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हास्य व्यंग्य // यहां वहां की // राजकीय जीवों के साथ व्यवहार का प्रोटोकाल // दिनेश बैस

मेरे शहर के रेलवे स्टेशन पर एक सांड़ महोदय रेलगाड़ी के दो डिब्बों के, बफर्स के बीच में फंस गये। अपनी सांड़ोचित बुद्धि से शायद उन्होंने सोचा होगा कि जैसे सब्जी मंडी में सब्जी वाले के टपरे के तनिक से खुले टाट के पर्दे को थूथनी से तोड़ कर वे सब्जी साफ कर आते हैं, ऐसे ही ट्रेन को बीच से फाड़ते हुये उस ओर निकल जायेंगे। वे लौह-शक्ति का आकलन नहीं कर पाये। कर पाते तो समझते कि सांड़ बल तथा लौह बल में अंतर होता है। लोहा बड़े-बड़े सांड़ों को पंक्चर कर देने की ताकत रखता है। खैर यह सांड़ जी की अपनी समस्या थी।

लेकिन उनके इस पराक्रम ने रेलवे के सामने सम्भावनाओं के कुछ और द्वार खोल दिये। यों कहें कि उसके ज्ञान चक्षु खोल दिये। उसकी समझ में यह आ गया कि उसका काम ट्रेन चलाना ही नहीं बचा है, बदले निजाम में सांड़ वंश को भी उचित सम्मान देना उसका दायित्व है। उसके सामने नई चुनौतियां पैदा कर दीं। यह कुछ ऐसा ही ज्ञान था, जैसे कभी बाग में सेब को पेड़ से नीचे गिरते देख कर न्यूटन को प्राप्त हुआ होगा कि पेड़ के नीचे पड़े-पड़े, सेब को टकटकी लगाये देखना व्यर्थ समय बर्बाद करना ही है।

इस अमूल्य समय को माशूका की गलियों में लोफरियाईं करने में लगाना अधिक सार्थक होगा। इस उपक्रम में कौन जाने कब ठुक जायें। लेकिन क्या बड़ी बात है कि इस ठुकाई कार्यक्रम से माशूका पट जाये। वह गाती हुई चली आये... कोई पत्थर से न मारो, मेरे दीवाने को... वे आश्वस्त हो गये होंगे कि सेब जब भी गिरेगा, नीचे ही आयेगा। चील-कौओं के लिये आकाशगामी नहीं हो जायेगा। कुछ यों समझिये जैसे बुद्ध को संसार का सत्य ज्ञात हुआ होगा कि दुख है, दुख का कारण है, दुख दूर करने के उपाय हैं। ऐसे ही रेलवे को समझ में आया होगा कि रेलवे स्टेशन है तो गाय, बैल, बछड़े, सांड़ स्टेशन के भीतर आयेंगे ही। वे प्लेटफार्म पर हुड़दंग मचाने के अतिरिक्त रेल की पटरियों का मुआयना करने प्लेटफार्म के नीचे भी जा सकते हैं। मूड बन जाये तो बफर्स के बीच फंसने की जोर अजमाइश भी कर सकते हैं। गाड़ी की नीचे से जांच-परख करने के लिये वाक्शिंग-पिट में भी कूद सकते हैं। यह सब होगा तो उन्हें स्टेशन के बाहर हांकना भी उसका काम होगा।

वैसे सांड़ खानदान हो या कुत्ता परिवार, इन्हें गिरफ्तार करने का टैक्स नगर निगम वसूल करता है। लेकिन, सांड़ वंश अब राजकीय प्राणी हो गया है। उसका सम्बंध गऊमाता वंश से पाया जाता है। जिनके विषय में हरिशंकर परसाई कुछ इस प्रकार लिखते हैं कि दुनिया भर में गाय दूध देती है। अपना ही देश है जहां वोट देती है। सरकार बनवाने के एवज में, बस उसके सम्मान में इक्कीस तोपों की सलामी देना ही शेष रह गया है। इसलिये नगर निगम अब उसे पकड़ने के बजाय उसके सामने बिछने का टैक्स लेने लगा है। चलिये छोड़िये, वह लोक संगठन भी उन्हें सादर अपने पास रख सकते हैं जो उन्हें ठेस पहुंचाने के आरोप में सड़कें जाम कर देते हैं। किसी आदमी की सामूहिक हत्या तक कर सकते हैं। जिन्हें इस प्रजाति को बेचना-खरीदना राष्ट्रद्रोह लगता है। धर्म भ्रष्ट होना लगता है। अलबत्ता, उन्हें भूख से तिल-तिल करके मरने के लिये सड़कों पर छोड़ देना पवित्र कर्म लगता है।

लेकिन उनके लिये इनका उपयोग चुनाव की प्रचार सामग्री से अधिक नहीं बचा है। जिसका भरपूर उपयोग चुनाव लड़ने के लिये किया जाता है। चुनाव समाप्त होते ही कबाड़ में फेंक दी जाती है। दुर्घटनाओं की सुविधा प्रदान करने के लिये सड़कों पर छितरा दी जाती है। इसलिये सांड़ वंश को नियंत्रित करने के दायित्व से स्वयं को मुक्त कर लिया है उन्होंने। गौवंश को लेकर विवाद पैदा करने की जिम्मेदारी अपने पास रखी है। शेष सब दायित्वों का विकेन्द्रीयकरण कर दिया है।

अब, रेलवे का अवतार रेल चलाने के लिये हुआ है। आदमी तथा माल को ढोने के लिये हुआ है। सियासत ने उसे विरासत में सम्मानित सांड़ वंश सौंप दिया है। वह तो गरीब की लुगाई है। सबकी भौजाई होने का फर्ज निभाना उसकी नियति है।

बहरहाल स्टेशन के अंदर गौवंश के यहां-वहां प्रगटन से प्रेरित होकर रेलवे ने निर्णय लिया है कि अब रेल कर्मचारी स्टेशन से गौवंश को हांकने का काम भी करेंगे। उन्हें ड्राइव करने के लिये सांड़ भगाओ विशेषज्ञ भर्ती नहीं किये जायेंगे। जो रेल चला रहे हैं, सांड़ वंश को भी चलायेंगे।

अतः कभी मेरे शहर के स्टेशन से गुजरें, चलने की उद्घोषणा होने के बावजूद ट्रेन नहीं रेंगे तो किसी दुर्घटना की आशंका से मत भर जाइयेगा। थोड़ी ही देर में आपको दूसरी उद्घोषणा सुनाई दे सकती है... यात्री कृपया धयान दें। ट्रेन के आगे मान्यवर सांड़ जी खड़े हैं। ड्रायवर साहब उनसे रास्ता छोड़ने का अनुरोध करने गये हैं। लौट कर ट्रेन चलायेंगे। आपको हुई असुविधा के लिये हमें खेद है... ड्रायवर साहब लौट कर आ जायें, ट्रेन चलने के लिये लम्बी सीटी बजा दें, फिर भी ट्रेन अटल खड़ी रहे तो अगली सूचना की प्रतीक्षा करें। उसमें बताया जा सकता है कि सांड़ जी पीछे की दिशा में अग्रसर हो गये थे। गार्ड साहब का हालचाल पूछने के लिये उनके डिब्बे में चढ़ गये थे। गार्ड साहब शिष्टाचार निभाने के लिये उन्हें गेट तक विदा करने चले गये हैं। लौटेंगे तब झंडी हिला कर सीटी फुरफुरायेंगे। तभी गाड़ी आगे बढ़ेगी। कृपया गौ वंश हांकने में रेलवे का सहयोग करें।

लेकिन, इस व्यवस्था में भी रेलवे को सफलता मिलने में संदेह ही समझिये। कारण यह है कि जैसे कोई-कोई जन जब जनता द्वारा खारिज कर दिया जाता है तो उसका रूपांतरणर दर्जा प्राप्त मंत्री के रूप में कर दिया जाता है। राज्य सभा में सजा दिया जाता है। ऐसे ही समाज से दुत्कारा सांड वंश दर्जा प्राप्त राजनैतिक विभूति होने का सम्मान अर्जित कर चुका है। फिलहाल राज्य सभा के लिये उसकी सम्भावना कम ही है। इसलिये यह भी हो सकता है कि कल स्टेशन निदेशक साहब सांड़ बाहर भगाने का अभ्यास कर रहे हों, ठीक उसी समय उन्हें उच्च स्तर से नोटिस थमा दिया जाये कि आपने राजकीय प्राणी के साथ व्यवहार करने में प्रोटोकाल का पालन नहीं किया है। यह कदाचार की श्रेणी में आता है। कारण बतायें कि क्यों नहीं आपको सांड़ों को स्टेशन के बाहर से हांक कर, समुचित सम्मान के साथ स्टेशन के प्लेटफार्म पर आसन देने के काम पर लगा दिया जाये।

सम्पर्क : 3-गुरुद्वारा, नगरा, झांसी-284003

व्यंग्य 2894098098828101173

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