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बालकथा // शिखर का संकल्‍प // शशांक मिश्र भारती

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शिखर और शिखा गहरे दोस्‍त थे। एक साथ पढ़ना-लिखना और खेलना होता था। कभी एक को परेशानी होती तो दूसरा उसके लिए परेशान हो जाता। दोनों के घर आमने -सामने थे। जब चाहते एक- दूसरे के यहां पहुंच जाते।

बाजार में हर्षोल्‍लास का वातावरण था। चारों तरफ दुकानें संज -संवर रहीं थी। जिधर देखो-उधर ही रंग-बिरंगे ग्रीटिगों , बधाई पत्रों ,फूलों के गुलदस्‍तों आदि की बहार थी।

दिसम्‍बर का अंतिम सप्‍ताह चल रहा था। दूर के रिश्‍तेदारों ,मित्रों को नववर्ष की बधाईयां भेजी जा रही थीं। बच्‍चों के उत्‍साह का तो कोई ठिकाना न था। नये वर्ष की पार्टियां उत्‍सव तो अच्‍छे लगते ही थे। सबसे अच्‍छी इन पर्वों पर मिलने वाली मिठाईयां लगती थीं।

पिछले कई वर्षों से इस अवसर पर कोई न कोई उत्‍सव करवाया जाता रहा था। इस वर्ष भी वही मुख्‍य आकर्षण का केन्‍द्र था। सभी को पूर्ण विश्‍वास था ; कि प्रत्‍येक वर्ष की भांति ही कुछ न कुछ नया किया जायेगा और यह सब शिखर भैया के प्रयासों से होगा। इस वर्ष का उत्‍सव मुहल्‍ले के खाली पड़े मैदान में होगा। सभी को सूचना दे दी गयी थी।

सभी बड़ी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। दिन कब बीत गये। पता ही न चला। आखिर वह दिन भी आ गया। जिसका सभी को इन्‍तजार था। शाम होते- होते मैदान में भीड़ लग गयी। चारों ओर की गई सजावट और रंग-बिरंगी रोशनी से मैदान जगमगा रहा था। सभी हर्ष व उल्‍लास से भरे थे और एक -दूसरे को बधाईयां दे रहे थे। गाने वाले गा रहे थे। नाच सकने वाले नाच भी रहे थे।

यहां पर की सारी व्‍यवस्‍था शिखर ने अपने दोस्‍तों नेहा ,प्रीति ,दीपू , आशू , मिलन , शांति , हेमा , उपदेश , गौरव , चेतन , आदि के सहयोग से की थी। सभी बच्‍चों के साथ उनके माता-पिता भी इस आयोजन में आये थे।

मंच पर आ -आकर सभी अपने विचार रख रहे थे। कोई गाना सुना रहा था। कोई बधाई पत्र पढ़ रहा था। तो कोई महीनों के नाम गिनाकर उनके इतिहास को समझा रहा था। सभी अपने -अपने में व्‍यस्‍त थे। चारों ओर से तालियों की गड़ -गडाहट गूंज रही थी। एक -एक कर सभी के माता -पिता ने अपने- अपने विचार अपनी रुचि पूर्वक रखे।

अंत में मंच पर बोलने पहुंचा शिखर। सबसे पहले सभी को बधाई दी। जोरदार तालियां बजबायीं ; सभी को यहां पर आने लिए धन्‍यवाद दिया। फिर कुछ क्षण शांत रहने के बाद बोला......................................................

‘‘हां सुनिये , आज हम सब नव वर्ष मनाने के लिए एकत्रित हुए हैं। बधाई ! मनोरंजन की बातें बहुत हो चकी हैं। जो सबसे महत्‍वपूर्ण बात है। वह किसी ने नहीं की ? आज का दिन संकल्‍प का है। नये- नये सपनों को पालने का है। पिछले वर्ष के अधूरे लक्ष्‍य को पूरा करने का है। दूसरों के दुःख दर्द को समझ कर बांटने का है। इस दिन को कलैण्‍डर बदल देने वाला ही न समझिये! अपने आपको बदलिए!! अपने देश -समाज- संस्‍कृति के प्रति सोच को बदलिए!!! बढ़ते प्रदूषण की रोकथाम ,साक्षरता, वृक्षारोपण ,जन-जागरूकता आदि पर ध्‍यान दीजिए।

यदि हम सब यूं ही दिखावटी नव वर्ष मनाते रहे। पार्टियों- मनोरंजन के नाम पर आधी- आधी रात तक जागते रहे ; तो हम सभी का अस्‍तित्‍व खतरे में पड़ जायेगा धन्‍यवाद।’’ शिखर ने अपनी बात समाप्‍त करते हुए कहा ,

इसके बाद सभा सभी ने संकल्‍प दोहराया। उसके बाद सभा समाप्‍ति की घोषणा की गई । सभी पुनः एक -दूसरे के गले मिले। बधाई दी। मिठाईयां खाने व खिलाने के बाद अपने- अपने घरों को चले गए।

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शशांक मिश्र भारती

संपादक-देवसुधा

हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर - 242401 उ.प्र.

दूरवाणी ः-09410985048/09634624150

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