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होली पर हास्य-व्यंग्य से भरपूर, रंग बिरंगी कविताएँ आमंत्रित // तीन होली बालगीत // शशांक मिश्र भारती

होली पर विशेष काव्य सम्मेलन के तहत इस सप्ताहांत, होलियाना, रंग-बिरंगी, हास्य-व्यंग्य से सराबोर कविताएँ प्रकाशित की जाएंगी. अपनी होली विशेष रचनाएँ शीघ्र भेजें.


प्रस्तुत है शशांक मिश्र भारती के 3 होली बालगीत -

शालू जी

 

होली के दिन साहस करके

घर से निकले शालू जी

मगर राह में ही रंगों से

रंग गये अपने शालू जी

अब शालू जी हो गए भारी

जैसे हो कोई हाथी

चिढ़ा रहे इनको अब बच्चे

चिढ़ा रहे इनको साथी

बोर हो रहे हैं शालू जी

मान भी जाओं भइया रे

नहीं चिढ़ाओं मुझसे ले लो

चाहें एक रुपइया रे ।।


होली

आ गई भइया रंग -बिरंगी

देखो फिर है होली

गांव- गांव आनन्द मनाएं

यह है ऐसी होली

छोटे-बड़े हंसाए सबको

हम बच्चों की बोली

आपस के मतभेद भगाने

आयी अबकी होली

मिलें और मिल जायें सब

लायी सन्देशा होली।।


रंगों की यह होली

हरे- गुलाबी, लाल-बैंगनी

रंगों की है होली,

काले-भूरे, सूखे-गीले

रंगों की है होली,

प्रेमभाव बढ़ाती है

यह खुशियों की होली

एक रंग में लाती है

रंगों की यह होली ।।

--

शशांक मिश्र भारती सम्पादक देवसुधा हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर -242401 उ0प्र0

ईमेलः- shashank.misra73@rediffmail.com/devsudha2008@gmail.com

कविता 8654551853352533558

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