लघुकथाएँ : डॉ. अंजना अनिल // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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डॉ. अंजना अनिल

1978 से नियमित लेखन. लघुकथा को समृद्ध करने की दिशा में निरन्तर प्रयासरत. इस दिशा में योगदान के लिए कई पुरस्कार व सम्मान प्राप्त.

पांच लघुकथा संग्रह संपादित

एक लघुकथा ‘साक्षात्कार’ प्रकाशित

संपर्कः बी-138, अम्बेडकर नगर, अलवर-301001 (राजस्थान)

डॉ. अंजना अनिल

घास के फूल

सिगरेट की राख को हिमेश ने बॉलकनी से नीचे झाड़ दिया. प्रश्न-दर-प्रश्न उसे कोड़े मारने लगे. एक आह सीने से निकली और पत्थरों की शक्ल अख्तियार करने लगी.

‘ओह! क्यों आता है ये दिन?’ आज हिमेश की पत्नी की छठी बरसी है. उसने दृष्टि घुमा ली. बेटी शुचिता हॉस्टल में जाते वक्त कितना रोई थी...मां के बगैर उसे यहां संभालता भी कौन?

हिमेश सिगरेट की राख फिर से झाड़ने को थे कि कामवाली बाई की बेटी चन्द्रा आ गयी..‘साब...नीचे के फ्लैटवाले अंकल बरामदे में ही बैठे हैं...कहीं यह राख उनके....?’

‘ओह!’ हिमेश चुपचाप वहीं खड़े रहे, ‘लेकिन तुम्हारी मां को बुखार था न्, अब वो कैसी है?’

‘साब...मां ज्यादा बीमार है. शायद बचे...ना बचे. पिताजी तो पहले जा चुके थे...’ चन्द्रा ने लम्बी सांस खींची.

‘तुम पढ़ती-वढ़ती हो क्या?’

‘हां...जी...ग्यारहवीं पास कर ली. अब बारहवीं में आई हूं.’ हिमेश के नेत्र आश्चर्य से फैल गये, ‘अच्छा!’

‘साब...मैं तो जिन्दगानी में अकेली ही रहूंगी, मैंने फैसला कर लिया है! मेरी मां कहवे है...जिनगानी तो बगीचे के बरोबर होवे है. उसे अच्छे कामों से जितना भी सींचो...सुख-शान्ति देगी...! मेरी मां कहवे है...जितना कोई साथ दे दे...उतना ही भला! जब शरीर गंगा की धार में उतरे है तो मन भी वैसा ही हो जावे...मेरी मां कहवे है साब! शुचिता बेबी...आपकी बगिया का सुन्दर-सा फूल है न साब! एक बात कहूं मैं.

‘आज अपनी मेम साब की बरसी है न? साब अपने आपको अंधेरे में मत रखना साब...कभी-कभी तो नदिया का पानी भी सूख जावे है साब...! मेरी मां ने ये सब आपको कहलवाया है मुझसे...’

चन्द्रा चौका-बर्तन करने अन्दर चली गयी.

हिमेश बॉलकनी में खड़े हैं. दूर-दूर तक फैले मैदान को देख रहे हैं. घास ही घास...घास पर सफेद फूल किसने उगाये?

चन्द्रा काम निबटाकर सीढ़ियां उतर गयी.

छोटा मुंह...

तबादले के बाद इस शहर में आकर बड़े साहब ने दफ्तर का कार्यभार संभाला. इस दफ्तर के माहौल ने उन्हें काफी हद तक प्रभावित किया.

कई दिनों तक तो वे पहले वाले शहर के दफ्तर को लेकर सोचते रहे... तुलना में यहां के माहौल को सराहते रहे. भगवान तेरा शुक्र है. इतना स्वस्थ वातावरण....वे तरोजाता हो जाते.

उस शहर के ऑफिस से... शाम को जब वो घर पहुंचते...चिड़चिड़ाते हुए... बच्चों को अक्सर डांटते... पत्नी से भी बेरुख हो जाया करते थे.

साहब... साहब कहता यहां उनका पर्सनल प्यून...बड़े ही अदब से उनके सामने आता है, जबकि उस शहर में चपरासी गेतूराम... बड़ा रूखा-रूखा सा था. बड़े साहब सोच में डूब जाते कि चलो जैसा भी था, अपनी जात का था. पानी-वानी, चाय-वाय उसके हाथ से पीना ठीक लगता था.

इस दफ्तर का चपरासी पानी रख जाता है, बड़े साहब नहीं पीते... चाय ले आता है, तो रखी रह जाती है. कल जब चपरासी मनोहर फाइलें लेकर उनके दफ्तर में आया, उसके हाथ में एक मोटी-सी पुस्तक थी. साहब ने पूछा, ‘ये क्या है?’

‘गीता है सर!’

‘अरे वाह! तुम तो बड़े धार्मिक ख्यालों के हो मनोहर.’

मनोहर हंस दिया. साहब पर गहरी दृष्टि डाली.

‘अरे मनोहर! एक बात बता तो!’

मनोहर फिर हंस दिया, ‘हां, हां, कहिए सर?’

‘अरे भाई तू किस जात का है...’ मनोहर ने उनकी बात पूरी कर दी... ‘यही पूछना चाह रहे हैं न? अब से आपने ज्वाइन किया है, न मेरे हाथ से लायी हुई चाय पी, न पानी....मैं तभी समझ गया था...! सर, जात-पात से क्या होता है. बड़े विनम्र भाव से कह रहा हूं, आदमी अपनी सोच से बड़ा बनता है. सर, पानी तो कुदरत की अनमोल देन है...इसके बारे में कहूं?’ मनोहर ने हाथ जोड़ दिये, ‘माफ करना... छोटा मुंह बड़ी बात कर गया.’ बड़े साहब आश्चर्य में डूब गये.

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