मोहसिन आफ़ताब केलापुरी की ग़ज़लें

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मोहसिन आफ़ताब केलापुरी हिंदुस्तान के नौजवान उभरते हुए शायर हैं।हिंदुस्तान के अलग अलग शहरों में जा कर अब तक अपना कलाम सुना चुके हैं।इंटरनेट पर...

मोहसिन आफ़ताब केलापुरी

मोहसिन आफ़ताब केलापुरी हिंदुस्तान के नौजवान उभरते हुए शायर हैं।हिंदुस्तान के अलग अलग शहरों में जा कर अब तक अपना कलाम सुना चुके हैं।इंटरनेट पर भी काफी लोकप्रिय हैं।अपनी शायरी के अलावा अपने खास अंदाज़ ए बयाँ के लिए भी जाने जाते हैं।इनकी अब तक सात किताबे आ चुकी हैं जो के पीडीएफ की शक्ल में है।एक किताब "अल्फ़ाज़" ऐमज़ॉन पर भी उपलब्ध है।इस के अलावा एक किताब "आग का दरिया " जल्द ही किताब की सूरत में प्रकाशित होने वाली है।मोहसिन आफ़ताब केलापुरी ने तीन विषयों में एम ए किया है और बी एड भी है ।अभी अपने शहर के कॉलेज में क्लॉक हार बेसिस पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं।आप के समक्ष प्रस्तुत है उनकी ये लोकप्रिय रचनाएं।
 
संपर्क - mohsin.aaftab9@gmail.com

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ग़ज़ल 1

फ़क़ीरी,बादशाही के उसूलों पर नहीं चलती।
ये वो कश्ती है जो पानी की लहरों पर नहीं चलती।

क़लंदर अपनी मर्ज़ी से कहीं भी घूम सकते हैं।
ज़बरदस्ती कीसी की भी हवाओं पर नहीं चलती।

हमारे दिल को हम समझा बुझा लेते मगर भाई।
जो बच्चें ज़िद पे आ जाएँ तो बच्चों पर नहीं चलती।

मियां,सहरा नवर्दी क़ैस के हिस्से में आयी है।
के लैला फूल पे चलती है शोलों पर नहीं चलती।

मुझे मालूम है मुझ को दुआ से काम लेना है।
दवा तो कोई भी अब मेरे ज़ख्मों पर नहीं चलती।

अदब से पेश आओ ऐ जहाँ वालों दीवानों से।
दीवाने हट गए तो फिर दिवानो पर नहीं चलती।

अभी भी फैसले सारे बड़े बूढ़े ही लेते हैं।
हमारे घर में बच्चों की बुज़ुर्गों पर नहीं चलती।

बुरे दिन जो हैं मेहमाँ ज़िंदगी में चार दिन के हैं।
हुकूमत देर तक शब् की उजालों पर नहीं चलती।

जो चलती है तो बस रब की ही चलती है जहां वालों।
किसी की भी मोहम्मद के ग़ुलामों पर नहीं चलती।

तो हम सब साथ होते खुश भी होते थे बहोत"मोहसिन"।
सियासत की अगर तलवार रिश्तों पर नहीं चलती।
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ग़ज़ल 2

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कुछ नया काम नए तौर से करने के लिए।
लोग मौका ही नहीं देते सुधरने के लिए।

जाओ जा कर के ग़रीबों के दिलों में झाँको।
कितनी बेचैन तमन्नाएँ हैं मरने के लिए।

उस पे मरते होतो फिर दुन्या की परवा कैसी।
इश्क़ होता है मियाँ हद से गुज़रने के लिए।

कोई आसानी से फनकार नहीं बनता है।
मुद्दतें चाहिए इक फ़न को निखरने के लिए।

मुंह उठा कर के फिर आई है ये तौबा तौबा।
शब् जुदाई की मेरे घर में ठहरने के लिए।

किसी दोशीज़ा की ज़ुल्फ़ें ये नहीं किस्मत है।
वक़्त लगता है बहोत इसको संवरने के लिए।

आज इस बात का अहसास हुआ है मुझ को।
ख़्वाब मोहसिन थे मेरे सिर्फ बिखरने के लिए।
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ग़ज़ल 3

मुद्दत से जो बंद पड़ा था आज वो कमरा खोल दिया।
मैं ने तेरे सामने दिल का कच्चा चिठ्ठा खोल दिया।

मुझ से लड़ने वाले सारे मैदाँ छोड़ के भाग गए।
ले कर इक तलवार जो मैं ने अपना सीना खोल दिया।

फूल समझ कर तितली भँवरे उस पे आकर बैठ गए।
बाग़ में जा कर जूं ही उसने अपना चेहरा खोल दिया।

सारे कामों को निपटा कर आधी रात में सोई थी।
भोर भये फिर उठ कर अम्मा ने दरवाज़ा खोल दिया।

मुझ को देख के मेरा जुमला जुं ही उसको याद आया।
उसने जो बाँधा था वो बालों का जुड़ा खोल दिया।
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ग़ज़ल 4



फसादों से उख़ुवत की जड़ें कमज़ोर होती हैं।
बग़ावत से हुकूमत की जड़ें कमज़ोर होती हैं।

गिले,शिकवे,शिकायत,एक हद तक ठीक है लेकिन।
सिवा हों तो मोहब्बत की जड़ें कमज़ोर होती हैं।

फ़लक से तुम ज़मीं पर आओगे मग़रूर होते ही।
ये मत भूलो के शोहरत की जड़ें कमज़ोर होती हैं।

दुवाएं बे असर होती हैं रीज़्के बद को खाने से।
दिखावे से इबादत की जड़ें कमज़ोर होती हैं।

मुसलसल अश्क का बहना मियाँ अच्छा नहीं होता।
नमी हो तो इमारत की जड़ें कमज़ोर होती हैं।

ये फ़िर्क़ा वारीयत अच्छी नहीं होती मेरे भाई।
इसी से ही तो उम्मत की जड़ें कमज़ोर होती हैं।

ये काले कोट वाले जज के जो इन्साफ परवर थे।
ईन्ही से अब अदालत की जड़ें कमज़ोर होती हैं।
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ग़ज़ल  5

एक आवारा सी परछाई का साया मैं हूँ।
तनहा रहती हुई तन्हाई का साया मैं हूँ।

ग़म के सूरज की तपिश इस को ना छु पाएगी।
अपने मासूम से इक भाई का साया मैं हूँ।

खेलती है जो तेरे जिस्म की शाखों से सदा।
देख मुझ को उसी पुरवाई का साया मैं हूँ।

मैं थकन हूँ तेरी रातों के हंसी लम्हों की।
और तेरे जिस्म की अंगड़ाई का साया मैं हूँ।

हकपरस्तों ने अक़ीदत से मुझे चूमा है।
ये है सच्चाई के सच्चाई का साया मैं हूँ।
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...  ग़ज़ल  6

जिस तरह धुप का रंगत पे असर पड़ता है।
नफ़्स का वैसे इबादत पे असर पड़ता है।

ऐसे मुझ पर भी तेरे ग़म के निशाँ दिखते हैं।
जैसे मौसम का इमारत पे असर पड़ता है।

सिर्फ माहौल से फिकरें नहीं बदला करतीं।
दोस्तों का भी तबीअत पे असर पड़ता है।

दुश्मनों से ही नहीं होता है ख़तरा लाहक़।
बाग़ियों से भी हुकूमत पे असर पड़ता है।

अब समझ आया सबब मुझ को मेरी पस्ती का।
मांग घटती है तो क़ीमत पे असर पड़ता है।

भूक नेकी की लगे या के लगे दुन्या की।
भूक लगती है तो सूरत पे असर पड़ता है।

रिज़्क़ रुकता है नमाज़ों के क़ज़ा करने से।
निय्यतें बद हों तो बरकत पे असर पड़ता है।

साफ़ दिखती है बुढ़ापे में क़ज़ा,सच तो है।
उम्र के साथ बसीरत पे असर पड़ता है।

पास रहने से ही बढ़ती नहीं चाहत"मोहसिन"।
फासलों से भी मोहब्बत पे असर पड़ता है।
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.....  ग़ज़ल 7

हमारे दिल में यादों को सलीके से रखा जाए।
के इस कमरे में फूलों को सलीके से रखा जाए।

मसीहाई की फिर कोई ज़रुरत ही नहीं पड़ती।
अगर ज़ख्मों पे अश्कों को सलीके से रखा जाए।

दिलों की हुक्मरानी का ये इक अच्छा तरीका है।
हर इक जुमले में लफ़्ज़ों को सलीके से रखा जाए।

अदब है दीन ओ दुन्या है,छुपा है इल्म भी इस में।
मेरे बच्चों किताबों को सलीके से रखा जाए।

तेरा ये घर लगेगा खूबसूरत ए मेरे भाई।
अगर चे सारे रिश्तों को सलीके से रखा जाए।

वो जाने वाला जाने कौन से पल लौट कर आये।
अभी रस्ते पे आँखों को सलीके से रखा जाए।

बरसती है खुदा की रहमतें इनकी दूवाओ से।
घरों में सब बुज़ुर्गों को सलीके से रखा जाए।

ग़रीबी देखती रहती है हसरत से खड़ी होकर।
दुकानों में खिलौनों को सलीके से रखा जाए।

पड़ौसी का भी हक़ है तुझ पे इतना याद रख"मोहसिन"
मुंडेरों पर चराग़ों को सलीके से रखा जाए।
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ग़ज़ल 8

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जिस्म में खूं की रवानी का मज़ा आएगा।
इश्क होते ही जवानी का मज़ा आएगा।

जोश गुफ्तार में कुछ और बढ़ा लो अपने।
तब ही कुछ शोला बयानी का मज़ा आएगा।

आज हम दोनों नहाएंगे बड़ी शिद्दत से।
आज बरसात के पानी का मज़ा आएगा।

बारिशें वक़्त पे खेतों को हरा कर दें तो।
सब किसानों को किसानी का मज़ा आएगा।

आज तो मूड है महफ़िल भी है"मोहसिन"साहब।
आज अंगूर के पानी का मज़ा आएगा।
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ग़ज़ल 9


नज़र को भाए जो मंज़र,पहन के निकला है।
धनक वो अपने बदन पर पहन के निकला है।

मैं आईना हूँ मगर पत्थरों से कह देना।
इक आईना है जो पत्थर पहन के निकल है।

वो अपनी आँख की उरयानियत छुपाने को।
हया की आँख पे चादर पहन के निकला है।

छुपा के रखता तो तू भी हवस से बच जाता।
मगर तू हुस्न का ज़ेवर पहन के निकला है।

ज़माना उसको कभी भी डरा नहीं सकता।
खुदा का खौफ जो दिल पर पहन के निकला है।

कुलाह सर पे नहीं मुंसिफ ए ज़माना के।
वो अपने सर पे मेरा सर पहन के निकला है।
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ग़ज़ल 10


जो भी शिकवा है गिला है वो बताया भी कर।
फ़ोन मैं तुझ को लगाऊँ तो उठाया भी कर।

हाँ तेरा हक़ है मोहब्बत की ये इक रस्म भी है।
मुझ को तड़पाया भी कर और जलाया भी कर।

घर ही घर में ये रहेंगे तो बिगड़ जाएंगे।
अपने बच्चों को तू बाज़ार घुमाया भी कर।

अपने अहसास के रिश्ते की बक़ा की ख़ातिर।
बात सुन भी ले मेरी और सुनाया भी कर।

ये नया दौर है इस दौर में सब चलता है।
मुझ को मिलने के लिए घर पे बुलाया भी कर।

नाम लिख उसका कभी बहते हुए पानी पर।
उसकी तस्वीर हवाओं पे बनाया भी कर।

भूल मत तुझ को बनाया है ख़लीफ़ा रब ने।
दे अज़ाँ और ज़माने को जगाया भी कर।

दर्द हूँ मैं तेरे दिल का तो दवा ढूंढ कोई।
अश्क़ हूँ मैं तो निगाहों से बहाया भी कर।

मैं तेरे ज़हन में बिखरा हूँ बड़ी मुद्दत से।
अपने कमरे की तरह मुझ को सजाया भी कर।

है बुज़ुर्गों से तुझे अपने मोहब्ब्त तो फिर।
अपनी औलाद को तहज़ीब सिखाया भी कर।

फेसबुक पर ही सदा पोस्ट करेगा मोहसिन??
अपने अशआर ज़माने को सुनाया भी कर।
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ग़ज़ल 11

हवेली, खेत , कारोबार , पैसा माँग लेते हैं !
बड़े होते ही बच्चे अपना हिस्सा माँग लेते हैं !

बुजुर्गों की दुवाओं का सहारा  माँग लेते हैं !
क़दम जब लडखड़ाते हैं तो कांधा माँग लेते हैं !

बड़े फय्याज हो तुम शहर भर में है यही चर्चा!
तो फ़िर हम तुम को ही तुम से सरापा  माँग लेते हैं !

नयी नस्लों को ये खानाबदोशी मुंह चिढ़ाएगी!
खुदा से इस लिये हम ईक ठिकाना  माँग लेते हैं !

कमी बेटी में भी कोई नहीँ होती मगर, रब से !
बहोत से लोग है ऐसे जो बेटा  माँग लेते हैं

तलब  करती है कूछ ऐसे मुझे दुनिया भी अऐ मोहसिन !
के बच्चे जिस तरह कोई खिलौना  माँग लेते हैं !

मोहसिन आफ़ताब केलापुरी

नाम

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श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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रचनाकार: मोहसिन आफ़ताब केलापुरी की ग़ज़लें
मोहसिन आफ़ताब केलापुरी की ग़ज़लें
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