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कहानी // विजेता // अर्जुन प्रसाद

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मेरठ के बाबू प्रभुदयाल बड़े ही उदार, सज्‍जन पुरुष थे। रिश्‍वतखोरी और भ्रष्‍टाचार के कुफल को वह भलीभांति जानते थे। अपने जमाने में वह बहुत ईमा...

संतोष नामदेव की कलाकृति

मेरठ के बाबू प्रभुदयाल बड़े ही उदार, सज्‍जन पुरुष थे। रिश्‍वतखोरी और भ्रष्‍टाचार के कुफल को वह भलीभांति जानते थे। अपने जमाने में वह बहुत ईमानदार, उज्‍जवल चरित्र के व्‍यक्‍ति माने जाते थे। उनका मत था कि मनुष्‍य को स्‍वभाव से सदैव नेक, विनम्र और उच्‍च आदर्शमय चरित्र का ही होना चाहिए। उसे दूसरों के लिए मिसाल कायम करनी चाहिए। अगर हर इंसान चरित्रहीन और भ्रष्‍ट ही होगा तो आने वाली पीढि़यों को सबक कौन देगा? नेक नियति, सज्‍जनता और धर्म-अधर्म की बातें मात्र किताबों में पढ़ने को मिला करेंगी। अपने आसपास बेहतर नजीर उन्‍हें सपने में भी देखने सुनने को न मिलेगी।

बाबू प्रभुदयाल के दो पुत्र थे और एक पुत्री। उनके दोनों बेटे उन्‍हीं की भांति बड़े चरित्रवान, धार्मिक और उदार थे। उनके बड़े पुत्र का नाम अमरनाथ था तो छोटे का उमेशचंद्र। बाबू प्रभुदयाल तकदीर के सचमुच बहुत धनी थे। पुरानी कहावत है बाढ़ै पुत्र पिता के धर्मा और खेती बाढ़ै अपने कर्मा। कहने का तात्‍पर्य यह कि यदि पिता का चरित्र उत्‍तम हो तो पुत्रों का चरित्र भी निश्‍चय ही कुलीन, अनुकरणीय और उच्‍च ही होगा।

इसे ही कहते हैं कि खानपान, आहार-विहार और रहन-सहन का मनुष्‍य के जीवन पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है। हालाँकि आज की वर्तमान टीवीबाज युवा पीढ़ी के लिए शत-प्रतिशत निश्‍चित तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता है क्‍योंकि आधुनिक युवाओं में नैतिकता, आदर्श, उदारता और शराफत बहुत ही कम देखने को मिलती है। फिर भी मानव एकदम निराश न होकर बेहतरीन आशाओं के सहारे ही जीता है। तनाव और हताशा इंसान की सबसे प्रबल शत्रु है। मुदिता या प्रसन्‍नता सबसे बड़ी दौलत है। प्रसन्‍न व्‍यक्‍ति दूसरों को भी प्रसन्‍न रखता है। मायूस दूसरों को भी मायूस बना देता है।

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प्रभुदयाल बाबू अपने पुत्रों को भलीभांति शिक्षित बनाने के बाद उन्‍हें हमेशा यही उपदेश देते रहे कि अन्‍याय, अनाचार और कदाचरण से कोसों दूर रहो। मासूम गरीबों का गला रेतने से बचो। रिश्‍वत और भ्रष्‍टाचार को कभी भूलकर भी अपने पास न भटकने दो। इसका उन पर बड़ा गहरा असर पड़ा। उन्‍होंने अपने जन्‍मदाता के दिए हुए ज्ञान को अपने हृदय पटल पर हूबहू उतार लिया। दोनों भाई बड़े ही नेक और विनम्र स्‍वभाव के थे।

बाबू अमरनाथ बचपन से ही मजबूत कद-काठी के थे। बल्‍कि यह समझिए कि वह एक हट्टे-कट्‌टे जवान थे। वह तरह-तरह के खेल-कूद के बड़े शौकीन थे। पढ़ाई के साथ-साथ वह क्रिकेट, हाकी, फुटबाल और जिमनॉस्‍टिक के अच्‍छे खिलाड़ी भी थे। पुलिस की वर्दी उन्‍हें बहुत प्रिय थी। वर्दी पहनने की उनकी बड़ी तीव्र अभिलाषा थी।

समय आने पर वह पुलिस में भर्ती भी हो गए। पुलिस में जाकर वह सचमुच अच्‍छी तरह समाज सेवा करने लगे। पुलिस की नौकरी पक्‍की होते ही बाबू प्रभुदयाल ने एक कुलीन, शिक्षित और सुशील कन्‍या देखकर उनका विवाह भी कर दिया। इसके कुछ दिन बाद ही बाबू अमरनाथ दो पुत्रों के पिता भी बन गए। इसके बाद वह अपने बीवी-बच्‍चों के साथ स्‍टाफ क्‍वाटर में ड्‌यूटी पर ही रहने लगे।

बाबू उमेशचंद्र उनके अनुज होते हुए भी कुछ अधिक बारीक दिमाग के थे इसलिए वह अध्‍यापन का प्रशिक्षण लेकर एक जानेमाने विद्या मंदिर में प्राध्‍यापक बनकर तन, मन से समाज सेवा में जुट गए। कुछ दिन बाद ही उनकी भी शादी हो गई। सौभाग्‍य से उन्‍हें कहीं बाहर नहीं जाना पड़ा और वह अपने माता-पिता के पास ही रह गए।

पुलिस में सिपाही बनने के कुछ समय बाद ही अमर बाबू की किस्‍मत यकायक बदल गई। वह पहले सब इंस्‍पेक्‍टर और उसके बाद ट्रैफिक पुलिस में इंस्‍पेक्‍टर बना दिए गए। एक मामूली से सिपाही से अब वह एक जिम्‍मेदार अफसर बना दिए गए। मगर, पुलिस महकमे में होते हुए भी उनके अंदर एक बड़ा ही विशेष गुण था। वह रिश्‍वत लेने से बहुत बहुत दूर रहते थे। घूस से उन्‍हें वास्‍तव में बहुत चिढ़ थी। अपने जीवन में वह कभी किसी को भी न सताए। उन्‍हें अपने परिश्रम और ईमानदारी की कमाई पर ही पूरा भरोसा था। रिश्‍वत लेने-देने में उन्‍हें लेशमात्र भी विश्‍वास न था। असहाय दरिद्रनारायणों की गर्दन पर छुरी फेरने से वह हमेशा बचने का भरसक प्रयास करते।

उनका बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट तर्क था कि जब अपनी मेहनत की कमाई से पूरा नहीं पड़ेगा तो रिश्‍वत से भी पूरा नहीं पड़ सकता। धन जिए तरह से आता है उसी प्रकार चला भी जाता है। मनुष्‍य को अपने परिश्रम की कमाई पर ही भरोसा करना चाहिए। रिश्‍वतखोरी का सबसे बुरा असर अपने परिवार पर पड़ता है। इससे बच्‍चे कुसंस्‍कारी बनते हैं।

हाँ, एक बात अवश्‍य है कि कानून से सरेआम खिलवाड़ करने वाले बदमाशों को वह कदापि न बख्‍शते थे। मौका मिलते ही वह उन्‍हें ललकारकर साफ-साफ कह देते कि अगर तुम वाकई निर्दोष हो तो मुझसे नजरें मिलाकर बात करो। कोई निर्दोष और निरपराध व्‍यक्‍ति पुलिस की रोबीली वर्दी से डर तो सकता है पर, वह अपनी नजरें हरगिज नहीं चुरा सकता।

वह फिर कहते-चोर, बदमाश और उचक्‍के पुलिस से कतई भयभीत नहीं होते हैं लेकिन वे पुलिस वालों से नजर मिलाकर बात करने का साहस कतई नहीं जुटा पाते हैं। उनकी निगाहों में यदाकदा कोई न कोई चोर छिपा रहता है। वे फितरती दिमाग के शैतान होते हैं। कुल मिलाकर अभिप्राय यह है कि अमर बाबू वाकई बहुत ही सत्‍यनिष्‍ठ, ईमानदार और एकदम उज्‍ज्‍वल छवि के पुरुष थे। उनकी ईमानदारी का सच में कोई जवाब ही न था। लोग उनकी बड़ी कद्र करते थे। उनके महकमें के कुछ भ्रष्‍ट लोग उन्‍हें जरूर पसंद नहीं करते थे लेकिन फिर भी ज्‍यादातर लोग उनकी बड़ी इज्‍जत करते थे। उनके पैतृक गाँव के लोग उन्‍हें पुलिस वाला नहीं बल्‍कि एक नेक इंसा नही मानते थे।

कुदरत के खेल भी बड़े निराले हैं। कभी-कभी वह ऐसा खेल भी खेल देती कि उस पर सहज ही यकीन नहीं होता। वह कभी एक भले-चंगे व्‍यक्‍ति को मार देती है। वह उसे मौत के मुँह में धकेल देती है। आनन-फानन में उसकी जान चली जाती है तो कभी साक्षात मौत के मुँह में जा पहुँचे इंसान को साफ-साफ बचा लेती है और उसका बाल तक बांका नहीं होता है। उसने अपना यह खेल अमर बाबू के साथ भी खेला। वह ऐसा खेल क्‍यों खेलती है इसे समझना इतना आसान नहीं है। कुदरत को भलीभाँति समझने के बाद ही उसके किसी खेल के बारे में समझा जा सकता है।

एक बार की बात है सर्दियों का मौसम था। बहुत जोर का जाड़ा पड़ रहा था। आसमान में कुहेसा छाया हुआ थां। घना कुहरा के चलते देर तक देखना तो एकदम असंभव ही था अपने हाथ की हथेलियाँ भी दिखाई न पड़ रही थीं। ऐसे हालात में इंस्‍पेक्‍टर अमरनाथ की ड्‌यूटी एक ऐसे भीड़ भरे चौराहे पर लगा दी गई जहाँ से दिन-दहाड़े कानून की आँख में धूल झोंककर आँख-मिचौली का खेल खेलने वाले बदमाश अक्‍सर गुजरते रहते थे।

पुलिस को पिछले काफी दिनों से उनकी बहुत तलाश थी। उनमें कुछ शातिर दिमाग के ट्रक ड्राइवर भी शामिल थे। कोटि यत्‍न करने पर भी वे पुलिस के हत्‍थे न चढ़ पा रहे थे। महकमे का कोई दूसरा इंस्‍पेक्‍टर उन पर लगाम न लगा पा रहा था। इससे पुलिस के आला हाकिम इससे अत्‍यंत परेशान थे। कोई दूसरा उपाय न सूझने पर आखिर उस स्‍थान पर बाबू अमरनाथ को तैनात करने का फैसला लेना पड़ा।

अमर बाबू पुलिस के एक रोबीले और जानदार हाकिम थे ही इसलिए उन्‍होंने इस काम को सहर्ष अपने हाथ में ले लिया। अगले दिन उस चौराहे पर पहुँचते ही जब उन्‍होंने एकदम तीव्रगति से आते हुए एक ट्रक ड्राइवर को अपने हाथ के इशारे से रूकने का संकेत किया तो दुष्‍ट रुकने के बजाय बचकर भागने का यत्‍न करने लगा। ट्रक ड्राइवर था बिल्‍कुल पाजी। उसका कलेजा मानो पत्‍थर का था। उसने आव देखा न ताव बल्‍कि, उनके हाथ के इशारे को नजरंदाज करके साफ बच निकलने के फेर में बड़ी बेदिली से आँखें मूँदकर ट्रक से उन्‍हें जोरदार टक्‍कर मार दी। इसके बाद वह ट्रक लेकर सायं से नौ दो गयारह हो गया। पलक झपकते ही वह वहाँ से छू-मंतर हो गया।

इधर ट्रक के टक्‍कर से इंस्‍पेक्‍टर अमरनाथ क्षण भर में ही धड़ाम से पक्‍की सड़क पर गिर पड़े। कुदरत की महिमा भी बड़ी निराली है। कभी-कभी वह ऐसे कारनामे कर दिखाती है जिस पर सरलता से यकीन ही नहीं होता। इंस्‍पेक्‍टर साहब के नीचे गिरते ही प्रकृति ने बड़ा अजीबोगरीब खेल खेल दिया। दरअसल हुआ यह कि अचानक सिर में तगड़ी चोट लगने से वह तुरंत बेहोश हो गए। इतना ही नहीं, उनके प्राण अकस्‍मात शरीर के न जाने किस कोने में जाकर छिप गए। प्राणों के विलुप्‍त होते ही उनका तन एकदम निष्‍प्राण सा हो गया।

देखते ही देखते उनका बदन बिल्‍कुल ठंडा और ढीला पड़ गया। उनकी सॉसें थम गईं। नसों का रक्‍त संचार ठप हो गया। उन्‍हें नीचे गिरते देखते ही उनके दाएं-बाएं खड़े कुछ अन्‍य ट्रैफिक पुलिस वाले दौड़कर वहाँ पहुँच गए। उन्‍होंने आनन-फानन में उन्‍हें उठाकर पास में ही स्‍थित एक जानेमाने खास अस्‍पताल में दाखिल करा दिया।

इतने में इस हादसे की खबर फूस की आग की तरह पुलिस विभाग के बड़े अफसरों और बाबू अमरनाथ की पत्‍नी अमरावती देवी के पास भी पहुँच गई। बारदात की इतला मिलते ही अधिकारीगण झटपट अस्‍पताल जा पहुँचे। अपने पति-परमेश्‍वर के घायल होने का संदेश सुनते ही अमरावती देवी एकदम विकल हो उठीं। उनका कलेजा कचोट उठा। वह घायल शेरनी की भांति पछाड़ खाकर गिर पडीं। उनके मुँह से आह निकल गई। कुछ देर बाद ही वह भी अपने दोनों बेटों के साथ छाती पीट-पीटकर रोती-विलखती उनके पास पहुँच गईं।

उधर अस्‍पताल के बड़े-बड़े नामीगिरामी डॉक्‍टरों ने फौरन बड़ी गहराई से उनके मृतवत शरीर का मुआयना और वैज्ञानिक तरकीब से अनेक परीक्षण करके नन्‍हीं सी जान को ढूँढ़ने का अथक प्रयास किया लेकिन, सब व्‍यर्थ। उनके प्राण मिलने को हरगिज राजी ही न थे। आखिरकार डॉक्‍टर उनकी जान को खोजने में विफल ही रहे। अंत में अपनी हर कोशिश बेकार होती देख हार-थककर उन्‍होंने अमरनाथ बाबू को मृत घोषित कर दिया। लाश का पोस्‍टमार्टम अब कल ही हो पाएगा यह कहकर उन्‍होंने अमर बाबू की बेजान शरीर को मुर्दाघर में भिजवा दिया।

उनके मरने की भनक अमरावती देवी के कानों में पड़ते ही वह दहाड़ मार-मारकर रोने लगीं। भरी जवानी में बेवा होने की पीड़ा की खबर सुनते ही चूडि़याँ उनकी कलाइयों से अलग हो गईं। उनकी मांग का सुहाग सिंदूर उतर गया।

एक सुहागिन को तनिक देर में ही विधवा का रूप घारण करना पड़ा। बेचारी अमरावती को कितना कष्‍ट हुआ? उसे कितनी पीड़ा झेलनी पड़ी? कोई इसका अंदाजा भी नही्र लगा सकता। पति के मुँह फेरते ही उसकी पूरी दुनिया ही लुट गई। वह पंखहीन पक्षी की भांति तड़प उठी। स्‍त्री के लिए विधवा होना ही बड़ा दुःखद है। जवानी मे ही विधवा हो जाना उसके लिए और भी कष्‍टप्रद हो जाता है। वैधव्‍यता का अपार कष्‍ट एक असहाय औरत ही सहन कर सकती है। वह आजीवन जो पीड़ा झेलती है उसे समझना बहुत मुश्‍किल है।

अमर बाबू की देह की चीर-फाड़ अगले दिन ही होनी थी इसलिए वह रोती-तड़पती अपने बच्‍चों को संग लेकर घर चली गई। कुदरत के विधान के आगे अपना कोई वश न चलते देख मन मारकर रह गई। घर जाकर उसकी सारी रात रोते हुए ही गुजरी। उसे इतनी पीडि़त देखकर मासूम बच्‍चे रिंकू, टिंकू एकदम हैरान और परेशान थे। उन मासूमों की समझ में कतई न आ रहा था कि हमारे प्‍यारे पापा जी कहाँ गए और उन्‍हें क्‍या हुआ? वह आज घर क्‍यों नहीं आए?

अमरावती देवी की नागिन जैसी काली रात तो जैसे-तैसे बीत गई पर, सुबह होते ही उनकी साँसें फिर अटकने लगीं। यमदेव बारंबार आकर उन्‍हें अहसास कराते कि आज तुम्‍हारे पति की अंत्‍येष्‍टि के बाद तुम इस संसार में हमेशा के लिए अकेली रह जाओगी। तुम्‍हारा जीवन नर्क बनकर रह जाएगा। यह दुनिया तुम्‍हें सुकून से जीने भी न देगी। तुम अब बेवा हो चुकी हो। अब इस संसार में तुम्‍हारा कोई मददगार नहीं है। अब तुम्‍हारी सेज काँटों से भर जाएगी। उस पर तुम्‍हारा सोना अत्‍यंत कठिन होगा। अब तुम्‍हें कुछ भी अच्‍छा न लगेगा। अब तुम्‍हारी किस्‍मत में दिनरात अकेले तड़पना ही रह जाएगा। पति की सारी की सारी जिम्‍मेदारी अब तुम्‍हें ही निभानी होगी। ऐसे में तुम अकेले इस निष्‍ठुर संसार में जीकर क्‍या करोगी। यह सोचकर उसका बदन सिहर उठा। कलेजा धक-धक करने लगा।

वह हाथ जोड़कर कहने लगी-हे भाग्‍य विधाता! तुमने यह मेरे साथ कैसा न्‍याय किया? ऐसा कू्रर खेल खेलते हुए तुम्‍हें तनिक भी दया क्‍यों न आई? मेरे छोटे-छोटे बच्‍चे अब किसके सहारे जिएंगे? इस निष्‍ठुर जगत में मेरा जीवन कैसे व्‍यतीत होगा? एक विधवा को तो लोग चैन से जीने भी नहीं देते हैं। इतना कहकर अपने कुछ पड़ोसियों और नजदीकी रिश्‍तेदारों के साथ वह फिर अस्‍पताल जाने की तैयारी करने लगी।

अब मृत्‍युदेव का एक नया और बिल्‍कुल ही विचित्र तमाशा देखिए। मोर्चरी में जमें बर्फ की सिल्‍लियों पर पूरी रात्रि पड़े-पड़े अमर बाबू को भोर की लालिमा उदय होने के साथ ही अचानक होश आ गया। उनके खोए हुए प्राण वापस आ गए। उनकी जिस जान को बड़े-बड़े डॉक्‍टर नहीं ढूँढ़ पाए वह स्‍वयं उनके शरीर में प्रकट हो गई। अचानक उनके खोए हुए प्राण न जाने कहाँ से शरीर में फिर से वापस आ गए। इससे उनकी बेहोशी खत्‍म हो गई और उन्‍हें पूरा होश आ गया। होशोहवाश में आते ही ज्‍योंही उनकी आँख खुली तो वह एकदम सन्‍न रह गए। जीते जी खुद को मुर्दों के बीच नंग-धडंग पाकर वह दंग रह गए। वह इतने हैरान हुए कि कुछ भी समझ पाने में असमर्थ थे। अब उनका बदन एकदम हल्‍का-फुल्‍का महसूस हो रहा था।

हॉ, एक बात है वह थे एक बड़े दिलेर पुरुष। ऐसे विचित्र स्‍थान और समय में उन्‍होंने बड़े साहस से काम लिया। चित्र-विचित्र लाशों को देखकर भी वह लेशमात्र भी घबराए नहीं। उस दिन उनकी जगह यदि कोई कमजोर दिल का दूसरा व्‍यक्‍ति होता तो भांति-भांति के सड़े-गले मुर्दों की दहशत से ही उसके प्राण पखेरू उड़ जाते। उस बेचारे का दम ही निकल जाता। ऐसी दशा में उसकी घिग्‍घी ही बँध जाती। अमर बाबू पुलिस के जाबाँज, तजुर्बेकार सिपाही थे ही मुर्दों की शक्‍ल देखते ही उन्‍हें समझते देर न लगी कि मैं चीरघर में पड़ा हूँ। अंदर ही अंदर वह वहाँ से बाहर निकलने का उपाय सोचने लगे। तभी उन्‍होंने दरवाजे की ओर झाँककर देखा तो उनके होश गुम हो गए।

अमर बाबू ने देखा कि मोर्चरी का हट्टा-कट्‌ठा, जवान चौकीदार नसीम ठंड से बचने की खातिर हीटर जलाकर आराम से ताप रहा है। उनके मन में आया कि अगर मरदूद किसी बहाने कुछ पल के लिए यहाँ से टल जाता तो मैं एक ही झटके में यहाँ से निकलकर बाहर चला जाता।

मन ही मन वह यम से बोले-हे जगतपिता! जब मैं अभी जिंदा हूँ तब फिर मुझे नाहक ही मारना क्‍यों चाहते हो? मेरे यहाँ होने का मतलब कि अस्‍पताल के डॉक्‍टर मुझे मुर्दा साबित कर चुके हैं। अब मेरी चीरफाड़ होगी। कोई डॉक्‍टर जब किसी व्‍यक्‍ति को एक बार मृत घोषित कर देता है तब वह उसे जीवित हरगिज नहीं मान सकता। वह सदैव अपने निर्णय पर ही अटल रहता है। यहाँ रहने पर आठ बजे जब डॉक्‍टरों की टीम आएगी तब मुझे एक मुर्दा समझकर वह मेरा पोस्‍टमार्टम करके मार डालेगी। अतएव मुझे इस नर्कमय कैद से किसी तरह बाहर निकाल लो। मैं आपका यह उपकार जीवनभर न भूलूँगा।

हृदय से निकली प्रार्थना कभी व्‍यर्थ नहीं जाती है। यही वैज्ञानिक प्रार्थना कहलाती है। इस प्रार्थना के लिए इंसान को किसी देवालय में जाने की कोई जरूरत नहीं है। यह प्रार्थना कहीं पर भी और किसी भी समय की जा सकती है। किसी देवालय में जाकर प्रार्थना करना व्‍यर्थ है। सौभाग्‍य से कुदरत ने उनकी विनती सुन ली। उसके घर में कुछ देर अवश्‍य होती है किन्‍तु अंधेर कदापि नहीं। इतने में एक अन्‍य लड़के ने जोर से आवाज दिया अरे नसीम! आजा गरमागरम चाय पी ले चाय। अबे हरदम वहीं क्‍या पड़ा रहता है। सुबह-सुबह तेरे मुर्दे कहीं भाग थोड़े ही जाएँगे। तू तो जी जान से हर वक्‍त उनकी रखवाली करने में ही जुटा रहता है। अरे भइया! उन्‍हें वहीं छोड़ दे, वे कहीं नहीं जाएंगे।

तब नसीम हॅसकर बोला-अच्‍छा भाई! जरा ठहर जा। मैं अभी आया।

यह सुनते ही अमर बाबू की जान में जान आ गई। उनका मन खुशी से झूम उठा। वह सोचने लगे-हे भगवान! तू कितना दयालु है? आज तुमने मेरी करूण पुकार सुन ली। अब मेरी जान बच जाएगी। अब मुझे कोई फिक्र नहीं। सारा खतरा टल गया। अब तक मेरी जान बड़ी जोखिम में थी। मेरा तो दम ही निकल रहा था। यहाँ अंधेरे में अकेले पड़े-पड़े मैं तो पागल ही हो जाता।

इसके बाद चौकीदार नसीम बड़ी फुर्ती से उठा और अपने दोस्‍त के पास चाय पीने चला गया। उसके वहाँ से हटते ही अमर बाबू ने अपनी काया पर लिपटी अस्‍पताल की सफेद चादर ओढ़कर लोगों की नजरों से बचते हुए झट वहाँ से बाहर निकल गए। तदंतर एक आटोरिक्‍शा में बैठकर वह अपने घर की राह पकड़ लिए। बेचारा चौकीदार नसीम देखता ही रह गया। इतनी चौकसी से देखभाल करने पर भी उसका एक मुर्दा दिनदहाड़े ही गायब हो गया।

आहिस्‍ता-आहिस्‍ता दिन के आठ बज गए। अस्‍पताल के नर्स और डॉक्‍टर अपनी-अपनी ड्‌यूटी पर आ गए। नौ बजते ही अमर बाबू का इलाज करने वाले डॉक्‍टरों ने दो मुर्दा वाहकों को मोर्चरी में भेजते हुए कहा-शव नंबर तेरह अमरनाथ की लाश लाओ, पोस्‍टमार्टम करना है।

वहाँ जाकर उन्‍होंने सभी लाशों को खूब उलट-पुलटकर देखा लेकिन, यह क्‍या? अरे! यहाँ तो तेरह नंबर और अमरनाथ नाम का कोई मुर्दा ही नहीं है। भला यह कैसे हो सकता है? वे घबराकर डॉक्‍टर साहब के पास जाकर बोले-सर! वहाँ तो इस नंबर और नाम का कोई मुर्दा नहीं है। कहीं आपसे कोई भूलचूक तो नहीं हो गई?

यह सुनते ही डॉक्‍टर निर्मल कुमार हक्‍का-बक्‍का से हो गए। वह मुस्‍कराकर बोले-अरे यार! कभी-कभी तुम लोग भी खूब कमाल करते हो। अरे भई! कोई बहुत पुरानी बात थोड़े ही है। अभी कल की ही तो बात है। कल शाम को ही तो उसे वहाँ भेजा था। लगता है तुमने उसे ध्‍यान से नहीं देखा। क्‍या अब हमारे अस्‍पताल से भी मुर्दे चोरी होने लगे। ऐसा करो एक बार और कोशिश करके देखो। वहीं कहीं ऊपर-नीचे पड़ा होगा। अगर फिर भी न मिला तो अपनी नौकरी ही चली जाएगी। न मिले तो चौकीदार नसीम को बुलाकर यहाँ ले आना। कहीं उसने ही तो कोई गड़बड़ी नहीं कर दी? क्‍या जमाना आ गया है? आजकल के चौकीदारों का क्‍या ठिकाना?

मुर्दा वाहक फिर गए और ज्‍यों के त्‍यों खाली हाथ लौट आए। अंततोगत्‍वा लाश गुम करने के जुर्म में चौकीदार नसीम को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। उसे निलंबित कर दिया गया। एक मुर्दे के चलते उसकी जान अनायास ही आफत में फँस गई।

उधर अमर बाबू जब घर पहुँचे तो उन्‍हें धवल चादर में लिपटे देखकर उनकी अर्धांगिनी अमरावती देवी की साँसे ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे अटककर रह गईं। उन्‍होंने उन्‍हें अपने प्राणाधार का भूत समझ लिया। उनके मुख से चीख निकल गई। वह बचाओ, बचाओ कहकर गिरते-पड़ते उनसे दूर भागने लगीं। एक बार को वह बेहोश भी हो गई।

अपनी प्राणप्रिया को इतना भयभीत देखकर अमर बाबू उसे ढाढ़स बँधाते हुए बोले-अमरावती! जरा होश से काम लो, डरो नहीं। अरे देखो, यह मैं हूँ तुम्‍हारा अमर। मैं कोई भूत-प्रेत नहीं बल्‍कि इंसान हूँ। तत्‍पश्‍चात अपनी सारी आपबीती उन्‍होंने अमरावती देवी को सुना दी। तब कहीं जाकर बड़ी मुश्‍किल से उसे यकीन आया कि मेरे देवता सच में जीवित हैं। आखिर, अमर बाबू को छोड़कर मृत्‍यु चुपचाप चली गई। उसकी पराजय हो गई। यदाकदा मौत सचमुच हार जाती है। मौत की पराजय होते ही अमर बाबू विजेता बन गए। परंतु अंधविश्‍वासी लोग अमर बाबू को काफी दिनों तक संदेह की नजर से ही देखते रहे। वे उनसे मिलने-जुलने से कतराते रहे।

अंततः अमरावती की खोई हुई सारी खुशियाँ फिर से वापस आ गईं। अब उसे तनिक भी यकीन न आ रहा था कि एक ही रात में उसकी बड़ी दुर्दशा हो गई। उसने इतना अधिक दुःख झेल लिया कि नई खुशी मिलते ही उसके नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी। वह जीते जी मर चुकी थी। अब उसकी खुशियों की कल्‍पना करना सच में अत्‍यंत मुश्‍किल था। वह अपने सभी दुःखों को भूल गई। उसकी सारी पीड़ा न जाने कहाँ चली गई।

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इलाहाबाद

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3845,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,336,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2788,कहानी,2118,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,486,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,839,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,8,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,315,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1923,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,649,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,688,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,56,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian 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रचनाकार: कहानी // विजेता // अर्जुन प्रसाद
कहानी // विजेता // अर्जुन प्रसाद
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