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बाल कहानी // स्कूल मजेदार है // सार्थक देवांगन

स्कूल मजेदार है

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एक शहर था। जहां दो भाई रहते थे। छोटा जितना नटखट था , बडा उतना ही शांत। छोटा स्कूल जाने के समय हमेशा बहाना करता था। हमेशा देर तक सोता रहता था और स्कूल के लिए लेट हो जाता था। और उसे स्कूल में रोज डांट पड़ती थी , क्योंकि वह अपना गृहकार्य कभी भी नहीं करता था। और वह खेलता भी नहीं था। दिन भर बैठा रहता था। उसके कुछ मित्र उसे खेलने के लिए बुलाने आते थे , तो वह उसके लिए भी मना कर देता था।

एक दिन उसके बडे भाई ने उसे अपने क्लब में लेकर जाने की बात की। वहां एक घंटा पढाई और एक घंटा खेल सिखाते थे। पर उसने वहां भी जाने से भी मना कर दिया। उसकी मम्मी ने उसे समझाया कि , पढोगे खेलोगे , तभी तो आगे बढोगे। छोटे वाले ने कहा मुझे स्कूल में मजा नहीं आता , टीचर क्या कहती है , कुछ समझ नहीं आता है। मम्मी ने कहा कि - तुम ऐसा क्यों सोचते हो कि स्कूल में मजा नहीं आता बल्कि , वहां कितना मजा आता है। अपने दोस्तों के साथ पढ़ना और उनके साथ बैठकर एक साथ खाना , साथ खेलना और साथ पढ़ना और मस्ती करना। तुम अपना मन ऐसा बनाओ कि तुम्हें स्कूल में मजा आने लगे। वह मान गया और अगले दिन स्कूल गया। लेकिन वहां उसे न ही पढ़ने में मजा आया न खेलने में। क्योंकि उसका कोई दोस्त नहीं था। सभी उससे दूर दूर बैठे रहे। उसके बड़े भाई ने उसके कक्षा के सहपाठियों को समझाया और सभी को साथ बिठाकर टिफिन खतम किया। टिफिन खाते मस्ती करते जाने कब और कैसे दोस्त बन गये। खेल की छुट्टी में साथ खेलना , बातें करना अच्छा लगा। आज उसे स्कूल में मजा आ गया।

कुछ दिनों बाद उसके सारे मित्र किसी अच्छे से स्कूल में जा कर पढ़ने लगे उसने भी जिद की कि , मैं भी किसी और स्कूल मैं जाउंगा लेकिन उसके मम्मी पापा ने उसे मना कर दिया था। उसे पुराने स्कूल में मजा ही नहीं आ रहा था। वह स्कूल जाता तो नियमित ही था लेकिन , उसे मजा नहीं आता था और उसका कोई मित्र नहीं था। सभी लोग अच्छे से अपने दोस्तों के साथ खेलते थे , पढ़ते थे , खाते थे और मजे से एक दूसरे के घर भी जाते थे। वह उदास रहने लगा। उसकी मां ने समझाया और कहा कि , पुराने दोस्त चले गये तो क्या हुआ , नए दोस्त बना लो। उसने ठीक है कह कर कहा कि - मेरा कोई दोस्त बनता ही नहीं है। मां ने कहा - तुम उनके साथ स्कूल में अच्छे से पढोगे , घुलो मिलोगे तभी तो कोई दोस्त बनेगा और स्कूल में मजा आएगा। अगर तुम स्कूल जाने का मन बनाओ और ऐसा सोचो कि , स्कूलों में तुम्हारे कई सारे दोस्त है तब तुम्हें स्कूल में ऐसे ही मजा आने लगेगा। अगले दिन स्कूल जाने के लिए सुबह से तैयार हो गया। स्कूल पहुंचकर , अपने सहपाठियों के समीप जाकर , बैठ गया और उनसे बातें करने लगा। उनके सहपाठियों ने भी उनसे , अच्छे से बात की। धीरे धीरे बातचीत ने दोस्ती का रूप धर लिया। फिर से उनके स्कूल जीवन में बहार आ गयी। अब उसके कई दोस्त बन गये और उसे स्कूल में मजा आने लगा।

कक्षा में अव्वल नम्बरों से पास होने लगा वह। उसकी लोकप्रियता बढ़ गई। नया सीखने सिखाने की होड़ में नन्हा छोटू सभी का चहेता बन गया। अब उसे स्कूल जाने से न गर्मी रोक सकती , न बरसात टोक पाती , न सर्दी मना कर सकती। छुट्टी के दिनों में , स्कूल जाकर क्या – क्या करना है , उसी की योजना बनाते रहता।

स्कूल की पढ़ाई पूरा करके , कालेज पहुंच गया। कालेज पूरा होते होते उसे अच्छी नौकरी मिल गई। एक दिन वह , उसी स्कूल के एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बन गया। आज उसे बीती बातें याद आने लगी। बच्चों को हंसते खेलते गुनगुनाते नाचते कूदते देख , नौकरी की शान और शोहरत फीकी लगने लगी और उसके मुंह से यह शब्द बार बार निकलने लगे कि स्कूल मजेदार है।

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सार्थक देवांगन

के. वि. 01 , रायपुर ( छ.ग.)

बालकथा 9180736690764269379

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