शहर और सपने // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

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ऐल्फी और बोरी बाजार की गलियों में चकर लगाते उसकी टांगें सुन्न हो चुकी थीं और पैर दर्द करने लगे थे। वह कोल्हू के बैल की तरह घूम घूमकर वापस उस...


ऐल्फी और बोरी बाजार की गलियों में चकर लगाते उसकी टांगें सुन्न हो चुकी थीं और पैर दर्द करने लगे थे। वह कोल्हू के बैल की तरह घूम घूमकर वापस उसी जगह पहुंच जाता था। उसे घूमते काफी देर हो चुकी थी, लेकिन उसने कहीं भी बैठना नहीं चाहा। बैठने से उसके अंदर हलचल समुद्री भंवर की तरह उबलने लगी थी। वह जैसे समुद्र के तल में पिस गया था। उसकी हालत अभी तक डूबते हुए व्यक्ति की भांति थी। उसने चाहा कि इतना घूमे कि थककर चूर होकर अपना होश हवास गंवाकर कहीं गिर पड़े। भीड़ के कारण लोग उसे आगे धकेल रहे थे, लेकिन उसे इस बात का ध्यान नहीं था। उसके आगे औरतें गर्दनें ऊंची करके आसमान की ओर देख रही थीं। पहले यूनिस को क्रोध आता था कि जैसे हम जमीन के मामूली कीड़े हैं उनके आगे, जो हमारी ओर एक बार भी आंख उठाकर नहीं देखती हैं। लेकिन आज उसे किसी भी चेहरे में ऐसा कुछ न दिखा जो मन को आकर्षक लगे। उसने एक बार नजर डालकर मुंह फेर लिया। सब बेकार था। उसे अपने आप पर क्रोध आया और वह ऐल्फी से निकलकर विक्टोरिया रोड की ओर घूम गया। अब वह परेशान हो गया था, उसे पता था कि जिस चीज से वह भाग रहा था उससे भागने की कोशिश बेकार थी, उसके पंजे उसके दिल में घुसे ही पड़े थे। फुटपाथ से आती जाती मिनी स्कर्ट पहने देसी और परदेसी क्रिस्चियन औरतों की भूरी, दूध जैसी सफेद, सांवली टांगों और दागों से भरे घुटनों के ढक्कनों को देखकर उसके अंदर नफरत की लहरें उठने लगीं। यूनिस को लगा कि उसके अंदर शारीरिक आकर्षण वाली चीज मर गई है। वह चौक लांघकर होली ट्रिनिटी चर्च के आगे आकर खड़ा हो गया। चर्च की दीवार के बाहर फुटपाथ पर लकड़ी की बेंचें रखी हुई थीं। कुछ क्रिस्चियन और पारसी बूढ़े शाम गुजारने के लिए बेंचों पर आकर बैठे थे। केवल एक टूटी हुई बैंच खाली थी। वह उस पर बैठ गया। सामने बड़े चौड़े चौक के बीच फव्वारा था। यूनिस चारों ओर से आती लगातार और न खत्म होने वाली ट्रैफिक को देखता रहा। नई सुंदर कारें और उसमें बैठे खुशहाल लोग- जिन्हें न कोई चिंता थी और न विचार था। उसने खुद की ओर देखा। चारों ओर से आती भरपूर ट्रैफिक जितना दुख था जो उसकी दिल को कुचलता गुजरता जा रहा था।

उसने जानबूझकर खुद पर से नजरें हटाकर सामने देखने की कोशिश की। उसने कारों में बैठीं सुंदर सजी औरतों पर ध्यान लगाना चाहा। संगमरमर जैसे सफेद और ठंडे शरीर, जिनके अंदर केवल कागज के नोटों ने गर्मी पैदा की थी। कागज के उन उड़ते नोटों के पीछे वह कितना दौड़ा था, क्योंकि उसे पता था कि दुनिया की सारी सच्चाई, सारी विद्या उन कागज के नोटों में थी। लेकिन उसकी सारी दौड़ बेकार थी। जोकरों जैसा खेल था। वह ऐसा जोकर था जो केवल अपने आप पर हंस सकता था। अब जब उसने अपने आप पर ठहाके लगाने चाहे, तो उसे रोना आ गया। उसने आँखें मूंद लीं। ट्रेफिक का शोर उसके ऊपर चढ़ता जा रहा था। वह उस शोर में दबता गया। उसने खुद भी ऐसा ही चाहा। लेकिन चाहने से क्या होता है। उसने जो कुछ चाहा था वह कभी हो न सका था।

‘‘कराची’’, उसके होंठ पर आया, ‘‘ख्वाबों का शहर...’’

पिता ने कहा था : ‘‘आखिर कब तक कराची में धक्के खाते रहोगे, जहां न रहने के लिए सुविधाजनक जगह और न ही सही ढंग का खाना पीना। देख तो! होटल का बेकार खाना खाते खाते तुम कैसे गल गए हो। गाँव लौटकर आ, हमारी खेती है। खुद जोतेंगे। अच्छा गुजर बसर हो जाएगा।’’

उस अपने बान की बातें मजाकिया लगीं।

‘‘नहीं पिताजी, मुझे गाँव में अच्छा नहीं लगता। कैसी जंगली जिंदगी है! अगर मैं एक वर्ष भी वहां पर रहूंगा तो पागल बन जाऊंगा। न उठना बैठना, न घूमना फिरना। दिन रात खेत में, पानी कि फिक्र और जाहिलों जैसे झगड़े। ऊपर से जमींदार का रौब। बेवजह अपना बड़प्पन दिखाता है। मुझसे ये बातें सहन नहीं होंगी।’’

उसकी ऐसी बातें सुनकर पिताजी कुछ हिचका। ‘‘जमींदार के पास ताकत है और पैसा है। हमें कम खेती बारी है तो क्या, शुरू से ही जमींदार के किसान हैं। लेकिन तुम पढ़े लिखे हो। जमींदार की रस में मिल जाओगे।’’

उस जमींदार के कारण ही तो उसे गांव छोड़ना पड़ा था। एक बार बचपन में वह खेल रहा था तो जमींदार के बेटे नवाज़ ने बेवजह आकर उसे गालियां दीं। यूनिस ने गुस्से में आकर उसे दो तीन डंडे मार दिये थे। पिताजी को जल्दी ही पता चल गया और वह उसे लेकर शहर चला गया। वहां उसे अपनी बहन के यहां छोड़ आया, जिसका पति राईस मिल में मजदूरी करता था। जमींदार यूनिस की पिटाई करना चाहता था, लेकिन वह उसे हाथ न आया तो उसके पिता को उसने बहुत तकलीफें दीं। यूनिस काफी वक्त तक गाँव न लौट पाया। पिताजी की इच्छा थी कि वह शहर में रहकर पढ़े। यूनिस ने जैसे तैसे बहुत तकलीफ से मैट्रिक पास की और फिर नौकरी के लिए भटकते भटकते वह कराची पहुंच गया। कराची उसे इतनी भा गई जो बेरोजगारी और बिना मकान के भी वह उसे छोड़ न सका। काफी भटकने के बाद जब उसे क्लर्क की नौकरी मिल गई तो फिर तो जैसे उसने कराची से ही विवाह कर लिया।

‘‘लेकिन पिताजी मुझे तेरे जमींदार की परवाह नहीं। इससे भी बड़े मजबूत जमींदार ऑफिस में हमें सलाम करने के लिए आते हैं। जमींदार तो जाकर खड्ड में गिरे, असल में अब मैं गाँव में नहीं रह पाऊंगा। कराची को छोड़कर इस जंगल में आकर रहूं। आखिर क्या फायदा - शहर में किसी की परवाह नहीं। बादशाह बनके चलते हैं। यहां तेरा जमींदार मिले तो उसे कोई पूछे भी नहीं।’’

नवाज़ कितनी ही बार उसे कराची की होटलों में मिला था। यूनिस ऐसा दिखाता था जैसे उसने नवाज़ को देखा ही नहीं। लेकिन यह कोशिश करता था कि नवाज़ उसे जरूर देखे। इससे उसे खुशी महसूस होती थी। खुद को जमींदार के बराबर महसूस करता था। बड़े ठहाके लगाता था और बैरों को रौब से बुलाता था। होटल में दोनों एक जैसे होते थे। लेकिन बाहर निकलने के बाद जब नवाज़ नए मॉडल की कार में बैठकर जाता था तो यूनिस को अपनी सारी खुशी और गर्व पानी की लकीर समान लगते थे। गरीबी का एहसास उसे किसी गहरी खाई में गिरा देता था। कराची ने उसे वैसे भी खुशियां कम, गरीबी के डंक ज्यादा दिए थे। लेकिन उन डंकों में भी कुछ ऐसा मजा था जो उनको उसने छोड़ना नहीं चाहा। कभी कभी उसे ऐसा लगता था कि कराची ऐसी दलदल थी जिसमें वह खुशी से अंदर दबता चला जा रहा था।

‘‘यूनिस, तुझे और किसी बात की परवाह हो न हो, लेकिन तुम्हारी एक जवान बहन भी है। मैं अब बूढ़ा हो गया हूं, बेटे, अब मुझमें इतनी शक्ति नहीं जो जवान बेटी का बोझा उठा सकूं। अब यह बोझा तुम पर है।’’

यूनिस ने पीछे बैठी बहन की ओर देखा था, जो नीचे चटाई पर बैठकर भर्त भर रही थी। ‘अगर मेरी प्यारी बहन निजू शहर में होती तो शहर की औरतें उसके आगे भमतिनी लगतीं,’ यूनिस ने सोचा। माँ तो उसकी बचपन में ही गुजर गई थी। बाप ने ही दोनों को पाला पोसा था, यूनिस बहन को बहुत चाहता था। यह बहन ही थी जिसका प्यार उसे कभी कभी गाँव खींचकर ले जाता था।

‘‘पिताजी, मेरी सलाह है कि यह खेती बेचकर शहर चलकर रहें। जब तक जमींदार की खुशामद नहीं करते तब तक पानी भी नहीं मिलता, इससे अच्छा है बेचकर शहर में कोई अच्छी जगह लेकर रहें। निजू को मैट्रिक पास करवाकर मास्टरी की नौकरी दिलवा देंगे। यहां गाँव में क्यों उसकी जिंदगी खराब करते हैं।’’

पिताजी को क्रोध आ गया। ‘‘खेती बारी मर्द नहीं छोड़ते हैं, यूनिस! शहर में रहकर तुम बेशर्म हो गए हो। अब बुढ़ापे में जवान बेटी को शहर ले जाकर धक्के खाऊं!’’

यूनिस खेती बारी वाली बात कई बार सुन चुका था। पहले सुनकर हंसता था। लेकिन अब उसे इस बात पर क्रोध आता था और क्रोध को दबाकर चुप हो जाता था।

एक लंबी चीत्कार हुई-यूनिस ने आंखें खोलकर देखा। एक कार चौक की ओर से तेजी से घूमी थी। मजबूत चिकने रोड पर कार के टायरों के निशान बन गए। यूनिस का दिल डूब गया। आगे की तस्वीर धुंधली हो गई। उसकी आंखों में पानी भर आया।

‘‘ओ... मेरी प्यारी बहन...’’ उसके अंदर से सिसकियों की लहर उठी और उसके पूरे वजूद को डुबो गई। उसके दांत निचले होंठ में पिसते चले गए। वह रोती आंखों से सामने की बड़ी बड़ी इमारतों की चोटियों की ओर देखने लगा। निजू का सर धड़ से अलग पड़ा था। उसका पिता कुल्हाड़ी लेकर थाने में हाजिर हुआ था। उसे किसी ने बताया था कि उसकी लड़की का जमींदार नवाज़ से झगड़ा था।

यूनिस एकदम उठ खड़ा हुआ। सिसकियां उसकी दिल को निचोड़ रहे थे। उसे मुंह में खून का स्वाद महसूस हुआ। दांतों ने होंठ को लहूलुहान कर दिया था। ट्रेफिक कम हो गई थी। वह सुस्त कदमों से चर्च की ओर से आगे बढ़ता ऐल्फी की ओर मुड़ा।

वह ऐल्फी के वीरान रोड पर लड़खड़ाते हुए चला। उसे सख्त कमजोरी महसूस हो रही थी। अचानक वह चक्कर खाकर बीच रोड पर गिर पड़ा। तेजी से आती कार को एकदम ब्रेक लगा और टायर जोरदार चीत्कार कर एक इंच की दूरी पर आकर रुक गए। यूनिस हड़बड़ाकर उठ बैठा और चीखकर दौड़ने लगा, उसे लगा जैसे कुछ लोग कुल्हाड़ियां लेकर उसे मारने के लिए उसके पीछे दौड़ रहे हैं।

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रचनाकार: शहर और सपने // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी
शहर और सपने // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी
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