइल को अलमारी के हवाले कर न जाने कहाँ चले जाते हैं। इसी तरह दिन बीतते गए। लेकिन थोड़े ही दिनों बाद संजय के चेहरे पर आशंका की रेखाएँ उभरती सी दीख पड़ी । सविता के पैने नेत्रों से यह छिपी न रह सकी ।  उन आशंका की रेखाओं को देखकर सविता के अन्तःकरण से भी आवाज आई -" दाल में कुछ काला अवश्य है।"

एक ही क्षण बाद उसका विचार बदल गया -"छि:! मैं क्या सोचने लगी,  मेरे पतिदेव और वह भी संजय किसी की नजर का शिकार बने, ऐसा कदापि नहीं हो सकता,हरगिज नहीं हो सकता..........।" सविता ने निर्णय किया कि वह उनसे पूछेगी -" आखिर ऐसा क्यों हैं ? क्या मुझसे कोई त्रुटि हो गयी है? त्रुटि हुई भी होगी तो क्षमा मांग लूँगी ,वह अवश्य क्षमा कर देंगे। "

ऐसा निर्णय कर के वह उठी। उसने जो घड़ी देखी ,चौंक गयी । बारह बज चुके थे। वह चुपचाप सो गयी। संजय अपने किसी मित्र के यहाँ गया था।

सविता सवेरे उठी। आज रविवार है । संजय अपने मित्र के घर से 8 बजे वापस आया। थोड़ी देर तक फ़ाइलों में सिर खपाने के बाद स्नान किया । इसी बीच सविता ने भोजन तैयार कर दिया। खाना खाकर संजय ने कपड़े पहने और कहीं जाने के लिए तैयार हो गया ।

सविता ने तो निर्णय कर ही लिया था,अतः संजय को रोकते हुये उसने पूछा-"एक समय था जब मुझे देखे बिना आपको क्षण भर भी चैन नहीं पड़ता था। आजकल घर खाना खाने के लिए भी नहीं आते, कभी आते भी हैं तो उल्टे पाँव जाने को तैयार रहते हैं।

बीच में ही संजय बोला-"बंद करो यह लेक्चरबाजी,मुझे जल्दी है मैं जा रहा हूँ। " "नहीं आपको इसका कारण बताना ही पड़ेगा!" सविता ने हठ किया। इस परज़ोर से चीख कर उसने कहा-" यदि तेरी जिद है तो सुन ,जब तक मैं समझता था कि तुम मेरी हो,मैं इस घर को अपना समझता था पर......... अब मैंने यह जान लिया है कि तुम किसी और को चाहती हो।”

     “नहीं स्वामी यह झूठ है।” धीमे एवं करुण स्वर में-“हे प्रभु! यह क्या लीला है तेरी?” कहते हुये वह अर्ध-मूर्च्छित सी होकर अपना सिर हाथ में थामकर बैठ गयी।”

     “नाथ मैं ईश्वर की सौगंध खाकर कहती हूँ ,मैंने आपके सिवा किसी और से प्यार नहीं किया।”

     “अच्छा सुनो” संजय बोला-“ तुम मनोज को जानती हो न?”

     “जी हाँ,”

     “जब तू पढ़ रही थी तभी से तेरा उससे प्यार चल रहा था।”

     “नहीं देव! आप विश्वास करें, मैं ऐसे दुष्ट लफंगे से कभी प्यार नहीं कर सकती, न ही कभी प्यार किया,एक बार उसने मुझसे कुछ गंदी बातें करने की चेष्टा की थी जिसके उत्तर में मैंने ऐसा चांटा लगाया था की उसे अब भी याद होगा।”

संजय का मनोज की बातों पर विश्वास और भी ढ़ृढ़ हो गया।

    “अच्छा ,मैं जा रहा हूँ,मेरे आने से पूर्व तुम मेरे घर से चली जाना, बस भला इसी मे है” कहते हुये संजय घर से बाहर चला गया।

संजय ने माधुरी को दोपहर 12 बजे मिलने का वायदा किया था। आज उसके मार्ग का रोड़ा दूर हो गया यह ध्यान आते ही उसे थोड़ी शांति मिली। वह हाँफते-हाँफते माधुरी के घर पहुंचा। उसे देखकर माधुरी का मुख-कमल खिल उठा।

दोनों ने जलपान किया। माधुरी एक पत्रिका का पुराना अंक देख रही थी,जिसके खुले पृष्ठ पर मोटे अक्षरों में छपा था-“धोखा दिया” संजय ने उसे पढ़ा और सोचने लगा- ठीक है उसने धोखा दिया तो क्या हुआ? मैं उसे तलाक दे दूंगा। उसके और माधुरी के बीच काफी देर तक बातचीत होती रही। अंत में उसने कहा-“माधुरी! यदि बुरा न मानो तो एक बात कहूँ। देखो” संजय बोला-“ मैं तुमसे विवाह करने के ध्येय से ,तुम्हारी इच्छा पूरी करने आया हूँ।”

     “धन्यवाद, मेरे बड़े भाग्य जो यह शब्द सुन रही हूँ।” उसके हृदय में एक विचित्र सी गुदगुदी हो रही थी। 

मैंने अपनी कंटक-स्वरूपा पत्नी को निकाल दिया, अब मैं स्वतंत्र हूँ।”

     “हैं! तुमने यह क्या किया? निकाल दिया। धोखा दिया, संजय! तुमने यह क्यों नहीं बतलाया कि तुम विवाहित हो।”

     “तुम चिंता न करो मैं उसे.......”

     “संजय चुप रहो तुमने धोखा दिया।”

     “मैं उसे तलाक दे दूंगा।”

     “कुछ नहीं,आज तुम उसे तलाक दे रहे हो और मुझसे विवाह कर रहे हो,कल किसी और से विवाह करोगे और मुझे छोड़ दोगे.......”

     “नहीं माधुरी,मैं तुम्हें नहीं छोडूंगा, विश्वास करो।”

     “नहीं मैं ऐसे पुरुष का विश्वास नहीं कर सकती जो एक पतिव्रता को ठुकराता है,ऐसे नीच पुरुष को मैं अपने पास देखना भी नहीं चाहती,तुम अभी मेरी नजरों से दूर चले जाओ।” संजय के सारे प्रयत्न निष्फल हो गए।

उसने अनुभव किया कि सचमुच माधुरी ने उसे धोखा दिया। सविता चली गयी होगी यह चिंता भी थी। तभी उसके मस्तिष्क में एक बात और आई, वह यह कि कहीं मनोज ने भी उसे धोखा तो नहीं दिया? उसका आशा महल ढह गया था। वह इसी प्रकार के विचारों में डूबा हुआ थका निराश घर की ओर बढ़ने लगा।

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मनोज भी इसी शहर के एक स्कूल में क्लर्क है। वह संजय के घर से कोई दो फर्लांग दूर रहता है। उसे जब मालूम हुआ कि उसका मित्र संजय अपनी पत्नी सविता को घर से निकल जाने को कहकर कहीं गया है  तो उसकी बाँछे खिल गयी। वह सविता के घर की ओर चल पड़ा। 

सविता अपने पति के व्यवहार से दुःखी थी ही,मायके जाने को तैयार हुयी। पर उसके मन में तुरंत यह बात आई कि यदि उसका पति भूल कर रहा है तो ऐसे समय में प्रभु से प्रार्थना करनी चाहिए ताकि उसके पतिदेव की दुर्बुद्धि दूर हो जाए, वे वास्तविकता समझें, ऐसा कार्य करें जिससे संसार में उनकी कीर्ति फैले। वह प्रार्थना कर ही रही थी कि बाहर से प्रवेश करते हुये किसी अपरिचित पुरुष की आवाज सुनाई दी-“ कहिए सविता जी , आप मुझे बिलकुल ही भूल गयी क्या?”सविता क्रोध से भुनी जा रही थी, उसने कहा- “आवारा! दुष्ट! लफंगा! मेरे घर में आने की तूने हिम्मत कैसे की? मेरे शिव सदृश भोले पति के कान भरकर आज ऐसी हालत की। उसकी आँखों से अंगारे निकल रहे थे। हट नीच! नारकी! मैंने तुझसे कब प्यार किया था? बता तूने मेरे चमन में क्यों आग लगाई?”

       “ तूने न किया, न सही, पर मैं तो करता हूँ, मेरी बात मान लो मैं सब ठीक कर दूँगा।” वह मुसकुराते हुये- “देखें अब तुझे कौन बचाता है?” ऐसा कहकर सविता की ओर लपका ही था कि बाहर से प्रवेश करते हुये संजय की आवाज आई-“ मैं बचाऊंगा मनोज! मेरे रहते हुये कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता।”

       “तुम आ गए संजय! देखो सविता मुझसे प्रणय की भीख मांग रही थी, मैंने इसे इतना समझाया कि पुरानी बातें भूल जाओ पर..........।”

       “चुप रहो मनोज!” क्रोध से आँखें लाल किए संजय बोला-“मैंने सारी बातें सुन ली हैं,भला इसी में हैं कि तुम चले जाओ।” मनोज चुपचाप चला गया।

सविता ने अपनी आँखों के सामने सबकुछ चलचित्र की भांति देखा। संजय को अपनी भूल तथा सविता के पतिव्रत धर्म दोनों की परख हो चुकी थी।

दोनों परस्पर आलिंगनबद्ध थे। उनकी आँखों से आंसुओं की अविरल धार बह रही थी। उनके बीच जो भ्रम या कालुष्य था वह आंसुओं में बह गया और उनके प्रेमबंधन जो ढीले पड़ गए थे, और कस गए।

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रचनाकार: कहानी // कसते बंधन : छलकते आँसू - // डॉ० कुसुमाकर शास्त्री
कहानी // कसते बंधन : छलकते आँसू - // डॉ० कुसुमाकर शास्त्री
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