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प्रविष्टि क्र. 64

“आयपिल्ला श्रीनिवास "मास्टर जी'

बारिश की एक शाम

बारिश की एक शाम थी I दूर नील -गगन का रंग अब धीरे धीरे काला हो चला था I हवा भी अब ठंढी हो चली थीI आकाश में काली घटाएं इधर से उधर नाच कर रहीं थीं I सामने ही शाल के पेड़ झुक- झुककर पावस ऋतु का सुस्वागत करते प्रतीत हो रहे थेI अम्बर में रह- रहकर दामिनी अपनी चमक से ---अपनी उपस्थिति का अहसास करा रही थी Iचिड़ियाँ भी ;भीगती हुई ...अपने घोसले की ओर तेजी से उड़ रहीं थीं I अब शाम ढलने लगी थी Iसारे मित्र अपने -अपने घर की ओर चलने लगे I मैं भी जल्दी से घर पहुँच जाना चाहता था I उस समय ....मैं करीब दस -ग्यारह वर्ष का था I सो बारिश से बचने के लिए मैं भी घर की ओर दौड़ने लगा I

मेरे साथी मुझसे आगे निकल गए I तभी बगल से एक चीख सुनाई दी I मेरे दोस्तों ने कहा ,”मत रुको , बारिश तेज़ होनेवाली है I” किन्तु न जाने क्यों ..मेरे दौड़ने की गति धीमी पड़ गयी Iवही चीखने की आवाज़ फिर सुनाई दी I आवाज़ कुछ जानी -पहचानी -सी लगी या मेरा भ्रम था , जो भी हो , इस बार मैं अपने को नहीं रोक सका I चीखने की दिशा में बढ़ने लगा I देखा, तो दंग रह गया I वर्षा के जल से एक गढ्ढा भरा हुआ था I उसी में कोई बच्चा गिर गया था और वही मदद के लिए पुकार रहा था , जबकि सारे मित्र उसकी पुकार पर ध्यान न देकर आगे बढ़ गए थे I उस गढ्ढे के बारे में मुझे पता था I जब वह गढ्ढा सूखा था तब हमारी बाल -मंडली कभी -कभी उसमें खेलती थीं I वह गढ्ढा ज्यादा गहरा नहीं था किन्तु छोटा बालक उसमें फंसा हुआ था I बादलों की गड़गड़ाहट में उसकी आवाज़ दब -सी गयी थी किन्तु न जाने मुझे उसकी मदद करने की क्यों सूझी I शायद मेरी अंतरात्मा की प्रेरणा से ,मेरे मन में उसकी सहायता करने की इच्छा हुई हो या मेरे अंदर का मानव मुझे उसकी सहायता करने को कहा हो …. जो भी हो मैंने उसकी जान बचाने की ठान ली I तब- तक अंधेरा हो चला था I मैं शीघ्र ही उसकी ओर बढ़ा I तभी जोरों की बिजली चमक उठी I मेरा बाल ह्रदय काँप उठा I उस चमक के साथ बादलों की गड़गड़ाहट ने मुझे कुछ पल के लिए भयभीत कर दिया था I लेकिन उसी पल बिजली की चमक से , गढ्ढे में गिरे बालक का चेहरा दिखा I चेहरे को देखकर मेरे शरीर में कंपकंपी -सी दौड़ गयी I वो बालक कोई और न था ,मेरा छोटा भाई ही था I बिना समय गवाएं मैंने उसे पास पड़ी एक पेड़ की डाली की सहायता से बाहर निकालने की कोशिश करने लगा किन्तु बारिश के कारण गढ्ढे के चारों ओर कीचड़ फ़ैल गया था I दो -तीन बार तो मैं भी फिसलते -फिसलते संभला लेकिन काफी प्रयत्न के बाद उसे बाहर निकालने में सफल हुआ और बाहर आते ही मेरा छोटा भाई मुझसे लिपट -लिपट कर रोने लगा I उसे रोता देख मैं भी रोने लगा Iफिर हम दोनों घर की ओर चल पड़े Iइतने में झमाझम बारिश होने लगी I उस बारिश में हमारे आंसू भी धुल गए I

घर पहुंचने से पहले ही हम् दोनों भाइयों ने इस घटना को किसी से न कहने का निश्चय किया क्योंकि पिटाई का डर था, साथ ही हमारे खेलने -कूदने पर भी पाबन्दी लग सकती थी I जब मैंने डिग्री की पढ़ाई पूरी कर ली , तब एक दिन इस घटना को ,मैंने अपने पिताजी को बताया I उन्होंने अपनी डब -डबी नेत्रों से मेरी ओर देखते हुए कहा ,"बेटा कर भला तो हो भला "I बगल में माताजी भी खड़ी थीं I इस घटना को सुनने के बाद मेरी मां दौड़कर पूजा घर में ईश्वर को धन्यवाद देने चली गयी , फिर बाद में सजल नेत्रों से हम दोनों भाइयों को गले से लगा लिया I आज जब तूफ़ान की वजह से बारिश होते देखकर -बारिश की एक शाम की यह घटना स्मरण हो आई है ,तो काफी सुखद आश्चर्य के साथ -साथ अपने बाल -साहस पर गर्व भी होता हैI मेरे प्रिय पाठकगण, अब जब कभी भी बारिश होगी ,आपको मेरी यह कथा स्मरण हो आएगी I


“आयपिल्ला श्रीनिवास "मास्टर जी'

(AYAPILLA . SRINIVAS “master jee)

Quarter no. B-258, DEEPANJALI NAGAR ,

NTPC ,SIMHADRI VISAKHAPATNAM-531020

ANDHRA PRADESH

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  1. बेनामी3:35 pm

    वाह इन्ही रचनाओ की वजह से इन्सानियत जिन्दा है

    उत्तर देंहटाएं

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