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लघुकथाएँ : सुरेश शर्मा // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

सुरेश शर्मा

अंधे बहरे लोग

सड़क किनारे पड़ा बीज हवा-पानी पाकर अंकुरित होने लगा. छोटी-छोटी पत्तियां दिखाई देने लगीं. कुछ ही दिनों में वह एक पौधे में रूपांतरित हो गया. कुछ पक्षियों की नजर उस पर पड़ी. उनकी लालची नीयत भांप पौधे ने समझाया- ‘अभी नहीं. मुझे बड़ा हो जाने दो. बड़ा होने पर मैं तुम सबको खुश कर दूंगा.’ पक्षी मान गए.

कुछ दिनों बाद पौधा और बढ़कर छोटा वृक्ष बन गया. कुछ जानवरों ने उस वृक्ष को देखा तो उनके मुंह में पानी आ गया. उनकी लालची निगाहें भांपकर वृक्ष ने विनम्रता से कहा- ‘अभी मुझे और बड़ा होने दो. फिर तुम सभी के लिए रोज ढेरों पत्तियां, फल-फूल उपलब्ध कराऊंगा. धूप, वर्षा से तुमको राहत प्रदान करूंगा.’ जानवरों ने उसकी बात मान ली.

कुछ सालों में छोटे वृक्ष ने पूर्ण वृक्ष का रूप धारण कर लिया. अब पक्षी घोंसले बनाकर चहचहाने लगे. बंदर एक डाल से दूसरी डाल पर कूद-फांद करने लगे. गिलहरियां फुदकने लगीं. रोज शाम को घर लौटे तोतों की फड़फाड़ाहट गूंज उठती. अन्य पशु भी उसके पत्तों, फल-फूल पाकर उसकी छांव में सुख से रहने लगे.

एक दिन वृक्ष ने देखा कुछ आदमी कुल्हाड़ी, आरी और रस्सा लेकर उसकी तरफ चले आ रहे हैं. वृक्ष भय से कांप उठा. जानवरों ने तो उसकी बात मान ली थी, पर आदमी ने...?

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