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प्राची - अगस्त 2017 : आत्म संदर्भ // धारावाहिक आत्मकथा (आठवीं किस्त) // अनचाहा सफर // रतन वर्मा

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पुनः साहित्यिक परिवेश का फंडा गतांक से आगे ... भैया चले तो गए थे, लेकिन मेरे लिए एक अच्छा खासा साहित्यिक माहौल बनाकर. जब तक भैया थे, उस बीच ...

पुनः साहित्यिक परिवेश का फंडा

गतांक से आगे...

भैया चले तो गए थे, लेकिन मेरे लिए एक अच्छा खासा साहित्यिक माहौल बनाकर. जब तक भैया थे, उस बीच भारत यायावर, प्राणेश कुमार, या अन्य साहित्यिक लोग भैया से मिलने-जुले आया करते थे, या भैया ही उन लोगों के बीच जाकर उठते-बैठते थे, तो मैं यही समझता था कि वह सिलसिला भैया के दरभंगा लौटने के साथ ही समाप्त हो जायेगा और मैं फिर से अपनी रोजी-रोटी के चक्कर में व्यस्त हो जाऊंगा. यानी मेरी दुनिया अलग और उनकी अलग.

लेकिन वैसा हो नहीं पाया था. भैया को दरभंगा छोड़कर जब मैं लौटा, मंजू (पत्नी) ने बताया- ‘‘भारत यायावर आ-आकर पूछते रहे हैं कि आप दरभंगा से लौटे कि नहीं. मैंने, जैसी कि आपसे बात हुई थी, आपके आज लौटने की बात बता दी थी.’’

मैं सुबह के लगभग छः बजे लौटा था. पत्नी से भारत जी के बारे में जानकर, पता नहीं क्यों मुझे सुखद अनुभूति हुई थी. जब तक भैया रहे थे, उनका मेरे घर रोज का आना, घंटों साहित्यिक चर्चायें करना, फिर हमें साथ लेकर बाजार की ओर निकल जाना तथा अन्य साहित्यिक लोगों से मिलवाना, आपस में बहसें-परिचर्चाएं करना, ये सब मेरी दिनचर्याओं में शामिल हो गये थे. ऐसे में भारत यायावर के द्वारा मुझे याद किया जाना सुखद ही लगा था मुझे.

मैं अपने कार्याल में यात्रा-रपट आदि जमा कर दिन के बारह बजे तक वापस लौट आया था. सोचा था, भोजन के उपरान्त रात भर की यात्रा की थकान दिन भर सोकर उतारूंगा. लेकिन तभी दरवाजे पर दस्तक हुई थी. दरवाजा खोला, तो सामने भारत यायावर को मुस्कुराते हुए पाया. ‘‘आ गये आप?’’

‘‘आइए...आइए भारत जी. मंजू से पता चला कि आप आते रहे हैं. मुझे तो लगा था कि भैया के जाने के बाद आप मुझे भूल ही जायेंगे.’’ बोला था मैं.

भारत जी ने कोई उत्तर नहीं दिया था, पूर्ववत होंठों पर मुस्कान खिलाये अंदर आकर कुर्सी पर बैठ गये थे. फिर पूछा था, ‘‘तब यात्रा कैसी रही?’’

‘‘भैया सब के चले जाने से घर अजीब सूना-सूना सा लग रहा है. आप आ गये, अच्छा लगा. ऐसे ही आते-जाते रहेंगे तो भैया की अनुपस्थिति खलेगी नहीं.’’

‘‘अब जान-पहचान हो ही गयी है, तो मिलना-जुलना भी होता ही रहेगा.’’ बोले थे भारत यायावर, ‘‘रतन जी, उस दिन की आपकी कविता बहुत अच्छी थी. छंदों पर आपकी पकड़ भी काफी मजबूत है. अगर आप लेखन के प्रति गंभीर हो जायें तो जल्दी ही पहचान बना लेंगे.’’

‘‘पर मैं तो तुकबंदियां किया करता हूं, जबकि उस दिन की गोष्ठी में सभी ने मुक्त छंद की कविताओं का पाठ किया था. वह भी जनवादी कविताओं का. और मैंने जनवादी जैसी कोई चीज तो लिखी नहीं है.’’

शायद मेरी बात उन्हें बचकाना लगी थी. हंसते हुए बोले थे, ‘‘रतन जी, रचनायें सिर्फ रचनायें होती हैं. चाहे प्रेम आधारित या शृंगार की रचनायें ही क्यों न हों, सभी को तवज्जो मिलती है. वैसे उस दिन भी प्राणेश कुमार ने गजल का पाठ किया था. ऐसी बात नहीं कि रचनाओं का मूल्यांकन किसी खास विचार के फ्रेम में कसकर होता है. खैर, आप लिखते रहिये. फिर मैं तो हूं ही.’’

इस प्रकार भारत यायावर के साथ मेरी निकटता बढ़ती ही चली गयी थी. इस हद तक कि एक तरह से वे मेरे परिवार का हिस्सा माने जाने लगे थे. उनके साथ साथ और भी कुछ रचनाकार मेरे घनिष्ठ होते गये थे. जिनमें प्राणेश कुमार काफी आत्मीय हो गये थे. मैं गोष्ठियों में भी भाग लेने लगा था. लेकिन सिर्फ श्रोता की हैसियत से.

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मैं समझ नहीं पा रहा था कि जो होना मैं नहीं चाहता था, नियति मुझे उधर ही घसीटे लिये जा रही थी. मैंने कभी नहीं चाहा था कि मेरी पत्नी नौकरी करे, पर परिस्थितिवश उसे नौकरी करनी पड़ी थी. साहित्यकार बनना नहीं चाहा था, लेकिन मसूरी से लेकर हजारीबाग तक मुझे साहित्यिक माहौल से ही साबका पड़ता रहा था. वैसे भी मेरी अपनी रुचि कला संस्कृति के प्रति रही है. मुझे आज भी वह रात याद है, जब मैं दरभंगे के अपने घर के कमरे में सो रहा था. रात निस्तब्ध हो चुकी थी. संभवतः ग्यारह-बारह का समय रहा होगा. अभी आंखों में नींद समाने को ही थी कि हवा में तैरता हुआ किसी का सुमधुर कंठ से निकले एक गीत की पंक्ति मेरे कानों में समायी थी...‘‘झूम बराबर- झूम शराबी...’’

नींद फिर से वापस लौट गयी थी. मैं अचंभित था- इतनी रात को ऐसी सुमधुर आवाज में कौन गा रहा है. मैं बाहर निकलकर आवाज का पीछा करते हुए जहां पहुंचा, वह एक ताड़ीखाना था. उसी के अंदर से गीत की आवाज आ रही थी. मैं ताड़ीखाने में प्रविष्ठ हुआ, देखा, एस.के. कमाल, जो भाड़े के उपन्यास की एक छोटी-सी दुकान चलाया करते थे, वे ही छोटे-े घड़े पर थाम देते हुए मग्न मुद्रा में गाये चले जा रहे थे. आवाज में इतनी कशिश और आकर्षण कि यदि वे फिल्मों में प्लेबैक सिंगर अनने की कोशिश करते तो शायद असफल नहीं होते. लेकिन उनका दुर्भाग्य कि वैसी प्रतिभा के धनी होने के बावजूद वे महज एक किराये के उपन्यासों के दुकानदार थे (उन दिनों मनोरंजन के साधन सिनेमा और किताबें ही हुआ करते थे. सस्ते और जासूरी उपन्यास, जो पुराने हो जाया करते थे, वे प्रतिदिन दो पैसे या एक आने के किराये पर पाठकों को मिला करते थे. दरभंगे में वैसी कई दुकानें थीं).

तो मैंने ताड़ीखाने में बैठकर ही कमाल साहब से कई गाने सुने और तत्क्षण मैंने मन बना लिया कि शहर में एक गीत-संगीत संस्था का गठन किया जाय और जिससे शहर की गायन-वादन प्रतिभाओं को जोड़ा जाय. मैंने दूसरे हीदिन से कोशिश षुरू कर दी, जिसके परिणाम स्वरूप ‘स्वर शृंगार’ नामक संस्था का गठन हो गया, जिसमें मेरे कॉलेज के गायक और संगीतज्ञ, दो मित्रों, जो आपस में भाई थे- अजय और विजय, उन्हें तो सम्मिलित किया ही गया था, साथ में और भी प्रतिभायें जुड़ गयी थीं. वह संस्था व्यावसायिक ढंग से शहर भर में प्रसिद्ध होने लगी थी और बाद में चलकर तो अन्य शहरों में भी इसके कार्यक्रम आयोजित किये जाने लगे थे. उस संस्था को ऐसी व्यावसायिक सफलता मिलने लगी थी कि वर्ष बीतते न बीतते एस.के. कमाल की वह किराये वाले उपन्यास की दुकान की जगह स्वर शृंगार का छोटा-सा दफ्तर खुल गया था और देखते ही देखते कमाल साहब के आर्थिक हालात भी सुधरते गये थे. कमाल साहब जब तक जीवित रहे मेरे अच्छे दोस्त बने रहे, जबकि वे मुझसे लगभग दस वर्ष बड़े थे. मेरे बारे में लोगों के बीच चर्चा भी करते रहे कि स्वर शृंगार का अस्तित्व रतन वर्मा के कारण ही है.

उन दिनों मैं आइ.एस.सी. प्रथम वर्ष का छात्र हुआ करता था. उपर्युक्त घटना का जिक्र मैंने इसलिए किया है, क्योंकि घर में साहित्यिक वातावरण होने के कारण साहित्य में मेरी रुचि तो बचपन से रही ही है, साथ ही कला संस्कृति के प्रति भी मेरे मन में खासा सम्मान है. यही वजह है कि हजारीबाग आगमन के बाद मेरा जुड़ाव गीत-संगीत और नाटक से जुड़े लोगों के साथ भी हुआ तथा मसूरी में भी मेरी अंतरंगता साहित्य से जुड़े लोगों के साथ ही रही.

बावजूद इसके मैंने साहित्य की दुनिया में प्रवेश करने से दूरी बनाये रखना ही अपने संदर्भ में उचित समझा था. किसी भी परिवेश से परिचय बढ़ाना एक बात थी और उसमें आकंठ डूब जाना अलग की बात. ऐसा इसलिए था कि बचपन से ही मैंने भैया को साहित्य के प्रति पूर्णतः समर्पित देखा था, जो कभी भी उनकी आय का जरिया नहीं बन पाया था.

यदि भैया ने ठीकेदारी शुरू नहीं की होती या पूर्व में हमें मामा-मामी का सहारा नहीं मिला होता तो हमारा पूरा परिवार बिना माझी और पतवार वाली नाव पर सवार हो था ही. छात्र जीवन में मैंने कबीर का वह दोहा भी पढ़ा था-

‘कबिरा खड़ा बजार में, लिये लुकाठी हाथ,

जो घर जारै आपना, चलै हमारे साथ.’’

आज इस दोहे के अर्थ की व्यापकता को समझने लगा हूं, पर उन दिनों इस दोहे का यही अर्थ समझता था कि चूंकि कबीर दास एक कवि थे और फक्कड़ भी और उनकी वह हालात शायद कवि होने के कारण ही हुई थी, साथ ही मैं भैया तथा उनके कई कवि मित्रों की हालत से भी परिचित था कि उनका लेखन उनके और उनके परिवार के जीवन यापन का साधन कतई नहीं बन सकता था, इसीलिए शायद साहित्यकार बनने की कल्पना मुझे डरा दिया करती थी. पर जैसा वातावरण बन रहा था मेरे पक्ष में, उससे कतई अंदाजा नहीं था मुझे कि एक दिन मैं भी लेखक की श्रेणी में आ खड़ा होऊंगा.

जैसा कि मैंने ऊपर कहा है, मैं भारत यायावर के साथ गोष्ठियों में भी जाने लगा था, पर वहां उपस्थिति होने के बावजूद चाहे लोग कितनी भी जिद करते, मैं अपनी कविताओं का पाठ नहीं करता था. शायद इसलिए कि वहां उपस्थित मंजे हुए कवियों के बीच अपनी फजीहत नहीं कराना चाहता था.

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हजारीबाग में कथाकार सुनील सिंह भी रहा करते थे, जिनसे भारत यायावर ने मेरा परिचय कराया था. उन दिनों शहर में दो ही कथाकार हुआ करते थे- सच्चिदानंद ‘धूमकेतु’ और सुनील सिंह. दोनों ही अच्छे कथाकार के रूप में जाने जाते थे. सच्चिदानंद ‘धूमकेतु’, जिन्हें लोग धूमकेतु जी पुकारा करते थे. उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित थीं तथा राष्ट्रीय स्तर पत्रिकाओं, जैसे सारिका, रविवार, धर्मयुग जैसी महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं में वे छपते रहते थे. लेकिन वे भूअर्जन पदाधिकारी तथा जिला परिवहन अधिकारी, दोनों ही पद पर आसीन रहते हुए पदाधिकारी होने की हेठी से भी ग्रस्त रहा करते थे. उनके चेहरे पर हर समय आफीसरी रुआब चश्पां रहा करता था. हालांकि साहित्यिक लोगों से मिलने-जुलने तथा गोष्ठियों में शिरकत करने में वे कोताही नहीं बरतते थे. सुनील सिंह किसी जमींदार घराने से ताल्लुक रखते थे. उनकी कहानियां भी धर्मयुग और कादम्बिनी जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर चर्चित हो चुकी थीं. उन्हें भी अपने राष्ट्रीय स्तर का लेखक होने तथा जमींदार परिवार से आने की कम हेठी नहीं थी. वे जिस किसी भी रचनाकार से बात करते ऐसा दर्शाते, जैसे सभी उनके चेले-चमचे हों. हां, गीतकार रामनरेश पाठक का वे बहुत आदर करते थे. उनका चरण स्पर्श भी किया करते थे. इसका कारण, जो मुझे बाद में पता चला था कि रामनरेश पाठक के पिता उनके घर के पुरोहित हुआ करते थे.

रामनरेश पाठक हजारीबाग में श्रम अधीाक के पद पर कार्यरत थे. वे अपने गीत बड़े ही सुरीले अंदाज में गाकर सुनाया करते थे. उम्र में वे हम नवयुक कवि-लेखकों से काफी बड़े थे, पर व्यवहार में मित्रवत हमारे साथ हर तरह की हंसी-दिल्लगी में साझीदार रहते. बड़े अफसर होने के बावजूद वे हम लोगों के साथ कहीं भी उठ बैठ लेते और किसी के भी घर आते-जाते रहते. सहजता उनमें कूट-कूट कर भरी हुई थी. उनका परिचय भी देश के बड़े-बड़े साहित्यकारों से था. पटने से निकलने वाली पत्रिका ‘अपरम्परा’ के संपादक मंडल में भी वे थे. इसका एक ही अंक निकल पाया था, लेकिन फणीश्वर नाथ रेएाु की कालजयी कहानी ‘तीसरी कसम अर्थात मारे गये ुल्फाम’ के उस पत्रिका में प्रथम प्रकाशन के कारण उस एक अंक ने ही इतनी ख्याति प्राप्त की थी, जिसे शायद ही साहित्य से जुड़ा कोई भी आदमी न जानता हो.

वैसे प्रत्यक्षतः सुनील सिंह उनका भरपूर आदर तो जरूर किया करते थे, मगर परोक्ष में हम लोगों के बीच उनके गीतों के नकल उतार कर उनका मजाक भी उड़ाया करते थे. यह लेखक कवियों के बीच आम बात हुआ करती थी. लेकिन भारत यायावर को उनका यह आचरण नागवार गुजरता था. वे रामनरेश पाठक की पुत्री को उनके घर जाकर पढ़ाया भी करते थे. एक दिन पता नहीं क्या सोचकर पाठक जी से सुनील सिंह के आचरण के आरे में बता भी दिया था उन्होंने. प्रतिक्रिया स्वरूप किसी अवसर पर जब सुनील सिंह ने पाठक जी का चरण स्पर्श किया था, तब पाठक जी ने उन्हें टोक ही दिया था, ‘‘क्या हो सुनील, सामने में तो तुम मेरा पैर छूते हो और पीछे में मेरा मजाक उड़ाते हो.’’

सुनील सिंह अवाक्! हकलाते हुए बोले थे, ‘‘न...न...नहीं...किसने कहा आपसे?’’

‘‘माने तुम ऐसा नहीं किये हो? तो क्या भारत यायावर झूठ बोल रहे थे मुझसे? देखो, एक तो तुम मेरी नकल उतारते हो, दूसरे मुझसे झूठ भी बोलते हो?’’

‘‘ओ, तो यह आग भारत यायावर ने लगायी है. देखियेगा, मैं उनकी क्या हालत करता हूं?’’

‘‘वाह, खुद को सुधारने के बदले तुम भारत यायावर पर गुस्सा कर रहे हो. उनसे कुछ कहने की जरूरत नहीं है. कहा तो उन्होंने सच ही है...’’

मसलन आग में घी तो पड़ ही गया था. उस घटना के कुछ ही दिनों काद रामनरेश पाठक की बेटी की शादी थी, जिसमें हम सारे रचनाकार आमंत्रित थे. पर शादी के अवसर पर मैं अपने व्यवसाय के सिलसिले में शहर से बाहर था, इसलिए शादी में उपस्थित नहीं हो पाया था. बाहर से लौटने पर मुझे पता चला था कि शादी के दिन ही भारत यायावर और सुनील सिंह के बीच भयंकर वाक्युद्ध हो गया था. सुनील सिंह ने भारत यायावर को न सिर्फ भद्दी-भद्दी गालियां दी थीं, बल्कि उन्हें पिटवाने तक की धमकी दे डाली थी.

बाद में जब सुनील सिंह मेरे घर आये तो मैं भी उनसे उलझ पड़ा था. मैंने कहा था कि चूंकि भारत यायावर एक सहज और शालीन मित्र हैं, इसीलिए उन्होंने आपकी गालियां और धमकी बर्दाश्त कर ली, अगर मैं उनकी जगह होता तो पता नहीं मैं क्या कर गुजरता. हम गुंडे-मवाली नहीं हैं कि किसी के साथ अपशब्द या धमकी से बात करें.

मेरी बात पर वे थोड़े सहज जरूर हुए थे, पर उस दिन के बाद से आज तक भारत यायावर और उनका संबंध नहीं ही सुधर सका.

सुनील सिंह की दो चार कहानियां भले ही धर्मयुग, कादम्बिनी जैसी पत्रिकाओं में छप चुकी थीं, पर भारत यायावर भी राष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक क्षेत्र में अपनी पहचान रखते थे. 1977 में रामनारायण बेचैन ने ‘नवतारा’ नामक पत्रिका का अपने ही संपादन में प्रकाशन शुरू किया था, जिसके प्रवेशांक के प्रकाशन के बाद ही उन्होंने भारत यायावर के समक्ष हथियार डाल दिया था. तब आगे के अंकों के संपादन-प्रकाशन की जिम्मेवारी भारत यायावर ने अपने हाथ में ले ली थी. उन दिनों भारत जी घनघोर संघर्ष के दौर से गुजर रहे थे. बावजूद इसके, साहित्य के प्रति उनके समर्पण भाव ने पत्रिका को अपने हाथ में लेने के लिए उन्हें मजबूर किया था शायद. वे एक गुमटी में लघु पत्रिकाओं की दुकान चलाया करते थे तथा कुछ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई से लेकर अन्य जरूरतों को पूरा किया करते थे. अब पत्रिका का भी बोझ उन्हें अपनी उस सीमित आय में उठानी पड़ने लगी थी. लेकिन मैंने उनके चेहरे पर कभी भी अभाव का तनाव महसूस नहीं किया था. उनकी कवितायें राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही थीं, पर इसका गुमार मैंने कभी उनमें महसूस नहीं किया. वे नये सेनये रचनाकार को भी अपने समतुल्य मानते रहे थे. उनके लेखन प्रकाशन में उनसे जितना संभव होता मदद भी किया करते. फिर भी वे भले ही खुद को जो भी समझते रहे हों, हजारीबाग के बुजुर्ग साहित्यकार से लेकर उनके समकालीन, उनके सामने हमेशा उन्हें सम्मान देते रहते. भले ही उनके परोक्ष में उनकी आलोचना या मजाक उड़ाया करते. कई बार मैंने देश भर से उनके पास अपने वाले पत्रों को भी देखा-पढ़ा था. मुझे आश्चर्य होता कि महज पच्चीस-छब्बीस पर्श की उम्र में उनके, देश के प्रतिष्ठित रचनाकारों-संपादकों से परिचय कैसे था. यह भी कि सभी उन्हें खासे सम्मान के साथ संबोधित किया करते थे.

जब मेरी चोरी पकड़ी गयी

भारत यायावर हमेशा चाहते थे कि गोष्ठियों में मैं भी अपनी कविताओं का पाठ किया करूं. लेकिन मुझे न तो कवि कहलाने की कोई चाहत थी और न ही रचनाकर्म के द्वारा खुद को सिद्ध-प्रसिद्ध करने की. गोष्ठियों में जाना मुझे इसलिए अच्छा लगता था, क्योंकि कवितायें सुननी मुझे अच्छी लगती थीं. वैसे गोष्ठियों में नहीं भी जाता, पर प्रत्येक गोष्ठी के दिन भारत यायावर मेरे घर आ ही धमकते और मुझे खींचकर ले जाते. जाने, उनमें क्या था कि इंकार करते-करते भी मुझे मान ही जाना पड़ता था.

एक दिन गोष्ठी में भारत यायावर के साथ प्राणेश कुमार, शंकर तांबी, रामनरेश पाठक तीनों ने एक साथ जिद करके मुझे मजबूर ही कर दिया कि मैं अपनी कविता सुनाऊं. मैं पसोपेश में पड़ गया कि क्या सुनाऊं, क्या नहीं? क्योंकि मैं जानता था कि जितना कुछ मैंने लिख रखा था, उनमें से एक भी रचना ऐसी नहीं थी, जिसे सुनाकर मैं लोगों को संतुष्ट कर पाता. लेकिन सभी की जिद ऐसी कि मेरे लिए बचना मुश्किल था. तभी अचानक सुधीर गैरोला की लिखी हुई कविता ‘मजूद’ दिमाग में कौंध उठी थी. सुधीर के मुंह से उस कविता को इतनी बार सुना था मैंने कि वह कविता मुझे कंठस्थ हो गयी थी. मैंने उसी कविता का पाठ कर दिया था. जेहन में यही था कि मुझे कवियों की सूची में अपना नाम तो दर्ज करवना नहीं है और दूसरे, मसूरी के रहने वाले सुधीर को यहां कौन जानता है कि लोग मेरी चोरी का पकड़ सकें.

फिर तो उस कविता पर इतनी दाद मिली थी मुझे कि अंतर्ग्लानि से अन्तस कांप उठा था. मेरे चेहरे का भाव कैसा हो गया होगा, यह तो कोई दर्पण ही बता सकता था, पर मेरे प्रति प्रशंसा का भाव बाकी के सभी चेहरों पर अंकित था.

गोष्ठी के बाद भारत यायावर देर रात तक मेरे साथ रहे थे. जितनी देर रहे थे, मेरी कविता पर ही बातचीत करते रहे थे और अंत मे निष्कर्ष दे दिया था उन्होंने कि मेरे अंदर भविष्य के एक ब़े कवि की संभावना छुपी हुई है और मुझे निरंतर लेखन करते रहना चाहिए. दूसरे दिन प्राणेश कुमार, नवीन बरडियार, सुनील सिंह आदि मित्र भी मिले, तो उन्होंने भी मेरी कविता की प्रशंसा करते हुए मेरे अंदर छुपे हुए संभावनाशील कवि को जमाने की चेष्टा करते रहे. और मैं अपने भीतर मुंह छुपाये एक चेार की कारगुजारी पर ग्लानिग्रस्त होता चला गया था. तय कर लिया था कि आइंदा कभी गोष्ठी-वोष्ठी का रुख नहीं करूंगा. और सचमुच किसी-न-किसी बहाने से, जब भी गोष्ठी का दिन आता, मैं कन्नी काट जाया करता.

पर भारत यायावर, प्राणेश कुमार, नवीन बरडियार आदि के साथ, जब भी मैं शहर में होता, रोज की मुलाकात तय रहती. भारत यायावर के साथ तो, जब भी उनके पास वक्त होता, दिन से रात तक. रोज ही शाम के समय हम सभी की जुटान झंडा चौक पर स्थित लक्ष्मी मिष्ठान भण्डार में होती रहती. नवीन बरडियार गजलें और लघुकथायें लिखा करते थे, पर शौकिया ही. वैसे उनमें एक गजलकार की अच्छी संभावना थी, पर उन दिनों वे किसी भी नौकरी के लिए अत्यधिक संघर्षशील थे. बाद में उन्हें बैंक ऑफ इण्डिया में क्लर्क की नौकरी मिल गयी थी और वे किसी दूसरे शहर में जा बसे थे. उसके बाद से न तो वे कभी हमारी साहित्यिक चर्चाओं के बीच उपस्थित रहे और न उनकी कोई रचना ही देखने को मिली. उनका एक शे’र आज भी हमारे बीच कभी-कभी गुनगुना दिया जाता है-

‘शरमा रही है बिजली, आने में घर में ऐसे,

पैरों लगी हो मेंहदी, घूंघट में नाजनीं हो.’

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सुधीर गैरोला के साथ पत्र-व्यवहार तो नियमित चलता रहा था मेरा. लगभग हर पत्र में मैं उसे हजारीबाग आने का आमंत्रण दिया करता था. उसके भी हर पत्र में मुझसे जुदाई का दर्द अंकित हुआ करता था. 1981 के अप्रैल महीने में हजारीबाग आने का उसने मन बना ही लिया था और एक दिन लगभग 15 दिनों के लिए हमारे घर आ पहुंचा था. उसके आगमन से मुझे ऐसा लगा था, जैसे मसूरी वाले दिन हमारे बीच फिर से लौट आए थे. वही शराब के दौर, हंसी-ठहाके, शेर-ओ-शायरी, मसूरी वाले दिनों के संस्मरण वगैरह-वगैरह. उन दिनों वह एम.एम. (हिन्दी) का छात्र हुआ करता था और कॉलेज में लड़के-लड़कियों के बीच काफी लोकप्रिय भ्ज्ञी. उसकी एक प्रेमिका भी थी आशा नाम की. अक्सर शाम को मसूरी के किसी हवा घर या किसी एकांतिक रमणीय जगह पर हम बैठते, तो हम दोनों के बीच शराब का होना अनिवार्य-सा होता. फिर तो आशा से जुड़े संस्मरण और उसकी प्रेरणा से लिखी कविताओं के फव्वारे से फूटने लग जाते उसके मुंह से.

बहरहाल, अब वे मसूरी वाले दिन तो नहीं रहे थे, पर सुधीर के आगमन से हम दोनों की चर्चाओं के बीच वहां के जर्रे-जर्रे, वहां के दोस्त- जगपाल सिंह रौथाण, अती भाई, शर्माजी, अग्रवाल साहब...वहां से जुड़े हर लोग, हर वाक्या साकार होने लगे थे. मेरा शहर से बाहर आना-जाना तो लगा ही रहता था. अब उन यात्राओं में सुधीर भी मेरे साथ होता. उसके साथ से मेरा सफर ऐसा खुशनुमा बना रहता कि लगता जैसे सफर कभी समाप्त ही न हो. यात्रा की ऊब, हमारे वार्तालाप में जैसे किसी भीषण ठंड से कंपकंपा रहे आदमी के लिए अग्निकुण्ड के ताप में तब्दील हो जाती.

मसूरी से सुधीर का आगमन हुआ था, और वह कवि भी था, यह जानकर शहर के तमाम साहित्यिक मित्रों का स्वागत-पात्र बन गया था वह. भारत यायावर और प्राणेश कुमार से तो उसकी रोज ही भेंट होने लगी थी. एक दि जब मेरी यात्रायों दो-तीन दिनों के लिए स्थगित थीं, तब प्राणेश कुमार ने सुधीर के सम्मान में गोष्ठी के आयोजन का प्रस्ताव रख दिया था. मैंने तो गोष्ठियों से किनारा कर रखा था, पर जब सवाल सुधीर के सम्मान में गोष्ठी का था, तब भला मैं मना कैसे कर सकता था. गोष्ठी का आयोजन हुआ था- और उस गोष्ठी में सुधीर ने ‘मजूर’ कविता का ही पाठ किया था. मुझे उस कविता को सुनते हुए ऐसा लगा रहा था, जैसे वह कविता न सुना रहा हो, बल्कि मुझ पर दनादन जूते बरसा रहा हो. तभी प्राणेश कुमार बोल पड़े थे, ‘‘सुधीर जी, यह कविता तो रतन जी की है.’’

सुधीर ने घूमकर मेरी ओर देखा था और मेरी शर्मिंदगी से इस हद तक, जैसे मैं पूरी तरह निर्वस्त्र वहां बैठा हूं और पूरी महफिल मेरी नग्नता को निहार-निहार कर खिल्ली उड़ा रही हो.

प्राणेश कुमार के टोकने पर सुधीर पूरी तरह निरुत्तर हो गया था. वह मुझे ही निहारे जा रहा था.

साहस बटोर कर भीतर-ही-भीतर पूरी तरह टूटते हुए मैंने कहा था, ‘‘यह सुधीर की ही कविता है, जिसे मैंने अपने नाम से सुनाया था. इसके लिए मैं क्षमा मांगता हूं.’’ इसके साथ ही उठकर मैं बाहर निकल आया था. मेरे पीछे-पीछे सुधी, प्राणेश और भारत यायावर भी. बाकी के लोग वहीं रह गये थे. वे आपस में मेरे बारे में कैसी-कैसी टिप्पणियां करते रहे होंगे, यह सोच-सोचकर मेरा अंतस कचोटता रहा था. मन-ही-मन संकल्प भी लेता रहा था कि आइन्दा साहित्य तथा साहित्यिक परिवेश से मैं पूरी तरह किनारा कर लूंगा.

पर मेरे साथ शहर के दो कद्दावर साहित्यकार तो लगे ही थे- भारत यायावर और प्राणेश कुमार. साथ में सुधीर भी. अब अथाह जलराशि के बीच तैरना न जानने वाला आदमी जब फंस ही गया हो, तब उसे डूबने से भला कौन बचा सकता था.

हम चारों चलते हुए पी.टी.सी. मैदान में आ गये थे. शाम काफी खुशनुमा थी, पर मेरे लिए जहर घुली. बाकी के तीनों वहां बैठना चाहते थे, पर मैंने सुधीर से घर चलने को कहा था. इस पर भारत जी ने कहा था, ‘‘आप झूठ-मूठ तनाव ले रहे हैं, चलिये बैठिये यहां.’’ सुधीर ने भी हाथ पकड़कर मुझे जबरन वहां घास पर बिठा लिया था. फिर भारत यायावर बोले थे, ‘‘देखिये रतन जी, इससे इतना विचलित होने की जरूरत नहीं है. इस तरह की गलतियां कई बड़े-बड़े साहित्यकारों से भी हुई हैं और आप तो अभी प्रारम्भिक दौर में ही हैं. इस गलती को सुधारने का एक ही तरीका है कि इसे आप चुनौती की तरह लें और खुद को प्रमाणि करके दिखायें कि आप भी बेहतर लिख सकते हैं. इसी क्षण से यह भी भूल जाइए कि आपने कुछ गलत किया है. आपके चेहरे से अपराध बोध की छाप स्पष्ट झलक रही है. इस अपराध बोध को प्रायश्चित समझिये और इसे ही अपनी लेखकीय ताकत बनाइए...’’

कुछ इसी तरह की बातें प्राणेश और सुधीर ने भी समझायी थीं मुझे. सुधीर ने तो तत्काल ही यह भी वादा ले लिया था मुझसे कि वह मसूरी लौटने के एक महीने बाद पुनः हजारीबाग आयेगा और तब तक मुझे इतनी कवितायें लिख लेनी हैं, ताकि वह अपने संपादन में मेरा एक संग्रह प्रकाशित करवा सके.

सच ही कहा गया है कि किसी भी आघात के लिए सबसे बड़ा मरहम समय होता है. मेरे मित्रगण भी मेरे अपराध बोध से ग्रसित मन के लिए मरहम सिद्ध हुए थे. मिलने पर कभी उस घटना का जिक्र किसी ने कभी नहीं किया था. मैंने भी उस घटना को चुनौती की तरह ही लिया था और सुधीर से किये गये वादे पर कामय रहते हुए कवितायें लिखनी शुरू कर दी थीं. सबसे पहले ‘यात्रा में’ शीर्षक एक लम्बी कविता लिख गयी थी मुझे, जो मुक्त छंद में थी. फिर मुक्त छंद की ही कई कवितायें रच डाली थी मैंने.

सुधीर लौटने के दो महीने के बाद फिर से वापस आया था. मेरी कविताओं को देखकर बहुत खुश हुआ था. उन सारी कविताओं को संकलित कर अपने ही संपादन में वृहत संपादकीय के साथ प्रकाशित भी करवा दिया था. मेरे लेखकीय उत्साह से भारत यायावर, प्राणेश कुमार, शंकर तांबी सहित सारे मित्र खुश हुए थे. प्रोत्साहन स्वरूप सभी ने मिलकर उस ‘यात्रा में’ शीर्षक मेरे काव्य संग्रह का लोकार्पण भी करवाया था.

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साहित्य से जुड़ने के बाद परिचित-अपरिचित जो भी मुझसे मिले, सभी ने एक साहित्यकार के हैसियत से मुझे भरपूर प्यार-सम्मान दिया. उसी क्रम में 1984 में अपनी ससुराल बेतिया जाने का अवसर मिला. वहां तक साहित्य से जुड़े लोग मेरे बारे में जानने लगे थे. मेरे छोटे साले अनिल के कॉलेज के एक सहपाठी सतीश राय ‘अनजान’ हुआ करते थे, जो न सिर्फ साहित्य के छात्र थे, बल्कि साहित्य में उनकी गहरी रुचि भी थी. वे अच्छी कवितायें लिखा करते थे. पढ़ने में मेधावी तथा अत्यंत ही व्यवहार कुशल. उनसे वह भेंट ऐसी आत्मीयता में बदल गयी, जैसी मसूरी वाले सुधीर के साथ हुआ था. उन्होंने मेरे काव्य संग्रह ‘यात्रा में’ की समीक्षा भी लिखी थी. उस समीक्षा को देखकर मुझे लगा था कि सतीश राय ‘अनजान’ के रूप में, मैं भविष्य के एक बड़े आलोचक के संपर्क में हूं. गजब की संभावना थी उनमें. लेकिन उनका अभीष्ठ कुछ और ही था. वे अपने विषय हिन्दी में पारंगत होकर व्याख्याता बनना चाहते थे. अपनी पूरी ऊर्जा उन्होंने अध्ययन को समर्पित कर दिया था और आज वे एक सफल व्याख्याता हैं. बी.आर. अम्बेदकर बिहार विश्वविद्यालय में इन दिनों, हैं तो वे कुलानुशासक के पद पर, पर अपनी प्रतिभा का उपयोग वे, घनघोर व्यस्तता के बावजूद, समय निकालकर अपने छात्र-छात्राओं की प्रतिभा को निखारने में करते रहते हैं.

सुधीर की तरह ही वे मुझसे काफी दूर हैं, पर इतने नजदीक कि जैसे पास बैठे वार्तालाप कर रहे हों. 1984 के बाद से अब तक सिर्फ दो बान उनका हजारीबाग आगमन हुआ है और जब भी हम मिले, लगा हम फिर से 1984 में पहुंच गये हों.


क्रमशः....

सम्पर्क : क्वा. नं. के-10, सी.टी.एस. कॉलोनी,

पुलिस लाइन के पास, हजारीबाग-825301

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रचनाकार: प्राची - अगस्त 2017 : आत्म संदर्भ // धारावाहिक आत्मकथा (आठवीं किस्त) // अनचाहा सफर // रतन वर्मा
प्राची - अगस्त 2017 : आत्म संदर्भ // धारावाहिक आत्मकथा (आठवीं किस्त) // अनचाहा सफर // रतन वर्मा
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