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लघुकथा // गुमशुदा बचपन // राजेश माहेश्वरी : प्राची – जनवरी 2018

क धनाढ्य व्यक्ति अपने बच्चों के लिए ढेर सारे खिलौने खरीदकर लाया करता था. कुछ समय बाद बच्चे के बड़े हो जाने के कारण वे सारे खिलौने उनके लिए अनुपयोगी हो गये थे. उस व्यक्ति ने सोचा कि क्यों न इन्हें गरीब बच्चों में बांट दिया जाए. जिससे वे भी इनसे खेलकर खुश हो जायेंगे. अपनी इस भावना को कार्यरूप देने के लिए वह पास की एक गरीब बस्ती की ओर निकल पड़ता है. रास्ते में उसे एक गरीब बच्चा मिलता है जिसे वह खिलौना देने की पेशकश करता है. वह बच्चा यह सुनकर बहुत खुश होता है एवं खिलौना ले भी लेता है परंतु अचानक ही कुछ सोचकर उसे मायूस होकर वापस कर देता है. वह व्यक्ति इसका कारण पूछता है तो वह बच्चा कहता है कि मेरे माता-पिता मुझसे भीख मांगने का काम करवाते हैं अगर वे यह खिलौना देख लेंगे तो समझेंगे कि मैंने भीख से प्राप्त पूरे रुपये उन्हें ना देकर उसमें कुछ रुपये से यह खिलौने खरीदे हैं तो मुझे बहुत मार पड़ेगी.

वह बच्चा यह कहकर चुपचाप चला जाता है. उस व्यक्ति को आगे जाकर एक दूसरा गरीब बच्चा मिलता है. वह उसे भी खिलौने देने की पेशकश करता है परंतु वह बच्चा मना करते हुए कहता है कि मैं तो दिनभर बीड़ी बनाने का काम करता हूं, मेरे पास इन खिलौने से खेलने का वक्त ही नहीं है. यह कहकर वह बच्चा आगे बढ़ जाता है. कुछ और आगे जाने पर उस व्यक्ति को तीसरा बच्चा मिलता है जो कि सहर्ष ही सभी खिलौने लेकर उसे धन्यवाद देता हुआ चला जाता है. वह व्यक्ति मन में सोचता है चलो देखते हैं कि यह बच्चा इन खिलौनों के साथ क्या करता है. वह उस बच्चे का पीछा करता है और देखता है कि उसने एक दुकान पर जाकर उन खिलौनों को बेच दिया और उससे प्राप्त राशि से पास ही की एक दवा दुकान से दवा खरीदकर ले जाता है. वह भी चुपचाप उसके पीछे-पीछे उसके घर तक पहुंच जाता है. वहां उस बच्चे को अपनी बीमार मां को दवाई पिलाते हुए देखकर द्रवित हो जाता है और उसकी आंखें नम हो जाती हैं. वह मन ही मन सोचता है कि जिस देश का बचपन ऐसा हो उस देश की जवानी क्या होगी?

सम्पर्कः 106, नया रामपुर, जबलपुर (म.प्र.)

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