सत्यम शिवम सुन्दरम ही साहित्य का सार सुशील शर्मा

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सिमैन और रयान के अनुसार  "साहित्य" खोज का एक मार्ग है जिस पर बहुत यात्रा की जाती है, हालांकि मंजिल पर अभी तक कोई नहीं पहुंचा है। स...

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सिमैन और रयान के अनुसार  "साहित्य" खोज का एक मार्ग है जिस पर बहुत यात्रा की जाती है, हालांकि मंजिल पर अभी तक कोई नहीं पहुंचा है। साहित्य के सार पर बात करने से पहले यह जानना जरूरी है कि साहित्य क्या है? हम इसे क्यों पढ़ते हैं ? साहित्य महत्वपूर्ण क्यों है?


क्या लिखित साहित्य लिखने या बोली जाने वाली सामग्री का वर्णन करने के लिए एक शब्द है। मोटे तौर पर, "साहित्य" का प्रयोग रचनात्मक लेखन से अधिक तकनीकी या वैज्ञानिक कार्यों के लिए कुछ भी वर्णन करने के लिए किया जाता है, लेकिन कविता, नाटक, कल्पित कथा, और गैर-कथाओं के कार्यों सहित रचनात्मक कल्पना के कामों को संदर्भित करने के लिए शब्द का सबसे अधिक उपयोग किया जाता है। साहित्य का अर्थ है लिखित रूपरेखाओं का एक तंत्र । इसकी उत्पत्ति लैटिन मूल लिटरातुरा (लिटटाटुरा) से हुई है जिसका अर्थ है पत्र या लिखावट। इसे फिक्शन / गैर-कल्पित, कविता / गद्य, उपन्यास, लघु कथा, नाटक जैसे कई रूपों में वर्गीकृत किया गया है। यह एक कला रूप माना जाता है जो बौद्धिक मूल्य धारण करती है । हम साहित्य क्यों पढ़ते हैं? इसके उत्तर बहुत विस्तृत है लेकिन अगर हम इन सभी मान्यताओं का एकीकरण करें तो हम पाएंगे कि साहित्य भाषा ,संस्कृति ,समाज और व्यक्ति को उनके मूल स्वरुप से विकसित स्वरुप तक ले जाने वाला सेतु है। साहित्य संस्कृति परंपरा धर्म और व्यक्ति को पहचान देता है। साहित्य ऐतिहासिक या सांस्कृतिक कलाकृति से ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि ये हमें स्वयं एवं अनुभूत और प्रत्यानुभूत जगत से परिचित कराता है। साहित्य हमें हकीकत से जोड़ता है, यह केवल इसका वर्णन नहीं करता है वरन यह आवश्यक दक्षताओं को समृद्ध करता है जिनकी हमें दैनिक जीवन में आवश्यकता होती है। साहित्य हमारे रेगिस्तान बने जीवन को अपनी शीतल फुहार से आध्यात्मिकता और संस्कृति रुपी आह्लाद एवं आनंद प्रदान करता है।


सभ्यता और संस्कृति के इस विचलन भरे समय में एक बार फिर इस पाठ को याद करने की जरूरत है कि मनुष्य के हर्ष और विषाद दोनों का ही संवेदनात्मक साक्षी साहित्य होता है। साहित्य सृष्टि ,सभ्यता और संस्कृति का संवेदनात्मक, जीवंत और प्रामाणिक स्मृतिकोश होता है। साहित्यकार का सर्व प्रथम धर्म समकालीन युग चेतना को ऐतिहासिक चेतना से जोड़कर उसका प्रामाणिक, कलात्मक एवं विवेकपूर्ण बोध कराना है। साहित्य मानवीय एवं सामाजिक संबंधों का सूक्ष्म विश्लेषण कर घनिष्ठ संवेदन को पाठकों को प्रत्यर्पित कर स्वयं एवं साहित्यकार को चिरस्थायी बना देता है। साहित्य को कालजयी होने के लिए युगीन जनचेतना से उसका गहरा संबंध अनिवार्य है।
साहित्य के संबंध में प्रेमचंद ने लिखा है ,“मेरे विचार से साहित्य की सर्वोत्तम परिभाषा जीवन की आलोचना हैं चाहे वह निबंध के रूप में, चाहे कहानियाँ अथवा काब्य के रूप में। उसे हमारे जीवन की आलोचना और व्याख्या करनी चाहिए।“ साहित्यकारों की सर्जनात्मकता के लिए व्यापक विश्व-दृष्टि अधिक मूल्यवान होती है क्योंकि जन-लेखन का उद्देश्य, वर्ग-स्वार्थ के कारण विचारधारा से असहमत लोगों को भी भावधारा की संवेदनात्मकता की सामाजिक सहमति से जोड़ना होता है। साहित्य वही जिसमें सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो,उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, जीवन की सच्चाईयों का प्रकाश हो-जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करने की क्षमता हो। द्वंद्व जीवन का लक्षण है और सृजन जीवन का प्रारंभ है। इसलिए सृजन में भी अनिवार्यत: द्वंद्व का महत्व है। साहित्य का सार भावना और बुद्धि के बीच तथा जीवन और मृत्यु के बीच युद्ध है। जब साहित्य बहुत बौद्धिक हो जाता है तब वह भावनाओं को अनदेखा करना शुरू कर देता है और इसमें निहित भावनाएं निर्बाध, मूर्खतापूर्ण और कथ्य के बिना हो जाती है।


साहित्य व्यक्ति के मन में समष्टि के स्वप्न को अध्यारोपित करता है और समष्टि के मन में व्यक्ति की आकांक्षाओं के लिए समुचित संदेश रचता है। शेक्सपियर के नाटक अनुपम है; पर उनमें जीवन की समस्याओं का कोई समाधान नहीं। आज के नाटकों को उद्देश्य कुछ और है, आदर्श कुछ और है, विषय कुछ और है, शैली कुछ और है। कथा साहित्य में भी विकास हुआ। उसकी शैली पूर्ण रूपेण परिवर्तित हो गयी। उपन्यासों तथा आख्यायिकाओं की कला हमने पश्चिम से ही सीखी। ‘अलिफ लैला’ तथा देवकीनन्दन खत्री का उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता’ आदर्श थे। उनमें बहुरूपता थी, वैचित्र्य था, कौतूहल था, प्रेम था पर उनमें जीवन की समस्याएँ न थीं, मनोविज्ञान के रहस्य न थे, अनुभूतियों की इतनी प्रचुरता न थी, जीवन सत्य का स्पष्टीकरण नहीं था। अनुभूतियाँ ही रचनाशील भावना से अनुप्राणित होकर कहानी बन जाती हैं। उसमें कई रसों, कई चरित्रों और कई घटनाओं के स्थान पर केवल एक प्रसंग का, चरित्र की एक झलक का सजीव हृदयस्पर्शी चित्रण हो। लेखन का आधार कोई रोचक दृश्य अथवा स्थूल सौंदर्य न होकर कोई ऐसी प्रेरणा हो जो पाठक की सुन्दर भावनाओं को स्पर्श कर सके। उसमें छिपे देवत्व को झकझोर कर जगा सके।


हेरियट स्टो के उपन्यास ‘टॉम काका की कुटिया’ ने सम्पूर्ण अमेरिका के हृदय को मथ डाला था। वर्तमान समय की यही पुकार है कि प्रतिभाशाली भावमयी लेखनी इस दिशा में चल पड़े और पाठकों को मनोरंजन के साथ सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें और संघर्ष में जीवन सत्यों की रक्षा करने की प्रेरणा और शक्ति दे। निस्संदेह, काव्य और साहित्य का उद्देश्य हमारी अनुभूतियों की तीव्रता को बढ़ाना है; पर मनुष्य का जीवन केवल स्त्री-पुरूष- प्रेम का जीवन नहीं है।


साहित्य की पहली गुणवत्ता इसकी कलात्मक सुंदरता है, जो हमें एक अलग कल्पनाशील दुनिया में ले जाती है जो कि सांसारिक चिंताओं से दूर होती है और शांतिपूर्ण और शांत वातावरण देती है दूसरा एक वाक्य के माध्यम से व्यक्त विचारों की एक लम्बी श्रृंखला का जन्म साहित्य से होता है साहित्य की तीसरी गुणवत्ता इसकी स्थायित्व है। यह किसी भी राष्ट्र या एक महाद्वीप तक ही सीमित नहीं है, लेकिन यह सभी सीमाएं पार करता है और पूरी मानव जाति को अपने में समेट लेता है, वैसे ही यह किसी एक उम्र तक सीमित नहीं है, सभी उम्र इसमें निहित रहती है और हर किसी को प्रबुद्ध करता है।


क्या वह साहित्य, जिसका विषय श्रृंगारिक मनोभावों और उनसे उत्पन्न होनेवाली विरह-व्यथा, निराशा आदि तक ही सीमित हो- जिसमें दुनिया की कठिनाइयों से दूर भागना ही जीवन की सार्थकता समझी गई हो, हमारी विचार और भाव सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है? नहीं वो सिर्फ मनोरंजन का साधन तो हो सकता है। आज साहित्य के इन गुणों को याद कर सही साहित्य का सृजन करने का समय है। अगर साहित्य हमारे जीवन की प्रस्तुति है, तो हम साहित्य की गुणवत्ता पर थोड़ा और अधिक ध्यान दें। उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण’ का ‘तिरगुन फाँस’ कर में लिये डोलनेवाले बाजारवाद की माया-मोहिनी से बचते हुए, जन-लेखक का दायित्व निभाने के लिए अपने को तैयार करने की चुनौती सृजनशीलता के सामने है। साहित्य के माध्यम से पाठकों को आशावादिता एवं जीवन के प्रति प्रभावी एवं सक्रिय दृष्टिकोण रखने की भावना जागृत करने का प्रयास करते रहना ही साहित्य का सार है। लिखने के लिए लिखना साहित्य का सार भी नहीं हो सकता है, इसके लिए हमें भावनाओं के गहरे समंदर में गहरे गोता लगाना होगा साथ ही हकीकत के तपते रेगिस्तान में नंगे पैर चलना होगा और स्वर्ण चमकते शब्दों से बाहर लाने की जरूरत है जो हर किसी के अंतस का दर्पण बन सकें। साहित्य का मूल स्वरुप तो वह आत्माभिव्यक्ति है जो साहित्यकार को आंदोलित करके जनमानस के अंतर्मन को झिंझोड़ दे, उसे आंदोलित करे और उस आंदोलन से सत्यम शिवं सुंदरम का अमृत निकले वही साहित्य का सार है। जिस प्रकार भगवान अपरिभाषित हैं उसी प्रकार सत्य अपरिभाषित है जो अटल अविचल अनेकानेक झूठों का हलाहल पीकर भी पथभ्रष्ट न हो वही सत्य है जो प्रकृति के प्रत्येक अजीव और सजीव के भावों को धारण करता हो वह शिव है और जिसमें सभी रस विद्यमान हों वही सुन्दर है और इन तीनों का समन्वय ही साहित्य का सार है।

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मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: सत्यम शिवम सुन्दरम ही साहित्य का सार सुशील शर्मा
सत्यम शिवम सुन्दरम ही साहित्य का सार सुशील शर्मा
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रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2017/10/satyam-shivam-sundaram-hi-jeevan.html
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