लघुकथाएँ : दिनेशनंदन तिवारी // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

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दिनेशनंदन तिवारी

जन्म : 3 सितंबर 1955, भैंसदेही

उपलब्धियां : सभी विधाओं में उपयुक्त लेखन.

संपादन : सत्यानारायण साईनाथ

संपर्कः साईं सबूरी प्लाट इ-6 रामनगर, पो. शक्तिनगर

रामपुर, जबलपुर,

दिनेशनंदन तिवारी

आशीर्वाद

उम्र का तकाजा या आंखों की उचित देखभाल का अभाव... कि उनको अचानक दिखाना कम होने लगा, ऐसा वो मोहल्ले में बताने लगीं. उनकी वृद्धावस्था को देखकर परिचित उन पर सहानुभूति प्रकट करके उन्हें सम्मान सहित खाना कपड़े और पैसा भी देने लगे. एक जगह फिर पुनरावृत्ति हुई, खाने के बाद एक अधेड़ महिला रिश्तेदार ने उन्हें पैसे (पचास का नोट) दिये तो एक हाथ से उन्होंने उसे सदा सुहागन रहने का शुभाशीष प्रदान किया और बोली- ‘बेटा, तुमने कम से कम दस रुपये तो दिये.’ तो युवती ने स्थिति स्पष्ट की- ‘अम्मा, दस का नहीं पचास का है.’ तो अपनी भूल सुधारते हुए उसे दोनों हाथों से सदा सुहागन रहने का आशीर्वाद दिया और अन्य रिश्तेदार के घर की ओर चल पड़ीं.

तोहफा

शाम को अचानक ही टप्पू के बाबू ने अपनी झोंपड़ी में प्रवेश किया तो रोज की बजाय आज चेहरा खिला-खिला था, क्योंकि हाथ में नया मोबाइल चमचमा रहा था. उन्हें इस हालत में देखकर दिनभर की थकी-हारी पत्नी कुछ कहती कि खुद ही बोल पड़े- ‘देखा टप्पू की मां, आखिर मैं भी आज मोबाइल वाला बन ही गया.’ पत्नी के चेहरे पर उठ रही प्रश्नवाचक मुद्रा- ‘कैसे मिला?’ के उत्तर में उन्होंने उसे चुप रहने को कहा तो पत्नी बिफर गई.

‘किसे करोगे मोबाइल? और फिर क्या उसे अपनी खाली कनस्तर और टपटपाती झोपड़ी का हाल बताओगे या फटे कपड़े और भूखे पेट की हालत बताओगे या ये बताओगे कि तीन महीने की फीस न भरने के कारण टप्पू को स्कूल से निकाल दिया गया है?’

अब टप्पू के बाबू की बोलती बंद थी.

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