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रेणु शर्मा की दो लघुकथायें : प्राची – जनवरी 2018

पूरा चाँद

‘क्यों विनोद, तू नहीं चल रहा क्या?’

‘कहाँ?’

‘अरे यार आज हम सभी विकलांगों को पहिया कुर्सियां, श्रवण यंत्र, बैसाखियाँ और दूसरे कृत्रिम अंग बांटे जा रहे हैं। बहुत बड़ा कार्यक्रम हो रहा है...।’

‘तू जा, मैं नहीं जाता ऐसी जगहों पर।’

‘क्यों?’

‘मुझे तो पूरा चाँद चाहिए मुन्ना।’

‘क्या? पूरा चाँद?’

‘हाँ, पूरा चाँद, यानी काम, रोजगार, नौकरी..., ये सब चीजें तो फिर मैं अपनेआप भी ले लूँगा...।’

चुग्गा

मैं अपने दोस्त के साथ सुबह की सैर कर रहा था, ‘कल क्यों नहीं आया सैर करने?’

दोस्त जिसकी हार्डवेयर की दुकान थी, ने बताया, ‘परसों सारे प्लम्बरों को शिखर होटल में डिनर करवाया था, जिसके कारण काफी देरी हो गयी, तो सुबह समय से उठ नहीं सका.’

‘अपनी जेब से?’ बीच में ही टोकते हुए मैंने पूछा।

‘हाँ, अपनी तरफ से ही कराना पड़ता है। चुग्गा डालेंगे तभी तो चिड़िया फंसेगी जाल में।’ उसने हँसते हुए कहा।

‘यानी कि...?’ मैंने कहा।

‘यार, उन्हें कुछ खिलाएंगे-पिलायेंगे तभी तो हम से सामान लेंगे या ग्राहक को लेने के लिए कहेंगे। बगैर लालच आजकल कौन...?’ उसने खुलासा किया।

‘पर यह तो अच्छा-खासा खर्चा हो जाता होगा.’ मैं अभी भी शंकित था।

‘बिक्री ज्यादा होती है तो जिस कंपनी का माल टारगेट से ज्यादा बिकता है, वह भी तो हमें अच्छा-खासा गिफ्ट देती है ...और कई बार तो बाहर का ट्रिप भी। उसके हिसाब से तो यह खर्च कुछ भी नहीं होता।’ उसने अंदर की बात बता दी।

‘ओह...,’ मेरे मुंह से निकला, ‘तो कंपनी वाले तुम्हें चुग्गा डालते हैं...।’


सम्पर्कः द्वारा श्री ओम प्रकाश शर्मा,

48, कृष्णा नगर, नजदीक महेश नगर,

अम्बाला छावनी-133001 (हरियाणा)

लघुकथा 8702508638428864757

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