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लघुकथाएँ : डॉ. सतीश दुबे // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

स्मृति शेष : नमन

जिन्होंने लघुकथा के अनेकों दीप जलाए और असमय ही अंतहीन यात्रा पर निकल पड़े, पर हम उनके जलाए दीयों को कभी बुझने नहीं देंगे चाहे जो हो... संपादक

डॉ. सतीश दुबे

रेवड़ मन

पूरे बाड़े में न जाने क्यों उसका मन शहजादी से जुड़ गया था. हर जुम्मे वह उसे साबुन की छोटी ब्टी से नहलाता और शरीर के विभिन्न हिस्सों पर मेहन्दी के चकत्ते बना देता. जब शहजादी इधर-उधर उछलकूद करती तो पैरों में घुंघरू बज उठते झन-झन-झन.

वह शहजादी उसके रोकने के प्रयासों को मिट्टी मारकर जंगले से निकल भागी तथा बाड़े की दूसरी भेड़ों के पीछे भाग गई. धूल-धुएं के बीच धीरे-धीरे ओझल हो रहे रेवड़ उसकी आकृति एवं घुंघरुओं की आवाज में अनुभव कर आंसुओं के वेग को रोकते हुए सोचने लगा- ‘काश कि शहजादी को वह समझ पाता कि वह रेवड़ की पिछलग्गू बन रही है. रहमत उसे कसाई खाने ले जा रहा है.’

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