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लघुकथा : राजकुमार जैन राजन // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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राजकुमार जैन राजन

जन्म : 24 जून 1969, अकोला (राजस्थान), शिक्षा- एम.ए. (हिन्दी)

उपलब्धियां : बालकथाएं, हिंदी- 15, राजस्थानी- 2, अंग्रजी- 1, असमिया- 1, अनेक सम्मान और पुरुस्कार प्राप्त

संपर्कः चित्रा प्रकाशन, अकोला- 312205,

चित्तौड़गढ़ (राजस्थान),

राजकुमार जैन राजन

अतिशयोक्ति कैसी

झींगू-ढींगू चूहे एक शाम अपनी मांद में लौटे तो ढींगू चूहे के पेट में जोर से दर्द हो रह था. हुआ यह था कि सुबह जब ढींगू भोजन की तलाश में पास के खेत की तरफ गया तो उसे वहां मूंगफली का ढेर दिखाई दिया.

बस, फिर क्या था. ढींगू खेत में उतर गया और लालची स्वभाव होने के कारण भूख से कहीं ज्यादा मूंगफलियां खा गया. इसलिए शाम को उसके पेट में दर्द होने लगा. रातभर वह दर्द से कराहता रहा.

सवेरा हुआ तो झींगू बोला- ‘आज हम भोजन की तलाश में दूर-दूर तक नहीं जाएंगे. तुम कुछ देर आराम करो, मैं तुम्हारे लिए खिचड़ी पकाऊंगा. हल्का खाना खाने से तुम्हारा पेट ठीक हो जाएगा.’

झींगू ने बड़ी मेहनत से खिचड़ी बनाने का सामान जुटाया. जब खिचड़ी बनकर तैयार हो गई तो झींगू ने ढींगू से कहा- ‘मैं नहाने जा रहा हूं. लौटकर दोनों साथ-साथ खिचड़ी खाएंगे. तब तक तू आराम कर.’

झींगू नहाने चला गया तो ढींगू ने थोड़ी-सी खिचड़ी चखकर देखी. खिचड़ी बहुत स्वादिष्ट लगी. उसने थोड़ी-सी और खा ली. लालची ढींगू थोड़ी-थोड़ी करके अपने हिस्से की सारी खिचड़ी खा गया.

फिर भी उसका मन नहीं भरा तो उसने झींगू के हिस्से की खिचड़ी भी खा ली. उसका पेट तो पहले से ही खराब था, अब जो उसने इतनी सारी खिचड़ी अकेले ही खा ली थी तो उसका पेट फूलने लगा. वह दर्द से तड़पने लगा. हाय-तौबा मचाने लगा.

कहीं ऐसा तो नहीं है कि आदमी के घर में रहते-रहते चूहे भी आदमी के माफिक लालची हो गए हैं. उनका पेट कभी भरता ही नहीं. उन्हें भी और...और...और... की आदत पड़ गई है. आदमी का नमक खाकर, आदमी के घर में रहकर आदमी जैसे क्रियाकलाप चूहों के भी हो गए हों तो अतिशयोक्ति कैसी? उनका लालची होना अवश्यंभावी है.

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