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मैनपाट के प्राकृतिक सौन्दर्य पर गीत एवं दो गज़ल // माणिक विश्वकर्मा ' नवरंग '

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गीत – मैनपाट

कविता की पृष्ठभूमि प्रकृति का शृंगार है।

दृष्टि पड़ती है जिधर बहार ही बहार है ।।


प्रेम का वातावरण ये सृजन का धाम है

संस्कृति का गौरव बौद्ध का पैगाम है

इसके हर कण में बसा जीवन का सार है ।।


शीतल जलवायु में नित पेड़ों का डोलना

चिड़ियों का चहचहाना झरनों का बोलना

कहता है कि मैनपाट दुर्लभ उपहार है ।।

भरमाते हैं यहां टेढ़े मेढ़े रास्ते

फिर भी मन कहता है भटकने के वास्ते

अद्भुत अभिसार है अनुशंसित मनुहार है ।।


अलग अलग संस्कृति अलग अलग वेश है

मन में कोई ईर्ष्या है न कोई द्वेष है

सबके दिलों में भाई चारा है प्यार है ।।


जलप्रपात बन गये हैं नदियों की धार से

देता है कोई आमंत्रण हर पठार से

मौसम अपना सबकुछ लुटाने तैयार है ।।


भाग रहीं हैं अपनी धुन में पगडंडियाँ

चारों ओर सजी हैं हरियई की मंडियाँ

धरती से अंबर तक फूलों की कतार है ।।


पैरों के साथ हिलने लगती हैं दलदली

लगता है नांच रही है साथ मनचली

अभिनव मनोरंजन है जीत है न हार है ।।


कीमती है फिर भी अबतक ये गुमनाम है

अल्युमीनियम क्षेत्र में भी इसका नाम है

इसके भीतर बाक्साइट का भंडार है ।।


भूधरों का समर्पक रूप पी गया हूँ मैं

कुछ दिनों में अपना जीवन जी गया हूँ मैं

इसको अनुभूति कहूँ या ये चमत्कार है । ।

--.

दो ग़ज़लें

1.

छटपटाती रहीं आस की मछलियाँ

रोज गिरती रहीं गाँव में बिजलियाँ


ख़ुशबुओं पर भरोसा नहीं कर सके

मुँह छुपाती रहीं बाग में तितलियाँ


पेट के साथ दुबकी रहीं कल तलक

आजकल झांकतीं हैं सभी पसलियाँ


नींद आती नहीं क्या कहें आपसे

रातभर नांचतीं हैं मुई पुतलियाँ


चाहकर भी न कुछ कर सके उम्रभर

बेबसी रोज लेती रहीं सिसकियाँ


है भरोसा बढ़ेंगे गगन के लिए

बाँधकर रख न पायेंगी ये सुतलियाँ


याद करता नहीं कोई भी प्यार से

बेवज़ह आ रहीं हैं हमें हिचकियाँ


2.

बज़्म में कल बिखर गया था वो

लोग कहते हैं डर गया था वो

वक़्त ने भी कभी न दुलराया

ख़ूब टूटा जिधर गया था वो


बोलती बंद हो गई उसकी

क्या कहेगा किधर गया था वो


प्यार के वास्ते बहुत तरसा

आंसुओं से निखर गया था वो


चाहता था किसी तरह हँसना

जी नहीं पाया मर गया था वो


साथ चलना नसीब हो न सका

रास्ते में ठहर गया था वो


गाँव वो छोड़ता नहीं शायद

बेकसी में शहर गया था वो


अज़नबी से लगे सभी अपने

बाद मुद्दत के घर गया था वो


आख़िरी वक़्त जब मिला कोई

जानकार भी मुकर गया था वो


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डॉ॰ माणिक विश्वकर्मा नवरंग” क्वार्टर नं॰ एएस-14,पावरसिटी, जमनी पाली,कोरबा (छ॰ग॰)495450 

मेल-vskm_manik@rediffmail.com


संक्षिप्त परिचय

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Øनाम- डॉ.माणिक विश्वकर्मा “नवरंग” Ø योग्यता - एम.एस॰सी (रसायन शास्त्र)

Øसंप्रति - भू.उपमहाप्रबंधक(पर्यावरण प्रबंधन),एनटीपीसी,कोरबा(छ॰ग॰)

Øवर्तमान - पर्यावरण विशेषज्ञ(डीईआईएए),जिला-कोरबा(छ.ग.)MoEF के अधीन एवं स्वतंत्र लेखन

Øजन्म तिथि - 07.02.1955 Ø जन्म स्थान - डोंगरगढ़ ,जिला-राजनांदगाँव (छ॰ग॰)

Øप्रांतीय संरक्षक - सृजन साहित्य समिति

Øसंरक्षक - मुकुटधर पाण्डेय साहित्य भवन समिति, कोरबा साहित्य समिति एवं विश्वकर्मा समाज ।

Øअध्यक्ष/जिला संयोजक - संकेत साहित्य समिति, छ॰ग.राष्ट्र भाषा प्रचार समिति , छ॰ग.प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, एवं छ॰ग.प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान

Øप्रकाशित पुस्तकें - (1) तेरे शहर में(ग़ज़ल संग्रह)] (2)माँ बम्लेश्वरी(संक्षिप्त इतिहास)](3)यादों की मीनारें(ग़ज़ल संग्रह)] (4) सर्पदंश (ग़ज़ल संग्रह)] (5) हरे पेड़ की सूखी टहनी (गीत संग्रह) (6)पसंगा (ग़ज़ल संग्रह)](7) लंबे दिन लंबी रातें(गीत संग्रह) (8) मन के विपरीत(ग़ज़ल संग्रह)](9) द्विविध(दोहा एवं मुक्तक संग्रह) (10) पुन्नी के चंदा(गीत संग्रह) (11)साहित्य के माणिक - नवरंग(एकाग्र) एवं (12) नवरंग की कुंडलियाँ ।

Øरचनाएँ प्रकाशित एवं संग्रहित - अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय समाचार पत्र, पत्रिकाओं, विशेषांकों एवं काव्य संग्रहों में।

Øरचनाएँ प्रसारित - दूरदर्शन एवं आकाशवाणी केंद्रों से (सन 1980 से)A

Øसंपादन - (1) संकेत ( हिन्दी काव्य संग्रह) (2) कोरबा के कवि (हिन्दी काव्य संग्रह) (3) गुड़ेरिया( छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह) एवंa (4)मन का अंतरजाल (हिन्दी काव्य संग्रह)।

Øसम्मान,अभिनंदन एवं मानद उपाधियाँ - सौ से अधिक(आंचलिक,प्रांतीय एवं राष्ट्रीय) ।

ग़ज़लें 5735393642459939225

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