लघुकथाएँ : रेणु चन्द्रा माथुर // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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रेणु चन्द्रा माथुर

जन्म : 4 मार्च 1951

उपलब्धियां : कविता संग्रह- 2, कहानी संकलन- 1, लघुकथा संगह- 2

संपर्कः 140, न्यू कॉलेनी, एम.आई.रोड, जयपुर-302001

राजस्थान,

रेणु चन्द्रा माथुर

खुशी

मेरे पड़ोस में रहने वाली ज्योत्सना शर्मा ने अचानक ही एक दिन अच्छी खासी पार्टी का आयोजन किया, जिसमें सभी रिश्तेदार, दोस्त एवं कॉलोनीवालों को निमंत्रित किया गया था. पार्टी किसलिये दी जा रही थी, किसी को मालूम नहीं था. जब सभी एकत्रित हो गये तब वह एक बहुत ही प्यारी सी बच्ची को गोद में लेकर आई और कहने लगी, ‘इस बच्ची को मैंने गोद लिया है. आज इसका नामकरण संस्कार है. इसी उपलक्ष्य में इस पार्टी का आयोजन किया गया है.’ मैंने उसे एक तरफ ले जाकर पूछा, ‘तुम्हारे तो स्वयं का अपना बेटा है, फिर इस लड़की को गोद लेने की क्या जरूरत आ गई?’

उसने कहा, ‘यह सच है, बेटा तो है परंतु मुझे एक बेटी की कमी खलती थी. ऐसा कहते हैं, बेटा तो अपने पिता का नाम आगे बढ़ाता है परंतु बेटी तो माता-पिता का मान बढ़ाती है. भाई की सूनी कलाई पर राखी बांध कर स्नेह लुटाती है. सब पर प्यार लुटा कर घर में खुशियां भर देती है. दर्द बांटती हैं. दूर जाकर भी सदा पास होती है. बेटी ईश्वर प्रदत्त खुशी का एक तोहफा होती है.’

पुनः वह मुस्कुराती हुई बोली, ‘यह बच्ची भी मेरे जीवन में बेटी की कमी को पूरा करके खुशियां लायेगी. इसी से मैंने इसका नाम ‘खुशी’ रखा है.’

मैंने उसकी ओर देखा, उसकी आंखों में अपार खुशियां झलक रही थीं.

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