रु. 25,000+ के  नाका लघुकथा पुरस्कार हेतु रचनाएँ आमंत्रित.

अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://www.rachanakar.org/2018/10/2019.html देखें.

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 50 // तुम्हारी माँ // डॉ रानू मुखर्जी

साझा करें:

प्रविष्टि क्र 50 तुम्हारी माँ - डॉ रानू मुखर्जी आजकल मुझे उनकी कमी बहुत महसूस होती है। काश कुछ दिन और जीती तो शायद वो देखती, नारी को जिस मुक...


प्रविष्टि क्र 50

तुम्हारी माँ

- डॉ रानू मुखर्जी


आजकल मुझे उनकी कमी बहुत महसूस होती है। काश कुछ दिन और जीती तो शायद वो देखती, नारी को जिस मुकाम पर वो देखना चाहती थी। उसी राह पर आज वो बढ़ने लगी है।

जब भी बाग में पीले, गुलाबी, सफेद, गुलदाउदी दिखते उन फूलों के आसपास मुझे तुम्हारी मां नजर आती। आंखों से फूलों को सहलाती-दुलारती हुई। अधखिले बेला की कलियाँ से महकते बगीचे में घूमती हुई। आज भी वो मेरे आसपास है।

तुम्हारी माँ ने ही मुझ जैसी दब्बू को खडे होना सिखाया, नहीं तो मैं बस डरी-डरी-सी अपने चारों ओर से त्रस्त वक्त के मजबूत झोंके से इधर-उधर लुढ़कती रहती।

एक कमजोर लता-सी मैं तुम्हारी वधू बनकर आई थी। मेरे सामने सब अपने हुनर को लेकर व्यस्त थे। बस एक तुम्हारी मां थी, जिसने मेरे दब्बूपन को, डरपोकपन को पहचाना था। सब कुछ देखती हुई भी कुछ कह और कर पाने में असमर्थ लगी थी मैं उनको, तब पीठ पर हाथ रखकर तुम्हारी मां ने कहा था, ‘डरो नहीं, ये तुम्हारा ही घर है। अच्छा-बुरा कुछ भी हो, मुझसे कह सकती हो। हम सब तुम्हारे अपने हैं।’

जीवन में पहली बार सुना कि मैं कुछ कह सकती हूं पर मेरे लिए यह इतना आसान नहीं था। एक कठिन तपस्या थी। बातों की जकड़न, काम करने में हड़बडाहट और भी बहुत कुछ, जो दूसरों को नहीं दिखता था पर उन्हें दिखा, जिसे देख तुम्हारी मां समझ गई कि इसको मजबूत बनाने के लिए उनको भी मशक्कत करनी पड़ेगी।

तुम्हारे घर में एक बहुत बडा सुनहरे चंपा का पेड़ था। उस पर तुम्हारी मां ने मधुमालती के बेल को चढा दिया था। तुम्हें याद है कि नहीं, पता नहीं, पूरा साल हमारा कमरा महकता रहता था । जब चंपा खिलते तो उसकी महक से और जब मधुमालती खिलते तो उसकी महक से सुगंध की बाढ़ आ जाती थी। मह-मह करता हमारा कमरा। उस मधुमालती को दिखाकर एक दिन तुम्हारी मां ने कहा था, ‘देखो दोनों महकते हैं पर एक मजबूत है तो दूसरे को खडे होने के लिए आधार चाहिए। दोनों एक-दूसरे के पूरक बन गए ! अब यह लता और महकेगी।’

आज मैं सोचती हूं लता को आधार तो मिला पर उसको और मजबूत बनने कि लिए अगर उसकी जडों को और गहराई दी जाए तो फिर उसे आधार की आवश्यकता ही न पडे। आज मुझे लगता है तुम्हारी मां ने यही किया था मेरे साथ। मेरे खडे होने के लिए मेरी जडों को गहराई देने और मजबूत बनाने में जुट गई थी।

मेरे अंदर दो तरह का संस्कार रोपा हुआ है। मेरी मां ने मेरे अंदर विरोध के स्वर को उभरने ही नहीं दिया था, जबकि तुम्हारी मां ने असहयोग लगने पर अविरोध का पाठ पढाया। वैसे विरोध की परिभाषा का कोई भी अस्तित्व मेरे कोश में नहीं है। ‘जो तुम कहो वही सही’ यही मैंने सिखा था। पर तुम्हारी मां ने मुझ गूंगी को बोलना सिखाया। न-न तर्क-वितर्क नहीं, स्पष्टवाद। वाक स्वतंत्रता। विचाराभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।

आज जब मैं देखती हूं, लोग घर में अशांति का मूल कारण बाहर से लाई लड़की के बहुत बोलने को मानते हैं तो मेरा रोम-रोम खिल उठता है कि कैसी किस्मत लेकर आई थी मैं कि तुम्हारी मां ने मुझे बोलना सिखाया। सही समय पर सही बात। शायद उन्होंने मुझे बाहर से लाई हुई लड़की नहीं समझा।

इसे मैं शक्ति ही कहूंगी, क्योंकि जो आज भी मुझे शक्ति देती है, वो है उनका अदम्य साहस। याद आती है उस रात की, जब पडोस की लड़की का विवाह था। उनके सारे मेहमान अपने साजो-सामान के साथ आए हुए थे। गहने घर में होने कि खबर चोरों को लग गई थी, अवसर पाकर उन्होंने भी अपना हाथ आजमाया। चोर-चोर का शोर उठने लगा पर पडोस से कोई नहीं निकला। उनके हथियारों के डर से। बेचारे घरवाले चोर-चोर चिल्लाते ही रहे।

सर्दी की उस रात में अपने कंबल को झाड़कर तुम्हारी मां ही थी, जिसने बॉलकोनी में जाकर चिल्लाकर उनको ढाढस बंधाया और उन्हीं के हल्ला मचाने से डर के मारे चोर भाग गए। दूसरे दिन लोग घर आकर….नहीं मदद किया इसलिए नहीं अपितु भविष्य में ऐसा कभी न करने को समझाया, क्योंकि दूसरे दिन बदला लेने वो फिर इस घर में आ सकते थे। तुम्हारी मां अडिग रही ‘ आने दो पर मैं ऐसा कभी नहीं कर पाऊंगी, क्योंकि अन्याय को सहना मेरे स्वभाव में नहीं है।’

स्वदेशी आंदोलन में तुम्हारे नानाजी का बहुत बडा योगदान रहा। खुद्दारी जो उनके खून में थी, उन्हीं से आई थी।

अक्सर फुर्सत के समय में तुम्हारी मां अपने बचपन की बातें करती थी। अपने छोटे-छोटे दो भाई और एक बहन को मां बनकर पाला था। उनकी मां अक्सर बीमार रहती। मां की बीमारी उनको निपुण गृहिणी बना दिया था। भोजन बनाने में उनकी निपुणता का सबसे श्रेष्ठ उदाहरण यह था कि घर में जितने भी लोग आते, सभी समय पर उनके हाथ का बनाया भोजन करके तृप्त होकर जाते। साधारण-से-साधारण खाने में भी अपना इतना प्यार उडेलती कि खाने वाले उंगलियां चाटते रहे होते। तभी तो अंतिम दिनों में बाबा केवल मां के हाथ का खाना ही पसंद करते थे। बच्चे उनके बनाए खाने के दीवाने। कभी-कभी मुझे भी गुस्सा आता था। बच्चों के दोस्त जब केवल दादी के ही हाथ का बनाया खाना खाने आते। पाक कला तो उनकी रग-रग में घुली हुई थी।

तुम्हारे नाना मेरठ कॉलेज के प्रिंसिपल थे। उनके क्वार्टर के आगे पीछे का आहता इतना बडा था की उसमें फल-फूल और सब्जियों की भरपूर खेती होती। बगीचे से ताजी सब्जियों को तोड़कर पकाया जाता। सर्दियों के दिनों में लहलहाती ताजी पालक की सब्जियां सुबह-सवेरे ही तोड़कर पकाई जाती। उन पर बर्फ की हल्की चादर फैली होती। जिनको तोड़ते हुए मालियों के हाथ सुन्न हो जाते पर उनके मां का आदेश सुबह का तोडा हुआ ही पकेगा।

माली जब कांपते हाथों से भाजी की टोकरी रखने आते तो तुम्हारी मां का मन कचोट उठता, फिर सर्दियों में शाम को ही तुम्हारी मां के आदेश से तोड़कर रखना शुरु किया। हर छोटे-बडे के लिए उनके मन में ममता भरी होती। कर्मठ होने के कारण कर्मशील लोग उन्हें बहुत पसंद थे, इसलिए घर के नौकरों की मदद में लगी रहतीं। घर में नौकर-चाकर भरे होने पर भी अपना काम स्वयं करना उनका सिद्धांत रहा। नौकरों पर कभी निर्भर नहीं किया। तुम्हारी मां से ही मैंने सीखा, सतत बहते रहना ही जीवंतता है। बैठा जीवन सुखी जीवन नहीं होता है।

तुम्हारी मां ने मुझे मकान को घर में तबदील करना सिखाया है। फुरफुराता उड़ता-फिरता जीवन कुछ दिनों में ही एकरसता के कारण अपनी मनोहरता खो बैठता है और तभी देनी होती है परीक्षा। धैर्य की परीक्षा, कर्मशीलता की परीक्षा, एडजस्टमेंट की परीक्षा, सहयोगिता की परीक्षा, एक-दूसरे को जानने-पहचानने के तकनीक की परीक्षा। ऐसी अनेक परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। ठोस धरती पर थरथराते कदमों का कांप जाना, सही जगह पर न पड़ना, कोई अजीब बात नहीं पर थरथराते कदमों का कांप जाना, सही जगह पर न पड़ना, कोई अजीब बात नहीं पर सही-गलत सिखाने वाला भी होना चाहिए। तुम्हारी मां ने मेरे ईंट पत्थर से बने मकान को घर बनाने में मेरी भरसक मदद की। कभी भी ‘मेरे बेटे का घर’ नहीं कहा और न ‘मेरा घर है’ कहा। सजाया-संवारा, मजबूत बनाया तो रानू के घर को।

मां के घर से सीखा सारा का सारा पाठ में तो तुम्हारी मां को देखते ही भूल गई थी। याद रहा तो बस इतना ही कि आज से मायके पर मेरा कोई अधिकार नहीं है पर यह तुम्हारी मां की ही विशेषता रही कि उन्होंने मुझे सम्राज्ञी बना दिया। एक विशाल दायित्व की सम्राज्ञी, फिर तो तुम्हारी मां ने मेरी हर गलती को इतनी बारीकी से अपना लिया कि मुझे मेरी हर गलती उन तक जा ऐसे विलीन हो जाती, जैसे समुद्र में नदी-नालों का पानी।

धीरे-धीरे तुम्हारी मां का मेरे प्रति स्नेह मेरे लिए एक सुरक्षात्मक बंधन बन गया और मैं उसमें ऐसे बंधी की मेरा मन उनसे दूर कहीं न टिकता। एक अव्यक्त समझौता हमारे बीच हरदम पसरा रहता। शुरु के दिनों में तुम्हारे ऑफिस से लौटने में देर होने पर मेरी हर उद्विग्न दृष्टि को पहचान कर कहती, “वो तुम्हारा ही है, तुम्हारे पास ही आएगा इतनी उद्विग्न क्यों होती हो। चलो मैं तुम्हें लाईब्रेरी से एक अच्छी पुस्तक निकालकर देती हूं। पढ़कर बताओ तो कैसा है।“ हमारे घर में हर भाषा से समृद्ध लाईब्रेरी है। उनको पढ़ने का बहुत शौक था। समय निकालकर पढ़ती रहती थी। तुम्हारी मां ने अपनी यह पसंद मुझे विरासत में दे दी।

सृष्टि की प्रत्येक वस्तु के प्रति उनके मन में सम्मान देखा। धिक्कार या अवज्ञा की भावना न उनके स्वर में और न उनकी दृष्टि में कभी देखा। छीः शब्द से या घृणात्मक भाव से व्यवहार करते हुए मैंने उन्हें कभी नहीं देखा। मुझे याद है उस बार जमकर बारिश हो रही थी। बगीचे से लगा पोखर लबालब भर गया था। हमारा बगीचा बतखों और मेंढकों का अड्डा बन गया था। पेंक-पेंक और टर्र-टर्र से गुलजार रहने लगा था। तुम्हारी मां अक्सर दोपहर को बैठकर अपने बगीचे को बालकनी से निहारा करती।

उस दिन थोडी धूप खिल आई थी। बगीचा टर्र-टर्र से गुलजार था। अचानक मुझे तुम्हारी मां ने आवाज दी। दूर से ही इशारे से चुपचाप आने को कहा। मेरे जाते ही बगीचे की दीवार की और इशारा किया। मैं तो देखकर स्तब्ध रह गई। एक लंबा मोटा-सा सांप पूरी दीवार पर कब्जा जमाकर धूप सेंक रहा है। मेरे दोनों हाथ मुंह पर कस गए। शायद चीख निकल जाती। उनकी ओर देखा तो वही स्नेहभरी दृष्टि। निर्निमेष निहार रही थी फिर मेरी ओर सरककर कहा, ‘देखो कितना सुंदर है न ! उसकी पीठ पर की चित्रकारी देखी और रंगो का मिश्रण, पीला, भूरा, सफेद और लग ऐसा रहा है जैसे किसी ने अभी-अभी स्केच किया हो। एकदम चमचम। है न!’

मेरी तो सिट्टी-पिट्टी गुम। वर्णन तो ऐसे कर रही थी जैसे किसी सुंदर रंगीन तितली का कर रही है। जीवन में पहली बार सुना कि सांप देखने में सुंदर होते हैं। मेरा तो धिन और डर के मारे बुरा हाल था पर उनकी मोहमयी दृष्टि के सामने नत हो गई।

तुम्हारी मां लोगों के दुख को समझना, अर्थ-सामर्थ्य से मदद करना। थक- हारकर पीछे हटने वालों में ढाढस बढाने की भावना से मैं होते-होते ही अवगत हुई थी। आश्चर्य तो इस बात का था कि वो कभी इसे जाहिर करना नहीं चाहती थी। ये उनका अलग संसार था, जिसमें दूसरों का प्रवेश निषिद्ध था। एक स्पष्ट वक्ता की तरह कह देती थी, ‘इससे मुझे ही निपटने दो।’ इसमें जदूमाली, चारु बूढी, कुब्जा आदि आते। बहुत ठोक बजाकर मुझे परखने के बाद ही, जब ये लोग आते तो मुझे तुम्हारी मां के साथ बैठने को मिलता।

जदूमाली माली का काम करता ही था पर दूध बेचने का काम भी करता था। जब भी उसे पैसों की जरुरत पडी तुम्हारी मां ने उसकी भरसक मदद की। एक बार उनको कहते हुए सुना था, ‘ओरे जोदू। पैसों की जरुरत होने पर दूध में पानी मिलाकर उसकी मात्रा बढाकर बेचने के बजाय मुझसे पैसे ले जाया करो। और उस समय के लोगों के मन में सम्मान की भावना देखिए। जब-तब हाथ फैलाकर खडा नहीं हो जाता था जोदू। अभाव पड़ने पर ही वह मांगता।

चारु बूढी के बारे में तो मैंने अपने बच्चों के जनेऊ के वक्त ही जाना। उसे हम इसी नाम से जानते थे। बाबा तो लोगों की भीड़ में उसे कोने में बैठे देखकर ही नारज होने लगे। तुम्हारी मां ने ही उन्हें शांत किया। मुझसे कहा, उसे खाना खिला दो। मैंने खाना दिया तो चारु बूढी बोली मांलक्ष्खी इस बार बरसात में भीगे कपडों में रही। दूसरा कपडा नहीं है, जो बदलती। मैंने उसे कपडे दिए तो वहां बैठे दूसरे नौकर भी मांगने लगे। एक हो-हल्ले का माहौल बन गया। मैं डर गई। बाबा के नाराज होने का डर सताने लगा। उनकी जुबान पर तो एक ही बात होती, ‘तुम्हारी मां ने तो इन पुराने नौकरों को सर चढा रखा है।’ तुरन्त मां नीचे उतर आई और मामले को क्षणभर में सुलझा दिया। उनके स्वभाव में ऐसी दृढ़ता थी कि उनको देखते ही लोग संभल गए। बाद में उन्होंने मुझे बताया था। इसका एक बेटा है, जो पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी पर है पर ये पगली वहां नहीं जाती।

कुब्जा की तो बात ही कुछ और थी। चार बच्चों को लेकर छोटी उमर में ही विधवा होकर मायके आ गई थी। कुब्जा की मां हमारे घर बर्तन-चौके का काम करती थी। शोक से उबरने पर वो भी इधर-उधर लग गई। चालीस कमरों के बडे से महल में काम का अभाव होता है क्या! काम का तो नहीं पर खाने का अभाव होने लगा। तुम्हारी मां ने उन सबको अपनी रसोई में बुला लिया। कुब्जा मदद भी करती और बाल-बच्चों का पेट भी भरती, फिर तो मां ने उसके बच्चों को वहां के स्कूल में दाखिल करवा दिया। आज सब नौकरी-चाकरी करके रच-बस गए हैं। शादी के बाद मैंने तुम्हारी मां से नहीं, कुब्जा से ही सारी बातें सुनी थी।

जैसा सुंदर मन था, वैसे ही सुंदर तरीके से वो काम भी करते थी। उनके स्पर्श से साधारण से साधारण काम भी विशिष्ट बन जाता। उनकी कलात्मक निपुणता बिन बताए ही दिख जाती। लक्ष्मीपूजा के दिन, दिनभर उपवास करके पूजा का आयोजन इतनी सहजता और सुंदरता से करती की भक्ति के साथ-साथ उनकी दक्ष व्यव्स्था का भी परिचय मिलता था। उनके हाथ की बनी खीर-पपूरी जिन लोगों ने खाई है, वो आज भी उनको याद करते हैं।

हमारे बंगाल में रिवाज है कि विजयादशमी के दिन वयस्क लोगों को उनके घर जाकर प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लेना। उत्तरपाडा में तो तुम्हारी मां इस दिन को एक उत्सव की तरह मनाती रहती। उनके हाथ की बनी “घुघनी” खाने के लिए लोग देर रात तक आते रहते।

ऐसे तो बाबा के साथ भी बडौदा आती रही पर बाबा के न रहने पर उनको हम अपने पास ही ले आए और बच्चों ने तब घोषणा कर दी कि दादी अब उत्तरपाडा हमारे साथ ही जाओगी और हमारे साथ वापस भी आओगी। छोटा तो उनसे फेविकोल की तरह चिपक गया।

वो आज भी उनकी सिखाई उन छोटी-मोटी बातों को बडी मुस्तैदी के साथ याद करता रहता है और बताता भी है कि इसे उसकी दादी ने सिखाया हैं।

तुम्हारी मां के बडौदा आते ही हमारी बिरादरी जाने-पहचाने सभी लोग दशहरे के दिन उनको प्रणाम करने हमारे घर आने लगे। उन लोगों को केवल मुंह मीठा और घुघनी खिलाकर भेजना उनको कभी अच्छा नहीं लगा। सो, आने वालों के लिए रात को खाने की व्यवस्था हुई। जिसमें कुछ एक बनाने में तो उनका हाथ जरुर होता। जब तक तुम्हारी मां जीवित रही, कम-से-कम पचास साठ लोग विजयादशमी के दिन हमारे घर प्रणाम करने के बाद रात का खाना तो खाते ही और आज तक वही प्रथा मैं भी निभाती आ रही हूं। उनका मेरे साथ होना ही मुझे ताकत देता है, मुझे लगता है अंदर से एक ऊर्जा उनसे बहती हुई मुझ तक आज भी प्रवाहमान है।

आज भी जब भी में दुखी होती हूं द्वंद्व में होती हूं, भीड़ में अकेलेपन की शिकार होती हूं, तुम्हारी मां मुझे सहारा देने मेरे साथ होती हैं। मेरे कदम बढाते ही मेरे बढ़ते कदमों के साथ मैं उनके दृढ़ कदमों की चाप आज भी सुनती हूं, जो मुझे मुश्किलों से जूझने की ताकत देती है।

हृदय को बेधने वाले शब्दों को अनसुना करने की कला मैंने उनसे ही सीखा। ऐसे में उनके सांत्वनात्मक शब्द जलते पर ठंडे रुह के फाहे जैसे लगते। ऐसे में एक भीरु मेमना जैसे अपनी मां के संरक्षण की आस में रहता है, वैसे ही मुझे अपनी पनाह में ले लेती और लगता मुझ डूबती का हाथ थामकर दलदल से खींचकर निकाल लेने के लिए ही उन्होंने हाथ बढाया है।

हर इनसान अपने बचपन के दिन बडी शिद्दत से याद करता है। मेरठ में उनके मकान के बाद के दो-चार बंगले लो छोड़कर ही नेहरुजी का बंगला था। अक्सर कमला नेहरुजी उनके घर आती रहती थी उनकी मां से मिलने। उनके हाथ के बनाए नाश्ते की कमलाजी बहुत तारीफ करती।

मैंने भी इस बात का जिक्र किया है बहुत छोटी उम्र से ही उनके अंदर घर पधारे लोगों तथा अपनी मां की मदद करने की भावना घर कर गई थी।

परिवार के लोगों को आपस में बांधकर रखने की कला में तो वो इतनी माहिर थी कि क्या कहने! उनके बुलाने पर या उनके कहीं होने की खबर मिलने पर उनको जानने वाले उन तक पहुंच ही जाते। किसी की भी कोई बुराई को याद रखकर दूसरों तक पहुंचाते हुए मैंने उन्हें कभी नहीं सुना। जो जैसे उनके सामने होता, वैसे ही उनसे मिलती। कोई टीका-टिप्पणी नहीं। अपनेपन से लबालब व्यवहार, जिससे मिलने वाला कई दिनों तक अभिभूत रहता। छोटी-छोटी बातों से लोगों के मन में घर बना लेने की अद्भुत कला उनके पास थी।

बच्चे बीमार पड़ते ही मैं मुरझा जाती। तुम्हारी मां तुरंत सिरहाने बैठ जाती। जैसे कह रही हो, आओ तो देखें कौन सताता है। पुचकारती, सहलाती, सर पर पट्टी रखती, दवाई देती और मुझे लगता इनके रह्ते मेरे बच्चों को क्या हो सकता है! दस-भुजाधारिणी मां।

हम आज नारी शोषण, स्त्री विमर्श की बात करते हैं पर उनके लिए संसार धर्म में लिपटे हुए हम कितना और क्या कर पाते हैं पर तुम्हारी मां किसी पीड़ित की व्यथा केवल सुनकर नहीं रह जाती थी। उसे बुलाकर अपने पास बैठकर उसे समझाने – उबारने की कोशिश करती।

एम.ए. करने की इच्छा जाहिर करते ही तुम्हारी मां का भरपूर सहयोग मिला। स्त्री शिक्षा की हिमायती होने के कारण मेरा कॉलेज ज्वायन करना उन्हें बहुत अच्छा लगा, फिर तो पी-एच.डी. तक मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इन दिनों बाबा भी चल बसे, फिर तो पांच पुस्तकें छप गई। उनके विराट व्यक्तित्व का परिचय एक बार फिर मिला। मेरी पी-एच.डी. के बारे में मेरी नानी बडी उत्सुक थी। अक्सर मुझसे पूछती, ‘ तू जो पुस्तक लिख रही है कब पूरा करेगी?’ थीसिस खत्म होते तक नानी का स्वर्गवास हो चुका था। पता नहीं क्यों, अंत तक उनकी जिज्ञासा बनी रही।

मैंने थीसिस बाबा (ससुरजी) को समर्पित करने की सोची थी पर तुम्हारी मां ने मुझे समझाया, ‘तुम्हारी नानी परिवार में सबसे बडी थी। बहुत पढी-लिखी न होते हुए भी तुम्हारे पठन-मनन से बहुत उत्साहित थी। मुझे लगता है तुम अपनी पहली पुस्तक उनको ही समर्पित करो। लिखना शुरु हुआ है तो और भी लिखे जाएंगे, फिर बाबा को समर्पित करना।’ और मैंने पुस्तक नानी को समर्पित की। आज लगता है कितना सही सुझाव था। उस थीसिस पर मुझे गुजरात साहित्य अकादमी का प्रथम पुरस्कार मिला है।

एक बडे शिक्षित परिवार से थी। उनके पिता उस समय के बहुत बडे इतिहासकार थे। उनकी लिखी पुस्तकें आज रेफेरेन्स के रुप में विश्वविद्यालय में लगाई गई है। घर हर समय संगीत कला और विद्या का निकेतन बना रहता था। ऐसे परिवार में से वो उस समय के बंगाल के विशिष्ट जमींदार, प्रातः स्मरणीय जयकेष्ट मुखर्जी के परिवार में बहु बनकर आई थी पर स्वभाव गरिमा देखिए, इन सबके लिए मस्तक ऊंचा तो रहता पर उसमें अकड़न लेश मात्र नहीं।

उनके पिता घनिष्ट मित्र ऐतिहासिक सुनिती कुमार चटर्जी मेरे विवाह में आए थी। मैंने आज तक उनके दिए उपहार को संभालकर रखा है। उनकी हस्ताक्षर की हुई पुस्तक मेरी अमूल्य निधि है। आज जब मैं सोचती हूं तो मेरे रोंगटे खडे हो जाते हैं कि मैंने क्या पाया! न जाने किस पुण्य का फल मिला है।

इन सबके लिए अहंकार उनको छू तक नही गया था पर मुझे अहंकार है। ऐसी ममतामयी मां का संस्पर्श पाने के लिए। उनके हृदय में आंखों में, अपने लिए स्नेह के सागर को लहराते देख मेरा मस्तक नत हो जाता है उनके चरणों में।

मुझे गर्व है कि मैं उनके द्वारा गढी गई हूं। एक कच्ची मिट्टी के लोंदे को गढ़कर उसमें प्राण फूँकने का काम तुम्हारी मां ने किया। मेरे इस लेख को लिखने तक मेरे गले में दर्द का एक गोला लगातार ऊपर धकेलता रहा है, जो मुझे और लिखने नहीं दे रहा है। रत्न की तरह संचित अभी और यादें है, फिर कभी पिटारी खुलेगी तो यादें फिर से महकेंगी।

---

परिचय -

नाम - डॉ. रानू मुखर्जी

जन्म - कलकता

मातृभाषा - बंगला

शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.(महाराजा सयाजी राव युनिवर्सिटी,वडोदरा), बी.एड. (भारतीय

शिक्षा परिषद, यु.पी.)

लेखन - हिंदी, बंगला, गुजराती, ओडीया, अँग्रेजी भाषाओं के ज्ञान के कारण अनुवाद कार्य में

संलग्न। स्वरचित कहानी, आलोचना, कविता, लेख आदि हंस (दिल्ली), वागर्थ (कलकता), समकालीन भारतीय साहित्य (दिल्ली), कथाक्रम (दिल्ली), नव भारत (भोपाल), शैली (बिहार), संदर्भ माजरा (जयपुर), शिवानंद वाणी (बनारस), दैनिक जागरण (कानपुर), दक्षिण समाचार (हैदराबाद), नारी अस्मिता (बडौदा), पहचान (दिल्ली), भाषासेतु (अहमदाबाद) आदि प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में प्रकशित। “गुजरात में हिन्दी साहित्य का इतिहास” के लेखन में सहायक।

प्रकाशन - “मध्यकालीन हिंदी गुजराती साखी साहित्य” (शोध ग्रंथ-1998), “किसे पुकारुँ?”(कहानी

संग्रह – 2000), “मोड पर” (कहानी संग्रह – 2001), “नारी चेतना” (आलोचना – 2001), “अबके बिछ्डे ना मिलै” (कहानी संग्रह – 2004), “किसे पुकारुँ?” (गुजराती भाषा में आनुवाद -2008), “बाहर वाला चेहरा” (कहानी संग्रह-2013), “सुरभी” बांग्ला कहानियों का हिन्दी अनुवाद – प्रकाशित, “स्वप्न दुःस्वप्न” तथा “मेमरी लेन” (चिनु मोदी के गुजराती नाटकों का अनुवाद शीघ्र प्रकाश्य), “गुजराती लेखिकाओं नी प्रतिनिधि वार्ताओं” का हिन्दी में अनुवाद (शीघ्र प्रकाश्य), “बांग्ला नाटय साहित्य तथा रंगमंच का संक्षिप्त इति.” (शिघ्र प्रकाश्य)।

उपलब्धियाँ - हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2000 में शोध ग्रंथ “साखी साहित्य” प्रथम

पुरस्कृत, गुजरात साहित्य परिषद द्वारा 2000 में स्वरचित कहानी “मुखौटा” द्वितीय पुरस्कृत, हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2002 में स्वरचित कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को कहानी विधा के अंतर्गत प्रथम पुरस्कृत, केन्द्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को अहिंदी भाषी लेखकों को पुरस्कृत करने की योजना के अंतर्गत माननीय प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयीजी के हाथों प्रधान मंत्री निवास में प्र्शस्ति पत्र, शाल, मोमेंटो तथा पचास हजार रु. प्रदान कर 30-04-2003 को सम्मानित किया। वर्ष 2003 में साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा पुस्तक “मोड पर” को कहानी विधा के अंतर्गत द्वितीय पुरस्कृत।

अन्य उपलब्धियाँ - आकशवाणी (अहमदाबाद-वडोदरा) की वार्ताकार। टी.वी. पर साहित्यिक पुस्तकों का परिचय कराना।

संपर्क - डॉ. रानू मुखर्जी

17, जे.एम.के. अपार्ट्मेन्ट,

एच. टी. रोड, सुभानपुरा, वडोदरा – 390023.

Email – ranumukharji@yahoo.co.in.

ranumukharji@yahoo.co.in

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

-----****-----

-----****-----

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1

.... प्रायोजक ....

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधाएँ ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=blogging$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3844,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,336,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2788,कहानी,2116,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,486,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,329,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,50,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,9,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,17,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,838,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,8,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,315,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1923,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,649,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,688,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,56,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 50 // तुम्हारी माँ // डॉ रानू मुखर्जी
संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 50 // तुम्हारी माँ // डॉ रानू मुखर्जी
https://lh3.googleusercontent.com/-hbl-Cx71TIc/Wgqe0b92HfI/AAAAAAAA8m0/DDd3tjYxZLUsQFYSTGexmKzDwdRJ1Q4aQCHMYCw/1%2B004_thumb%255B1%255D?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-hbl-Cx71TIc/Wgqe0b92HfI/AAAAAAAA8m0/DDd3tjYxZLUsQFYSTGexmKzDwdRJ1Q4aQCHMYCw/s72-c/1%2B004_thumb%255B1%255D?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2018/03/49_10.html
https://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2018/03/49_10.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ