मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ : भाष्यालोचन - खंड 1 // शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव

SHARE:

‘अँधेरे में’ मुक्तिबोध की एक श्रेष्ठ कविता है. पर इसको समझने में मुझे बड़ी कठिनाई हुई, इसलिए नहीं कि इसका पैटर्न नया है, शिल्प नया है, वरन् ...

‘अँधेरे में’ मुक्तिबोध की एक श्रेष्ठ कविता है. पर इसको समझने में मुझे बड़ी कठिनाई हुई, इसलिए नहीं कि इसका पैटर्न नया है, शिल्प नया है, वरन् इस कारण कि इसकी काव्यवस्तु और अभिव्यक्ति दोनों उलझी हुई हैं. शब्द-रचना और उसकी व्यंजना में कहीं-कहीं एकान्विति नहीं है. कहीं-कहीं शब्दों के अर्थ जानने के लिए मुझे अपनी बुद्धि लगानी पड़ी है. इससे मुझ पर मनमानेपन का आरोप लग सकता है.

यह पूरी तरह एक राजनीतिक कविता है. कवि की सोच का दायरा राजनीतिक है. इसमें कविता को राजनीतिक परिणाम तक ले जाने के लिए कवि ने कई योजनाएँ की हैं. पर अपने संबोध्य जन तक अपनी सोच, चिंतन और राजनीतिक भावातिरेक को पहुँचाने के लिए कोई योजना नहीं दिखती जो उसे आपाद संवेद्य बना दे. कवि की राजनीतिक संवेदनाएँ जन के मस्तिष्क तक पहुँच कर घिरनी काटने लगती है. कविता की प्रथम पंक्ति दखिए:

जिंदगी के...

‘जिंदगी के’ पद के बाद कवि ने तीन बिंदु रखे हैं. उनके ऐसा करने में कोई बात तो होगी ही. क्या बात हो सकती है? इसे समझने में मस्तिष्क झनझना उठता है. मुक्तिबोध ने कहीं कहा है कि मेरी कविताएँ शिक्षित वर्ग के लिए है. अब यहाँ एक शिक्षित का यह हाल है तो अशिक्षित वर्ग की क्या दशा होगी? जबकि भारत में मार्क्सवाद के प्राणाधार ये अशिक्षित ही हैं. सुधीश पचौरी ने एक जगह उल्लेख किया है कि मुक्तिबोध यह मानते थे कि उनकी कविता किसी की समझ नहीं भी आ सकती है.

कविता की काव्यवस्तु के राजनीतिक होने में कोई हर्ज नहीं. अभी कुछ दिन पहले गोरखपुर में एक पुस्तक विमोचन समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार रामदेव शुक्ल ने कहा कि आज की कविता बिना राजनीति के नहीं लिखी जा सकती. यह अवस्था कभी भक्तिकाल में थी जब भक्ति के बिना कोई कविता नहीं लिखी जा सकती थी. किंतु सन् साठ-सत्तर के दशक में मुक्तिबोध ने अपनी इस श्रेष्ठ कविता के लिए विषय राजनीति ही चुना था- शोषक-शोषित की राजनीति. इसके लिए उन्होंने पैटर्न चुना- मिल-मजदूर की हड़ताल का. सन् साठ-बासठ के आस पास नागपुर के एम्प्रेस टेक्सटाईल मिल-मजदूरों ने वेतन में वृद्धि के लिए स्ट्राइक की थी जिसमें पुलिस को गोलियाँ चलानी पड़ी थीं. कविता में जिक्र है कि इसमें मार्शल लॉ भी लगा था, किंतु तत्कालीन आलोचक इसका कोई जिक्र नहीं करते.

मुक्तिबोध ने यह कविता एक विशेष मनोदशा में लिखी थी. यह मनोदशा थी मध्यप्रदेश सरकार द्वारा, प्रदेश के स्कूलों की पाठ्य पुस्तक के लिए लिखी गई उनकी इतिहास-पुस्तक को प्रतिबंधित कर देने से उनको लगे सदमा की. वह इससे बहुत क्षुब्ध हो उठे थे. इसे उन्होंने सत्ता, पूँजीपति, शोषकों की साजिश समझी. वह अपने मित्रों से इस प्रतिबंध की बातें करते समय उग्र हो जाते थे. गले की नसें फूल जाती थीं. उन्हें भय हो गया कि कहीं प्रदेश अथवा देश में फासिस्ट शासन न स्थापित हो जाए. प्रेमचंद के ‘सोजेवतन’ पर भी प्रतिबंध लगा था, और कंपनी सरकार कोई उदार सरकार न थी. लेकिन वह सदमे में नहीं आए थे.

कविता का भाष्य :

पहले कविता में प्रवेश:

यह है कविता का सार-संक्षेप:

यह कविता फैंटेसी शिल्प में लिखी गई है. इसमें कवि किसी जुलूस का एक कल्पना-चित्र बनाता है. वह स्वयं भी इस कल्पना-चित्र का एक हिस्सा हो जाता है. रात में निकाले गए जुलूस के साथ मशालें भी हैं. मशालों से प्रसारित ज्योति, पास के तालाब, पहाड़ी और वृक्षों के शिखरों की फुनगियों पर चमक उठती है. मशालों के आगे बढ़ते रहने से धीरे-धीरे वृक्षों के झुरमुट के पास का अँधेरा जब पूरा छँट जाता है तो कवि को लगता है कि किसी खोह या गुफा का द्वार खुल गया हो. रात साफ नहीं है, कोहरे के अवगुंठन में है. जब मशालें बुझने लगती हैं तो उनकी श्वेत जयोति लाल होने लगती है. इसी समय कवि को (मशालों की) लाल रौशनी में नहाया हुआ एक रहस्य-पुरुष दिखता है. वह लुभावने चेहरे वाला है. कवि उसे अपनी अभिव्यक्ति कहता है. फिर मशालें बुझ जाती हैं. तब कवि को लगता है जैसे उसे किसी सूली पर टाँग दिया गया हो. और उसका शरीर किसी खड्ड में डाल दिया गया हो अचेतन अवस्था में.

यह जुलूस किसने और क्यों निकाला है, इसका यहाँ कोई स्पष्ट संकेत नहीं. किंतु कवि का जुलूस के दरम्यान लाल रंग में नहाए हुए रहस्य-पुरुष को देखने और उसे देख कर काँपने लगने फिर रौशनी के बुझ जोने पर मृत्यु के समान बोध से भर अचेत होकर शून्य के खड्ड में गिर जाने की अवस्थाएँ कुछ कहती हैं. यह कोई सामान्य जुलूस नहीं हो सकता. संभव है यह जुलूस राजनीतिक हो जिससे मुक्तिबोध प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि वह भी राजनीति से संबंधित हैं.

अब कविता को लें

कविता की प्रथम पंक्ति ‘जिंदगी के...’ से व्यंजित होता है कि कवि किसी सोच में पड़ा है. दूसरी पंक्ति “कमरों में अँधेरे” से प्रतीत होता है कि वह अपनी जिंदगी को कमरों में बँटा पाता है. पर जिन्दगी के कमरों में बँटे होने के अभिधार्थ से इसका अर्थ नहीं सुलझता, क्योंकि यह कविता है. मेरी समझ से कमरों का लक्ष्यार्थ ही लिया जा सकता है, और वह लक्ष्यार्थ होगा कवि का व्यक्तित्व. मनोविज्ञान में

व्यक्तित्व के खंडों में बँटे होने की बात की जाती है.

मेरी समझ से कवि की इस तरह की प्रतीति चेतन अवस्था में संभव नहीं है. ऐसा तभी संभव है जब कवि परिवेश से कटा भावातिरेक में डूबा हो या स्वप्न में हो. कवि यहाँ भावातिरेक में नहीं है, किसी सोच में डूबा है. सोचते सोचते कदाचित उसे एक झपकी आती है और वह स्वप्न में खो जाता है. इसीलिए मैंने प्रथम पंक्ति के बिंदुओं में छिपे आशय का अर्थ किया है- “स्वप्न में देखे गए”. इस तरह प्रथम दो पंक्तियों का अर्थ हुआ- “जिंदगी के, स्वप्न में देखे गए कमरों में अँधेरे”. कविता को फैंटेसी में ढालने का यह बड़ा ही सुंदर प्रयोग है

.

कवि यह कविता अपनी चेतनावस्था में लिख रहा है. उसे अपनी झपकी में देखे स्वप्न का स्मरण होता है. वह अपनी अभिव्यक्ति को पाने की इच्छा को लेकर उसका एक कल्पना-चित्र बनाता है. “ वह स्वप्न में, अपनी जिंदगी को कमरों में या व्यक्तित्व-खंडों में बँटी देखता है. उन कमरों में (व्यक्तित्व-खंडों में) अँधेरा है अर्थात् अभिव्यक्ति अस्पष्ट है. अँधेरे में ‘एक कोई’ (अभिव्यक्ति की चेष्टा में कवि की चेतना) है जो लगातार चक्कर लगा रहा है (व्यक्तित्व-खंडों का तल-स्पर्श कर रहा है). कवि को उसके पैरों की आवाज (व्यक्तित्व-खंडों की नाड़ियों का आलोड़न) बार-बार सुनाई देती है (अनुभव होता है). पर वह दिखाई नहीं देता. लगता है जैसे वह किसी तिलस्मी खोह (व्यक्क्तित्व-खंड भी तिलस्मी खोह ही है) में कैद है. खोह की भीत के उस पार से (व्यक्तित्व-खंडों के दूसरे छोर से) खोह का (व्यक्तित्व-खंड का) घनीभूत और रहस्य-भरा अंधकार (अभिव्तक्ति की अस्पष्टता) बहुत पास से ध्वनि के समान (अंतर्ध्वनि से) अपने अस्तित्व को अनिवार जनाता हुआ (अभिव्यक्ति की सीमा तक पहुँचता) घूम रहा है (उद्बुद्ध हो रहा है)). कवि चाहता है, वह उसके अस्तित्व से परिचित हो ले. जब किसी विचार या धारणा की कभी सटीक अभिव्यक्ति नहीं मिलती तो विचारक का सम्पूर्ण व्यक्तित्व उसे पाने में लग जाता है. विचारक के व्यक्तित्व के हर खंड में उसकी अनुगूँज सुनाई देने लगती है. यही स्थिति यहाँ कवि की है.

उसके (‘कोई एक’ के) होने के भान से कवि का हृदय धक्-धक् करने लगता है. उसका हृदय उससे पूछ उठता है, वह कौन है जिसकी पगध्वनि सुनाई तो देती है पर वह दिखाई नहीं देता. स्वप्नस्थ कवि जिस कमरे में बैठा है, उसकी दीवारें बहुत पुरानी हैं. उनके पलस्तर फूले हुए हैं. कमरे में अकस्मात एक फूला हुआ पलस्तर टूटता है और उसमें से चूने भरी रेत गिरती है. फिर फूली पपड़ियाँ ऐसे टूटती-खिसकती हैं कि उससे दीवार पर एक बड़ा चेहरा बन जाता है. उसमें खुद ही मुख, नुकीली नाक, भव्य ललाट और दृढ़ ठुड्डी बन जाती है, वह एक अनजानी अनपहचानी आकृति होती है. उसे देख कवि के मुख से निकल पड़ता है, कौन है वह, जो दिखता तो है किंतु पहचान में नहीं आता? उस आकृति को देख उसे कोई स्मृति आती है और उसके मुख से निकल पड़ता है, कौन, मनु?

इस कविता के लिखने के कुछ ही पहले मुक्तिबोध ने “कामायनी एक पुनर्मूल्यांकन” का लेखन पूरा किया था. लगता है उनके मन में अभी भी कामायनी के मनु की स्मृति ताजा थी. अतः दीवार पर बनी आकृति को देख उन्हें मनु की याद आ गई.

कवि ने, कमरे में उक्त ‘कोई एक’ के पद-चापों को सुनते हुए, उत्सुकतावश कमरे के बाहर की ओर रुख किया. उसने देखा, शहर के बाहर, पहाड़ी के उस पार तालाब आदि घुप्प अँधेरे में डूबे हैं. तालाब का जल निस्तब्ध है. पर सहसा उसके तम से श्याम हुए जल के भीतर से एक श्वेत आकृति उभरती (तालाब में मशाल की ज्योति पड़ती है जो कोहरे में कुछ ऊपर उठ कर एक आकृति-सी बनाती है) है और जल के ऊपर कोहरे की चादर मे लिपटा एक बड़ा चेहरा फैल जाता है. वह चेहरा मुसकुराता है, अपनी पहचान बताता है (अस्पष्ट संकेतों द्वारा). किंतु कवि हतप्रभ है. वह कुछ समझ नहीं पाता. अधोप्रकट पंक्तियों के मशाल की दूर से आती रोशनी तालाब के जल पर पड़कर चमक उत्पन्न करती है जो पास आते जाने से बढ़ती जाती है और कोहरे पर प्रत्यावर्तित होकर एक चेहरे-सा दिखने लगती है.

तभी कवि के आश्चर्य की सीमा नहीं रहती जब वह देखता है कि तालाब के आस पास के अँधेरे में डूबे हरे हरे वन-वृक्ष चमक उठते हैं, वृक्षों के शीश पर बिजलियाँ नाच उठती हैं अर्थात उनकी फुनगियों पर प्रकाश की किरणें चमचमा उठती हैं, पेड़ों की शाखाएँ और डालियाँ एक दूसरे से टकरा उठती हैं (जुलूस के तेजी से चलने से उपार्जित हवा के कारण) जैसे एक दूसरे पर अपने सिर पटक रही हों. तभी लगा वृक्षों के पीछे अँधेरे में छिपी किसी तिलस्मी खोह का का द्वार अकस्मात धड़ से खुला जो (अँधेरे रूपी) एक पत्थर से बंद था. वृक्षों की ओट में पसरे अँधेरे को भेद कर मशाल की रोशनी सामने आ गई.

इसके आगे कविता में प्रयुक्त डॉट बिंदुओं से यह राज खुलता है कि ज्योति की ये रश्मियाँ किसी जुलूस के साथ चल रहे मशालों की हैं (इसके प्रभाव का वर्णन पहले स्रोत का परिचय बाद में). यह जुलूस रात में निकला हुआ है. इन डॉटमूलक बिंदुओं के विश्राम के बाद कवि कुछ यों अनुभव करता है:

मशालों की अजीब-सी लाल लाल रोशनी (पास से देखने हर बुझती हुई मशाल जो अभी बुझी नहीं है, से निकलने वाली रोशनी लाल होती है) प्रकृति के हर अंतराल के विवर के अँधेरे में घुस रही है. अर्थात जहाँ जहाँ अँधेरे का वास है उन सभी जगहों के अँधेरे में प्रवेश कर रही है. लाल-लाल रोशनी के कारण बाहर फैला कोहरा भी लाल-लाल दिखता है. इस कोहरे में कवि को, सामने लाल कोहरे में नहाया हुआ एक पुरुष दिखाई देता है जो साक्षात रहस्य है या कहें गहन रहस्य से भरा हुआ है. कवि की दृष्टि में उस रहस्य-पुरुष का ललाट तेज और प्रभा से युक्त है (अभिव्यक्ति के प्रकट होने के मुहाने पर होने से उसकी रहस्यमयता और अधिक हो गई है. क्षितिज के उषा-किरण-सी वह लाल है.) उसे देख कर कवि के शरीर में अद्भुत थरथराहट उत्पन्न हो जाती है (इस थरथराहट के अद्भुत होने से प्रतीत होता है कि यह थरथराहट वास्तविक से भिन्न है. इसमें भय के साथ कुछ और विकार भी मिश्रित हैं). वह रहस्य-पुरुष गौरवर्ण है. उसकी आँखें दीप्ति से भरी हैं. मुख सौम्य है. संभावित स्नेह-सा अर्थात जिस प्रिय में प्रेम की संभावना हो (अपने को ठीक ठीक अभिव्यक्त करना एक बडी बात है. एक परिपक्व कला है. ठीक ठीक अभिव्यक्ति आने को हो तो उसके आह्लाद का रूप कुछ ऐसा ही होता है.) ऐसे प्रिय के रूप को देख कर कवि एक विलक्षण आशंका से भर जाता है (आशंका इसलिए कि अभिव्यक्ति की प्रसन्नता कहीं प्रतिकूलता में न बदल जाए. यह भूलना नहीं चाहिए कि मुक्तिबोध लोकतंत्र को भी उतना ही महत्व देते हैं जितना मार्क्सवाद को. शंका है उनकी अभिव्यक्ति के रूप में दोनों समवेत न हों, कोई इतर रूप हो) उस भव्य, अजानुभुज (जिसके हाथ उसके घुटने तक पहुँचते हैं) को देखते ही कवि साक्षात एक गहन संदेह से भर जाता है (गाँधी भी आजानुभुज थे). अभिव्यक्ति, कवि जिसके पाने की चेष्टा में है, क्षितिज से उगते सूरज की तरह लाल और रहस्य से भरी है. परंतु उसके मन में सूरज के उगने का आह्लाद नहीं है. उसे शंका है सूरज उगेगा या नहीं याने उसकी अभिव्यक्ति उसे मिलेगी या नहीं. कहीं उनपर काले बादलों (अनर्गल साहित्यिक आंदोलनों) का साया न पड़ जाए.

मुझे कवि की शंका यों दिखती है. कवि मार्क्सवाद से प्रभावित है जहाँ अभिव्यक्ति पर अधिनायकवाद का पहरा है और वह व्यक्ति की स्वतंत्रता के भी पक्ष में है, जो लोकतंत्र का मूल्य है. कवि किस अभिव्यक्ति की तलाश में है? यह स्पष्ट नहीं.

पर कविता की अगली पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि उस रहस्यमय व्यक्ति को कवि अपनी अब तक की न पाई गई अभिव्यक्ति मानता है- याने वह अभिव्यक्ति, जिसे कवि अभी पा नहीं सका है. कवि उसे अपनी संभावनाओं (अपने होने), उसमें निहित प्रभावों (जो दूसरों को भावित कर सके), प्रतिमाओं (अपने रूपों) की और अपने परिपूर्ण के आविर्भाव (जिसमें कवि का पूरा व्यक्तित्व उच्छल हो) की पूर्ण अवस्था मानता है. कवि को लगता है वह रहस्य-पुरुष उसके हृदय में रिस रहे उसके ज्ञान का तनाव है, और उसकी आत्मा की प्रतिमा है.

वह रहस्य-पुरुष कवि की आत्मा की प्रतिमा है, यह वक्तव्य तो समझ में आता है पर कवि का यह काव्य-वक्तव्य, “हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव”, कुछ अनूठा है. मुक्तिबोध के लिए ज्ञान एक तनाव है. भारतीय परिप्रेक्ष्य में ज्ञान तनाव नहीं है. ज्ञान बुद्ध को हुआ था, उनकी चेतना सम हो गई थी. उनकी पूरी जिंदगी समरसता से भर गई थी. और यहाँ ज्ञान मुक्तिबोध को तनावग्रस्त कर रहा है. सीधी सी बात है, मुक्तिबोध ज्ञान के पश्चिमी अर्थ को लेते हैं जहाँ उसका अर्थ होता है सूचनाओं का संग्रह. अगर इन सूचनाओं में कोई अपने विचारों के लिए पुष्टि ढूँढ़ने जाए तो अन्य विचारों से जोड़ बैठ न पाने पर केवल तनाव ही हासिल हो सकते हैं. एक और बात, मुक्तिबोध यह भी महसूस करते हैं कि उनकी सूचनाओं (तथाकथित ज्ञान) के तनाव उनके हृदय में रिस रहे हैं. जबकि हृदय भावों का आश्रय है तनावों का नहीं. तनाव हृदय के द्रवण में विलुप्त ही होते है.

उक्त तमाम प्रतीतियों के बाद भी कवि आश्वस्त नहीं है, लगता कि वह रहस्य-पुरुष उसके मन की उक्त विभिन्न अवस्थाएँ हैं. वह इन्हें गंभीर पश्नों के रूप में ले रहा है. कवि के लिए ये प्रश्न गंभीर तो हैं ही खतरनाक भी हैं. वह इसी सोच के तनाव में है कि मशालें बुझ गईं मानो बाहर के गुंजान और जंगलों से आती हुई हवा ने फूँक मार कर उन्हें बुझा दिया हो (किसी प्रतिकूल परिस्थिति के कारण). कवि को लगा जैसे उसने (हवा ने, विपरीत विचारवालों ने, संभवतः शोषकों ने) उसे पकड़ कर अँधेरे में मौत की सजा दे दी हो. मशालों की ज्योति के बुझने से अँधेरा कवि को और गहरा गया लगा जो उसे अधिक पीड़दायक हो उठा, इतना कि उसे मौत का अहसास-सा होने लगा..

उस क्षण, मशालों के बुझ जाने से कवि को लगा मानो उसकी आँखों पर काले डैस (काली स्याही से जिसका प्रयोग लिखते समय किया जाता है) के समान अँधेरे की एक काली पट्टी बँध गई हो. मशालों के बुझने से वह जहाँ जैसा था उस स्थिति में खड़ा रह गया मानों उसे किसी खडी पाई की सूली पर टाँग दिया गया हो. उसे ऐसा भी लगा कि उसे किसी शून्य विंदु के खड्ड में अचेतन स्थिति में गिरा दिया गया हो. इस उक्ति से यही लगता है कि कवि अपने कमरे में अचेत होकर गिर गया.

समाज में कवि ने अपनी अर्थात शोषित वर्ग की बहुत-से विरोधी शक्तियों की पहचान की है. उन्हीं से उनको अधिक डर है. मुक्तिबोध को समाज और व्यक्ति में भी द्वंद्व दीखता है, हालाँकि वह अलग-अलग दोनों को मानने वाले थे.

आलोचन:

कविता का भाष्य करते समय मैं स्थलीय आलोचनाएँ भी देता चला हूँ. पर उसका संबंध अर्थ को स्पष्ट करने से ही अधिक है, कविता के काव्य-गुण से नहीं. इसकी काव्य-वस्तु कवि की कूट-बुद्धि से संयोजित लगती है. “जीवन के कमरे” एक कूट-पद है. जीवन को कमरों के रूप में कैसे देखा जाए, बौद्ध आचार्य नागार्जुन से राजा मिनांडर ने पूछा. आचार्य आप किससे आए हैं? आचार्य ने कहा, ‘‘रथ से’’. राजा ने आगे पूछा, क्या पहिया रथ है? ‘नहीं’, आचार्य ने कहा. जीवन के इन कमरों के बारे में भी ऐसे प्रश्न उठाए जा सकते हैं जो काव्येतर नहीं होगा. विभिन्न काल-खंडों मे कवि का जिया जीवन कवि के जीवन के कमरे नहीं हो सकते. उसके फेफडे, हृदय आदि भी कमरों की तरह व्यवहृत नहीं हो सकते. अतः मैंने इन कमरों को उनके व्यक्तित्व-खंड माना है. यह काव्य-गत चिंता के मेल में है. कवि की इस कल्पना में कोई काव्यगत-सौंदर्य नहीं दिखता.

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ : भाष्यालोचन - खंड 1 // शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव
मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ : भाष्यालोचन - खंड 1 // शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव
https://lh3.googleusercontent.com/-Q-d1TJvCCWg/WJsYCTxqe6I/AAAAAAAA2cA/7a3Bgy6DOvY/image_thumb.png?imgmax=200
https://lh3.googleusercontent.com/-Q-d1TJvCCWg/WJsYCTxqe6I/AAAAAAAA2cA/7a3Bgy6DOvY/s72-c/image_thumb.png?imgmax=200
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2018/01/1_23.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2018/01/1_23.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content