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होली विशेष रंगीन हुड़दंग : इको-फ्रेंडली होली....!! // गिरीश पंकज

व्यंग्य 

इको-फ्रेंडली होली....!!

गिरीश पंकज

लोगबाग़  इको- फ्रेंडली होली खेल रहे थे ।

सरकार का निर्देश था भाई,  क्या करते। लेकिन जमकर हुई इको-फ्रेंडली होली । मोहल्ले के लोग ढेर सारी लकड़ियां उठाकर ले आए । हर व्यक्ति के हाथों में  कुछ लकड़ियाँ थी, मगर लकड़ियां किसी को दिख  नहीं रही थी । बस, समझ लो कि लकड़ियां थीं। मान लो स्टाइल में। जैसे गणित में हम लोग मान लेते है। लोग करते भी क्या,  इको-फ्रेंडली होली थी न। लकड़ियां जलानी हैं, मगर पता भी ना चले कि लकड़ियां जलीं । जंगल बचना है।  पेड़ों को रक्षा करनी है।  इसलिए सबको स्वांग भर करना है कि लकड़ियां लेकर के आ रहे हैं और होलिका सजा रहे हैं।  तो लकड़ियां आ गई । सभी लोगों ने एक चौराहे पर लकड़ियों को सजाने का सफल अभिनय किया। 

एक तो बहुत बड़ा नाटकबाज निकला था । वह जोर-जोर से से चिल्लाने लगा कि "मर गया बाप रे !! भारी लकड़ी मेरे पैरों पर गिर गई है।"

और वह सचमुच नीचे बैठ गया और अपना पैर दबाने लगा । दूसरा उसे बड़ा कलाकार था. उसने कहा "उफ कितना खून बह रहा है।  चिंता मत करो । अभी मरहम-पट्टी कर देता हूं ।"

वह दौड़ के पास की  दवाई दुकान में गया और वापस आकर मरहम लगाने का नाटक करने लगा।  फिर बाद में पट्टी बांधने के लिए बाकायदा हाथ भी घुमाता रहा। पट्टी बंध गई तो आदमी खड़ा हो गया । उसने मुस्कुराकर कहा, " थैंक्यू , मेरे भाई।"

फिर सब लोग मिलकर हाथ चलाने लगे । गोया होली तैयार हो रही है । कुछ देर बाद होली तैयार हो गई । शाम को सब लोग होलिका दहन के लिए पहुंच गए।  एक ने जयकारा लगाया,  दूसरे ने जेब से माचिस निकालने का अभिनय किया । फिर माचिस निकालकर एक तीली भी निकाली और जलाकर होली को छुआने का सुंदर अभिनय किया । कुछ देर बाद सब ने ऐसा महसूस किया कि होली जल रही है और आग तेज हो रही है। बस, लोग आँच से बचने के लिए  धीरे धीरे पीछे होने लगे।

एक मुस्कराते हुए बोला,  "कमाल की होली जल रही है ।"

दूसरे ने कहा, "लकड़ियों ने तो भयंकर आग पकड़ ली है।"

तीसरा बोला, " मजा आ गया यार।  हर साल हम ऐसे ही ईको फ्रेंडली होली मनाएंगे और लकड़ियां बचाएंगे ।"

चौथे ने पूछा, "और उधर जो सरकार के संरक्षण में सचमुच के जंगल कट रहे हैं, उनका क्या होगा मेरे भाई ?"

पहले ने कहा," काटने वाले काटते रहेंगे और उनको कटवाने वाले ईको फ्रेंडली का उपदेश देते रहेंगे। हमको उनका उपदेश मानना है, बस । "

लोग बहुत देर तक जलती हुई आभासी होली के इर्द-गिर्द घूमते रहे । सरकार का यह भी निर्देश था कि होली में शोर-शराबा बिल्कुल ना हो। जैसे श्मशानघाट में शोर नहीं होता, वैसी शांति रहे।  ढोलक- नगाड़ा, चंग -मंजीरा कुछ न बजे। कोई फाग गीत भी न गाया जाए । इसलिए सब लोगों ने गायन का मूक अभिनय शुरू किया।  किसी ने ढोलक बजाने का नाटक किया,  किसी ने ढब बजाने का । कोई दोनों हाथ लहराकर मजीरा बजाने का अभिनय कर रहा था। एक सज्जन फाग गाने के लिए अपना मुंह चला रहे थे । लोग उसका मुँह देख कर अंदाजा लगा रहे थे कि अब उसने कहा होगा,  ''सा...रा...रा...रा मोर कबीर.....।''

बहुत देर तक लोग फाग गायन का मूकाभिनय करते रहे । फिर एक दूसरे से गले मिले, और दूसरे दिन सुबह होली खेलने के वादे के साथ अपने-अपने घरों की ओर लौट गए।

दूसरे दिन सारे लोग नाचते-गाते बाहर निकले। किसी के हाथ में पिचकारी, किसी के हाथ में रंगों से भरी बाल्टी । किसी के हाथ में तरह-तरह के गुलाल। सब लोगों ने मूकाभिनय किया । लोगों ने अंदाजा लगाया कि सब बोल रहे हैं, "बुरा न मानो होली है!.. होली है !"

कोई एक दूसरे को पिचकारी मार रहा है, कोई पिचकारी से बचने की कोशिश कर रहा है।  कोई रंगों से भरी बाल्टी दूसरे पर उड़ेल रहा है । कोई अपने साथी के गालों पर गुलाल मल रहा है और मुंह चला रहा है, "बुरा न मानो होली है ।"

और मजे की बात यह कि सब मूकाभिनय ही कर रहे थे । इको फ्रेंडली होली मनाई जा रही थी न । सबके हाथों में आभासी पिचकारियां थीं। आभासी गुलाल थे। आभासी रंगों की बाल्टियां लिए लोग इधर-उधर भाग रहे थे।  हँस  रह थे और होली खेल रहे थे। ऐसी मज़ेदार होली जिसमें किसी के कपड़े पर एक बूंद भी रंग नहीं लग रहा।  न किसी का चेहरा रंगीन हुआ, मगर होली चल रही थी। लोग होली के गीत गा रहे थे, मगर केवल मुँह चला कर,  क्योंकि सरकार का निर्देश था कि होली में ध्वनि-प्रदूषण बिल्कुल ना  हो। सरकार का निर्देश था इसलिए लोग सहयोग कर रहे थे और इको फ्रेंडली होली मना रहे थे ।

इन सब की नाटक- नौटंकी देखकर बच्चों ने सर पीट लिया।  मोहल्ले के सारे बच्चे एक जगह एकत्र हो गए । उन्होंने सचमुच का रंग घोला और सचमुच की पिचकारियां निकाली,  फिर उस में रंग भरकर बाहर निकले, और इको-फ्रेंडली होली मनाने वाले मूक अभिनेताओं पर पिचकारियां दाग दी । देखते- ही- देखते सब -के- सब रंगों  में डूबने लगे । तब बच्चों ने जोरदार आवाज लगाकर कहा,

"बुरा ना मानो होली है।.....

बुरा न मानो होली है ।

रक्खो अपनी इको- फीको,

अपनी तो यह रंगों वाली

सच्ची-मुच्ची की फ्रेंडली-होली है।..

बुरा न मानो होली है।"

मूक अभिनय कर के होली खेलने पर मजबूर बड़े लोग जैसे सपने से जागे हों, वे सभी जोर-जोर से चिल्लाने लगे,

"बुरा न मानो होली है... बुरा न मानो होली है ।"

और सभी वास्तविक रंगों से होली खेलने लगे।


गिरीश पंकज

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