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लघुकथा // आठ दिन // कैलाश चन्द्र

देवीलाल पाटीदार की कलाकृति

आठ दिन

मास्टरजी आज बड़े खुश थे, हो भी क्यूँ ना आखिर राशन स्टाक खत्म होने से पहले ही आ गया था. उनके पिछले आठ दिन बड़े मुश्किल से निकले थे क्योंकि उनका स्टॉक गड़बड़ चल रहा था, और बड़े भयभीत थे पता नहीं कब कौन आ जाए, अधिकारी से ज्यादा डर तो उन्हें अपनी बदनामी का था कि कहीं अख़बार में खबर ना आ जाए.

वैसे तो ऐसी नौबत आती ही नहीं है, पर इस बार स्कूल की प्रबंधन समिति के अध्यक्ष के यहाँ लड़के की शादी के कारण ये सब झंझट हुआ था. अध्यक्ष महोदय ने बड़ी चतुराई से मास्टरजी को अपने जाल में फंसाया था. ऐन वक़्त पर दो कट्टे गेहूं के मांग लिए थे. पहले तो मना करने का मन भी किया, पर उन्हें पता था कि अध्यक्ष को मना करने का मतलब हमेशा के लिए उससे बैर मोल लेने जैसा है. और वो ये करना नहीं चाहते थे. वैसे भी अध्यक्ष ने आज तक उनके खाली चैकों पर हस्ताक्षर करते समय कभी ये नहीं पूछा था कि मास्टर जी, ये पैसा आप किस लिए निकाल रहे हो ?

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