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राहुल प्रसाद की ग़ज़लें


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1

उदासी का सबब न पूछो यारों बहाने बहुत हैं

रहने की चिंता नहीं मुझे कहीं भी ठिकाने बहुत हैं


उसके सुर में है एक अजीब सी झंकार

लगता है उसके पास तराने बहुत है


रोज दिखाता है मुझे वो तरह तरह के सपने

लगता है उसके पास नजराने बहुत हैं


बचा के रखना खुद के प्यार को इस भीड़ में

क्योंकि यहाँ प्रेम के दीवाने बहुत हैं


घर से निकलो तो अपनों को याद करना

यहाँ रस्ते रस्ते पर मयखाने बहुत हैं


तुम रहोगे साथ तो लड़ लूँगा मै सबसे

मैं समझूंगा मेरे पास दुनिया के खजाने बहुत हैं


2

मेरी ही भूल थी वो भी जो दिल तुझसे लगा बैठे

ज़माने में खुद ही को हम बेपर्दा करा बैठे


किये कितने थे मैंने भी जतन तुझको जो पाने के

तुम्हारे साथ रहने के सपने हम सजा बैठे


खता तुमने भी की थी तब इशारा न किया होता

हुई थी भूल हमसे भी नजरें जो मिला बैठे


नींदे भी गयी मेरी गया जब चैन भी सारा

तुम्हें पाने की हसरत में सब कुछ ही लुटा बैठे


मेरे हर ध्यान में पूजा में तुम्हारा नाम होता है

नमाजी बन गया मैं भी खुदा तुमको बना बैठे


उछाला इश्क का मुद्दा भरी महफ़िल में क्यों तुमने

बहुत थी भीड़ लेकिन तुम हमें तन्हा करा बैठे


लिखे थे गीत हमने भी तुम्हें पाने के खातिर जब

मिले जब तुम नहीं हमको खुद ही को हम सुना बैठे


3

भूख से बेहाल होकर मरने लगे हैं लोग

बेचकर खुद को बसर करने लगे हैं लोग


इस शहर में गोलियां अब इस कदर चलने लगी हैं

घर से कैसे निकलेंगे डरने लगे हैं लोग


माहौल डर का इस कदर है खौफ भी हावी हुआ

खुद की छाया देख कर भी ठहरने लगे हैं लोग


आँख खोली थी अभी ही जिन परिंदों ने यहाँ

परों को उनके भी यहाँ कतरने लगें हैं लोग


अब मुझे लगने लगा है शान कुछ मेरी बढ़ी है

बात मेरी पीठ पीछे करने लगे हैं लोग


4

घर की बातों को लोगों ने अखबार बना कर रखा है

बूढ़े माता-पिता को भी लाचार बना कर रखा है


स्कूलों में शोर शराबा है ज्ञान सजा है दीवारों पर

सच कहता हूँ स्कूलों का बाजार बना कर रखा है


किसको कितना मिला है पैसा कौन बिका है कितने में

राजनीति को नेताओं ने व्यापार बना कर रखा है


भाई -भाई अलग अलग हैं माँ-बाप भी रहते जुदा जुदा

कुछ बच्चों ने रिश्तों में दीवार बना कर रखा है


उनसे हाथ मिलते देखे जो दुष्कर्मों में लिप्त रहे

यहाँ स्वार्थ ने बदमाशों को इज्जतदार बना कर रखा है


कागज कलामों से दूर रखा है बंदूकें चाक़ू पकड़ा दी

फूल सरीखे बच्चों को अंगार बना कर रखा है


बातों बातों से लोगों ने खूब यहाँ पर जख्म दिए हैं

जबान को अपनी लोगों ने हथियार बना कर रखा है


--

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राहुल प्रसाद

शोधार्थी एम. फिल. हिंदी

गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय गांधीनगर सेक्टर 29

पिन – 382030


ईमेल – rahul.best9222@gmail.com

ग़ज़लें 5712538659773886290

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