ठहरा पानी // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

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तालाब के किनारे पर बैठे उसे बहुत देर हो गई थी, उसका उसने अंदाजा लगाना चाहा। कुछ पल! लेकिन अब शाम हो गई थी। पूरा दिन! नहीं, जहां तक मुझे याद...


तालाब के किनारे पर बैठे उसे बहुत देर हो गई थी, उसका उसने अंदाजा लगाना चाहा। कुछ पल! लेकिन अब शाम हो गई थी। पूरा दिन! नहीं, जहां तक मुझे याद आ रहा है मैं कई दिनों से बैठा हूं। एक हफ्ता हो गया होगा! महीना! नहीं, कई वर्ष गुजर गये हैं मुझे यहां बैठे। पहले इस तालाब में लहरें थीं, छोलियां थीं। पानी किनारे से लगकर लौटता था और फिर से आकर किनारे पर लगता था। लेकिन अब तो पानी में कोई हलचल नहीं है। पानी एक जगह ठहर गया है। जम गया है। मुझ जैसा। या मैं इस तालाब की तरह। इस बात पर माथापच्ची करना बेकार है। कोई परिणाम नहीं निकलेगा। निकलने वाला भी नहीं। लेकिन यह बात साफ है कि यहां बैठे मुझे कई वर्ष गुजर गए हैं और मैंने तालाब के पानी को एक दिन हवाओं पर छलक छलक कर जमते देखा है। उसे भी काफी वक्त हो गया।

मैं जब खुद को देखता हूं तो जैसा बुड्ढा आज हूं हमेशा ऐसा ही रहा हूं। मैं कभी बच्चा नहीं था। कभी नौजवान नहीं था। कभी था, तो मुझे याद नहीं। मन के तौर पर हमेशा ऐसा ही देखा है खुद को। जब पत्नी थी, बच्चे थे तब भी अकेला था। पत्नी मुझे कभी अच्छी नहीं लगी। फिर भी बच्चे हुए। घर भरा। फला फूला। बच्चों के बच्चे हुए। यह पूरा वक्त मैं अकेला था। अब जब वह मर गई है और जब मरी थी तब मैंने खुद को आजाद महसूस किया। लेकिन उसके बाद अकेलापन और बढ़ गया। यह क्या है। वह थी तो घर में शोर था। झगड़ा था। बच्चों की समस्याएं थीं। अब कुछ नहीं रहा है। घर घर नहीं रहा। मेरे लिए नहीं रहा। औरों का हो गया है। घर में मेरा वजूद अनावश्यक है। किसी की खटपट नहीं। कोई झगड़ने वाला नहीं। हूं या नहीं हूं कुछ फर्क नहीं पड़ता। नहीं, यहां पर मैं गल्ती कर रहा हूं। मेरे होने से फर्क पड़ता है। बोझा हूं मैं। लोग बढ़ गए हैं और घर तंग हो गया है। मैं अनावश्यक तौर पर जगह भरकर बैठा हूं। यह किसी जरूरतमंद को काम में आ सकती है। व्यक्ति भी किसी चीज की तरह है। जब तक कोई चीज कारगर है उसे सम्हालकर रखेंगे। उसका काम खत्म हुआ तो वह बेकार बन जाएगी। उसे बाहर फेंक देते हैं। इन्सान का अंत भी यही है। चीजों की तरह इन्सान भी बेकार हो जाता है। कुछ मरने से पहले मुझ जैसा। कुछ मरने के बाद। अंत दोनों ही सूरत में वही है; बोझे को फेंककर आने का।

मुझे दुखी होना नहीं चाहिए। उसने खुद को आश्वासन देना चाहा। आश्वासन मैं खुद को देता आया हूं। इससे होता कुछ नहीं। अब भी कुछ नहीं होगा। मेरा अकेलापन खत्म नहीं हो जाएगा। मेरे दुख नहीं हो जाएंगे। सब कुछ ऐसा ही चलता रहेगा। ये सभी बातें मेरे साथ रहने वाली हैं और मेरे साथ ही खत्म होने वाली हैं।

तालाब में पानी जम क्यों गया था, उसने खुद से पूछा। कोई कारण समझ में नहीं आ रहा था। पानी में हलचल होती है। हलचल का बंद होना उसे समझ में नहीं आया। उसे विचार आया कि पत्थर को उठाकर तालाब में फेंके। फिर देखें कि पानी में हलचल होती है या नहीं। उसने पत्थर उठाने के लिए बांह उठाई लेकिन उसमें कोई हरकत नहीं हुई। वह डर गया। उसे आश्चर्य से ज्यादा डर लगा। यह उसे क्या हो गया है। उसका शरीर सु्न्न क्यों हो गया था। शरीर में कोई हरकत नहीं थी। जैसे शरीर पर चट्टान गिरी थी। हाथ पैर सब सुन्न थे। वह एकदम जैसे जम गया था। उसने सोचा, फिर मैं सोच कैसे रहा हूं, बाकी दिमाग ही जाकर बचा था, जो अभी तक काम कर रहा था। वह भी कब तक। उसने खुद से पूछा। पानी में पत्थर फेंककर देखता कि उसमें हलचल होती है या नहीं। यह आखिरी इच्छा भी पूरी होने वाली नहीं थी। तालाब पर भी चट्टान गिरी थी क्या! पानी सुन्न था। मैं केवल जानना चाहता था। मुझे और कुछ नहीं चाहिए था। अब कोई मोह ही नहीं रहा था। चाहिए होता है उसे जिसका मोह सुरक्षित होता है। मैंने तो हर बात से खुद को अलग कर दिया है। लेकिन शुरू में ऐसा नहीं था। सिवाय पत्नी के चुनाव के। मैंने बच्चों पर अपनी मर्जी थोपने की कोशिश की। नाकाम कोशिश। मेरा बड़ा बेटा मेरी राय लिए बिना एक बच्चे वाली रांड पत्नी को भगाकर ले आया। मैं केवल इतना कर पाया कि उसे अपने घर से निकाल दिया और उसके अधिकार छीन लिए। ऐसा मैंने इसलिए किया क्योंकि जैसे मैं अपने पिता के सामने दबा हुआ था वैसे ही मेरा बेटा भी मेरे आगे दबा रहे। पत्नी के रोने धोने की परवाह नहीं करके मैं अपनी बात पर कायम रहा। मैंने बेटे को घर में अजनबी का दर्जा दे दिया। कभी कभी अजनबियों की तरह आए और चला जाए। लेकिन मेरे जो अपने थे, मेरे और बेटे, जो मेरे घर में थे वे मेरे साथ रहते अजनबी क्यों बन गए? या मैं उनके लिए अजनबी बन गया! हर कोई अपने में खो गया है। मेरे लिए कुछ नहीं बचा है। जो मैंने किया वह ठीक था या नहीं! यह निर्णय कौन करेगा? मैं इतना अकेला हूं, खुद को बेबस मानता हूं। कहीं कोई गड़बड़ जरूर हुई है। मेरी उम्र तक पहुंचकर हर कोई ऐसा ही सोचता है क्या?

उसने चाहा कि किसी से पूछे। उसने तालाब से पूछना चाहा। लेकिन तालाब चुप था। बिना हलचल आँखें फाड़कर उसे ताक रहा था। उसे क्रोध आया और तालाब पर चिढ़ता रहा। उसे विचार आया कि तालाब को लातें मारे। ठहरे पानी की लातों से धुनाई करे। लेकिन उसमें हिलने की भी ताकत नहीं थी।

‘‘मेरे मौला, किसी का मोहताज मत बनाना...’’ उसने बड़ों को ऐसा कहते सुना था। फिर जैसे जैसे वह बूढ़ा होता गया, उसने खुद भी यह दुआ मांगनी शुरू की। उसे डर ने घेर लिया था। उसे महसूस हुआ कि वह औरों पर बोझा बन रहा था। मैं नहीं होऊंगा तो औरों से एक बार उतर जाएगा। उन पर जिम्मेदारी नहीं होगी मेरी। लोग उन्हें ऐसा नहीं कहेंगे कि अपने बाप की ओर से लापरवाह बन गए हैं। वह किसी के लिए कुछ नहीं है। इसलिए मैं कभी कभी इनके मामलों में टांग अड़ाता हूं जिससे कि मैं उन्हें अपने होने का अहसास दिलाऊं। फिर वाद-विवाद और झगड़ा भी होता है। तब लगता है कि मैं अभी कुछ हूं। लेकिन कुछ वक्त से, पता नहीं कब से, शायद जब से वह मर गई है, कोई वाद-विवाद और झगड़ा अच्छा नहीं लगता है। बहुत पीड़ा देते हैं। मन पर बोझा बढ़ जाता है। सब बेकार लगता है। मैं भी बेकार हूं। तालाब में कीचड़ लगे ठहरे पानी की तरह बेकार। जब पेड़ की जड़ें सूखने लगती हैं तो पेड़ भी सूखकर लकड़ा बन जाता है। उसे काटा जाता है। वह फिर भी किसी काम में आ जाता है। उसमें से कुछ न कुछ बनाया जाता है, कुछ नहीं भी तो जलाने के काम तो आता ही है। व्यक्ति का कार्य जब खत्म हो जाता है तो वह किसी काम का नहीं रहता। उसे किसी काम में नहीं लाया जा सकता। इन्सान जाति बड़े से बड़ी ट्रेजेडी है। बाकी सब उसमें से ही जन्म लेती हैं।

सूर्य उतरने पर था। आकाश की लाली तालाब पर उतर आई थी। पानी था या गंदे काले रक्त के धब्बे थे। वह कोई निर्णय नहीं कर पाया। तेज हवा लगनी शुरू हो गई थी। मिट्टी के बवंडर उसके वजूद को घेर लिए। तालाब के ऊपर केवल धूल नजर आ रही थी। हवा के झोंके बढ़ते गए। उसके मुंह पर हवा के तेज थपेड़े लग रहे थे। हवा का एक जोरदार थपेड़ा आया और किसी ने धक्का दिया। उसने खुद को सम्हालने की कोशिश की लेकिन उसमें ताकत नहीं बची थी। वह तालाब में जा गिरा। हवा उसे आगे धकेलती गई। मैं इतना हल्का कैसे हो गया हूं जो पत्ते की तरह पानी पर तैर रहा हूं। उसे आश्चर्य हुआ। हवा उसे धकेलती गई। एक जगह जमे पानी में जगह बन गई और वह खिंचने लगा। अब उसका शरीर भारी बन रहा था। फिर वह पानी में अंदर जाने लगा। पानी गले तक आ गया। उसने आसपास देखा। तेज हवा के कारण केवल धूल थी। कुछ भी साफ नहीं था। तालाब उसके शरीर को निगल गया। वह नीचे चला गया। तालाब के तल में घास का गहरा जंगल था। ‘अब मैं घास के गहरे अंधेरे जंगल में आराम करूंगा।’ उसने आखिरी बार सोचा और फिर घास की जड़ें उसके शरीर से लिपट गईं।

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रचनाकार: ठहरा पानी // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी
ठहरा पानी // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी
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