पंकज प्रखर की पाँच लघुकथाएँ

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PANKAJ

पंकज प्रखर

कोटा राज.

अकेलापन

प्रमोद ने माइक्रोवेव में खाना गरम किया और और डाइनिंग टेबल पर बैठ कर खाने लगा।

जाने क्या बात थी कुछ महीनों से उसे अकेलापन खलने लगा था।

वह अपने जीवन के बारे में सोचने लगा जवानी में उसने अपने जीवन में कभी कोई कमी महसूस नहीं की थी, वह अपने में ही मस्त था| उसे लगता था की जीवन में कहीं ठहर जाना सही नहीं है ,जैसे भंवर हर फूल का भरपूर लुत्फ़ उठता है वैसे है उसे जीवन जीना है इसलिए उसके जीवन में कई प्रेम प्रसंग हुए लेकिन वो किसी को लेकर गंभीर नहीं हुआ।

उन्हीं दिनों उसके जीवन में सोनम आई वो बहुत ही सरल और सादगी पसंद थी| प्रमोद उसकी खूबसूरती का दीवाना हो गया। सोनम उसकी कंपनी में ही काम करती थी। अपने इस रिश्ते को लेकर गंभीर थी और इस रिश्ते को एक मुकाम तक ले जाना चाहती थी। लेकिन प्रमोद का चंचल मन फिर भटकने लगा जिससे सोनम बहुत आहत हुई उसने नौकरी छोड़ दी और दूसरे शहर में चली गयी।

प्रमोद का भटकना जारी रहा वह किसी भी रिश्ते में ज्यादा दिन तक नहीं रहता था उसके मित्रों और शुभचिंतकों ने उसे समझाया की ये चंचलता और भटकाव उसे एकाकीपन के अलावा उसे कुछ नहीं देगा पर जवानी के मद में चूर उसने किसी पर ध्यान नहीं दिया|

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गयी जीवन में ठहराव की आवश्यकता अनुभव होने लगी उसे एक साथी की तलाश थी| लेकिन उसकी छवि ऐसी बन गयी थी की कोई भी लड़की उससे रिश्ता नहीं रखना चाहती थी।

अब वह अकेला रह गया था और उसका एकाकीपन उसे काटने को दौड़ता था। उसके भटकाव ने उसे क्षणिक सुख तो दिए लेकिन उसके आसपास अकेलेपन की एक गहरी खाई खोद दी थी जिसमें वो अकेला भटक रहा था।

कल रात से जब से वो अपने मित्र की शादी से लौटा था तब से उसे ये खालीपन ज्यादा ही खल रहा था वह सोच रहा था काश कोई उसका साथ देने वाला भी होता जो बस उसका होता और वो अपनी हर बात उससे शेयर कर पाता। खाना खाते हुए अचानक ही सोनम का चेहरा उसके आँखों के सामने घूमने लगा और चेहरे पर दर्द उभर आया।

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अस्तित्व

सोनम एक प्रतिभावान छात्रा थी लेकिन रिश्तेदारों के दबाव के चलते उसके बीमार पिता ने उसकी शादी बारहवीं पास करते ही कर दी| सोचा था पिता के घर तो बस पिता की सेवा में ही लगी रहेगी शादी करके ससुराल चली जाएगी तो जीवन सुख से बीतेगा उसका ,लेकिन विधि का विधान कुछ और था मनुष्य जो सोचता है वैसा कहां हो पाता है किस्मत के आगे सयाने से सयाना भी ठगा जाता है सो हुआ भी कुछ ऐसा ही सास के दहेज के लिए ताने, ननद की गालियाँ और पति की मार यही सोनम के जीवन का हिस्सा बन चुके थे। एक दिन पति की मार से बेहाल सोनम का हाथ अनायास ही पति के गाल पर जोर से पड़ा। एक बिजली सी कौंधी और पूरा वातावरण शांत हो गया। अब सोनम में न जाने कहां से अजीब शक्ति समा गयी और उसने उसी क्षण निर्णय कर लिया कि अब वो अपनी जिंदगी बर्बाद नहीं होने देगी। उसने पति का घर छोड़ दिया अधूरी पढ़ाई फिर चली, समय के सोपानों के साथ उसने कदम बढ़ाए। बढ़ते कदमों ने उसे स्वातंत्र्य यज्ञ का पथिक बनाया। संवेदना उसकी शक्ति बनी व गुणों के वृक्ष पर कविता के प्रसून खिले और यह कविता बन गयी नारी की अनकही संवेदनाओं की कथा। साहित्य के क्षितिज पर एक ‘निहारिका’ का अवतरण हुआ, जिसमें भावों के ब्रह्माण्ड सँजोये थे। कविता के भवन में उसका सौंदर्य दीपशिखा बन चमका। भावना के सौंदर्य से भरी सोनम अब “निहारिका’ के नाम से प्रतिष्ठित होकर एक सफल लेखिका के रूप में अपना जीवन बिता रही थी क्योंकि अब वो अपना अस्तित्व सिद्ध कर चुकी थी।

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आत्मसम्मान

‘तो क्या हो गया बेचारी विधवा है खुश हो जाएगी।’

ये शब्द जैसे ही सोनम के कानों में पड़े, सहसा उसके कदम रूक गये। दरअसल उसकी भाभी उसके भाई द्वारा उसे दिए गये उपहार की उलाहना दे रही थी। अभी कुछ तीन साल पहले ही सोनम का विवाह सार्थक से हुआ था। घर परिवार सब अच्छा था और ससुराल, ससुराल कम बल्कि मायका ज़्यादा लगता था वो अपने ससुराल में रानी की तरह रहती थी।

सार्थक उसे हमेशा अपनी पैतृक सम्पति के बारे में बताता रहता था और कहता था हमें किसी पर भी ज़रुरत से ज्यादा भरोसा नहीं करना चाहिए वो चाहता था की सोनम को भी उसकी सम्पत्ति की जानकारी रहे। लेकिन ये बात जब भी वो शुरू करता सोनम कहती क्या जरूरत है मुझे ये सब जानने की आप तो हमेशा मेरे साथ रहेंगे इस पर सार्थक कहता समय का कोई भरोसा नहीं है चाहे पति हो या पत्नी उन्हें एक दूसरे के बारे में हर एक बात पता होनी चाहिए| जिससे की कभी एक को कुछ हो जाए तो दूसरे को दुःख के दिन न देखना पडे तुम तो पढ़ी लिखी हो सब समझ भी सकती हो।

लेकिन सोनम उसकी बातों पर ध्यान नहीं देती।

मगर हुआ वही जिसका डर था सार्थक को एक गंभीर बीमारी हो गयी .....उसने बीमारी के दौरान ही सोनम को सम्पत्ति के विषय में सब कुछ बता दिया था|

पति की मृत्यु के बाद उसका बड़ा भाई उसे ये कहकर अपने घर ले आया था की तू मेरी बहन नहीं बल्कि बेटी है लेकिन आज उसकी ये बेटी उसके लिए बेचारी विधवा बनकर रह गयी थी| उसका भाई ही उसकी सारी धन सम्पत्ति का लेखा जोखा रखता था और उससे अपने और अपने परिवार के शौक भी पूरे कर लेता था। जिस पर सोनम ने कभी आपत्ति नहीं जताई। लेकिन भाई की ऐसी बात सुनकर सोनम को बहुत ग्लानि हुई और उसके आत्म सम्मान को गहरा आघात लगा उसे अपना आने वाला भविष्य अनिश्चित और दुखद लगने लगा क्योंकि वो केवल एक विधवा ही नहीं थी बल्कि एक बच्ची की माँ भी थी उसे अफ़सोस हो रहा था की ... उसे आंखें बंद करके विश्वास नहीं करना चाहिए था। उस रात वो सो नहीं पायी सार्थक के शब्द उसके कानों में गूंजते रहे। दूसरे दिन उसने अपनी सम्पत्ति की कमान खुद सम्भालने का निर्णय अपने भाई को सुना दिया और सामान समेटकर अपने घर चली आई।

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घुटन से संघर्ष की ओर

सरला अब उठ खड़ी हुई थी ये विवाह उसके माता पिता और गर्वित के माता पिता की ख़ुशी से हुआ था लेकिन न जाने क्यों गर्वित उससे दूरी बनाये रखता है न जाने उसे स्त्री में किस सौन्दर्य की तलाश थी ये सोचकर उसके माथे पर दुःख की लकीरें उभर आई वो सोचने लगी- विवाह हुए अभी ज्यादा दिन नहीं हुए। पति का उसके प्रति यह व्यवहार, ताने, व्यंग्य, कटूक्तियों की मर्मपीड़क बौछार सुनते- सुनते उसका अस्तित्व छलनी हो गया है। यदि उसके पास वासनाओं को भड़काने वाली रूप राशि नहीं हैं, तो इसमें उसका क्या दोष है? गुणों के अभिवर्द्धन में तो वह बचपन से प्रयत्नशील रही है। बेचैनी से उसके कदम कमरे की दीवारों का फासला तय करने लगे। विचारों की धारा प्रवाहमान हुई।

आज निर्णय की घड़ी है। निर्णय की घड़ी क्या-निर्णय हो चुका। पति साफ कह चुके, “मैं तुमको अपने साथ नहीं रख सकता।” उनकी दृष्टि ने शरीर के अलावा और कुछ कहाँ देखा? यदि देख पाते तो ... काश.....! बेचैनीपूर्वक टहलते-टहलते पलंग पर बैठ गयी। अचानक उसने घड़ी की ओर देखा, शाम के 5-15 हो चुके। अब तो वे आने वाले होंगे। नारी सदियों से एक वस्तु रही है, पुरुष के पुरुष हाथों का खिलौना।

तभी दरवाजे पर बूटों की खड़खड़ाहट सुनाई दी। शायद.......मन में कुछ कौंधा। अपने को स्वस्थ-सामान्य दिखाने की कोशिश करने लगी। थोड़ी देर में सूटेड-बूटेड, ऊँचे, गठीले शरीर के एक नवयुवक ने प्रवेश किया। उसके मुखमण्डल पर पुरुष होने का गर्व था। एक उचटती-सी नजर उस पर डालकर वह कुर्सी पर बैठा व प्रश्न दाग बैठा-”हाँ तो क्या फैसला किया तुमने?”

घुटन या संघर्ष में से वह पहले ही संघर्ष चुन चुकी थी। पति का निर्णय अटल था, अतः उसने बन्धनों से मुक्ति पा ली

टूटा विश्वास और बिखरा स्वाभिमान

शैलेश तमतमाता हुआ ऑफिस से बाहर आया उसका स्वाभिमान और स्वर दोनों ही उच्चावस्था में थे बात ये थी की उसे किसी आवश्यक कार्य हेतु अपने एक महीने की सैलरी एडवांस चाहिए थी और शैलेश स्कूल में कोई नया नहीं था बल्कि २० सालों से विद्यालय में हिंदी पढ़ाता चला आ रहा था वो बच्चों को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं देता था बल्कि उनमें मौलिक चिंतन और नैतिक गुणों के विकास के बीज भी उनके हृदय और मानस में बोता था जिस पर उसे बहुत गर्व था। आज उसे घर के आवश्यक कार्य हेतु अपने एक महीने की तनख्वाह एडवांस चाहिए थी। लेकिन प्रिंसिपल ने पैसे देने से साफ़ मना कर दिया| शैलेश बड़बड़ाता हुआ बाहर निकल गया..... शिक्षक कोई मजाक नहीं है बल्कि जीवन बनाने वाला राष्ट्र का निर्माता है हमें समझते क्या है ये आजकल के व्यापारी आज ही स्कूल छोड़ दूंगा तब इन्हें मेरी कद्र होगी हर साल अपने विषय में सौ प्रतिशत परीक्षा परिणाम देने वाला शिक्षक जब जाएगा तब मालूम पड़ेगा। ये सोच उसने रिसेप्शन से खाली पेपर लिया और उस पर कुछ लिख ही रहा था की इतने में चपरासी आया और उसने कहा सर.... प्रिंसिपल मेडम ने बोला है... की आप अपनी अलमारी खाली कर दें और एनओसी साइन कराकर अपनी बची हुई सैलेरी लेलें। शैलेश पर तो मानो बिजली सी ही गिर गयी हो उसका चेहरा निस्तेज हो चूका था| उसे विश्वास नहीं हुआ कि जिस स्कूल को उसने अपने जीवन का एक बड़ा भाग देकर ईमानदारी से काम करते हुए आगे बढ़ाया आज वो ही स्कूल उसे नौकरी से निकालने को आमादा है।

शैलेश ने अपने टूटे विश्वास को और बिखरे हुए स्वाभिमान को बटोरा और प्रिंसिपल को जाकर सॉरी बोला। लेकिन आज कक्षा में उसने नैतिक मूल्यों के बारे में बच्चों को कुछ नहीं पढ़ाया।

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पंकज कुमार शर्मा "प्रखर"

(साहित्य भूषण सम्मानोपाधि से विभूषित)

लेखक ,लघुकथाकार एवं वरिष्ठ स्तंभकार


E-mail: pankajprakhar984@gmail.com

Blog: pankajprakhar.blogspot.in

*कोटा (राज.)*

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