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व्यंग्य जिसने की शरम... डॉ. भावना शुक्ल // प्राची - फरवरी 2018

‘जिसने की शरम, उसके फूटे करम’ इस कहावत को पैदा शायद प्राचीन समय में इसलिए किया होगा; ताकि लोगों को शर्मिंदा न होना पड़े और लोग बेशर्मी से जीवन जी सके. आज के इस युग में यह कहावत चरितार्थ होती है, क्योंकि लोग इतने बेशरम होते हैं कि सारी शर्मो हया को ताक पर रखकर वे बेशर्मी से लोगों का सामना करने में नहीं हिचकिचाते.

आज चाहे रस्ते में हो, गली-मोहल्ले में हो,पार्क में हो... यहाँ तक कि मेट्रो में भी छिपन-छिपाई नहीं है. लड़के-लड़की खुल्लम-खुल्ला बेशर्मी के साथ अपने प्यार का इजहार कर रहे हैं और इस कहावत को अक्षरशः अमल कर रहे है. यहाँ तक की अखबारों में टी.वी.चैनल पर रोज न्यूज आती है- बलात्कारियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलती है, फिर भी यह जान-सुनकर भी लोगों के खून में की गर्मी ठण्डी नहीं होती. वो बेशर्मी का जामा पहनकर कुकर्म करते रहते हैं.

आज चाहे नेता हो, चाहे अफसर, चाहे प्रोफेसर, चाहे डॉक्टर... सभी कोटि के प्राणी अपने-अपने प्रोफेशन में इस कहावत को पूर्णतः अमल कर दिन दूनी रात चौगनी तरक्की कर कर रहे हैं. यानी जब तक घूस देवा को प्रसन्न नहीं करोगे तब तक आपके कार्य नहीं बनेंगे. अच्छा पद और स्थायी हो या अस्थाई नौकरी में इन्हें सदैव याद रखना होगा.

माता-पिता बहुत चाव से अपने बेटे की शादी करते हैं. सोचते हैं- बहू आएगी तो हम सबको सुख देगी. लेकिन बेटा शरम पर कुंडली मार कर अपनी पत्नी के सामने नतमस्तक हो जाता है और शरम को त्यागकर माँ-पिता को वृद्धाश्रम के हवाले कर देता है. कहीं-कहीं तो यह भी देखने में आता है कि आजकल की लड़कियां सास-ससुर के साथ रहना पसंद नहीं करती. उनका कहना है अलग रहो, नहीं तो हमें तलाक दे दो. इतनी भी शरम नहीं कि बाद में तुम्हारी ही इज्जत का फलूदा बनेगा पर इन्हें इससे क्या और मिल जायेंगे.

भारत में लोग शरम पर नहीं, करम पर भरोसा करते हैं जो कामचोर और आलसी हैं वे उसे भाग्य कहते हैं, वो शरम का पंगा नहीं लेते. उनका कहना है, जब शरम ही नहीं होगी तो करम कैसे फूटेंगे. आदमी दिन भर खाता है, पीता है. रास्ते में उसकी लघु दीर्घ शंका का समाधान जरुरी है. ये तो ऐसी शंका है, इसे तो बड़े से बड़ा अधिकारी भी नहीं रोक सकते तो हम क्या चीज है भाई! मरता क्या न करता! दीवार को गीला नहीं करेगा तो क्या करेगा, पान गुटखा खाने वाले तो थूकते समय यह भी नहीं देखते कहाँ और किस पर अपनी पिचकारियाँ मार कर डिजाइन बना रहे हैं.

कुछ लोग ऐसे भी प्रकाश में आये जो सम्मान पाने को लालायित हैं. सम्मान उन्हें काबलियत पर नहीं पैसों से चाहिए. इसके लिए वो कितने भी पैसे देने को तैयार रहते हैं. बस उनके घर पर सम्मानों के ढेर होना चाहिए जैसे दूसरे साहित्यकारों के यहाँ है. वे जरा भी नहीं हिचकिचाते और वे बड़े ही प्यार से पेश आते हैं. पैसा देकर सम्मानित हो जाते है, वाह -वाही लूटते हैं, फोटो खिचवाते हैं और फेसबुक पर डाल कर सबकी लाइक का मजा लेते हैं और खुश होते हैं.

कॉलेज के प्रोफेसर अच्छा वेतन पाते हैं. अपने यहाँ के एडहोक गेस्ट से जी भर के काम करवाते हैं. बेचारे डर के मारे चुप रहते हैं. जो मिली है नौकरी वह चलती रहे, यही सोच कर उनका कहा मान कर काम करते हैं. और तो और प्रोफेसर कक्षा में 10 मिनिट बाद जाते हैं और 15 मिनिट पहले कक्षा से निकल आते हैं. बस पक्की नौकरी का दंभ भरते हैं. देखा जाये तो क्या पढाया गया क्या नहीं बिलकुल भी शरम नहीं जब शरम ही नहीं तो क्या करम फूटेंगे.


सम्पर्कः डब्ल्यू जेड-21, हरि सिंह पार्क, मुल्तान नगर

पश्चिम विहार (पूर्व), नई दिल्ली-110056

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