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संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 119 : बहुत याद आती हैं बीजी .. // डॉ प्रवीण चोपड़ा

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प्रविष्टि क्र. 119 बहुत याद आती हैं बीजी .. डॉ. प्रवीण चोपड़ा कुछ दिन पहले मैं मोबाइल में बीजी (मेरी मां) की एक साल पुरानी तस्वीरें देख रहा ...

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प्रविष्टि क्र. 119

बहुत याद आती हैं बीजी ..

डॉ. प्रवीण चोपड़ा

कुछ दिन पहले मैं मोबाइल में बीजी (मेरी मां) की एक साल पुरानी तस्वीरें देख रहा था। पिछले साल इन दिनों भली-चंगी ही तो थीं ..बस, एक दिन उठीं पिछले मार्च की ही बात थी ..सुबह उठ कर हमारी राम राम हुई। अच्छे से याद नहीं कि उन्होंने मुझ से पूछा या मैंने पूछा कि चाय बनाऊं। जो भी था, मुझे लगा कि वह बहुत ऊंचा बोल रही थीं। इतने में उन्होंने मुझ से कुछ बात पूछी, मैंने वैसी ही सहजता से जवाब दिया .. उन्होंने मुझे फिर कहा कि ऊचा बोल, प्रवीण, तुम इतना धीमा क्यों बोल रहे हो? मैंने कहा - बीजी, मैं तो धीमा नहीं बोल रहा हूं।

लेकिन चंद लम्हों में ही उन्हें यह आभास हो गया कि उन के गले से आवाज़ ही नहीं निकल रही। मैं उस समय होने वाले उन की हताशा कभी नहीं भूलूंगा कि कैसे वह मुझे ऊंची आवाज़ में कह रही थीं कि मेरी तो गले से आवाज़ ही बाहर नहीं निकल रही।

मैं भी डर सा लगा। मैं और बीजी घर में अकेले थे। सुनने की दिक्कत तो उन्हें पहले से ही थी। लेकिन उस वक्त ही यह पता चल गया कि अब तो दोनों कानों से ही सुनना बिल्कुल बंद सा ही है। चूंकि वह अपने मुंह से निकली बात सुन नहीं पा रही थीं, इसलिए उन्हें बार बार यही लग रहा था कि उन का आवाज़ तो गले में ही अटक गई है..

मैंने कान-नाक-गले के विशेषज्ञ डाक्टर को फोन लगाया। उसने कहा कि अस्पताल ले आइएगा, ऑडियोमिट्री जांच के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। मैंने कहा कि कान की फलां फलां दवाई पड़ी है, तो उन्होंने कहा कि हां, एक गोली दे दो. बीवी ट्रेन में सफ़र कर रही थीं, उन्होंने कहा कि गुनगुने पानी से गरारे करने को दीजिए। वैसा ही किया। उसी वक्त ही मुझे यह आभास हो गया कि मैं तो मां की सारी बातें सुन रहा हूं लेकिन समस्या यह थी कि इन तक अपनी बात कैसे पहुंचाऊं।

उन २०-३० मिनटों में ही मैंने मां को बड़ा डरा हुआ पाया। तब मुझे एक तरकीब सूझी कि मैं इन्हें लिख कर सारी बात बता दूं। वही किया। एक पन्ने पर मैंने सारी बात लिख दी कि यह इसलिए हो रहा है कि आप के कान बंद हैं, उन्हें मैंने इत्मीनान रखने को कहा कि आप चिंता मत करिए, बस, आप को लग ही रहा है कि आप की आवाज़ गले में दब रही है, बाहर नहीं निकल रही है। मैंने उन्हें लिख कर ही बताया कि मैं उन की सभी बातें अच्छे से सुन रहा हूं, इसलिए उन्हें पूरे ज़ोर से ऊंची आवाज़ में बोलने की कोई ज़रूरत नहीं है, वह आराम से बोल सकती हैं। मैंने यह भी लिखा कि ईएऩटी डाक्टर से बात की है, उन्होंन एक टेबलेट लेने को और गुनगुने पानी से गरारे करने को कहा है। मेरी बात वह मान गईं और मैंने कहा कि आप चिंता मत करिए, आज सुबह ही अस्पताल में चल कर पूरी जांच करा लेंगे।

मेरी इस चिट्ठी से उन्हें थोड़ा सुकून तो मिला लेकिन फिर भी वह बार बार बहुत ज़्यादा ज़ोर लगा कर गला साफ़ कर रही थीं क्योंकि उन्हें यही लग रहा था कि गले से आवाज़ नहीं निकल रही, इसलिए कुछ तो इस में अटक ही गया है।

फिर वह कुछ समय के लिए ऊंची ऊंची आवाज़ में सिमरन करने लगीं. बहुत ही ऊंची आवाज़ में...और स्टील का गिलास बेड के पास रखी छोटी टेबल से टकरा कर कुछ चेक करने की कोशिश करने लगीं। यह गिलास को मेज पर हल्के से टकरा कर शोर करने वाला काम तो बीजी पहले भी कभी कभी करती थीं, मना करने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था।

लो जी, दिन चढ़ गया । मैं और बीजी ईएनटी डाक्टर के पास पहुंच गये। उसने ऑडियोमिट्री की और बता दिया कि यह तो इस उम्र की एक आम समस्या है। दोनों कानों की श्रवण-शक्ति लगभग खत्म ही समझ लीजिए। एक तरह से उस ने जवाब ही दे दिया था, कुछ दवाई दे तो दी ऐसे ही दिलासे के लिए और कहा कि कुछ दिन बाद देखते हैं, अगर कुछ सुधार होता है तो एक कान की मशीन लगाने के लिए बताएंगे।

उस दिन यह भी पता चला कि किस तरह से एक अंग में भी जब कुछ गड़बड़ी आ जाए तो कैसे किसी की सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती है!

उस दिन ड्यूटी पर चला तो गया लेकिन मन नहीं लग रहा था, बड़ी बहन का भी फोन आया कि बीजी को फोन लगा रही हूं, वह उठा ही नहीं रही हैं...पहले भी कम सुनने वाली दिक्कत तो थी ही लेकिन जैसा कि मैंने पहले ही बता दिया कि उस दिन तो सुनना लगभग बंद ही था...मैंने बहन को उन की तकलीफ़ के बारे में बताया .. और तसल्ली भी दी कि वह चिंता मत करें ...ठीक हो जायेंगी यह दिक्कत कुछ दिनों में।

शाम के वक्त मैं मां को एक कान की मशीन वाली दुकान में ले गया ..लखनऊ की मशहूर दुकान है ... वहां मां की ऑडियोमिट्री भी फिर से करवाई ...वही रिज़ल्ट .. उसने कहा कि एक सप्ताह बाद देखते हैं अगर कुछ थोड़ा सा भी सुधार हुआ तो सुनने वाली मशीन लगाएंगे...

यहां यह भी बताना चाहूंगा कि सुनने वाली मशीन तो मां ने पिछले तीन-चार साल से लगवा रखी थी ... लेकिन उन की शिकायत थी कि उसे लगाते ही ज़ोर ज़ोर से आवाज़ें आने लगती हैं....दो चार बार दिखाया भी ..लेकिन कुछ खास ठीक हुई नहीं यह तकलीफ़, और मां ने भी जैसे इस बात से समझौता ही कर लिया कि अब सुनेगा कम ही ... बस, ऐसे ही बढ़िया कट रही थी ... मुझे कईं बार बात फिर से रिपीट करनी पड़ती थी बिल्कुल उन के पास जा कर ...वैसे भी मां को मेरे से प्यार भरी शिकायत थी कि मैं थोड़ा जल्दी जल्दी बोलता हूं... अफसोस मैं अपनी आदत बदल न पाया ..लेकिन मैंने अपनी तरफ़ से उस का भी एक जुगाड़ कर रखा था ...

मैंने जब मैं से कुछ बातें कहनी होती थीं तो मैं एक कागज़ पर लिख कर मां को दे देता था ..मां उसे पढ़तीं, और मैं वापिस लेकर उसे फाड़ देता ...यह पाती केवल मां की आंखों के लिए ही होती थी...मां भी बहुत बार उस का जवाब मुझे लिख कर ही दिया करतीं ...जिसे मैं पढ़ कर उसी समय फाड़ दिया करता ...

मां भी कैसी होती है ...वह मुझे कईं बार कहतीं कि बिल्ले, तेरा कोई भी कागज़ फाड़ने का मेरा बिल्कुल मन नहीं करता..तू इतना सुंदर लिखता है!!

हां, तो एक साल पहले की बातें चल रही थीं....उस दिन हम लोग लखनऊ के लालबाग से ऑडियोमेट्री करवा के बाहर आ रहे थे .. उस माहिर ने भी कहा कि इस के लिए कुछ दवाईयां होती तो हैं ..लेकिन ...इस उम्र में इतनी सख्त दवाईयां पता नहीं ये बर्दाश्त कर भी पाएंगी या नहीं।

बाहर निकलते निकलते शाम के ७-७.३० का समय हो चुका था .. बहुत बार शहर में भारी ट्रैफिक, लखनऊ में जगह जगह मेट्रो की खुदाई और लगभग हर बाज़ार में पार्किंग की चिकचिक के चलते मैं और बीजी स्कूटर पर ही निकला करते थे ... सुबह शाम जब भी भीड़भाड़ कम होती थी तो कार से मां को सत्संग या डाक्टर के पास लेकर जाता था .. और बहुत बार हम लोग ओला या ऊबर कर लिया करते ... हां, तो ऑडियोमिट्री करवाने के बाद मैंने सोचा कि चलते हैं मां को किसी बड़े ईएनटी रोग विशेषज्ञ को भी दिखाया जाए .. एक ऐसे विशेषज्ञ के पास मैं मां को पहले भी लेकर जाता था ...वह लखनऊ का बहुत बड़ा ईएनटी विशेषज्ञ है....बुज़ुर्ग है, बड़ा काबिल भी है ... लेकिन उस के क्लीनिक की व्यवस्था के बारे में मां घर आ कर बहुत हंसती थी .. दरअसल उस के यहां कोई स्टॉफ नहीं है, एक चौकीदार दिखने वाला शख्स उस का शटर खोल देता है, औज़ार भी वही चौकीदार ही धोता है ... और वह डाक्टर मरीज़ से फीस खुद ही लेता है .. पहले चार सौ रूपये थी, फिर पांच सौ रूपये हो गई ... और हर बार शर्ट की ऊपरी जेब से पैसे निकाल कर उस में पांच सौ के नये नोट को जोड़ना ...और फिर थोड़ा सा उन नोटों को थोड़ा करीने से लगा कर वापिस जेब में सरकाना ....मां को तो बस उस की यह बात हास्यास्पद लगती थी ...घर आते ही इतनी हंसती और कहती कि डाक्टर भी अच्छा है, किसी स्टॉफ की कोई सिरदर्दी नहीं और बिल्कुल एक आम दुकानदार की तरह पैसे लेता है और गल्ले की जगह जेब में दबा देता है ... और कईं बार तो मुझे कहतीं - “तुम भी रिटायर होने के बाद कुछ ऐसा ही काम करना ... तेरे को अच्छा लगेगा! ” मां की बात पर मैं हंस देता। ...

हां, उस ईएऩटी रोग विशेषज्ञ ने मां को देखा, ऑडियोमिट्री की रिपोर्ट देखी ...और कुछ दवाईयां लिखीं... जो उसी दिन से मां ने लेनी शुरू कर दीं.. दवाईंयां थोड़ी स्ट्रांग किस्म की तो थीं...मां की उम्र के लिहाज़ से हिसाब से तो बिल्कुल ....लेकिन मां नियमित उन्हें लेती रहीं....डाक्टर ने कहा था कि पंद्रह दिन बाद फिर से ऑडियोमिट्री करवा के देखेंगे ...और अगर कुछ सुधार लगेगा तो किसी बढ़िया मशीन की मदद से कुछ काम तो चलने लगेगा।

कुछ ही दिनों में मां थोड़ा थोड़ा सुनने लगीं ... जितना भी सुन लेतीं उसी में भी ईश्वर का शुकराना करते ना थकतीं...मुझे कहतीं कि अगर इतना भी सुन न पाऊं तो ईश्वर के क्या टक्कर लूंगी? ..ईश्वर का हर पल शुकराना करना होता है, जो घड़ी बीत रही है ..मुबारक घड़ी है…इस के साथ ही अपना एक भजन गुनगुनाने लगतीं.. “घड़ी सुहानी बीत रही ऐ, आवेगी सो चंगी ऐ”(जो घड़ी बीत रही है बहुत बढ़िया बीत रही है और आने वाला पल भी मुबारक होगा !)

दो तीन हफ्ते दवाईयां चलीं...मां ने नियम से खाईं ...फिर ऑडियोमिट्री हुई, कुछ सुधार दिखा और एक मशीन भी लग गई ...लेकिन कुछ ही दिनों में उस मशीन से भी मां का मन उचाट हो गया ...यही कहतीं कि ठीक है ना, इतने वर्षों से शरीर रूपी मशीन चल रही है, कुछ न कुछ तो लगा ही रहता है ...मां को तो बस इसी बार की तसल्ली थी कि कुछ तो सुन रहा है, मेरा काम चल रहा है ...और मैंने भी मां को कभी इस बात की कमी महसूस नहीं होने दी कि उन की सुनने की शक्ति कम होने से हमारी बातचीत कम हो जायेगी ...मैंने अभी आप को बताया कि मैं लिख कर मां से पूरी बात कर लेता ... हां, एक बात का मलाल है कि मां को कभी कुछ बात कहता तो ज़ाहिर है उन्हें पहली बार पूरी समझ नहीं आतीं, मुझे कईं बार दोहरानी पड़ती ... और कईं बार बिल्कुल उन के कान के पास जा कर ... मेरे चेहरे पर कभी कभी झुंझलाहट दिखने लगती....इसे भांप कर मां कहती कि चल अब रहने दे, मैंने समझ ली है ...और फिर भी मैं कागज़ और कलम उठाने की तरफ़ लपकता तो झट से कह दिया करतीं ....हुन छड़्ड वी, ऐवें ऐन्नी तकलीफ़ करदां ऐं (अब छोड़ भी, यूं ही तुम इतनी तकलीफ़ उठाते हो)..लेकिन मैं लिख कर ज़रूर मां को देता, मुझे भी तभी चैन पड़ता।

मां को बस यह लगता रहता कि वह मुझे बहुत तकलीफ़ दे रही हैं...मां कहती कि तैनूं मेरा सारा स्यापा करना पैंदा (तुझे ही मेरा सारा स्यापा करना पड़ता है!) ...यह सुन कर मैं मां को प्यार से झिड़क भी देता कि वह ऐसी बातें मत किया करें।

प्यार भरी झिड़की से ध्यान आया कि बच्चे तो जिस भी उम्र के हो जाएं मां-बाप के लिए बच्चे ही रहते हैं....लेकिन मुझे कईं सालों से यही लगने लगा था जैसे मेरी मां मेरी सब से बड़ी बहन ही हैं ...सच कह रहा हूं...

हां, तो पिछले साल मार्च के ही महीने में मां कुछ हल्की हल्की सी लगने लगी ... मां अकसर कहतीं कि मां के सूट की बाजू और ब्लाउज़ खुले हो गये हैं... ऐसे ही लगा कि मां थोड़ा कम ही खाती हैं, सुबह शाम अपनी शारीरिक क्षमता के मुताबिक थोड़ा टहल भी लेती हैं ..शायद उसी की वजह से वज़न थोड़ा कम हो गया होगा ... बात आई गई हो जाती ..

कुछ दिनों के बाद मुझे भी लगा कि मां थोड़ी लिस्सी सी लग रही हैं (पंजाबी में कमज़ोर सा दिखने को हम लिस्सा लगना कहते हैं)...वजन भी किया तो आया ७१ किलो... मुझे याद है कि पिछले कईं वर्षों से मां का वज़न तो ७५-७६ किलो पर ही टिका हुआ था .. मां को स्टेशन पर वजन करने का बहुत शौक था ... और उस की पिछली तरफ़ वाली भविष्यवाणी पढ़ कर भी उसे बहुत मज़ा आता ....और उस टिकट के ऊपर अपने हाथों से तारीख लिख कर संभाल लिया करती थीं...कुछ दिन पहले मैं मां की अलमारी देख रहा था तो उसमें बीस साल पुरानी वज़न की मशीन से निकलने वाली बहुत सी टिकटें भी मुझे मिलीं।

हां, तो जब मैंने देखा कि वज़न तीन चार किलो कम है तो उन्हें एक अनुभवी एवं बुज़ुर्ग डाक्टर जो मैडीकल कॉलेज के प्रोफैसर के पद से रिटायर हैं, उन के पास ले गया....मां के ब्लड-प्रेशर आदि का इलाज उन्हीं से ही चल रहा था...उन्होंने कुछ रक्त की जांच करवाईं और पता चला कि मैं को मधुमेह की तकलीफ़ ने जकड़ लिया है ..लेकिन मां बिल्कुल मस्त-मौला ...हर बात का सकारात्मक पहलू टटोलने में दक्ष....कहने लगीं कि नियमित योगाभ्यास और खाने पीने की आदतों में सुधार कर के दुरुस्त कर लूंगी ...कोई फ़िक्र की बात नहीं ...फिर भी उस डाक्टर की सलाह के मुताबिक मां ने दवाई तो शुरू कर ही दी... मधुमेह के लिए ...कुछ ही दिनों में दवाईयों की वजह से कंट्रोल भी हो गया ..

हां, तो उस जर्नल फ़िजिशियन के पास मैं और मां वैसे भी दो एक महीने के बाद हो आते थे ...और वहां जाने पर सब से पहले तो उन का कंपाउंडर वजन लेता और ब्लड-प्रेशर को नापता.. यही पिछले साल मई-वई की बात है हम वहां गये तो वज़न आया ६९ किलोग्राम ...

मां का वजन लगातार कम हो रहा था ..चिंता हुई .. डाक्टर को भी कहा ...वह बोलता बहुत कम है, कुछ पूछो तो हल्की सी आवाज़ में ही जवाब देता है .. और मैंने जब भी उस के पास मां को ले कर जाना होता, पहले ही मां को कह देता कि वह अपने शब्दों में लिखें कि उन्हें डाक्टर को क्या कहना है .. वह घर पर ही एक कागज़ पर इत्मीनान से कुछ लिख देतीं और मैं उसी बात को अक्षरशः इंगलिश में लिख कर डाक्टर को दे देता...उन की तकलीफ़ समझने में उस से मदद मिलती।

याद आ रहा है ...अप्रैल मई के आस पास मां ने जब यह कहना शुरू किया कि उन्हें पेट में बाईं तरफ़ दर्द होता है तो डाक्टर को भी यही लगा होगा कि यह वाला दर्द दिल से संबंधित ही होगा ...दर्द पीठ पीछे भी जाता था .. उन्होंने ईसीजी करवाई, ठीक थी... उन्होंने हाजमे वाली कुछ गोलियां, कुछ खाली पेट लेने वाले ऐन्टासिड लेने को कहा ....कुछ दिन थोड़ा आराम सा रहा ...लेकिन उस पेट वाले दर्द से मां परेशान ही दिखतीं अकसर ....मुझे पता है वह ज़्यादा बताती नहीं थीं, उन्होंने इस बात की ज़्यादा फ़िक्र थी कि मैं उन की तकलीफ़ के बारे में बहुत सोचता हूं।

बस, जब देखो मां गर्म पानी की बोतल से पेट की सिकाई कर रही होती...और बहुत बार तो उस बिजली से चलने वाले गर्म पैड से भी पेट और पीठ सेक लिया करतीं।

कुछ दिनों बाद फिर देखा तो मां का वजन ६६ तक पहुंच गया था ... किसी विशेषज्ञ ने कहा कि डॉयबीटीज़ की जो टेबलेट वह खाती हैं उस की वजह से भी किसी किसी मरीज़ का इस तरह से वजन घटने लगता है ...चूंकि जिस विशेषज्ञ का इलाज चल रहा था, मुझे और मेरी मां को उस पर ज़्यादा भरोसा था ...और उन्होंने इस तरह की कोई बात नहीं कही थी, ऐसे में दवाई बदलने का तो विचार कभी नहीं आया ...वैसे भी उस दवाई से उन का मधुमेह कंट्रोल में ही रह रहा था।

हां, तो वजन निरंतर घटने की बात जब उस रिटायर प्रोफैसर साहब से की ... तो उन्होंने यही कहा कि कुछ टैस्ट करवा लेते हैं... देखते हैं... वैसे तो शूगर के कंट्रोल न होने की वजह से ही होता है ऐसा ..लेकिन उसने कहा कि देखते हैं। रक्त की बहुत सी जांचें हुईं...एक बढ़िया लैब से सभी टैस्ट करवाए... रिपोर्ट देख कर ब्लड़ में कुछ गड़बड़ी दिखी ...जिस तरह की गड़बड़ी ब्लड-कैंसर में होती है ... ऐसा कुछ लिखा नहीं था स्पष्टता से .. लेकिन मेरे तो होश उड़ गये उस रिपोर्ट को देखते ही ... क्योंकि मां की उम्र के लोगों में इस तरह के कैंसर अकसर अपनी गिरफ्त में ले लेते है।

अगले दिन सुबह ही मैं मां को लेकर उस विशेषज्ञ के पास गया ... उसने कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है...थायराड की जांच भी ठीक है .. उस की बात सुन कर जान में जान आई ...अनुभवी डाक्टर की यही तो खूबी होती है .. बस, उसने इतना ही कहा कि देखते हैं एक महीने बाद ... शूगर के कंट्रोल न होने की वजह से भी वज़न घट सकता है ..मुझे भी यही लगा क्योंकि शूगर का स्तर थोड़ा बढ़ा हुआ ही आया था, इसलिए डाक्टर साहब ने एक आधी टेबलेट रात में भी लेने को कह दिया।

आस पर दुनिया टिकी हुई है ...और मैं और मां भी उसी किल्ली से टंगे रहे।

लेकिन वज़न तो गिर ही रहा था .. देखते देखते ६४-६५ किलो हो गया ....याद आ रहा है मेरा कॉलेज में पढ़ने वाला बेटा जब घर आया तो मां उस के साथ खड़ी हो कर कहती हैं ...हंसते हंसते - “देखयो, भई, किते मैं ईंज लिस्सी हुंदे हुंदे गायब ही न हो जावां !” ( देखना, भई, कहीं मैं कमज़ोर होते होते गायब ही न हो जाऊं....)...मां की बात पर मैं हंस तो पड़ा लेकिन मैं उन के गिरते वजन की वजह से मन ही मन बड़ा परेशान था ....मैं समझ नहीं पा रहा था कि हो क्या रहा है ।

मां में वह चुस्ती ही नहीं थी, हर समय थकी थकी सी रहती थीं....अपने कपड़े अलमारी में करीने से लगा कर या अपनी बुक-शेल्फ में किताबें सहेज कर ही थक जातीं थीं....मैं तो बस ईश्वर से यही प्रार्थना किया करता हर वक्त कि यह सब कुछ बस मधुमेह की वजह से ही हो ... मां को भूख भी कम लगने लगी।

हम लोगों का एक फ्लैट दिल्ली के पास वसुंधरा में है ...ऐसे ही लगा कि चलिए मां की हवा-पानी बदल कर आते हैं ...वहां एक हफ्ता रहे, वहां मेरी बड़ी बहन भी आ गईं जयपुर से, दिल्ली में पढ़ने वाला बेटा भी साथ था, उस के कॉलेज उन दिनों बंद थे ...कुल मिला कर एक हफ्ता रहे वहां .... लेकिन मां में वह चुस्ती नहीं थी ...कमज़ोरी तो जैसे जाने का नाम ही नहीं ले रही थी।

यह पिछले साल जून के महीने की बात है। हम एक सप्ताह वहां रुकने के बाद वापिस लखनऊ लौट आए।

मां के गिरते वज़न के चलते अब मैंने अपने अल्पज्ञान को इस्तेमाल करना शुरू किया ... कहीं टीबी ही ना हो, छाती का एक्सरे करवाया, ठीक ठाक रिपोर्ट आई ....जून की आखिरी तारीख में पेट का अल्ट्रासाउंड भी हुआ ...उस की रिपोर्ट भी बिल्कुल ठीक थी। कहीं कोई महिलाओं वाली अंदरूनी तकलीफ़ ही न हो, इसलिए स्त्रीरोग विशेषज्ञ से भी जांच करवा ली, सब सामान्य बताया गया।

मां कभी कभी यह भी शिकायत करतीं थीं कि पेट अच्छे से साफ़ नहीं होता ... कभी कभी पहले भी और उन गिरते वज़न वाले महीनों के दौरान तो बार बार मेरे मन में यह भी आता कि कहीं बड़ी आंत के कैंसर जैसी कोई नामुराद बीमारी ही ना हो ... फिर मैं अपने आप को समझा लिया करता कि वह तो अधिकतर नॉन-वेज खाने वाले लोगों की बीमारी है ..मां तो एकदम शाकाहारी!

अब मां भी चुप ही हो गई अपने गिरते वज़न के बारे में ..लेकिन मेरी चिंता उन दिनों भी लगातार बनी रही ...मुझे हमेशा डर लगा रहता था कि कहीं कोई लाइलाज रोग इस उम्र में मां को घेर न ले, इस फ़िक्र का बड़ा कारण यही था कि मधुमेह का कंट्रोल तो लगभग ठीक ठाक ही था....फिर भी वजन में निरंतर गिरावट किसी गंभीर समस्या का ही इशारा होता है।

इस के बावजूद मां का घर के सामने टहलना, अपनी सखी सहेलियों से गप्प-शप्प करना चल रहा था, एक दिन टहलने के बाद जब लौटी तो मुझे कहती हैं कि मिसिज दत्त कह रही थी कि आप बहुत कमज़ोर लग रही हो ...तो मां ने मुझे कहा कि मैंने उसे कहा कि थोडी मधुमेह की शिकायत हो गई है। मैंने भी कहा कि कोई बात नहीं, बीजी, सब ठीक हो जाएगा।

जुलाई-अगस्त आते आते सच बताऊं मुझे तो मां का वज़न करने में भी डर लगने लगा ...शायद तब तक ६२ किलोग्राम हो चुका था...ऊपर से मां को भूख बहुत कम लगती .... मां यही कहा करतीं कि भूख का तो यह आलम है कि मैं थोड़ा बहुत खा लेती हूं, अगर न भी खाऊं तो भी चल जाए! मां में वह पहले जैसी चुस्ती बिल्कुल न थी, यह बढ़ती उम्र के साथ कम होने वाली चुस्ती वाला केस किसी भी नज़रिये से नहीं लगता था, यह मेरा मन जानता था....कपड़ों को तह लगाते हुए मां हांफने लगती, कुछ समय के लिए खड़ा होना तक मां के लिए दुश्वार था...मां हंसते हंसते यह भी कह देती कि अब तो सिर पर कंघी करते हुए ही थक जाती हूं ...फिर भी - बल्ले बल्ले, बीजी की यह ज़िंदादिली, उन का सेंस ऑफ ह्यूमर हमेशा बना रहा .. शायद वह बच्चों के लिए उन्होंने सहेज कर रखा होगा, वरना बच्चे तो हौंसला ही हार जाएंगे।

अगस्त के महीने में मैंने सोचा कि मां के पाखाने (स्टूल टेस्ट) की जांच करवाई जाए ... यह कोलन कैंसर (बड़ी आंत के कैंसर) की जांच का एक जरिया होता है जिस में पाखाने की जांच के जरिये उस में दिखने वाले रक्त का पता लगाया जाता है ...जिसे स्टूल ओकूल्ट ब्लड जांच… कहते हैं ...एक जगह से करवाई ... टेस्ट की रिपोर्ट पॉज़िटिव आई ...मेरे तो होशोहवाश उड़ गये ...लेकिन मां को तो इस के बारे में बताने का सवाल ही नहीं था, उन्हें तो हमेशा यही लगता था कि उन के पेट में कीड़ें हैं ... उन की जांच हो जायेगी तो पता चल जायेगा।

हां, तो स्टूल-टैस्ट की रिपोर्ट पॉज़िटिव आने के बाद होश उड़ जाना तो स्वभाविक ही था ...मुझे यही लगने लगा कि अब मां तो बस कुछ समय की ही मेहमान है ... मैं उन दिनों मां के बेड-रूम में उन के साथ ही सोने लगा .. एक दो दिन बाद मैंने वही जांच एक बड़ी प्राईव्हेट लेब से भी करवाई ...उस में भी रिज़ल्ट पॉज़िटिव ही आया...मेरी तो जैसे जान ही निकल गई...बहुत ज़्यादा बेचैनी हुई ...थोड़ा शूगर-कोटिंग के साथ ये बातें बड़ी बहन को भी फोन पर बता दिया करता ताकि उन्हें भी मां की सेहत की जानकारी मिलती रहे।

इस दौरान मां को फोन से बात करना भी थोड़ा कठिन लगने लगा ...दरअसल बात वही है कि जब किसी की तबीयत ठीक न हो तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता...बस, मां वाट्सएप पर मैसेज कर देती थीं, मेरी बहन को, अपने पोतों को और कईं बार मुझे भी जब मैं घर से बाहर गया होता तो मां का वाट्सएप संदेश आता ...हां, जी महांपुरुषो, कब आ रहे हो?.... मैं उन्हें तुरंत जवाब लिख भेजता। वैसे तो मैं देरी होने की हालत में खुद ही मां को मैसेज कर दिया करता .. (मां मुझे महांपुरूष के नाम से पुकारती थी ...हिंदोस्तानी हर मां ऐसी ही होती हैं...इन की महानता ब्यां करने के लिए कभी कोई शब्द बनेंगे ही नहीं, बस इन के बच्चे ही जानते हैं कि यह बड़ी खास किस्म की मिट्टी की बनी होती हैं!) मां वाट्सएप पर कॉल करना भी सीख रही थीं .. कितना खुश होती थी वह नई नई चीज़ें सीख कर ...जब कभी वह घंटी सुन लेतीं तो फोन उठा लेतीं ....हां, जब वह स्वयं कॉल करतीं तो बात ज़रूर हो जाती।

हां, बात पाखाना जांच की हो रही थी ...मैं अगले दिन ही अकेला उस फ़िज़िशियन से मिलने चला गया जिस से मां का इलाज चल रहा था ..उसे रिपोर्ट दिखाईं...वह भी पूछने लगा कि शायद यह इकोस्प्रिन की वजह से पॉज़िटिव आ गया होगा ..दरअसल इकोस्पिन रक्त को पतला करने वाली टेबलेट होती है जो मां ले रही थीं...उन्होंने कहा कि इसे एक हफ्ते के लिए बंद कर के फिर से यह जांच करवाई जाए...उस के बाद देखेंगे ... मैंने वैसा ही किया ... एक हफ्ते बाद जांच हुई और उस की रिपोर्ट निगेटिव आई और मेरी जान में जान आई।

मन में परेशानी तो थी लगातार की जांचें सब ठीक हैं लेकिन मां है कि बस घिसती ही चली जा रही हैं...मां जो पहले बड़ी बहन की तरह लगती थी अब मुझे मेरी बेटी की तरह लगने लगी ...सच में मुझे वह मेरी प्यारी बेटी ही लगने लगी ...मैंने मां को लिख कर भी यह कईं बार कहा .. मां भी हंसने लगती खिलखिला कर ..

अब और जांचे क्या करवाते, बैठ गये चुपचाप! यह अगस्त महीने की ही बात है ... मैं रोज़ाना दोपहर सवा-डेढ़ बजे घर आता तो मां मेरी रोटियां सेंक रही मुझे मिलतीं ... एक दम कड़क रोटी खिलाती थीं मुझे ...उन्हें पता था मुझे बेहद पसंद है .. मेरे लिए ताज़ा आटा गूंथती ... हां, तो उस दिन मैं जैसे ही घर पहुंचा, मैं अभी पहुंचा ही था कि मां ने मेरे सामने गैस का चूल्हा बंद किया, तवे के ऊपर रोटी पड़ी हुई थी ..मां ने मुझे कहा- “बिल्ले, रोटी मैंने तवे पर डाल दी है, तुम देख लेना, मेरे से खड़ा नहीं हुआ जा रहा ..पेट और पीठ में दर्द की वजह से।” ...मां की आवाज़ थोड़ी रूआंसा हो चली थी। अपने कमरे में जाते जाते कहने लगीं- “अभी लेटूंगी तो ठीक हो जाऊंगी।”

रोटी तो मैंने क्या देखनी थी, मुझे तो मां की तबीयत देखनी थी ... बिस्तर पर जा कर लेट गईं, मैंने गर्म पानी की बोतल दी ...या शायद बिजली वाला पैड दिया....एक टेबलेट दी ... मां कुछ समय में ठीक ठाक हो गई ...लेकिन मेरे मन में खतरे की घंटी बज चुकी थी ...सिर्फ इसलिए कि जिस मां ने इतने सालों से बिना किसी छुट्टी के खिलाया-पिलाया, पाला-पोसा, बड़ा किया ...और उस का आज ऐसे रोटी तवे पर डाल कर गैस बंद कर देना, मतलब कुछ तो बड़ी बात है!

एक बात का ध्यान आ रहा है कि वैसे भी जब कभी सुबह उठ कर मां मुझे कहतीं कि चलो, प्रवीण, एक कप चाय तो पिलाओ। उस का मतलब भी यही होता कि आज मां की तबीयत नासाज़ है।

जैसा कि मैंने पहले भी लिखा कि मां की भूख तो बिल्कुल कम हो चुकी थी, वजन का हाल तो पहले ही बता चुका हूं ...हर समय की थकावट, कमज़ोरी और लेटे रहना...यह सब देख कर मुझे लगा कि क्यों न मां को लखनऊ की पीजीआई में ही दिखाया जाए.. मुझे लगा कि पेट के रोगों के विशेषज्ञ को ही दिखाया जाए।

एक दो दिन के बाद मैं मां को लेकर पीजीआई चला गया .... बड़ा भीड़-भड़क्का था ... लेकिन किसी को कह-कहलवा कर दो तीन घंटे में बारी आ ही गई ..गेस्ट्रोएन्ट्रोलॉजी विभाग में गये थे ..किसी ने पूछा कि किसी विशेष डाक्टर को दिखाना चाहेंगे, मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं थी, सब डाक्टर काबिल ही होते हैं ऐसी जगहों पर ...इसी लिए तो वे वहां तक पहुंच पाते हैं।

ड्यूटी पर एक जूनियर डाक्टर था ..लेकिन इन संस्थाओं के जूनियर डाक्टरों का काफ़ी अनुभव हो जाता है ..मां की तकलीफ़ें मैं मां से ही लिखवा कर ले गया था ..वे सुना दीं.. हां, एक बात तो मैं भूल ही गया था कि पिछले कुछ महीनों से मां का मुंह बिल्कुल कसैला-कड़वा सा रहने लगा था .. वह हर समय नींबू का एक टुकड़ा नमक लगा कर छिलके समेत मुंह में रखतीं...यह भी लिखा था उस पर्ची पर।

डाक्टर ने मां को एक बेंच पर लिटा कर पेट को टटोलना शुरू किया ..उसे बाईं तरफ़ एक गांठ सी महसूस हुई ...उसने मां के पर्चे पर कुछ लिखा ..अच्छे से बात की ...मां ने समझा कुछ दवाईयां लिख दी हैं, सब ठीक हो जायेगा...मां ने उसे आशीर्वाद दिया और उठने लगीं...उसने कहा कि ठीक है, ठीक है....अभी आपने जाना नहीं है, बाहर इंतज़ार करना है..उसने मुझे कहा कि कंसल्टैंट से भी इन के बारे में बात करनी होगी...आप बाहर इंतज़ार करिए...

हम लोग बाहर आ गये ...मां के लिए तो कुछ समय बैठ पाना भी मुश्किल होता था उन दिनों ...कभी पेट दबाने लगतीं, फिर कभी दर्द-निवारक टेबलेट खा लेतीं...मां से बैठा नहीं जा रहा था तो मां उस दिन बाहर बरामदे में ही जहां और लोग भी लेटे हुए थे ..वहीं लेट गईं...मुझे इस बात का अंदाज़ा था कि मां कितनी ज़्यादा दर्द में हैं...

दो तीन घंटे बाद आवाज़ पड़ गई...हम लोग अंदर गये ...हम कंसल्टेंट के कमरे में थे ..उसने भी मां को बेंच पर लिटा कर पेट टटोल कर चैक किया ...उस की और उस के जूनियर की बात से मुझे यही लगा कि कुछ गड़बड़ तो है ...उन्होंने कहा कि कुछ ब्लड की जांच करवाएं, कोलनोस्कोपी (बड़ी आंत की दूरबीन से होने वाली जांच) और पेट का एक रंगीन सीटी स्कैन भी करवाएं।

आते आते उस जूनियर डाक्टर ने मुझे इतना कह दिया कि हमें इन की आंत में एक गांठ होने का संदेह है ...साथ में उसने गोलियां लिखीं दर्द की ...दिन में चार बार लेने के लिए ...मां तो वैसे ही पूरी थक चुकी थीं, हम लोग घर आए ...मैं आकर मां के लिए मौसंमी का जूस बनाया और मां एक टेबलेट लेकर और गर्म पानी की बोतल लेकर लेट गई।

मां बड़ी शार्प तो ही थीं...मैंने भी हाव-भाव से कुछ पता नहीं चलने दिया कि डाक्टर ने क्या कहा है .. मैंने ऐसे ही कहा कि डाक्टर कहते हैं कि पेट में थोड़ी सूजन है, दवाईयां लेनी पडेंगी...वह मान गयीं मेरी बात मुझे ऐसा लगता है ...लेकिन थी तो वह मेरी भी मां... मुझे नहीं पता मां के मन में क्या क्या चल रहा था ...लेकिन इतना तो वह अकसर कहती थीं कि जो कान की सख्त दवाईयां खाई हैं न, यह सब उस का ही नतीजा है ... तुम देखना, एहतियात से, योग से और देसी, घरेलू नुस्खों से सब ठीक हो जायेगा .. मां तब तक सुबह उठ कर थोड़ा-बहुत प्राणायाम और योगासन करती थीं। मैंने मां को कहा कि सुबह आप ध्यान भी कर लिया करें...मां मान गई थी।

पी जी आई में रक्त की जांच का सेंपल तो हम लोग उसी दिन ही लौटते वक्त दे आये थे ....कोलनोस्कोपी टैस्ट तीन दिन बाद और सी टी स्कैन जांच आठ दस दिन बाद होनी थी।

इन दो तीन दिनों में विचार आया कि बाहर किसी दूसरे पेट के रोगों के विशेषज्ञ को दिखा लेता हूं ...लखनऊ के नामचीन डाक्टर के क्लीनिक पर गया भी ... समय भी ले आया ...लेकिन इच्छा ही नहीं हुई वहां जाने की .. और वहां से कोलनोस्कोपी जैसा टेस्ट करवाने की ...

बहरहाल, चिंता की वजह से वे दो चार दिन भी कुछ ज्‍यादा ही लंबे लग रहे थे ...मेरा किसी भी काम में मन नहीं लगता था..बस, यही लगता था कि मां के साथ ही ज़्यादा से ज़्यादा समझ बिताऊं ...उन के साथ ही सोया करूं...और ऐसा करता भी था।

कोलनोस्कोपी टैस्ट करवाने से पहले एक दिन पेट अच्छे से साफ़ करना होता है, उस के लिए कईं जग पानी जिस में पेट साफ़ करने वाली दवाई मिली रहती है, वह पीना होता है ...मां ने वह पानी पिया, पेट साफ़ भी हुआ और सुबह हम लोग कोलनोस्कोपी जांच के लिए पहुंच गये ... वे दोनों डाक्टर भी वहां मौजूद था ...पूछने लगे कि सीटी स्कैन हो गया आपका? …मैंने कहा- नहीं, अभी तो नहीं हुआ...दरअसल, डाक्टर लोगों को अंदर तक की खबर होती है, अब मैं सोचता हूं कि उन्हें लगा होगा अगर सीटी स्कैन की रिपोर्ट है तो उसमें तो सब कुछ आ ही गया होगा...खैर, उन्होंने कहा कि चलिए, कोलनोस्कोपी करते हैं...मां कोलनोस्कोपी कक्ष में चली गईं ...आधे घंटे बाद बाहर आईं...उस टेस्ट में आंतों के अंदर पहले गैस डालते हैं...टेस्ट के बाद सारी गैस निकल जाती है ..(इस टेस्ट में दूरबीन से बड़ी आंत के अंदरूनी हिस्सों को देखा जाता है)।

मां को उस दिन से यह इत्मीनान हो गया कि उन के पेट से बहुत मात्रा में गैस निकल गई है ...मां हैरान थी कि पता नहीं इतनी गैस आई कहां से....मैंने भी जानबूझ कर नहीं बताया कि यह गैस तो टैस्ट करते वक्त डाक्टरों ने ही अंदर भरी थी ...मैं चाहता था कि मां अगर हल्का महसूस कर रही है तो बहुत बढ़िया है।

शाम को मैं रिपोर्ट लेने गया .. डरता डरता ..सच में मैं बहुत डरा हुआ था ...लेकिन रिपोर्ट हाथ में लेकर जब उस का लिफ़ाफा खोला तो चैन की सांस आई...रिपोर्ट नार्मल थी।

उस दिन एक आस बंधी कि शायद सब कुछ ठीक ही हो ...ऐसे ही मां की कमज़ोरी मधुमेह या उम्र की वजह से ही हो ..... काश, ऐसा ही हो, मन में बार बार यही हूक उठ रही थी।

तीन चार दिन के बाद पेट का रंगीन सीटी स्कैन होना था ...सलाह दी गई कि क्यों इंतज़ार कर रहे हो, बाहर से या मेडीकल कॉलेज से करवा लो, लेकिन मेरा भरोसा लखनऊ के पीजीआई पर ही था ..उस का कारण यह भी था कि इतने लोगों को दिखाया, टेस्ट करवाये कोई मां का पेट तक तो टटोल नहीं पाया और वहां एक जूनियर डाक्टर ने पेट टटोल कर तुरंत गांठ होने की बात कह दी ...

यह बात पिछली सितंबर के पहले हफ्ते की है ...मैं और मां सीटी स्कैन करवाने गये ...जैसा पीजीआई के डाक्टर ने कहा था कि सीटी स्कैन से पहले रक्त की जांच जैसे सीरम क्रिएटिनीन आदि करवा के आना है...हम लोग करवा के ले गये थे...उन का रिजल्ट नार्मल ही था...वहां मां को एक डाई (कंट्रास्ट मीडिया) का इंजेक्शन दिया गया ...और सीटी स्कैन हो गया ...बीच में विशेषज्ञ ने कहा कि पेट अच्छे से साफ़ नहीं है ...एनीमा करवाना होगा ...हम लोग साथ वाले कमरे में गये ..वहां अस्पताल कर्मचारियों ने मां को एनीमा करवाया ...उस के बाद मां ने गीली सलवार ही पहनी रखी ... मुझे बड़ा महसूस हुआ ...मां अपने पहनावे के बारे में बड़ी सचेत रहती थीं लेकिन अब मजबूरी वश यह गीली सलवार पहन कर वापिस सीटी स्केन वाले कमरे में पहुंच गईं...मैं बाहर से देख रहा था कि डाक्टर अपने कक्ष से स्पीकर से उन्हें कुछ कह रहा था, लेकिन ज़ाहिर सी बात है वह सुन नहीं पा रही थी ....मैंने डाक्टर से कहा कि उन्हें सुनने में दिक्कत है ...उसने मुझे कहा कि आप अंदर जाइए और इन्हें सांस रोकने के लिए कहिए।

मैं अंदर गया ... कान के पास जा कर उन्हें वैसे ही कहा...और मुझे फिर बाहर आने के लिए कहा गया ...दो मिनट में मां भी बाहर आ गईं... मां ने सुबह से कुछ खाया नहीं था...चाय और बिस्कुट साथ ले गये थे...मां ने वह थोड़ा लिया ...हम लोग घर लौट आए ..कहा गया कि रिपोर्ट तीन दिन बाद मिलेगी ....बीच में एक शनिवार-रविवार आता था।

पीजीआई में किसी से कोई गिला शिकवा करने का तो कोई कारण ही नहीं है कि वे रिपोर्ट इतनी देर से देते हैं या टेस्ट देरी से होते हैं ....मैंने सीटी स्कैन की रिपोर्ट लिखते वहां कुछ विशेषज्ञों को देखा था ... सच बताऊं यह इतनी ज़िम्मेवारी वाला काम होता है कि एक बडे़ उस्ताद के साथ कुछ जूनियर डाक्टर भी बैठे होते हैं...मुझे हमेशा से लगता है कि वे ऐसे बड़े मेडीकल संस्थानों के माहिर डाक्टर जब कोई रिपोर्ट लिखते हैं तो वे सेहत के बारे में सुप्रीम कोर्ट जैसा फैसला लिख रहे होते हैं .... सीटी स्कैन करवा कर बाहर लौटते वक्त मैंने माहिर से नहीं पूछा कि उसे क्या मिला ....अगर मैं अपनी पहचान बता देता तो वह मुझे ज़रूर बता ही देते, मैंने यह इसलिए नहीं किया क्योंकि एक तो मेरा यह मानना है कि इस तरह की हरकतें उन की व्यवस्था में खलल डालती हैं ... वहां तो भई एक मरीज़ के सी टी स्कैन वाले कक्ष से बाहर निकलने से पहले ही दूसरा अंदर जाने की इंतज़ार कर रहा होता है ... और दूसरा, यह भी कि फाइनल रिपोर्ट लिखने से पहले ये लोग कुछ मेडीकल लिचरेटर या अपने से सीनियर लोगों से भी सलाह मशविरा करते होंगे ...जैसा कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच करती हैं...बिल्कुल वैसा ही।

हां, एक बात तो मैं कहना भूल ही गया .. सीटी स्कैन से पहले एक जूनियर डाक्टर मरीज की हिस्ट्री लेता है...जैसा कि मैं पहले भी लिख चुका हूं कि वज़न कम होने का, भूख न लगने का अब तक कारण तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, कोलनोस्कोपी की रिपोर्ट भी नार्मल थी ...लेकिन पेट में गांठ भी डाक्टरों ने टटोल ली थी...इसलिए मुझे मन ही मन यही लगने लगा कि ईश्वर करे कि यह जो गांठ है यह पेट की टीबी की वजह से ही हो....इसलिए, उस दिन वह जूनियर डाक्टर जब मां कि हिस्ट्री ले रहा था तो मैंने जांच का रुख एक तरह से बदलने की नाकाम कोशिश करते हुए उसे यह भी बताना ज़रूरी समझा कि मां के परिवार में टीबी की भी फैमिली हिस्ट्री है। पता नहीं ३५ साल पुरानी बात का क्या औचित्य था वहां कहने का ...लेकिन मैंने कहा। बस, मेरी तो जैसे यही मुराद थी कि यह गांठ टी बी की वजह से ही हो ...क्योंकि मुझे लगता था कि टीबी की गांठ तो दवाई से गायब हो जायेगी ...और मां की उम्र को देखते हुए उन्हें टीबी की थोड़ी हल्की दवाईयां ही तो दी जाएंगी।

हां, यह सब सोचते बुनते हम लोग घर आ गये ...मैं ही ज़्यादा सोच रहा था ..मां तो वैसे ही सुस्त सी लग रही थीं.. थकी-मांदी सी लेकिन हारी हुई बिल्कुल नहीं।

हां, एक बात और ... जब अपना मन अच्छा न हो तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता, मरीज़ को भी नहीं और उसके तीमारदार को भी नहीं ...जब से मां की तबीयत खराब होने का रिश्तेदारों को पता चला था...बार बार उन के फोन आने से बड़ी कुढ़न होती थी ...कि यार, जांच चल तो रही है, देखते हैं क्या निकलता है ... करेंगे मुकाबला....लेकिन उन्हें तो यह सब कहां कहना होता है ...मुख्तसर सी बात कर के पल्ला छुड़ा लिया जाता था।

सी टी स्कैन की रिपोर्ट तीन दिन बाद मिलनी थी ... बीच में शनिवार-रविवार आ रहा था ...शुक्रवार को हुए टेस्ट की रिपोर्ट मंगलवार के दिन सुबह मिलनी थी .. लेकिन मैं बाद दोपहर ही गया ... मुझे वहां अकेले जाते हुए बड़ा डर लग रहा था ... मुझे लग रहा था कि मां के मुकद्दर का फैसला होने वाला है ...मैं रास्ते में भी यही दुआ कर रहा था कि ईश्वर करे यह रिपोर्ट ठीक ठाक ही हो ...उन पेट के विशेषज्ञों को गांठ टटोलने में टपला लगा हो ...जब कि मन में मुझे पता था कि ऐसी गल्तियां इतने बड़े माहिरों से होती नहीं हैं...अजीब किस्म की बेचैनी थी उस दिन मेरे मन में ... मैं यह सोच कर कांप रहा था कि अगर मां को कोई भयंकर बीमारी हो गई तो हम लोगों का क्या होगा, मां का क्या होगा....इसी उधेड़-बुन में कब मैं अपने स्कूटर को ठेलता पीजीआई पहुंच गया पता ही नहीं चला ..

जहां पर सी टी स्कैन हुआ था, उस विभाग की रिसेप्शन से रिपोर्ट ली ....पास में रखी एक कुर्सी पर बैठ कर रिपोर्ट देखी .. रिपोर्ट देखते ही मेरे तो होश उड़ गये ...अग्न्याशय (पैनक्रियाज़) में एक रसौली जैसी गांठ की बात, और इस के साथ लिवर में भी और बाईं तरफ़ की एडरिनल ग्रंथी में भी और फेफड़ों के निचले हिस्सों में भी कुछ गड़बड़ी ....

देखते ही मैं समझ तो गया कि दाल में कुछ काला नहीं है, पूरी की पूरी दाल ही काली है ..लेकिन ईश्वर हिम्मत भी देता है ...मैंने भी हिम्मत से काम लिया ... घर आया ...मां को बताया - बीजी, रिपोर्ट ठीक है, बस थोड़ी सी सूजन है, दवाईयों से ठीक हो जायेगी .. मस्त रहिए।

मेरा मन तो बिल्कुल बैठा हुआ था लेकिन मां को मैंने कभी इस की भनक नहीं लगने दी...क्योंकि मुझे यह भी पता था कि मां को अपनी शारीरिक तकलीफ़ से परेशानी कम लेकिन मेरी तकलीफ़ उन्हें ज़्यादा परेशान कर देती है, हिंदोस्तानी हर मां की तरह .. और वह यह झट से भांप भी लेती हैं ..मां तो आखिर मां ही ठहरी!

एक बात मैंने उन दिनों यह अनुभव की कि हम दूसरे लोगों की बीमारी के लिए जितनी फ़ुर्ती से गूगल से कुछ भी पूछने की हिम्मत रखते हैं, अपनों के लिए वह हिम्मत गायब हो जाती है ...खौफ़ में तबदील हो जाती है ..पता नहीं गूगल क्या कह दे! और वैसे भी मन में यही आता है कि इलाज गूगल से तो करवाना नहीं है, विषय के माहिर ही बताएंगे और उन की ही मानेंगे ..

लो जी फैसले की खड़ी भी आ गई .. मैं और बीजी दो दिन बाद शायद सितंबर की १४ तारीख थी उस दिन पहुंच गये पीजीआई लखनऊ के उसी विशेषज्ञ के पास..सभी रिपोर्ट ले कर...जूनियर डाक्टर ने रिपोर्ट देखीं और बाहर रूकने के लिए ...कहा कि कंसल्टैंट को भी दिखाएंगे ...आप बैठिए...अगर ज़रूरत पड़ी तो फिर से मरीज़ को अंदर बुला लेंगे ...

बाहर बैठे हुए थे हम लोग...मन ही मन हताश-निराश, मां तो वैसे भी पेट के दर्द से निढाल थीं बेचारी, बैठे बैठे कभी पेट को दबाती, कभी इस तरफ़ झुकती और कभी उस तरफ़... मेरा मन अंदर से कांप रहा था और एक उम्मीद भी थी कि शायद, वह गांठ कैंसर की न ही हो ..मन ही मन मैं मां के लिए दुआ कर ही रहा था कि फ़ैसला सुनाये जाने का वक्त आ गया।

हम लोग कंसल्टेंट के कमरे में पहुंचे ...उस जूनियर डाक्टर ने उन्हें बताया कि यह उस दिन वाली मरीज़ है ...ये इन की रिपोर्ट है...कंसल्टैंट ने रिपोर्ट देखीं और फिर मां को देखा ...उस दिन भी मां को दर्द थीं ..लेकिन फिर भी मां ने हमेशा की तरह बहुत अच्छे कपड़े पहने हुए थे .. यह मां की बहुत प्यारी बात थी ... हां, तो उस डाक्टर ने पूछा कि क्या उम्र है इनकी? क्या यह अपना काम खुद कर लेती हैं? …साथ ही कहा कि अम्मा को आराम से बिठा दीजिए....मैं समझ गया ... उस सीनियर डाक्टर ने जिस अंदाज़ में पूछा कि इन की उम्र कितनी है ..शब्द तो बस यही थे जो मैंने लिखे हैं, लेकिन उस का लहज़ा कुछ इस तरह का था मानो कह रहा हो कि इन्होंने इतनी ज़िंदगी जी तो ली है!!!

मैं बीजी को साथ ही लगते जूनियर डाक्टर के कमरे में कुर्सी पर बिठा कर वापिस लौट आया।

तब उस डाक्टर ने मुझे बताया कि देखिए, इस तरह की गांठें अमूमन कैंसर की वजह ही से होती हैं.. और हालत बहुत ही खराब है ....यह सुन कर मेरे होश फाख्ता उड़ गये...पता नहीं ईश्वर की ही कृपा से मैंने अपने आप पर काबू रखते हुए पूछा ...सर, कुछ हो सकता है? … उसने कहा कि सर्जरी तो हो नहीं सकती. मैंने कहा कि रेडियो-कीमो? उसने कहा कि क्या आप को लगता है कि इस उम्र में यह झेल पाएंगी।

पीजीआई डाक्टर की तरफ़ से उस दिन एक तरह से जवाब ही मिल गया ... मैं मन ही मन सोच कर कांप उठा कि अब मां कुछ ही समय की मेहमान है! अच्छी भली है, हंसी-मज़ाक करती है, पोतों के साथ मस्ती करती है, बच्चों की तरह से उत्साही है...बस, यह अब हम से दूर चली जाएगी...

अभी मैं यह सोच ही रहा था कि उस कंसल्टैंट ने अपने एक जूनियर से कुछ कहा कि देख लो करना चाहो तो कर लो, बढ़िया केस है ...मुझे उस के मुंह से यह सुन कर कि केस बढ़िया है ...बहुत बुरा लगा ...मुझे उस वक्त लगा कि डाक्टर लोग भी अपने प्रोफैशन के माहिर होते होंगे ...लायक होते होंगे ...लेकिन लफ़्ज़ों के इस्तेमाल में ये कुछ नहीं जानते ...और खास कर जब किसी मरीज़ का बेटा सामने खड़ा हो जिसे आपने दो मिनट पहले बताया हो कि उस की मां को लाइलाज कैंसर है ...

फिर वह सीनियर डाक्टर मुझे कहने लगा कि कुछ जांच करते हैं ...अगर कुछ हो सका तो ज़रूर करेंगे...मुझे उसी वक्त लगा कि यह अब मीठी गोली दे रहे हैं..सोचने वाली बात यह भी है कि उस समय वह मुझे और दे भी क्या सकता था।

मैं वापिस जूनियर डाक्टर के साथ उस के कमरे में आ गया जहां मां बैठी इंतज़ार कर रही थीं...उसने कुछ लिखा मां की पर्ची पर ...दो मीठी बातें की - ये टेस्ट करवा लीजिए ...तारीख ले लीजिए... उसने भी बड़े डाक्टर वाली बात दोहराई कि हालत खराब ही है.. मैं चुप रहा ...हारे हुए जुआरी की तरह ...एक मुजरिम की तरह ..शुक्र है मां को कुछ खास सुना नहीं ..लेकिन मुझे मेरी मां का पता है ...वह बड़ी समझदार थीं, कुछ कुछ तो उसने भी भांप ही लिया होगा।

बड़ी बहन का फोन आ रहा था ..उन्हें भी कुछ कुछ बता दिया .. जिस तरह से भी उस समय मन में आया ..साथ में कहा कि ऐसी क्या बात है, और किसी जगह पर दिखाएंगे..बढ़िया से बढ़िया इलाज करवाएंगे...बस, इसी तरह की बातें।

हम लोग बाहर आए ...मां ने कुछ पूछा या नहीं पूछा, मुझे अब याद नहीं...हम लोग नये ओपीडी कंप्लैक्स के बाहर टैक्सी का इंतज़ार कर रहे थे ... जब मां से भी बीमार लोगों को देख रहा था तो वह बात रह रह कर याद आ रही थी ..दुनिया में कितना गम है, मेरा गम कितना कम है, औरों का गम देखा तो, मैं अपना गम भूल गई....मां भी शायद यही सोच रही थीं, बड़ी संवेदनशील महिला थीं मेरी मां ...इतने में मैंने ही शायद कुछ कहा कि हां, बीजी, सब ठीक है, वही कह रहे हैं कि थोड़ी सूजन है ... एक टेस्ट करवाना होगा ...

मां ने तुरंत फैसला सुनाया... “देख, प्रवीण, अब तो यह पता चल ही गया है कि यह दर्द सूजन की वजह से है, अब मैंने नहीं करवाने और टेस्ट-वेस्ट, ये भी बेकार में एक्सपेरीमेंट करने लगते हैं! मां की बात सुन कर मैं चुप बैठा रहा, इतने में टैक्सी आई और हम लोग घर लौट आए। घर आने पर मैंने बड़े बेटे को भी टैक्स्ट मैसेज किया...फोन पर भी फिर बात हुई.. खुल के मेरा कुछ भी बताने को मन नहीं हो रहा था।

हां, वहां से लौटने से पहले मैं इस टैस्ट की तारीख ले आया था .. उसे एफएनएसी टैस्ट कहते हैं...एक बारीक इंजेक्शन की सूईं से किसी अंग से कुछ पानी जैसा कुछ पदार्थ खींचते हैं, उसे माईक्रोस्कोप से चैक करते हैं...

लेकिन जिस दिन टैस्ट होना था, हम नहीं गये ...मैंने पहले ही कहा कि मां ने तो मना ही कर दिया था ... मतलब अब मैं हताश हो कर बैठ गया ..मां तो बेचारी अपनी बीमारी की वजह से परेशान ही रहती थीं...लेटी रहती थीं हर वक्त, सुस्त थी, थकी थकी सी...कुछ ज़्यादा खाती भी नहीं थी, बस मैं जो जूस का गिलास बना देता वह ज़रूर लेतीं शौंक से ...और कभी कभी काफ़ी के लिए कहती, दो बिस्कुट लेतीं, थोड़ी सी खिचड़ी या थोड़े से दाल चावल या आधी चपाती ...उन का खाना बहुत सी कम हो चुका था ...मुझे बड़ी चिंता थी मां की ...दूध में डाल कर कुछ प्रोटीन पॉवडर भी पीजीआई डाक्टर की सलाह से देना शुरू किया था ..लेकिन वही बात है जब रोटी ही अंदर नहीं जायेगी, तो ये चोंचले क्या कर लेंगे।

तब तक हमारे अस्पताल में कुछ लोगों को मेरी मां की तकलीफ़ का पता चल चुका था...मेरी आदत अलग है ...मैं इस तरह की बातें बाहर किसी से भी शेयर करने में विश्वास नहीं रखता ...ये निहायत ही पर्सनल किस्म की बातें होती हैं, दूसरों को इन बातों से क्या मतलब! किसी ने कहा कि एक अस्पताल दिल्ली में हमारे पैनल पर है, वहां मां जी को भर्ती करवा दीजिए...लेकिन मैं इस के लिए तैयार नहीं था। जब उन्होंने वहां कोई इलाज ही नहीं करना, तो ऐसे कैसे कहीं पर मां को दाखिल करवा दें। घर में रहेंगी, जैसे भी होगा, देख लेंगे, मुकाबला करेंगे। वैसे भी घर तो घर ही होता है!!

अब यह सोचने लगे कि आगे क्या करें? पीजीआई लखनऊ ने तो अपना फ़ैसला सुना ही दिया था और इन अदालतों के फ़ैसलों की तो कहीं अपील भी नहीं होती, बस मन को दिलासा ही देना होता है, इधर उधर धक्के खाने होते हैं।

एक बार पीजीआई डाक्टर को मिलना चाहा ...किसी स्टॉफ के मार्फ़त यह संदेश मिला कि यह बीमारी ठीक नहीं होने वाली। भई, यह तो हमें भी पता चल ही चुका था। तब यही सलाह बनने लगी कि मुंबई के टाटा अस्पताल में भी दिखाते हैं। इतने में नेट से पत्नी को पता चला कि ऑन-लाइन भी कोई पोर्टल है, देश की एक शीर्ष संस्था से जुड़ा हुआ ...वहां पर आप अपनी रिपोर्ट अपलोड करिए और फिर उस से संबंधित विशेषज्ञों का एक समूह विचार-विमर्श करने के बाद आप को उचित इलाज की सलाह देंगे।

आनलाइन उन्हें भी संपर्क किया ...लेकिन वह अनुभव बड़ा ही बेकार सा रहा ...सब से पहले तो वे फीस जमा करने की बात करते हैं शायद सात-आठ हज़ार फीस थी (१८ फीसदी सर्विस टैक्स सहित)। उन्हें सारी रिपोर्ट ई-मेल कर दीं। उन का जवाब आया कि फलां फलां टेस्ट अभी और करवाईए ...बॉयोप्सी करवाएं, कुछ ब्लड-जांच करवाएं जिन्हें ट्यूमर मार्कर कहते हैं। ट्यूमर मार्कर टैस्ट तो करवा लिया ... जिस की नार्मल वेल्यू ४० से नीचे होती है, उस की वेल्यू छः हज़ार से भी ऊपर थी।

बस वे लोग तो और जांच करवाने की बात कर रहे थे .. एक पेट-स्कैन करवाने की बात कह रहे थे। मुझे वह करवाने का कोई औचित्य लग नहीं रहा था, साफ़ पता लग चुका था सीटी स्कैन से कि कैंसर दूसरे अंगों में भी फैल चुका था, ऐसे में क्या मां को तकलीफ़ देते रहें।

मैंने ऊपर लिखा कि मैंने एक बार भी मां की बीमारी के बारे में गूगल नहीं किया, मैं वैसे ही बडा़ डरा हुआ था। एक बार और भी थी कि ऐसा कुछ था ही नहीं जो मैं गूगल से पूछता, सब कुछ तो पता ही चल चुका था। लेकिन मेरे बड़े बेटे ने उन दिनों पूरे नेट पर इस के बारे में खूब पढ़ा। बड़ा बेटा २५ वर्ष का है और छोटा २० वर्ष का है। दोनों बीजी के लाडले और बीजी को भी जान से ज़्यादा प्यारे, बीजी उन पर जान छिड़कती थीं। जितना प्यार-सम्मान इन दोनों ने दादी को दिया और जितना दादी ने इन से मोहब्बत की, मेरे पास शब्द नहीं हैं उसे ब्यां करने के लिए। यकीं मानिए इतने बड़े हो चले हैं लेकिन मैंने कभी इन्हें बीजी से ऊंची आवाज़ में बात करते नहीं देखा था...बस, बीजी की हां में हां मिलाते रहे और बीजी भी उन के साथ वैसी ही बन जाती थीं। बीजी की फोटो खींचना और वीडियो बनाना इन को बड़ा अच्छा लगता था। सैंकड़ों ऐसी तस्वीरें और वीडियो संजो कर रखे हैं इन्होंने।

हां, पीजीआई से तो एक तरह से जवाब मिल ही चुका था ...बड़ा बेटा मुंबई में बैठा हुआ नेट पर इलाज ढूंढ रहा था, उसे भी मैंने रिपोर्ट भेजीं ...उसने अपने एक मित्र के पिता से भी संपर्क किया ...उस का उसे जो मैसेज आया वह उसने मुझे भी फारवर्ड किया कि यह तो पेन्क्रियाटिक कैंसर की आखिरी स्टेज है और यह दूसरे अंगों में भी फैल चुका है ..इलाज से कुछ होगा नहीं इस स्टेज पर। उसने आगे लिखा था कि फिर भी इलाज करना ही है तो बॉयोप्सी तो चाहिए ही होगी, अगर इलाज करवाने का मन बनाएं तो वह पीजीआई में किसी चिकित्सक को कह देगा, और अगर मुंबई आ कर इलाज करवाना चाहें तो आ सकते हैं।

सितंबर २०१७ की ही बात है कि बेटे ने मेरे से पूछा कि बंबई में किसी बड़े गेस्ट्रोऐंट्रोलॉजिस्ट को रिपोर्ट दिखा के आऊं...मैंने एक बहुत बड़े अस्पताल के डाक्टर के बारे में बताया। वह उस से मिलने चला गया। सारी रिपोर्टस् साथ ले गया। उस से मिल कर उसे बड़ी निराशा हुई, उसने बता दिया कि यह कैंसर की टर्मिनल स्टेज है- ६महीने से एक साल तक ही मरीज निकाल पाता है लेकिन अगर बॉयोप्सी कर के पता चले कि किस किस्म का कैंसर है और अगर ऐंडोक्राईनिल किस्म का कोई कैंसर हुआ जो बहुत धीरे फैलता है तो चार-पांच साल भी मरीज़ ज़िंदा रह सकता है।

मुझे समझ नहीं आ रहा कि हम ने ऐसे ही कैसे कयास लगा लिया कि मां को तो दूसरे किस्म का ही कैंसर होगा ..कहीं नहीं जायेगी मां चार पांच साल तक।

लेकिन बड़ा सच यह भी था कि सी टी स्कैन की रिपोर्ट से कैंसर के दूसरे अंगों में फैलने का पता भी तो लग ही चुका था।

उन दिनों मैं बेटे के साथ फोन पर मंसूबे बनाने लगा कि यार, बीजी को अब थोड़ा घुमाना फिराना है। एक बार बीजी रामेश्वरम् जाने के लिए भी कह रही थीं, वहीं चलेंगे। उसने कहा- हां, हां, ठीक है। मैंने उससे इतना भी कहा कि अब तो तुम मेरी और बीजी की अलग अलग जगहों की फ्लाईट-बुकिंग और होटल बुकिंग करवा दिया करो, मैं बीजी के साथ अलग अलग जगहें देखना चाहता हूं। उसने कहा कि बस आप तो मुझे जगह और तारीख बता दिया करें, बाकी सब मैं बुक कर लिया करूंगा।

बेटा ने भी कहा कि ऐसा करो आप लोग पहले मुंबई ही आ जाओ, यहीं देखेंगे कुछ इलाज, वहां लखनऊ में क्या होगा! मैंने भी सोचा कि वह ठीक ही कहता है वहीं चलते हैं, अच्छे अस्पताल में दिखा लेंगे और तसल्ली भी हो जायेगी। और उसने कहा कि जहां भी घूमने का प्रोग्राम होगा, यही मुंबई से ही आना-जाना सुविधाजनक रहेगा। मुझे भी उस की बात सही लगी।

इधर किसी ने कह दिया कि टाटा अस्पताल वाले तो बिना बॉयोप्सी के देखते ही नहीं। ऐसे में हमें भी लगा कि कम से कम लिवर की एफएऩएसी तो करवा ही ली जाए...अब मां और भी कमज़ोर हो रही थी ...उन्हें तैयार करना कि वे किसी टेस्ट के लिए चलें ...मुमकिन नहीं लग रहा था। एक बार फिर मां से झूठ बोला। मैंने मां से कभी झूठ नहीं बोला था लेकिन इन दिनों झूठ पर झूठ बोल रहा था। झूठ बोल देता ...और फिर मां पर तरस आने लगता कि वह बेचारी यही सोच रही होगी कि वह भली-चंगी हो जाएंगी।

खैर मैंने मां को एक दिन कहा कि बीजी, पेट में दर्द के लिए एक टीका लगवाने को कह रहे हैं। उस से दर्द में भी राहत मिलेगी। मां ने तो जैसे मेरी कोई भी बात को टालना सीखा ही नहीं था। यहां एक बात याद आ गई ...जो बहुत बड़ी बात है कि बीजी ने अपने बच्चों को कभी पीटना तो दूर, झिड़का तक नहीं ...मां की कसम, बिल्कुल सच कह रहा हूं...बस, एक बार मां ने बड़ी बहन पर कालेज से देर से लौटने पर थोड़ा गुस्सा किया था, मुझे यही याद है, तब मैं १०-११ साल का था, लेकिन मां ने कभी किसी बच्चे को रोका-टोका नहीं, बस हमेशा प्यार-दुलार ही दिया...अब तो हम लोग मां से यह बात शेयर कर के खूब हंसते थे कि कोई ऐसी भी मां होगी जिसने अपने किसी भी बच्चे को कभी भी मज़ाक में भी न पीटा हो ...और मां हंस कर कह देती ...“मेरे बच्चे हैं ही इतने समझदार.. इतने प्यारे।”

हम लोग लिवर का एफएऩएसी टेस्ट करवाने चले गये पीजीआई लखऩऊ में ... टेस्ट करवाने में तो दस-पंद्रह मिनट ही लगते हैं। एक बारीक सूईं को टेस्ट के दौरान लिवर के अंदर डालते हैं और अल्ट्रासाउंड मशीन में देखते रहते हैं कि सूईं कहां तक पहुंची है, जैसे ही वह सूईं सही जगह पर पहुंचती है, वे उसमें से कुछ द्रव्य या जो भी वहां से निकल पाए, निकाल लेते हैं, और फिर उसे स्लाईड पर फैला कर दूरबीन से जांच करते हैं।

टैस्ट करवा के आ गये ...बीजी को यही बताया कि इस इंजेक्शन से बड़ा आराम मिलेगा। नादान, भोली मां, बच्चों की बातों में आ जाने वाली नन्ही बेटी सी लगने वाली मां ने वही मान लिया। और अगले दिन कहने भी लगीं कि हां, थोड़ा आराम तो लग रहा है।

दो तीन दिन बाद उस की भी रिपोर्ट आ गई, बदकिस्मती से यह पक्का हो गया कि लिवर में भी कैंसर की ही कोशिकाएं हैं। इस से आगे हम लोग कोई टेस्ट करवाना नहीं चाहते थे।

मां का खाना पीना बहुत कम हो गया था। फिर भी मां कुछ समय के लिए लेटे लेटे अपने कमरे में टीवी देखतीं, क्रिकेट मैच भी देखतीं, अखबार भी देख लेतीं, और बिल्कुल थोड़ा बहुत खा लेती। रह रह कर मां का ध्यान मेरी नानी की तरफ़ चला जाता और मुझे कहतीं कि मेरी मां इतनी बीमार थी और मैं उस की सेवा भी नहीं कर सकी। २५ साल पहले मेरी नानी को मूत्राशय का कैंसर हो गया था। मेरी मां अकसर कहतीं कि जब मां बाप साथ होते हैं तो यही लगता है कि ये तो हमेशा साथ ही रहेंगे लेकिन उन का साथ भी मौसम की बहार सरीखा होता है। इतने कहते कहते मां की आंखें भर आतीं...मैं मां को दिलासा देता और मां फिर सहज हो जातीं।

हां, जिस दिन पीजीआई के डाक्टर ने एक तरह से जवाब दे दिया था उसने उस दिन कहा था कि इन्हें आप पेन-क्लीनिक में ले कर ज़रूर जाइएगा.. इसे पेलीएटिव क्लीनिक भी कहते हैं....आम भाषा में इस का यह मतलब होता है कि जिन कैंसर के मरीज़ों का कुछ और इलाज तो संभव न हो, बस उन के दर्द को यह विभाग वाले कंट्रोल करते हैं।

दर्द तो मां को थी ही, परेशान थीं, शायद मेरे सामने हॉय-तौबा नहीं करती थीं लेकिन बच्चों से भी मां का दर्द कब तक छिप सकता है। दर्द होता था तो सिमरन करने लगती थीं, वैसे भी सिमरन तो करती ही रहती थीं, भजन गाती थीं, वाट्सएप पर मेरी बहन को, अपने पोतों को और मुझे मैसेज किया करती थीं इन दिनों भी, वाट्सएप काल भी सीख गईं थीं और छोटे बेटे ने पूरी रिसर्च करने के बाद दादी को ऐसा बढ़िया मोबाइल खरीद कर दिया था कि अब तो सारी खबरें मां अपने मोबाईल पर ही देख-पढ़ लिया करती थीं। मैं उन्हें वाट्सएप पर लिंक भेजता और वे मेरे ब्लॉग की पोस्टें भी अपने मोबाइल पर ही देख कर, कभी कभी वहीं टिप्पणी भी कर दिया करतीं, वरना मौखिक टिप्पणी कर देती ...प्रवीण, तू बहुत अच्छा लिखता है, शिक्षा होती है तेरे लेखों में, किताब छपवा एक...कहीं से पता कर, छोटी सी एक किताब छपवा।

मां को लिखने पढ़ने का बहुत शौक था...अंग्रेजी की डिक्शनरी उन की टेबल पर ही रहती थीं, अखबार में जो शब्द मुश्किल लगता उसे तुरंत कापी में लिख लेतीं और साथ में शब्दार्थ भी। जब मन करता तो अपना ब्लॉग भी लिखती थीं.. लेपटाप पर हिंदी में ज़्यादा लिख न पातीं तो एक कागज पर ब्लॉग की पोस्ट लिख कर मुझे दे देतीं और मैं उसे मां के ब्लाग (क्या कहूं..क्या न कहूं ... santoshchopra.blogspot.in ) पर पोस्ट कर देता। उन्हें यह सब बहुत अच्छा लगता।

वापिस पेन(दर्द)-क्लीनिक वाली बात पर लौटते हैं, एक दिन मैं पहले जा कर टाइम ले कर आया और फिर मां को लेकर उस पेन क्लीनिक में ले गया ...टाइम लेने इसलिए गया था ताकि वहां पर मैं को कम से कम इंतज़ार करना पड़ा और साथ में डाक्टर को कह कर आया कि मां को उन की बीमारी के बारे में कुछ मत बताएं। इन दिनों मैं पीजीआई जाता तो था लेकिन बिल्कुल एक हारे जुआरी की तरह जो सब कुछ हार चुका हो। मां को मैं कुछ भी जाहिर नहीं करता था लेकिन मेरा मन बहुत ही ज़्यादा बुझा बुझा रहता था। पेन क्लीनिक में मां के साथ तो मैं दो बार गया। जब भी गया वहां पर जूनियर डाक्टर ही दिखे जिनमें आत्मविश्वास की कमी जाहिर होती। हर बात पर अपने किसी सीनियर से फोन पर बार बार पूछते। वहां पर मरीज़ भी कम ही होते थे। दवाईयां तो उन्होंने वही लेने को कहा जो पेट के रोग के विशेषज्ञ ने लिख रखी थीं, बस ऐसे ही एक टेबलेट कम करना और कुछ और सप्लीमैंट्स लेने को कहा, बस यही हुआ वहां भी। बार बार यही पूछते कि क्या यह (मां) अपना सारा काम खुद कर लेती हैं और मेरे हां कहने पर थोड़े हैरान ही दिखते। मैं मां को वहां इसलिए ले जाता ताकि मां को मन में यह तसल्ली तो कम से कम हो कि इलाज चल रहा है।

मां का पेट का दर्द देखा नहीं जाता था। हर चार छः घंटे के बाद मां को दर्द की टेबलेट तो लेनी ही पड़ती थी। ढंग से कुछ न खाने-पीने की वजह से भी मां बिल्कुल एक हड्डियों का ढांचा ही बनती जा रही थी और जो बचा खुचा मांस भी बिल्कुल लटक गया था। मुझे मन ही मन बड़ा दुःख होता था कि मां को हो क्या गया है। अब तो पिछले एक महीने से मां का वजन देखना भी बंद कर दिया था...उन के कमरे से वजन चेक करने वाली मशीन ही मैंने हटा दी थी...उन्होंने भी कभी इस के बारे में बात नहीं की। जो हालत मां की हो चुकी थी उस में कोई अपनी जान की सलामती देखे या वजन को देखे !!

यह सब करते-कराते अक्टूबर का महीना शुरू हो गया...मन बना लिया कि मुंबई चलते हैं, मां को दिखाएंगे भी वहां पर और मां कुछ महीने वहीं मेरे बेटे के पास रहेंगी। उस की भी बड़ी ख्‍वाहिश थी कि बीजी अब मुंबई में ही रहें, यहां का मौसम भी मुफ़ीद है, बीजी का अच्छा भी लगेगा। मां को भी सुन कर अच्छा लगा कि पेट के दर्द का इलाज भी करवा लेंगे और विशाल के साथ रहने को भी मिलेगा।

बेटा बांद्रा में एक बीएचके फ्लैट में रहता था ...उसने कुछ दिन कोशिश कर के हमारे जाने से पहले मुंबई के पाली हिल में दो बीएचके फ्लैट किराये पर ले लिया- बहुत ज़्यादा किराये पर। हमारे वहां जाने से पहले वह उस नये फ्लैट में शिफ्ट हो गया था।

हम लोग (मां, मेरी बीवी और मैं) १५ अक्टूबर को लखनऊ से फ्लाईट लेकर बंबई पहुंच गये .. दोनों एयरपोर्ट पर व्हील-चेयर मिल गई थीं, कोई दिक्कत नहीं हुई। लखनऊ में तो मैंने देखा कि व्हील-चेयर पर हवाई जहाज तक पहुंचने वाले आठ-दस बुज़ुर्गों की बोर्डिंग गेट के पास एक लाइन ही लगी हुई थी, उन में से कुछ बहुत बीमार लग रहे थे।

खैर हम लोग मुंबई पहुंच गये। उस से दो दिन पहले ही बेटे को चोट लगी थी और उस की कॉलर बोन का फ्रैक्चर हो गया था। फिर भी वह एयरपोर्ट पर एक ही हाथ से गाड़ी चला कर पहुंचा हुआ था। मुझे उसे देख कर गुस्सा भी बहुत आ रहा था कि ऐसी हालत में गाड़ी चलाने की क्या पड़ी है, लेकिन हम लोग सारा रास्ता चुप रहे ...एक तो उस की यह हड्डी टूटने की चिंता हो रही थी और दूसरा मां की चिंता सता रही थी।

घर आने पर दो-तीन दिन में ही बेटे ने फर्नीचर खरीद लिया ..बड़े बड़े दो एलसीडी टीवी...उनमें से एक मां के कमरे के लिए खरीद लिया...टाटा-स्काई भी लग गया और मां को टीवी देखते देख कर वह खुश हो जाता। अगले दिन मेरी बड़ी बहन भी जयपुर से आ गईं। उन्होंने मां को देखा तो हैरान हुई कि उन्होंने नहीं सोचा कि बीजी इतनी कमजोर हो चुकी होंगी। वह कहने लगीं कि बीजी फोन पर तो इतनी चुस्ती से बात करती रहीं कि मुझे लगा ही नहीं कि बीजी की तबीयत इतनी खराब है। थकावट का तो यह आलम था कि बीजी अपने बालों में कंघी करते करते थक जाया करती थीं। उसी दिन छोटा बेटा भी दिल्ली से आ गया, जो वहां पढ़ता है।

अगले दिन दीवाली थी, सब ने मिल कर दीवाली की पूजा की ... बीजी ने भजन भी गाया.. कुछ मिनट ड्राईंग-रूम में बैठ कर बीजी अपने कमरे में चली गईं ..क्योंकि उनसे ज़्यादा समय तक बैठा भी नहीं जाता था। पता नहीं दीवाली के मौके पर भी हम में से कोई भी खुश सा नहीं लग रहा था .. मैं और बड़ा बेटा बुझे बुझे से ही थे ... मैं तो बस यही सोच कर परेशान था कि अगली दीवाली में मां हमारे साथ होंगी कि नहीं, क्या पता। बहन को तब तक बीमारी की गंभीरता का पता नहीं था। उन्हें यही था मन में कि जैसे दूसरे लोगों को कैंसर होता है और वे कईं साल तक ज़िंदा रहते हैं, बीजी को भी वैसी ही तकलीफ़ है।

दो दिन बाद बड़ी बहन और मैं बीजी को टाटा अस्पताल ले गये ...हां, एक बात और ..मां को हमने यह भी नहीं बताया कि हम जा कहां रहे हैं। मां को यही कहा कि पेट के रोगों का एक बहुत बड़ा अस्पताल है भाभा अस्पताल ...वहां जा रहे हैं।

टाटा अस्पताल के डाक्टर ने सारी रिपोर्ट देखीं .. उसने मां से एक मिनट बात की और कहा कि मां बाहर बैठ जाएं। मेरी बहन बीजी के साथ बाहर चली गईं। तब डाक्टर ने मुझे कहा कि देखिए, तकलीफ़ तो आप जानते ही हैं। हालत खराब ही है, कैंसर आसपास फैल चुका है। मैंने कहा कि क्या पता चल सकता है कि शुरूआत कहां से हुई। उसने मुझे कहा कि देखिए, जब इस हालत में कोई इलाज ही संभव नहीं है तो यह जान कर करेंगे भी क्या! फिर भी उसने कहा कि एक तो जो एफएऩएसी जांच लखनऊ में हुई है वहां से आप ब्लॉक मंगवा लीजिए, यहां भी जांच करेंगे और साथ मे कुछ रक्त की जांच भी करवानी हैं, फिर ही रिव्यू कर पाएंगे।

उसने मुझे साफ साफ कह दिया कि देखिए अगर कुछ इलाज करवाएंगे तो इन्हें उसे झेलने में दिक्कत ही होगी, बीमारी तो अब यह खत्म होने से रही। अस्पताल के माहौल में रहेंगी तो परेशान ही रहेंगी, जो भी इन की ज़िंदगी है चंद महीनों की (चार-छः महीने, यही कहा था उसने) उस दौरान अगर यह घर के वातावरण में परिवार के साथ खुशी खुशी रहेंगी तो ही अच्छा होगा। उस के आगे कुछ कहने सुनने को बचा ही नहीं था।

कुछ समय बाद उस ने अपने सीनियर को भी बीजी के पेपर दिखाये...उसने कहा कि उन्होंने अंदर लेकर आइए...मैं जब अंदर गया तो उसने पूछा कि ये अपने सारे काम- नहाना, धोना खुद कर लेती हैं क्या। मैंने कहा कि हां, वह तो सब खुद ही करती हैं, बस थकावट बहुत रहती है। उसने भी मुझे यही कहा कि जो आप को इन्होंने (जूनियर की तरफ़ इशारा करते हुए) कहा है वह बिल्कुल सही है।

फिर उन्होंने वही बीजी को पेन-क्लीनिक में रेफर कर दिया ..जहां लाइलाज टर्मिनल स्टेज वाले रोगियों के दर्द का इलाज होता है ...कुछ दिन पहले मैं ऐसे ही बच्चों के साथ बात कर रहा था कि मां को तो सजाए-मौत तो १२ सितंबर को ही मिल चुकी थी ...बस अब तो फांसी लगने में ही समय लग रहा था। और उसी दौरान हम सब वैसे ही उन्हें बचाने की नाकाम कोशिशें करते रहे जैसे फांसी की सजा पाने वाले मुजरिम के घर वाले करते हैं- अपील भी करते हैं कि शायद मौत टल जाए।

पेन क्लीनिक में जाने से पहले हम लोग पेलीएटिव विभाग में गये जहां पर टर्मिनल स्टेज पर अटके बीमार मरीज़ों की ज़रूरतों के बारे में ध्यान दिया जाता है। बहुत कुछ पूछा जाता है वहां कि क्या मरीज़ को बीमारी के बारे में पता है, क्या आपके डाक्टर ने इस के नतीजे के बारे में बता दिया है, क्या मरीज़ घर में अपना खुद का काम करने के काबिल है, खाने-पीने की डिटेल्स, अगर मरीज़ के सरकारी काम-काज- बैंक-डाकखाने के काम अटके पड़े हैं तो कह देते हैं कि उन्हें भी निपटा लेना चाहिए, कोई वसीहत या कोई नामांकन का मसला तो नहीं है...जी हां, एक तरह से वे यह भी समझा रहे होते हैं कि अब वक्त थोड़ा ही बचा है। उस विभाग में चिकित्सा समाजसेवी भी होते हैं जो इस तरह का काम करते हैं।

उसी विभाग में एक चिकित्सा समाजसेवी ने एक फार्म भरने के लिए मुझे अपने केबिन में बुलाया.. उससे यही बात हो रही थी कि बीजी को दर्द तो है, भूख न लगने की भी दिक्कत है, फिर भी मस्त रहती हैं अपने आप में और वाट्सएप पर भी एक्टिव हैं। सुन कर उसे थोड़ी हैरानी भी हुईं और उसने कहा कि मुझे भी मिलवाइए। फिर मां को उन के कमरे में भी ले गये। प्यारी मां ने वहां भी आशीर्वादों की झड़ी लगा दी।

इन दिनों बड़ी बहन भी परेशान रहती थीं। मुझे लग रहा था कि उन्हें बीमारी की गंभीरता के बारे में बताना बहुत ज़रूरी है। मैंने टाटा अस्पताल से ही अग्न्याशय (पेन्क्रियाज़) के कैंसर के बारे में जानकारी उपलब्ध करवाने वाले हिंदी में लिखी एक बुकलेट खरीदी और बहन को कहा कि बीजी की नज़रों से छिपा कर इसे पढ़ना है। उस ने कुछ ही घंटों में उसे देख लिया और उस का भी बड़ा मूड बड़ा खराब हुआ यह पढ़ कर कि कैसे बीजी में यह बीमारी इतनी फैल गई और पता ही नहीं चला!

मैंने पहले भी बताया था कि मां को खट्टी चीज़ें खाना इन दिनों खूब भाता था, मुंह में नमक लगा कर नींबू का एक टुकड़ा हर समय रखे रहतीं। एक दिन बेटा जल-जीरे की बोतल लाया तो मां को बहुत मज़ा आया। बस, फिर क्या था, वह तो रोज़ जल-जीरा लेकर आने लगा। दिन में बीसियों बार तो बीजी का माथा चूमता रहता। बीजी से उस का खास लगाव था जिसे शब्दों की सीमा में बांध पाना मेरे वश में है नहीं। अद्भुत ही प्यार देखा इन दोनों का। जल-जीरे से याद आया, दो तीन महीने पहले जब वह बीजी को मिलने लखनऊ आया, अभी उन की जांचें चल ही रही थीं...एक दो दिन रूका..वहां से लौटते हुए छोटे भाई को डेढ़-दो हज़ार रुपये दे कर कह गया कि इन पैसों से बीजी के लिए फलां-फलां मिनरल पानी ले आना। उसी दिन छोटा बेटा बीजी के लिए चालीस बोतलें उसी ब्रांड के पानी की एक बड़ी सी बोरी में डाल के ले आया। बीजी को सख्त हिदायत भी जारी कर दी गई उन के पोतों की तरफ से कि आप तो यही पानी पिया करो। मैं चुपचाप यह सब देख रहा था, वैसे तो घर में एक्वागार्ड लगा ही हुआ है, लेकिन बच्चों की अगर ऐसी इच्छा है तो ठीक है। मैं शायद यही सोच रहा था कि किसी के मन में मलाल नहीं रहना चाहिए कि काश! यह कर लेते तो बीजी और ज़िंदा रहतीं। और मज़े की बात, बीजी भी बिल्कुल बच्चों की तरह बच्चों के साथ बच्चा बन जातीं और उन की बातों में आ जातीं। अब बीजी ने भी हुक्म की तामील करते हुए वही पानी पीना शुरू कर दिया और आने जाने वाले को कहतीं कि देखिए, बच्चे मेरा कितना ख़्याल रखते हैं!

दादी के प्यार में इतना दीवाना कि जिस दिन जाना था, दादी के साथ लेटे लेटे उन से स्कैच-पैन से उन का नाम अपनी कलाई के अंदर की तरफ़ लिखवा लिया...संतोष चोपड़ा ...और बंबई पहुंचते ही उसने मां के लिखे पर टैटू गुदवा लिया। और मुझे फोन पर टैटू दिखा कर कहने लगा कि अब बीजी हमेशा मेरे पास रहेंगी।

मुंबई में रहते हुए भी मां की इतनी कम होती भूख और उसी अनुपात में वज़न कम होता देख कर डर ही लगता रहता था.. जब भी टाटा अस्पताल जाने की बारी होती ...मैं जैसे तैसे सुबह नहा तो लेतीं, धीरे धीरे कपड़े भी पहन लेतीं, और आहिस्ता आहिस्ता अपने बाल भी संवार ही लेतीं, बड़ी बहन भी उन के पहनावे-खाने-पीने का पूरा ध्यान रखतीं। कम खाने पर कभी थोड़ा प्यार से बच्चों की तरह झिड़की भी दे देतीं कि क्या बीजी, कुछ तो खाया करो। लेकिन मां अपनी बीमारी के कारण मजबूर थीं। मां इतनी बेबस लगने लगी थी कि सलवार का नाड़ा बांधते हुए भी वह परेशान हो जातीं, बहन उन के लिए इलास्टिक वाले दो पायजामे ले कर आई थीं, ताकि पहनने-उतारने में आसानी रहे।

मां अपना सब काम खुद करना चाहती थीं। मेरी बहन भी अगर उस में कुछ हस्तक्षेप करना चाहतीं, उन की सुविधा के लिए, तो भी मां को अखरता था। खुराक बहुत कम हो चुकी थी, दो चार चम्मच दलिया, या सुबह आधा कप दूध में कॉर्नफ्लेक्स, बाद में एक गिलास जूस, दोपहर में आधी चपाती, दो चम्मच दाल...रात में भी आधी कटोरी या उससे भी कम खिचड़ी...उन को इतना कम खाते देखते थे तो हमारा दिल कांपता था कि ऐसे कैसे चलेगा!

मां को हम लोग प्यार से समझाने बुझाने की कोशिश करते तो वह कहतीं कि अब उम्र के साथ भूख तो कम होती ही है, इस में कौन सी बड़ी बात है, मैं ठीक ठाक हूं, चिंता मत किया करो, जाओ जा कर कहीं घूम फिर आओ..हर समय मेरे सिरहाने पर ही बैठे रहते हो। सारा दिन लेटी रहती हूं, बस पलंग ही तोड़ती रहती हूं, इस उम्र में और कितना खाना चाहिए होता है!

पेट के दर्द से तो मां इतनी परेशान थीं कि एक बार बेटे को कह रही थीं, मैंने सुना था बीजी ने उसे कहा- “मेरा मन करता है कि पेट को तो काट के फैंक ही दूं।” ...और मां कि ज़िंदादिली देखिए, इस तरह की बात कर रही हैं, बुरी तरह से पीड़ा से त्रस्त भी हैं लेकिन यह बात कह कर हल्का सा ठहाका भी लगा रही हैं।

बीजी का पोता जो भी उन के लिए खाने पीने का सामान लेकर आता, वह उन के स्पैशल होता, उस की पसंद की बड़ी कायल थीं। उस के लाए बिस्कुट, इडली-सांबर जैसी चीज़ें बड़े चाव से खातीं। आज ही सुबह बेटा मुझे बीजी का एक वीडियो दिखा रहा था जिसमें वह जीप की अगली सीट पर बैठी हुई हैं और फलूदा आईसक्रीम का मज़ा ले रही हैं। मुझे भी देख कर बड़ा मज़ा आया। हम सब उस दिन जुहू बीच के पास ही इस्कॉन मंदिर के पास दक्षिनयन होटल में गये हुए थे।

बस, ऐसे ही दिन कट रहे थे - घर के पास ही कार्टर रोड है ...जॉगर्स पार्क के पास ही समुद्री तट (बीच) के किनारे दो तीन बार बीजी हम सब के साथ गये - कहने लगे कि घर से बाहर निकल कर अच्छा लगता है। वैसे तो वह पाली-हिल वाले इस नये फ्लैट में भी बहुत खुश थीं...हर तरफ़ हरियाली, साफ-सफाई, खिड़कियों से बाहर प्रकृति का नज़ारा और मच्छरों का नामों-निशां नहीं..

अच्छा, अब टाटा-क्लीनिक के पेन(दर्द)-क्लीनिक की कुछ यादें बांट लें। बीजी को लेकर मैं और बड़ी बहन एक दिन वहां पहुंच गये। उन्होंने पूछा कि कौन सी दवाईयां ले रहे हैं। उन्हें सब कुछ बताया कि इस के बावजूद भी पेट का दर्द खत्म या कम होने का नाम ही नहीं ले रहा। वहां पर जो सीनियर डाक्टर थीं उसने सलाह दी कि दर्द में अगर खाने वाली दवाईयों से आराम नहीं मिल रहा तो फिर एक तो इन्हें मारफ़ीन की गोली खानी होगी और इन की छाती के ऊपर कॉलर-बोन के नीचे एक मारफ़ीन का पैच लगाया जायेगा।

उस डाक्टर ने अपनी एक जूनियर को कहा कि इन्हें मारफीन का पैच लगाना सिखा दे, उसने सिखा भी दिया। कुछ खास करना नहीं था, बस पैकिंग से खोल कर एक बैंड-एड जैसे पैच को (पारदर्शी लगने वाला छोटा सा पैच) छाती के ऊपरी हिस्से में कॉलर-बोन के नीचे चिपका देना होता है, और उस के ऊपर टेप लगा देनी है। मैंने और बड़ी बहन ने सीख लिया। और यह भी बताया गया कि इस पैच को ७२ घंटे के बाद बदलना होगा। इस से दर्द में आराम रहेगा।

पैच लगवा कर हम लोग घर आ गये, मारफीन का नाम सुनते ही किसी को भी झटका सा लगना स्वभाविक है। जी हां, कैंसर के रोगियों में भयंकर दर्द को कंट्रोल करने के लिए यही पैच इस्तेमाल होता है। यह मारफीन का मैडीकल इस्तेमाल है जो विशेषज्ञ डाक्टरों की देख-रेख में होता है और गैर-मैडीकल इस्तेमाल के बारे में तो आप जानते ही हैं कि कैसे यह ड्रग युवाओं की सेहत बर्बाद कर रही है। मेडीकल इस्तेमाल के लिए मारफीन पैच विशेषज्ञ डाक्टरों की अनुमति से ही टाटा अस्पताल से ही मिलते हैं, दूसरे शहरों के सरकारी अस्पतालों में भी मिलते ही होंगे इस काम के लिए, मुझे पता नहीं है। इस में मारफीन की मात्रा बहुत ही कम मात्रा में होती है जो धीरे धीरे उस पैच से निकल कर शरीर में प्रवेश करती रहती है।

जिस दिन पैच लगवा के आए, मां को अच्छा ही लगा .. नींद भी आ गईं, शायद दर्द कम होने की वजह से थोड़ा बहुत खा भी लिया। हमें थोड़ा खुशी हुई इस बात की कि चलिए, मां को राहत तो मिली। लेकिन यह क्या, दो दिन में हमें लगने लगा कि यह कैसी राहत है कि मां हर समय सोई ही रहती है, नशे जैसी हालत में ही रहती हैं, जगाओ तो जागती हैं, वरना ऊंघती रहती हैं। पैच तो हम लोग ७२ दिन के बाद बदल देते लेकिन मां की हालत देख कर बड़ी बहन भी घबराई हुई ही दिखती। मैं जब भी देखता मां को झकझोड़ती ही दिखतीं - क्या बीजी, हर वक्त सोये ही रहते हो, कोई बात भी नहीं करते, इतनी दूर से आपकी बेटी आई है और आप हो कि बस सोना, सोना, सोना!!

कुछ दिन बाद हम लोग फिर पेन-क्लीनिक में बीजी को ले गये। उस दिन जिस लेडी डाक्टर की वहां पर ड्यूटी थी उसने सारी बात अच्छे से सुनीं, दर्द में कितनी राहत है उस का जायजा लिया और थोड़ी ज़्यादा पॉवर वाला पैच लगाने को दे दिया। वह लगाया भी एक दो बार ..लेकिन इस से तो मां की और भी आफ़त हो गई । बिल्कुल बेसुध सी पड़ी रहतीं। हमें तो इतना तो लग ही रहा था कि दर्द-वर्द में फ़र्क कुछ नहीं है, बस बेहोशी छाई रहती है, और हर वक्त सोये रहने की वजह से लगता है कि बीमार का हाल अच्छा है।

बेटियां कहां ज़्यादा दिन घर से बाहर टिक पाती हैं, उन के घरों की अपनी मजबूरियां होती हैं. मैंने बहन को कहा कि चलते हैं बाज़ार चलते हैं, कुछ देख लीजिए...(वह मेरे से १० साल बडी हैं), पर वह हर बार यही कहतीं कि बिल्ले, मेरा बिल्कुल भी कहीं जाने का मन नहीं है। पंद्रह दिन मुंबई रहने के बाद बहन के वापिस जयपुर लौटने का दिन आ गया ...बीजी को देख कर उस का मन तो बिल्कुल नहीं कर रहा था, मैं जानता था, लेकिन उस की भी कुछ मजबूरी थी। जिस दिन बहन ने जाना था वह रोने लगीं, मां का भी मूड खराब था ...इन दोनों को देख कर मैं भी अंदर ही अंदर रो रहा था कि बहन जा रही है, पता नहीं इस के अगली बार मिलने तक मां होंगी भी कि नहीं!

मां ने बहन को कुछ पैसे दिए, और उसे कहा कि ऐसे ही अपना मूड खराब न करे, बस यही दुआ करे कि मेरी (बीजी की) तबीयत ठीक रहे!!

उस दिन बड़े ही भारी मन से बहन लौट कर गईं ...मेरा भी मन बहुत खराब रहा। बीजी तो हमेशा की तरह सोई पड़ी थीं।

नवंबर का महीना चढ़ गया था.. टाटा के पेन क्लीनिक वालों ने कह दिया था कि ज़रूरी नहीं कि हर बार मां जी को भी आप साथ ही लेकर आएं, कभी कुछ पूछना हो या बताना हो तो आप अकेले भी आकर हमें मिल सकते हैं। एक दिन मैं फिर वहां गया यह बताने कि पैच से दर्द में तो थोड़ी राहत चाहे होगी लेकिन वह तो बेसुध सी पड़ी रहती हैं।

वहां पर उस दिन जिस डाक्टर की ड्यूटी थी उसने कहा कि इसीलिए तो हमें यह बीच बीच में आप से फीडबैक लेनी होती है कि किसी दिन अम्मा कहीं सोई हुई हमेशा के लिए ही न सो जाए। मुझे उस की यह बात बुरी लगी। हर बात कहने का एक ढंग होता है। मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि कुछ डाक्टरों के पास डिग्रीयां चाहे जितनी हों, लेकिन अल्फ़ाज़ को चुनने और उन्हें बोलने के बारे में वे अनाड़ी ही होते हैं।

घर आ गया ...फिर धीरे धीरे मां की ऐसी बेसुध सी पड़े रहने वाली हालत को देखते हुए मैंने वही हल्के वाले पैच लगाते रहने का फैसला किया...पेट दर्द वाली गोली भी मां को हर पांच छः घंटे के बाद चाहिए ही होती थी।

बस उधर बंबई में रहते हुए यही लगने लगा कि यहां रह कर भी क्या करेंगे...मां कहीं बाहर भी नहीं निकलतीं, ठीक है फ्लैट बढ़िया है लेकिन सूर्य देवता कभी यहां से दिखते नहीं, मन ही मन सोचा कि चलते हैं लखनऊ ही चलते हैं...वहां पर मां को धूप-रोशनी दिखेगी, मां अपना टहलना-वहलना थोड़ा शुरू करेंगी तो इन्हें अच्छा लगेगा। टिकटें आ गईं... १५ नवंबर की टिकट थी।

बेटा कह रहा था कि कुछ दिन ही देखना, क्योंकि १०-१५ दिन में वहां ठंडी का मौसम शुरू हो जायेगा ...जिसे बीजी ऐसी हालत में सहन नहीं कर पाएंगी, तब आप लोग बीजी को यहीं ले कर आ जाइएगा। मैंने भी हामी भर दी ..मन इस विचार से कांप रहा था कि अब की यहां से गई मां यहां वापिस लौट के कभी आएंगी भी या नहीं, ईश्वर ही जानता है! बेटे ने एक बिल्ली पाली हुई है ..मां का मन उस के साथ लगा रहता था। मां उस की बड़ी तारीफ़ करती थीं कि ज़रा भी तंग नहीं करतीं, बड़ी समझदार है, हंसते खिलखिलाते उसे कहती- अपनी बहू भी ऐसी ही समझदार ढूंढ ले - अकसर वह बिल्ली मां के पलंग के किनारे मां के पांव की तरफ़ चुपचाप बैठी या सोती दिखती, बेटा उन दिनों यह मंजर देख कर ऐसे कुछ कहता था कि पापा, जानवरों की सिक्स्थ-सैंस या इसे आप कुछ भी कह लें, बड़ी गजब की होती है इन में कुछ देख पाने की शक्ति, जो हम लोग नहीं भांप पाते, नहीं देख पाते, ये जानवर सूंघ लेते हैं !! मुझे भी यही लग रहा था।

वह दिन आ गया जिस दिन हम लोगों ने वापिस लखनऊ जाना था. १५ नवंबर की बात थी, मां नहा कर गुसलखाने से आहिस्ता आहिस्ता बाहर आईं, सिर भी धोया था जहां तक मुझे ध्यान है, बाहर आकर पलंग पर बैठ कर आराम से कपड़े पहनने लगीं..फिर बालों में कंघी करने लग गईं...बेटा भी पास ही बैठा हुआ था...बड़ी कमज़ोर लग रही थीं, लेकिन मां के बाल एकदम रेश्मी, लंबे, बालों में रंग नहीं लगाती थीं, फिर भी सफेद बालों के बीचों बीच थोड़े बहुत काले बालों की चमक भी देखते बनती थी...कुदरत का तोहफ़ा ही कह सकते हैं इसे.. बालों पर कंघी फेरते हुए मां हंस कर कहने लगी (मैं और बेटा उस समय उन के कमरे में थे) – “देखो, शरीर में जान नहीं, और बालों को देखो..।” बड़ा तरस आया मुझे मां की उस बात पर ...मैंने झट से कहा कि ऐसा भी क्या है बीजी, शरीर भी ठीक है और लखनऊ जाएंगे तो आपको और भी ठीक लगेगा।

हम लोग एयरपोर्ट पर पहुंचे- जीप से उतर कर गेट तक पहुंचने में जो चंद कदम चलना था वह भी मां को मुश्किल लग रहा था ..मैंने थामा हुआ था मां का हाथ, बीवी आगे गईं और उन्होंने गेट पर ही व्हील-चेयर भिजवा दी.. व्हील चेयर पर बैठते वक्त पता नहीं मुझे क्या हुआ...मैंने बेटे को बीजी का माथा चूमते देखा तो मेरी आंखें भर आईं...बीजी को पता नहीं लगा होगा, लेकिन बेटा मुझे कहने लगा- “चिंता मत करो, पापा, सब ठीक हो जायेगा, मैं हूं न आप के साथ!”

हम लोग लखनऊ पहुंच गये ..१५ नवंबर की बात है .. पहली मंज़िल की सीढ़ियां चढ़ना ही आज मां के लिए दुश्वार हो गया था। बहुत ही आहिस्ता आहिस्ता से ऊपर चढ़ी और आते ही लेट गईं..कहने लगीं कि मुझे आराम करना है, जब कुछ खाना होगा तो मैं खुद मांग लूंगी..
लेकिन उस दिन से मां की हालत और भी गिरती चली गई.. खाने के बारे में तो मैं पहले ही कितनी बार लिख चुका हूं...अब तो मां की नहाने की भी हिम्मत न रही.. दो चार दिन बीत गये ...मां नहाने के नाम से ही घबराने लगीं.. बच्चों की तरह कह देतीं...मेरा बिल्कुल भी मन नहीं है, जब मुझे अच्छा लगेगा, नहा लूंगी। मैं चुप कर जाता।

फोन पर बड़ी बहन सारी खबर लेती रहतीं ...बहन वाट्सएप मैसेज करती तो मां उस का भी जवाब न दे पाती, जवाब तो तभी देती अगर उस मैसेज को पढ़ती ...अब तो बिस्तर से उठना भी मां के लिए दुश्वार था.. मां के कमरे का टीवी लगना ही बंद हो गया..क्रिकेट के मैच में अब बीजी की रूचि जाती रही...

एक दो दिन के बाद मैं पीजीआई के पेन क्लीनिक में गया। उन्होंने कहा कि मारफीन के पैच लगाना बंद कर दीजिए और दर्द वाली टेबलेट जो पहले चलती थी, वही चलने दीजिए, दर्द तो अभी बढ़ेगा ही...लेकिन अगर कुछ भी आराम नहीं लगेगा तो पीठ में एक इंजेक्शन लगा देंगे जिस से दो-तीन महीने तक इन्हें दर्द में आराम रहेगा।

बस, ऐसे ही फिर मैं पीजीआई के डाईटिशियन से मिला...खाने पीने का क्या करें?..उसने बहुत अच्छे से बताया कि चने का सत्तू दही में डाल कर, सूजी की खीर, दलिया, मट्ठा, मखाने पीस कर दूध में डालकर, इतनी खिचड़ी, उतनी दाल, इतनी चपाटी, इतना दूध....लेकिन मरीज की इच्छा हो तभी तो बात बने...मां इतनी कमज़ोर हो चुकी थी कि मां का कंगन अकसर कलाई से खिसक कर, कोहनी पार कर के बाजु के उपरी हिस्से में पहुंच जाता ...

और कभी कभी मां ऐसे ही कह देती कि अब तो यह दर्द मेरी जान लेकर ही जायेगा।

और मां जो इतनी साफ-सफाई का ध्यान रखती थीं, वह नहाने के नाम से ही घबराने लगीं...कपड़े भी मां ने वही पहने थे जो बंबई से आते वक्त पहने थे..मैंने जब सब कुछ बहन को बताया तो वह दस दिन बाद २६ तारीख को लखनऊ पहुंच गईं। जीजा जी भी साथ आये थे। मां उन से अच्छे से मिलीं..हाल चाल लिया। अगले दिन उन्होंने जाना था, मुझे कागज पर लिख कर मां ने कहा कि जीजा जी को लिफाफे में डाल कर पैसे दे देना..। मैंने वैसा ही किया।

बहन लखनऊ आने के बाद मां के खाने-पीने का और ध्यान रखने लगी...लेकिन खाती-पीती तो भी बीजी बहुत ही कम थीं। नहाना-धोना-कपड़े बदलना..कुछ भी नहीं। बीजी को मुंबई से आये पंद्रह दिन हो चुके थे और सिर के बाल धुले नहीं थे, कंघी भी नहीं हुई थी ..वह बहन को भी उन के बालों में कंघी नहीं करने देती थीं..बैठने तक की ताकत भी जाती रही, कईं बार बहन उन की पीठ के पीछे सहारा बन कर बैठ जाती ताकि बीजी चंद मिनट के लिए बैठ पाएं...बीस दिन हो गये ऐसे ही ...एक दो बार जैसे ही मां बाथरूम से फारिग हो कर आती और पलंग के किनारे पर बैठने लगतीं-- बहन उस समय प्यार-मनुहार से बड़ी मुश्किल से उनका पायजामा बदल देतीं.. कमीज बदलने के लिए तो बीजी फिर भी राजी नहीं होतीं.. कभी गीले तौलिये से मां की टांग, बाजू और पेट बहन या मां थोड़ा सा पोंछ देते..बहन पावडर लगा देती।

मां को वहां आये १० दिन हो गये .. पांच दिसंबर के आस पास उन्होंने जाने की बात कही कि मैं कुछ दिनों के लिए हो आती हूं...बीजी तो वैसे भी कुछ करने नहीं देतीं, न कपड़े बदलने देती हैं, न ही बाल ठीक करने देती हैं और नहाने के नाम से ही गुस्सा हो जाती हैं। लेकिन यह भी बात तो थी कि बंबई से आए हुए बीस दिन हो गये थे और मां का सिर भी इतने दिनों में नहीं धुला था..न ही मां धुलवाने के लिए मानती थीं...यह मैं लिख तो रहा हूं जब कि मुझे पता है कि मां उन दिनों दर्द की वजह से कितनी लाचार थीं।

यही कोई सात आठ दिसंबर की बात थी...मैं अपने हेयर-ड्रेसर को घर ले कर आया कि मां सिर तो धुलवाती नहीं हैं, चलिए मां के बाल थोड़े हल्के ही करवा देते हैं, क्योंकि हमें पता था कि इस तरह से जुड़े हुए बालों के कारण मां को खुद कितना कष्ट हो रहा होगा, लेकिन शायद यह हमारा ही विचार था, क्योंकि मां को तो अपनी जान की सुध नहीं थी, बालों का वह क्या करतीं!! लेकिन मां ने हेयर-ड्रेसर से बाल ट्रिम करवाने से भी साफ मना कर दिया और लेटी रहीं। मैं उसे वापिस छोड़ आया।

उन दिनों मां ज़्यादा बोल भी नहीं पाती थीं.. लिख कर बात कह देती थीं, एक नोट बहन को लिख कर दिया कि तुम्हें ऊपर से मैं ठीक लगती हूं लेकिन मैं अंदर से ठीक नहीं हूं। मुझे जितना खाना चाहिए होता है मैं खा लेती हूं। फिर एक दिन एक और नोट लिख कर दिया कि मेरी एफडी जो स्लेटी अटैची में पड़ी हैं, प्रवीण को दे देना, सिल्क की जो साड़ियां तुझे अच्छी लगती हैं, ले जाना ...और भी ऐसी कुछ बातें मां ने शेयर की थीं। वे सब नोट मेरे पास हैं। और आठ दिसंबर के दिन मां ने जब एक नोट लिखा वह आखिरी साबित हुआ ...वह शायद मां ने कांपते कांपते हाथों से लिखा था... लिखा था कि बंबई में विशाल जो मेरे लिए बिस्कुट लाता था, वह मुझे बहुत अच्छे लगते थे, मैं चाय के साथ तीन चार खा लिया करती थीं, अब तो कुछ खाने की इच्छा ही नहीं होती। यह मां का अंतिम लिखा हुआ नोट हमारे पास है।

रूपये पैसे का मां ने कईं बार पहले भी मुझे बताया था कि क्या करना है...मां अपने पैसे को नेक कामों में लगाया करती थीं, मैं भी उस पैसे को मां की इच्छा के अनुसार नेक काम में ही लगा रहा हूं...और सारा पैसा मां की इच्छा अनुसार ही खर्च करूंगा।

तभी मां इतनी कमज़ोर हो गईं कि बाथरूम में भी वह बिना सहारे के नहीं जा पाती थीं। मैं मां के पास ही बेड के साथ रखने वाली एक कुर्सी-नुमा-कमोड ले आया ... दो तीन दिन से मां उसी पर बैठ कर पेट साफ कर लेतीं..। उन दिनों मां का पेट साफ भी नहीं हो रहा था, कभी मेरी बहन और कभी मेरी बीवी एनेमा ऱख देतीं...थोड़ी सी राहत लगती मां को कुछ घंटों के लिए, फिर वही परेशानी बनी रहती। दस दिसंबर की सुबह मुझे कहती हैं कि अस्पताल चल कर एनीमा करवाएंगे किसी नर्स से, उन्हीं अच्छे से यह काम करना आता है। मैंने कहा - “ठीक है, बीजी, जैसा आप कहेंगे।”

नौ दिसंबर की रात में बहन का जयपुर वापिस लौटने का कार्यक्रम बना। उन का जाने का मन नहीं था। लेकिन उन्हें लगा कि जा कर स्टूडेंस का कुछ सिलेबस कवर करना है, आगे २५ से शीतकालीन अवकाश होते ही वह वापिस आ जायेंगी ..दो तीन यह बात हुई ...लेकिन मैं हर बार यही सोचता कि अब तो आप जा रही हैं, २५ किस ने देखी? लेकिन यह बात मेरी जुबान पर आते आते अटक जातीं कि मैं भी मां के बारे में भी कितना अशुभ सोचने लगा हूं!

मैं भी आता जाता मां के सिर पर हाथ फेर देता जैसा वह मेरी नन्ही सी बिटिया हों..कभी कभी माथा भी चूम लेता.. तबीयत कुछ ज़्यादा ही नरम दिख रही थी मां की .. पता नहीं उन दिनों हर वक्त ऐसे लगता था जैसे घर में मातम पसरा हुआ है ...सच में ऐसा ही लग रहा था। मां ने भी शायद मेरे हाव-भाव भांप लिये होंगे ..एक दिन मुझे इशारा करके पलंग के पास बुलाती हैं ...यह भी ८ दिसंबर की ही बात थी...कहने लगी ...देख, प्रवीण, मां बाप हमेशा तो किसी के नहीं रहते। मैंने कहा कि यह क्या बात हुई, बीजी, आप तो ठीक हो, और दवाई ले रहे हो, पूरी तरह से ठीक हो जाएंगे आप....लेकिन उस दिन वह मुझे कुछ खास बात कहना चाहती थीं... “देख, मां बाप हमेशा नहीं रहते, यह आना-जाना तो लगा ही हुआ है, दुनिया ऐसे ही चलती है- इसलिए अपने दिल को बड़ा रखना होता है।”

दो तीन दिन पहले मैंने बड़े बेटे को कहा कि वह भी लखनऊ का प्रोग्राम बना ले, वह अगले ही दिन आ गया। उसे आने का मां को कुछ ज़्यादा पता नहीं ...जिस के आने पर मां नाच उठती थीं, आज मां को कुछ पता ही नहीं था, यह देख कर वह भी बडा़ उदास था। दस दिसंबर का दिन बड़ा मनहूस था...दोपहर में भटूरे-छोले बने थे लेकिन मेरी खाने की इच्छा ही नहीं हुई ... पता नहीं मुझे बड़ी बेचैनी हो रही थी...कितने कितने घंटे मां को पेशाब ही नहीं हो रहा था, ऐसे लग रहा था जैसे कि मां के अंग फेल हो रहे थे।

दो तीन दिन पहले छोटे बेटे को छुट्टी थी और वह भी आया हुआ था.. दस दिसंबर की रात को उसने वापिस दिल्ली जाना था.. लेकिन उसे कुछ पता चला कि ११ तारीख को क्लास नहीं है तो हम लोग स्टेशन जा कर टिकट रद्द करवा के आ गये।

घर आने के कुछ देर बाद मैंने मां से कहा कि बीजी, कुछ खा लो। बीजी ने कहा कि अच्छा, थोड़ी खिचड़ी ले आओ, बस दो चम्मच। मैं किचन में गया , थोड़ी खिचड़ी डाली, लेकर आया..उसे बेड के पास ही साइड-टेबल पर रखा। इतने में देखा कि बीजी को कमोड पर बैठने की इच्छा हो रही थी, बैठा दिया, पांच सात मिनट बैठी रहीं बीजी उस पर....ज़ोर लगाती रहीं, फिर उठ गईं ...बेड पर बैठने लगीं, मैं बीजी को पकड़ कर बैठाने की कोशिश कर रहा था कि छोटा बेटा जो वहीं बीजी के पलंग पर ही लेटा हुआ था, वह भी मेरे साथ आ गया..बीजी, जैसे ही पलंग पर बैठीं, तुरंत कहने लगीं कि मेरा सांस नहीं निकल रहा...मैंने कहा कोई बात नहीं, अभी ठीक हो जायेंगे...चिंता मत करें....इतने में बीवी भी अंदर आ गईं...वह भी मां को देखने लग गईं...

सांस में आने वाली दिक्कत कम नहीं हुई ...सांस उखड़ने लगी ...बीजी, कुछ कहना चाह रही थीं लेकिन कह नहीं पा रही थीं...तब तक बड़ा बेटा भी अंदर आ गया था। बीजी अपने दोनों हाथों से दोनों पोतों का हाथ कस के पकड़ना चाह रही थी, लेकिन यह हो नहीं पाया, उन दोनों ने ही दादी का हाथ थामे रखा ...मैं सिमरन करने लगा.. सांस उखड़ी रही ...पांच सात मिनट हो गये ...मां आवाज़ लगाने पर भी कुछ नहीं बोल रही थीं, आंखें भी पत्थर जैसी होने लगी थीं...धीरे धीरे जैसे अंदर धंस रही हों, बीजी का सिर मेरी गोदी में था, बीवी ने शूगर की जांच भी की उसी वक्त, लेकिन उस में भी कुछ विशेष बदलाव नहीं था। बीवी ने भी कहा कि हालत कुछ ठीक नहीं लग रही, अगर आप कहें तो अस्पताल से ऐम्बुलेंस बुलवा लूं? …अब इसमें मैंने क्या जवाब देना था ...मैंने कहा कि देख लो, जैसे ठीक लगे। लेकिन मां थी कि हर पल जैसे हमारे हाथों से रेत की तरह खिसकती जा रही थी। मैं सिमरन करते करते बार बार बीजी के कानों में बोलता जा रहा था, बीजी...बीजी ..लेकिन बीजी सुन्न हो चुकी थीं...छोटा बेटा रोने लगा था, और बड़ा भी मेरी तरह दिल ही दिल में सुबक रहा था .. मैंने उन के सिर पर हाथ रख कर दिलासा दिया...बीवी ने मां की छाती को बार-बार दबा कर कार्डियक-मसॉज की चार पांच मिनट ...लेकिन कुछ नहीं हुआ...बस, उस ने रोते हुए मेरी तरफ़ देखा। उसी वक्त डिक्लेयर हो गया कि चल बसी जी अपनी बीजी, चली गई बहुत दूर। लेकिन मैं तो पत्थर बन चुका था।

मेरे आंसू नहीं निकले क्योंकि मुझे लगता है कि बीजी मुझे इतनी प्यारी थीं और मैं पिछले महीनों मन ही मन इतना रो चुका था कि अब मेरे आंसू सूख चुके थे..और जो बचे भी होंगे वह दो दिन पहले मां ने वह बात कह के सुखा दिए थे कि हिम्मत रखना, दिल को बड़ा रखना, मां-बाप हमेशा साथ थोड़े ही न रहते हैं! आंसू भी ऐसे सूखे कि दिखावा करने के लिए दो-चार भी न बचे थे...और इस की बिल्कुल ज़रूरत भी तो नहीं थी। कुछ फोन करने थे, किए....फिर मैं मां के साथ उन के डबल-बैड पर ही लेट कर सिमरन करने लगा... बीच बीच में एक ठंडी आह सी भर जाती या एक आंसू भी निकल आता ..बचपन से लेकर अब तक मां के साथ बिताए दिनों की मीठी यादों के झोकें आ रहे थे . मैंने अपनी प्यारी मां के सिर पर हाथ रखा हुआ था, उस के प्यारे पोतों ने भी उसे प्यार की झप्पी डाल रखी थी, बार बार बीजी का मुंह और माथा चूमे जा रहे थे .. मैंने सब को आराम करने के लिए कह दिया। सिमरन करते करते हम बीजी के साथ उसी डबल-बैड पर उन पर ओड़ा हुआ कंबल ओड़ कर कब सो गये पता ही नहीं चला ... वह तो चिरनिद्रा में सो चुकी थीं और कभी न टूटने वाली उन की इस गहरी नींद देख कर हमें भी नींद आ गई । सुबह उठे तो अड़ोस-पड़ोस वाले आना शुरू हुए।

अब मां तो चली गई...अब लिखने के लिए क्या रहा...जी हां, अगले दिन शाम के वक्त दाह-संस्कार हुआ, दो दिन बाद अस्थियां लेने गये, फिर गोमती नदी में उन्हें प्रवाह किया गया, शांति-पाठ भी हुआ...सब कुछ हुआ.. लेकिन उन के बारे में कुछ लिखने लायक है नहीं, जब संस्मरण का किरदार ही गायब हो गया तो आगे क्या लिखें, अब तो मां से जुड़ी मधुर यादों के साथ खेलने और उन में खो जाने का वक्त है।

थोड़ा मां के बारे में बताने की इच्छा हो रही है ..मां को पढ़ने लिखने का बहुत शौक था, मां की किताबों की पूरी लाइब्रेरी थी. धार्मिक और आध्यात्मिक किताबें भी बहुत सारी थीं लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से मां को धार्मिक किताबें नहीं सुहाती थीं। मुझे अकसर कहतीं कि मुझे अब ये धार्मिक किताबें पढ़ने में मज़ा नहीं आता...वही बातें बार बार। प्रवीण, मेरी बात सुन, जो किसी की किस्मत में लिखा है वह तो होना ही है, होनी अटल है ...इसलिए मुझे तो अब हल्की-फुल्की कहानियों की किताबें पढ़ने में ही मजा आता है ..मैंने भी बीजी के पास मुंशी प्रेम चंद की कहानियों की छोटी छोटी किताबें और कुछ दूसरी छोटी छोटी कहानियों की किताबें रख दीं जिन्हें वह बड़े चाव से पढ़ती थीं।

मां को सीखने का बहुत शौक था...अभी कुछ महीने पहले ही तो किसी सखी से पेच-वर्क सीखा था और कितनी बेड-शीटों के ऊपर अपने हुनर की छाप छोड़ गई हैं। अपने सूट अधिकतर अपने आप ही सिल लिया करती थीं, कुछ ही साल पहले उन्होंने सिलाई भी सीखी थी। जब से वजन गिर रहा था ढीले हुए कपड़े खुद ही मशीन पर ठीक कर लिया करती थीं, और फिर मैंने देखा कि शायद जब मशीन उठाने की हिम्मत न बची तो हाथ से ही सूईं-धागे से ही अपने कपडे़ ठीक कर लिया करतीं। मुंबई में इतनी तबीयत खराब थी ..एक दिन मेरी बुशर्ट की पाकेट थोड़ी उधड़ गई, तुरंत मेरी बहन को बोला कि मुझे सुई-धागा दे ...उसे पाकेट को तुरंत हाथ से बढ़िया टांक दिया।

छः सात साल पहले बाकायदा कंप्यूटर सीखा था- डेस्कटॉप पर पहले तो काम करती थीं, फिर लैपटाप पर भी काम करने लगी थीं, और स्मार्ट फोन का इस्तेमाल तो छोटे बेटे ने सिखा दिया था... और थोड़ा सीखने के बाद फिर वह अपने आप भी कोशिश करती रहतीं। जब मैं उर्दू सीख रहा था तो मेरे साथ उर्दू सीखने लगीं- बिल्कुल बच्चों जैसा उत्साह देखा बीजी में, टहलने जातीं तो वहां उन की इतनी सहेलियां बन जातीं, हर एक साथ हंसते हुए मिलना-बात करना, किसी को भी हमेशा सही सलाह देना। और अकसर डॉयरी भी लिखती थीं, अहम् बातें उस में दर्ज किया करती थीं और कहती थीं कि जब पोतों के बच्चों होंगे तो कोई यह तो नहीं कहेगा कि हमारी परदादी अनपढ़ थी...उन को भी पता चलना चाहिए कि उन की परदादी पढ़ी लिखी थी- यह कह कर हंसने लगती थी।

तकनीक के मामले में भी किसी से कम नहीं थी, मुझे हमेशा मां के कमरे का एलसीडी चलाने के लिए मां की मदद लेनी पड़ती थी ..दो रिमोट थे, उन्हें पता था कि कौन सा बटन किस का पहले दबाना है, उस के बाद कौन सा बटन दबाना है ..लेकिन मैं अब तक भी सीख नहीं पाया, अब तो शायद ज़रूरत भी नहीं क्योंकि मां के कमरे वाला एससीडी चलाने का मन ही नहीं करता...मैं पढ़ता ज़रूर हूं वहां पर बैठ कर।

हां, तो मेरी प्यारी बीजी से जुड़े संस्मरण लिखते लिखते मेरी आंखों में जमे आंसू पिघलने शुरू हो गये और मैं इन पन्नों को लिखते हुए पता नहीं कितनी बार रोया...मैं ही नहीं, बच्चों ने भी इसे पढ़ा तो वे भी बीच बीच में सुबकने लगते ...कहते कि पापा, हमें इतना कुछ पता भी नहीं था!

मां के गुजर जाने के चंद रोज़ बाद मैं महान शायर फैज़ अहमद फैज़ साहब की ये पंक्तियां पढ़ रहा था ..

बोल की लब आज़ाद हैं तेरे

बोल ज़बां अब तक तेरी है..

बोल ये थोड़ा वक्त बहोत है

बोल जिस्म-ओ-ज़बां की मौत से पहले

बोल कि सच ज़िंदा है अब तक

बोल जो कुछ कहना है कह ले..

एक बात तो है जो मैं वैसे भी सब से शेयर करता हूं कि ऐसी कोई बात नहीं जो मैंने मां से कहनी हो और मैंने न कही हो और मुझे यकीं है कि मां भी मेरे साथ हमेशा अपने अपना मन खोल लेती थी। फिर भी १० दिसंबर की उस मनहूस रात को बीजी अपने पोतों के हाथों को अपने हाथों में लेकर कुछ कहना चाह रही थीं, लेकिन बिना कहे ही उन के प्राण पखेडू उड़ गये .. उन्हें समय ही नहीं मिला, शरीर में इतनी शक्ति ही नहीं बची थी, जुबान से बोल निकल ही नहीं पा रहे थे.. इसलिए जब मैंने फैज़ साहब की यह बात पढ़ी कि जब तक बोल सकता है, बोल ले, दिल खोल ले ...वरना सांसों का और हालात का क्या भरोसा !

अब इस संस्मरण को यही विराम लगाने का समय आ गया है ...आप के मन में यह प्रश्न शायद होगा कि मां की उम्र क्या थी, मेरा जवाब है कि उम्र का क्या है, वह तो सिर्फ़ एक संख्या है ... असली होता है जीने का ज़ज्बा ..जो बीजी में कूट कूट के भरा हुआ था.. पिछले कुछ महीनों से तो वह मुझे मेरी नन्ही मुन्नी प्यारी सी छोटी बिटिया ही लगने लगी थी।

मां तुम्हें सलाम, ढ़ेरों प्यार, मुझे पता है आप जहां भी हो, मस्त हो, मजे में हो, आप की आत्मा शांत है .. फिर किसी जन्म में मिलेंगे, मैं हमेशा आप का ही बेटा बनना चाहूंगा.. बहुत बहुत प्यार-दुलार।

डॉ प्रवीण चोपड़ा

(२००७ से हिंदी ब्लॉगिंग सीखने की कोशिश में लगा हूं.)

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लखनऊ में रहता हूं।

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कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,649,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,688,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,56,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 119 : बहुत याद आती हैं बीजी .. // डॉ प्रवीण चोपड़ा
संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 119 : बहुत याद आती हैं बीजी .. // डॉ प्रवीण चोपड़ा
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