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उपन्यास - अमावस्या का चांद - भाग 1 // बैरिस्टर गोविंद दास // अनुवाद - दिनेश माली

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भाग 1

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अमावस्या का चांद

उपन्यास

बैरिस्टर गोविंद दास


अनुवाद

दिनेश माली


आमुख

ओड़िया साहित्यकार डॉक्टर प्रसन्न कुमार बराल द्वारा संपादित ओड़िया पत्रिका ‘गोधूलि लग्न’ में जब मैंने बैरिस्टर गोविंद दास के अन्यतम उपन्यास ‘अमावस्या का चांद’ पर उनकी समीक्षा पढ़ी तो मैं भाव-विभोर हो गया। मुझे ऐसा लगा मानो मेरे हाथ में अमूल्य साहित्य का कोई छुपा हुआ बहुत बड़ा खजाना लग गया हो। तत्काल मैंने भुवनेश्वर में लगे पुस्तक मेले से इस उपन्यास को खरीदने की व्यवस्था की और खरीदकर उसे बड़े चाव से पढ़ने लगा। जैसे-जैसे मैं उसे पढ़ते जा रहा था, वैसे-वैसे इस उपन्यास के मुख्य पात्र काउल में मुझे कभी भगवतीचरण वर्मा के कालजयी उपन्यास ‘चित्रलेखा’ के नायक ‘बीजगुप्त’ तो कभी मुंशी प्रेमचंद के विख्यात उपन्यास ‘सेवासदन’ के गजाधर पांडे तो कभी धर्मवीर भारती के कालजयी उपन्यास ‘गुनाहों के देवता’ का नायक ‘चंदर’ की याद ताजा हो जाती थी। सभी पात्र एक से बढ़कर एक थे! उपन्यास के महिला पात्रों में नीरा ‘सेवासदन’ की ‘सुमन’ लगती तो मनीषा ‘गुनाहों के देवता’ की ‘सुधा’ दिखने लगती तो बाईजी ‘चित्रलेखा’ की नर्तकी चित्रलेखा की प्रतिच्छाया प्रतीत होने लगती थी। इतने सारे पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं, अभिनेयता, मनोस्थितियों को एक कलेवर में समेटकर उपन्यासकार बैरिस्टर गोविंद दास ने भारतीय साहित्य में अपना नाम अमर किया है। ऐसा लगता है कि तत्कालीन हिंदी साहित्य में भी पाप-पुण्य, भाग्य की विडम्बना, शून्य से शिखर तक पहुँचने वाली विचारधारा दृष्टिगोचर थी। ‘सेवासदन’ की वेश्या सुमन को उसका साधु बना पति गजाधर पांडे वेश्याओं के बच्चों को पढ़ाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं में मदन सिंह आदि की मदद से आवासीय विद्यालय ‘सेवासदन’ जैसे खोलने की सलाह देता है तो इस उपन्यास में वेश्या नीरा की आर्थिक मदद कर काउल पतित स्त्रियों के बच्चों को पढ़ाई के लिए स्कूल खुलवाकर उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा लौटा देता है। दोनों आदर्शवादी घटनाओं का सादृश्य बहुत ज्यादा है!

पाप-पुण्य को परिभाषित करने के लिए उपन्यासकार ने भगवतीचरण वर्मा की ‘चित्रलेखा’ के पात्रों जैसे श्वेतांक, विशालदेव, कुमारगिरि, बीजगुप्त, नर्तकी चित्रलेखा, यशोधरा और दृश्य-विधान के लिए पाटलिपुत्र के राजगृह, हिमालय की प्राकृतिक छटा आदि का सहारा लिया है। असल में उपन्यासकार की दृष्टि में पाप-पुण्य व्यक्ति विशेष की मानसिक स्थिति और समय के सापेक्ष अपना रूप बदलते रहते हैं। धर्मवीर भारती के ‘गुनाहों का देवता’ में सुधा की उपन्यास के अंत में अपने प्रेमी चंदर के सामने प्रसव-पीड़ा के दौरान मृत्यु हो जाती है तो बैरिस्टर गोविंद दास के उपन्यास ‘अमावस्या का चांद’ में मनीषा की कैंसर हॉस्पिटल में अपने प्रेमी काउल के लापता होने के गम में और उसके लौटने का इंतजार करते-करते मृत्यु हो जाती है। दोनों उपन्यासों की वेदना भी काफी हद तक मिलती-जुलती है। क्या यह सादृश्य संयोगवश हो सकता है अथवा तत्कालीन भारतीय साहित्यकारों की सम विचारधारा इसके मूल में हैं? जिस तरह ‘गुनाहों का देवता’ सन 1954 में ज्ञानपीठ, दिल्ली से प्रकाशित होकर आज तक अपने 70 संस्करण पूरे कर चुका है, इसी तरह ‘अमावस्या का चांद’ ने सन 1964 में ओड़िशा बुक स्टोर, कटक प्रकाशित होकर अपने 33 संस्करण पूरे कर चुका है। आज भी दोनों उपन्यास अपनी-अपनी जगह पर लोकप्रियता की पराकाष्ठा पर है। यह देखकर मैंने हिंदी में इस उपन्यास का अनुवाद करने का निश्चय किया। मेरे परम मित्र उमाकांत मोहंती ने मेरे इस निर्णय को और ज्यादा सशक्त कर दिया। उनके अनुसार अगर हिन्दी का कोई श्रेष्ठ प्रकाशक इस पांडुलिपि को प्रकाशित करता है तो यह उपन्यास भी अवश्य हिंदी जगत में विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लेगा। इस तरह मैंने साहित्यिक अनुवाद कर अपना धर्म निभाया। अब परिणाम अच्छे रहेंगे या नहीं, यह तो पाठकों की प्रतिक्रिया और उपन्यास के भाग्य पर निर्भर करेगा। फिर भी मैं आशान्वित हूं कि यह अनूदित उपन्यास आज नहीं तो कल, हिंदी-जगत में कामयाबी के शिखर को अवश्य स्पर्श करेगा।

ईश्वर से यही कामना करते हुए

दिनेश कुमार माली

तालचेर

अभिमत

1.बैरिस्टर गोविंद दास और अमावस्या का चाँद:-

“ अंगूर खाओ, स्वास्थ्य के लिए अच्छे हैं;मगर इन अंगूरों के रस का क्वाथ गिलास में लेकर पियोगे तो तुम्हें मद्यपान करने वाला कहा जाएगा। एक नारी का उपभोग करोगे तो समाज तुम्हें उसका पति कहेगा, मगर ज्यादा नारियों का उपभोग करोगे तो समाज तुम्हें लंपट कहेगा। भविष्य में अपनी आर्थिक उन्नति के लिए जगन्नाथ जी के सामने धन बांटोगे तो समाज कहेगा धार्मिक, मगर रेस-कोर्स में पैसा कमाने के लिए लॉटरी खरीदोगे तो लोग कहेंगे जुआरी, गैंबलर। ” ये पंक्तियां याद आते ही मेरे स्मृति-पटल पर तरोताजा हो जाता है ओड़िया साहित्य का एक बहुचर्चित उपन्यास- “अमावस्या का चाँद”। उस समय मन में प्रश्न उठता है कि ऐसा कालजयी उपन्यास बैरिस्टर गोविंद दास ने लिखा कैसे?अनगिनत पाठकों के मन में बहुत दिनों से उठ रहे इस प्रश्न का उत्तर खुद गोविंद दास देते हैं:-

वह ढलते शनिवार की आलस भरी दुपहरी थी। कटक विकास प्राधिकरण में स्थित दास भवन में उनसे मिलने के लिए ‘हमारा समय’ अखबार की तरफ से मैं वहां गया था। उस दिन मेरा मन बहुत इच्छुक था, करोड़ों युवाओं के आदर्श प्रतीक चरित्र काउल को सशरीर देखने के लिए।

क्या यह संभव है! क्या भौतिक जगत में एक शरीरधारी मनुष्य आधुनिक युग में काउल बन सकता है?भौतिक विमुक्तता इतनी सहज बात नहीं है! फिर उम्र की ढलान में अगर वह काउल काउल जैसा लगता है- यह जानने की मन में अभिलाषा थी। मन में कामना थी, कामना रूपी घोड़े पर सवार होकर उसे अपनी इच्छा से दौड़ाने की, फिर उस दौड़ के दौरान उस रास्ते पर चुपचाप छोड़कर लौट आता एक दर्शक बनकर यह कहते हुए ‘तू अपने रास्ते पर जा’ और वह फिर अपने रास्ते पर लौट आता था। कह सकते है नए रास्ते की खोज में रेस कोर्स, घोड़े, दर्शक, हार-जीत आदि को पीछे छोड़ कर चलता जा रहा था काउल! अरे, काउल का घर और कितनी दूर है!

प्रिय पाठको! मैं आपको काउल को याद दिलाने की धृष्टता नहीं करूंगा। क्योंकि बैरिस्टर गोविंद दास का ‘काउल’, ‘अमावस्या का चांद’ का ‘काउल’ शायद ओड़िया साहित्य में पहला पात्र है जो जाति-वर्ग-वर्ण-देश की सीमाओं से ऊपर उठकर अंतर्राष्ट्रीय चरित्र का प्रतिनिधित्व करता है। ओड़िया उपन्यासों में ‘अमावस्या का चाँद’ के सर्वाधिक संस्करण (अभी तक 33 बार) प्रकाशित हो चुके है। काउल के चरित्र की सफलता इस बात से उजागर होती है कि 50 वर्षों से अधिक समय से पाठकों को काउल के डायलोग कविता की पंक्तियों की तरह याद हैं। काउल ने ओड़िया पाठकों के हृदय में, सपनों में, आदर्श में, पत्र-भाषा में, सभा-समिति में, आलाप-आलोचना में, साहित्य में ऐसी जगह स्थापित की है, वैसी जगह किसी अन्य ओड़िया उपन्यास के पात्र के भाग्य में नहीं है।

इसलिए काउल से मिलने के लिए हम पहुंच गए उपन्यासकार गोविंद दास के घर और ‘अमावस्या का चाँद’ जैसे कालजयी उपन्यास-रचना की पृष्ठभूमि के गर्त में छिपे हुए कथानक की तलाश करने लगे। गोविंद दास अपनी स्वीकारोक्ति इस तरह करते हैं:-

हरमन हेस के विख्यात उपन्यास ‘सिद्धार्थ’ ने मेरे मन पर गंभीर प्रभाव डाला। जीवन की विभिन्नताओं के भीतर उस पात्र के मूल्यांकन करने का प्रयास मेरे लिए आकर्षण का अन्यतम कारण था। इसके अतिरिक्त, सिद्धार्थ जिस तरह अंत में गौतम बुद्ध के अष्टांग मार्ग की ‘सम्यक समाधि’ के निकट पहुंचकर जीवन को समझ पाता है, वही कहानी मुझे उद्वेलित करती है। इसलिए मैंने सोचा कि मैं भी एक ऐसे चरित्र को तैयार करूंगा, जो जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में मानवता के मापदंड की कसौटी पर खरा उतरेगा। इस प्रकार इस कहानी का स्केच मुझे मिला हरमन हेस के पास, जिसका ट्रीटमेंट मैंने अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुसार किया।

बड़े मजे की बात है, काउल ओड़िया पात्र नहीं है। इसी तरह मुख्य घटनाएं भी ओड़िशा की नहीं है जैसेकि रेसकोर्स, बाईजी का कोठा-ये सब ओड़िशा में नहीं है। फिर ओड़िया पाठकों के प्रिय पात्र के अंदर जीवंतता है, जीवन खोजने का साहस है, इसलिए उन्हें यह पात्र पसंद आता है। विभिन्न मनस्थितियों वाला ‘काउल’ उनकी इच्छा और अभिलाषा का प्रतीक बन गया है। इसलिए मैं ओड़िशा के वृहत्तर पाठक वर्ग के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं।

आप जानना चाहते होंगे कि वह काउल मैं हूं या कोई और। नहीं तो और कौन है? कहानी इस प्रकार है-

कोई भी पात्र, कथावस्तु या विचार धारा अगर लेखक की अनुभूति नहीं है, मेरा विश्वास है वह कृति पाठक जगत को आंदोलित नहीं कर पाएगी। इस पात्र में आप वह प्रेरणा खुद खोज सकते हैं। मैं जब विलायत से बार-एट-लॉं करके लौटा, उस समय मैंने नहीं सोचा था कि मैं क्या करूंगा। ओड़िशा में रहूंगा या सुप्रीम कोर्ट जाऊंगा या ये सब-कुछ छोडकर कोई और काम करुंगा-ये सारे मेरे सामने प्रश्नवाचक थे। एक समय ऐसा आया-मैंने निश्चय किया, जीवन जिस रास्ते पर जा रहा है जाए, मेरा काम उसके साथ खेलना है, इस जीवन से खेलने की हिम्मत मुझे मेरे अतीत की पृष्ठभूमि ने प्रदान की।

छात्र जीवन से ही दुस्साहसिक काम करने की मन में इच्छा थी। हमारा एक मध्यमवर्गीय परिवार था। मेरे मित्रों ने, जो धनी परिवारों से संबंध रखते थे, कटक में पढ़ने का निर्णय लिया, उस समय मेरी कोलकाता की प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ने की इच्छा हुई। उस समय कटक के लड़कों के लिए प्रेसिडेंसी कॉलेज में अध्ययन करना एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने के तुल्य था। प्रेसिडेंसी कॉलेज से बी॰ए॰करने के बाद मैंने ऑक्सफोर्ड में बार-एट-लॉं के लिए अप्लाई किया। ऑक्सफोर्ड में पढ़ना भी कोई आसान बात नहीं थी। पहले तो वहाँ सीट पाना भी कोई साधारण बात नहीं थी, उसके बाद पढ़ाई का खर्च निकालना भी इतना सहज नहीं था। मगर मुझे सीट मिल गई और मैंने पिताजी से आगे पढ़ने की हठ करने लगा। पिताजी ने मना नहीं किया। ऋण लेकर मुझे ऑक्सफोर्ड भेजा गया। मुझे आज भी याद है- जब मैंने घर में बैरिस्टर बनने की इच्छा जाहिर की तो हमारे घर में मानो वज्रपात हो गया। क्योंकि बैरिस्टरी की पढ़ाई करने के लिए उस समय शायद कटक शहर में दस-बारह जनों को छोडकर किसी के पास इतना पैसा नहीं था।

मैं पढ़ाई में अच्छा था। उसके अलावा, उस समय मेरा समाजवादी आंदोलन से घनिष्ठ संबंध था। सन 1951 में छात्र-आंदोलन के समय जेल भी गया था। बीच में समाजवादी अखबार ‘कृषक’ का संपादन कर रहा था। मैं अपने पिता की इकलौती संतान था। वे चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूँ। अगर मैं चाहता तो उस समय आई॰ए॰एस॰ बन सकता था। परंतु ये सब छोड़कर मैं वकील बना। ओड़िशा में पहले वकालत शुरु की। यहां खूब प्रतिष्ठित होने के बाद अचानक मेरी इच्छा हुई दिल्ली जाकर सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने की। उस समय ओड़िशा में जो मुझे प्रतिष्ठा मिली थी, उससे आराम से धनोपार्जन किया जा सकता था। मगर मैंने दिल्ली में नए सिरे से अपने आप को स्थापित करने के लिए संघर्ष करना ज्यादा पसंद किया। शायद मेरे मन में भविष्य के प्रति एक पुंजीभूत आग्रह था, जो मुझे आगे-से-आगे खेल खेलने के लिए प्रेरित कर रहा था।

उस समय और एक ऐसी घटना घटी, जो इस उपन्यास की मुख्य कहानी है। उस समय हस्तशिल्प पर सरकार ने टैक्स लगाया। सरकारी संस्थाओं छोड़कर प्राइवेट संस्थाओं को इस टैक्स के घेरे में ले लिया गया। प्राइवेट संस्थाओं ने इसका विरोध किया। मैंने इस केस को लिया। इस संबंध में निर्णय लेने के लिए अशोक मेहता कमेटी का गठन किया गया। वह कमेटी कोलकाता से आई थी। कमेटी के आगे कानूनन दावा करने के लिए उद्योगों की तरफ से मुझे दायित्व दिया गया। इस काम के लिए मुझे कोलकाता में लगभग तीन महीने रहना पड़ा था। मैं ग्रेट ईस्टर्न होटल में ठहरा हुआ था। वहां के वातावरण ने मुझे जिंदगी को चारों दिशाओं में फेंककर एक भिन्न-शैली का जीवन-यापन कर रहे मानव को बचाने प्रेरणा दी। वहीं पर मैंने उस समय ‘अमावस्या का चाँद’ उपन्यास लिखा। वहीं पर ‘काउल’ का जन्म हुआ। सच कहूँ तो फाइव स्टार होटल के उस परिवेश से ‘माटी का मनुष्य’ का बरजू जैसा पात्र कभी नहीं आ सकता था।

‘काउल’ नाम की एक संभावना है। मैंने जानबूझकर यह नाम दिया, जो किसी जाति और भौगोलिक सीमा से परे होगा। लोग अपनी निगाहों से उस काल्पनिक पात्र को देखें। इसलिए काउल केवल एकमात्र चरित्र नहीं है। वह एक इच्छा है। वह एक प्रेरित अभिलाषा है। (तथ्य सौजन्य: द टाइम्स ऑफ इंडिया/हमारा समय)

2.अमावस्या और चाँद: एक मुग्ध अनुभव:-

अमावस्या एक ऐसी तिथि है, उस रात को चंद्रमा नहीं दिखता है। यह चंद्र का भाग्य है। सौर-मंडल में सूर्य, चंद्र, तारे, ग्रह, नक्षत्र सभी विज्ञान-सम्मत गतिपथ पर चक्कर लगाते हैं, अमावस्या के दिन वे अपने पथ पर स्थिर हो जाते हैं इसलिए दुनिया के लोग उसे देख नहीं पाते। इतनी बलवती युक्ति का भी मनुष्य के आवेग और भाव-प्रवणता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। सूर्य पृथ्वी के चारों तरफ घूर्णन करता है या पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ चक्कर लगाती है, यह तथ्य हजारों साल पहले प्रकाश में आ चुका हैं। अर्ध शतक पूर्व बैरिस्टर गोविंद दास ने अमावस्या तिथि में जो चंद्र-दर्शन करवाया था, वह आज तक ओडिया पाठकों को आह्लादित करता है, पुलकित करता है। उस अमावस्या के चाँद की शीतल चांदनी में पाठकों को वही अनिर्वचनीय, अतुलनीय विमुग्ध अनुभूति होती है।

सन 1964 दिसंबर महीने की प्रथम अमावस्या तिथि की रात जो चाँद उगा था, आज उसे पचास साल से ज्यादा हो रहे हैं। तैंतीस संस्करणों में प्रकाशित इस उपन्यास ने ओड़िया साहित्य में एक सर्वकालीन रिकॉर्ड स्थापित किया हैं। जबकि साठ, सत्तर, अस्सी दशक के प्रकाशन संबन्धित अनेक असुविधा थी, ओड़िशा की साक्षरता दर और पुस्तक प्रचार-प्रसार नेटवर्क इत्यादि पर भी विचार करना होगा।

उपन्यासकार ने उपन्यास का नामकरण अमावस्या और चाँद जैसे दो परस्पर विरोधी शब्दों से किया है, उसकी आत्मा और उसके पात्रों की जीवन-शैली के अनुरूप कभी कुत्सित, घृण्य, कदाकार दृश्य प्रस्तुत होते हैं तो कभी ज्योत्सना-विधौत-चांदनी रात की तरह शीतल, कोमल, मधुर, स्वप्नमय, अविश्वसनीय आकर्षक दृश्य।

काउल इस उपन्यास का केंद्रीय चरित्र है। वह फिर इसका नायक भी है। ऐसे पात्र की परिकल्पना करने की पृष्ठभूमि में उपन्यासकार गोविंद दास ने हरमन हेस के प्रसिद्ध उपन्यास ‘सिद्धार्थ’ के प्रभाव को स्वीकार किया हैं। फिर उनका कहना हैं कि उन्होंने कोलकाता के पंच-सितारा होटल ‘ग्रेट ईस्टर्न’ में ‘अमावस्या का चाँद’ उपन्यास की रचना की। वहाँ पर ‘माटी का मनुष्य’ का बरजू जैसा पात्र के निर्माण की कोई संभावना नहीं थी।

यह बात सत्य है। उपन्यास का सारा वर्णन कोलकाता का है। पार्क स्ट्रीट, रेस-कोर्स, गंगा का तट, हावड़ा स्टेशन, चौरंगी, रेड लाइट एरिया, बाई जी का कोठा, ट्राम लाइन, चर्च के दृश्यों में पचास साल पुराना कोलकाता महानगर साफ नजर आता है।

पचास साल पहले के ओडिया उपन्यास की भाषा, रचना-शैली और संरचना की दृष्टि से ‘अमावस्या का चाँद’ पूरी तरह से अलग है। केवल अलग ही नहीं, वरन पूरी तरह से अभिनव है। उपन्यास के प्रथम परिच्छेद में पाप-पुण्य की एक विस्तृत और सूक्ष्म व्याख्या है, इसलिए उपन्यासकर ने पाटलिपुत्र के राजमहल और पात्रों के लिए शिष्य श्वेतांक और विशाल देव के प्रसंग का सहारा लिया है। इस प्रसंग की मंदिर की मुखशाला की तरह आवश्यकता थी। ‘अमावस्या का चांद’ उपन्यास में जितने पात्रों को पाठकों का सामना करना पड़ा है, वे सब प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से काउल से संपृक्त है। फिर वही काउल पाप-पुण्य के दोराहे पर खड़ा होकर एकाकी निसंग मनुष्य प्रतीत होने लगता है। इस समाज द्वारा तैयार की गई पाप-पुण्य की सीमा-रेखा के भीतर काउल उलझ जाता है और उसके पक्ष-विपक्ष में अपना मंतव्य देने के अधिकार खो देता है।

वास्तव में उपन्यास का अंत ही इसके प्रारंभिक अध्याय की कहानी है। उपन्यास समाप्त होते-होते काउल अदृश्य हो जाता है। अंत में मरणासन्न मनीषा काउल का इंतजार करते-करते अनुरागी मन से उसके फोटो का आलिंगन करती है और कामना करती है कि आखिरकर एक बार काउल उसके निर्जन कमरे में लौट आए, जहां मनीषा की पवित्र आत्मा मृदु प्रेम के हिल्लोल शैली के धूप से सुरभित परिवेश में निर्निमेष नेत्रों से अनंत काल के लिए उसकी प्रतीक्षा में है।

यहां से पुस्तक प्रारंभ होती है, “काउल, तुम्हें न किसी प्रकार की पीड़ा है और न ही किसी प्रकार का पश्चाताप। भाग्य के खिलाफ न तुम्हारा कोई विरोध है और न ही आत्मसमर्पण। विजय की न कोई लालसा है और नहीं पराजेय का भय। तुम एक निर्विकार, निर्विछिन्न पुरुष हो। तुम्हारे जीवन में हजारों आंधी-तूफान आने के बाद भी तुम बीथोवन की चौथी सिंफोनी की तरह निश्चल, शांत हो। ....”

काउल के लापता होने की इस प्रारम्भिक और अंतिम परिस्थिति का मध्यवर्ती इलाका काउल की चारण भूमि हैं। इसके भीतर पाठक देखते हैं, काउल के विलासमय जीवनचर्या की संक्षिप्त रूपरेखा। और बीच में देखते हैं, काउल के पूर्वजों की राजशाही जीवनशैली, उनकी प्राचुर्य धन-संपदा और उनके मनमौजी विलासी जीवन से अवक्षय होते जीर्ण-स्वरूप को।

उपन्यास पढ़ते समय ऐसा लगता है, गोविंद दास काउल को एक चरित्र भाव से नहीं, वरन् भिन्न-भिन्न प्रकार के कसौटी पत्थरों से घिसकर एक मुग्ध चेतना के उज्जवल अनुभवों की संरचना करते जा रहे हैं। इसलिए जो पाठक काउल को सुरा-सुंदरी, जुआ, रेस-कोर्स, झूठ, छल-कपट, कालाबाजारी की अंधी गली के भीतर देखते हैं, वही काउल अचानक पाठकों के सामने असीम त्याग, स्नेह, श्रद्धा, नीरव प्रेम और निस्वार्थ तपस्या जैसे सद्गुणों के साथ प्रकट होते हैं।

काउल की धुंधली छबि उसके व्यक्तित्त्व के कारण अविश्वसनीय हो जाती है, पाठकों के लिए अचरज की बात है। अंतिम फैसला नहीं ले पाने की असहायता के कारण पाठक छटपटाने लगता है, उसका स्वरूप एक बड़े प्रश्न में बदल जाता है।

उपन्यास की कहानी वैश्या नीरा से शुरू होती है। उपभोग की समस्त सामग्रियों से परिपूर्ण इस नीरा के शरीर का नक्शा जो कई पुरुषों को आकर्षित करने का सामर्थ्य रखता है, वहाँ यह स्वाभाविक है कि काउल के लिए वह रात्रि की रजनीगंधा बन सकती है। नीरा के साथ रात बिताकर उसे अपना प्राप्य देकर लौटाने के बाद उसके सानिध्य को रात के बुरे सपने की तरह वह नहीं भूल पाता है। काउल की सूक्ष्म अन्वेषण दृष्टि से नीरा को मुक्ति नहीं मिल पाती है।

नीरा से काउल को उसके किशोरावस्था के स्वपनभंग की कहानी पता चलती है। सुना है अर्द्धनिर्मित शरीर के प्रेम के प्रथम कदंब खिलने के समय का विषादपूर्ण नैराश्य। काउल ने इस लावण्यमयी रूप की छटा में बिजली की चमक पैदा करने नीरा में भाड़े के घर में रहने वाले एक गरीब बंगाली परिवार की लड़की निर्मला का अनुसंधान किया।

निर्मला से नीरा। बहुत ही लंबी कहानी। निर्मला टाइपिस्ट बनती है, शिक्षिका बनती है और बीच में सेल्स गर्ल के रूप में काम करती है। मगर कितनी मिथ्या और छलावे वाली ये नौकरियाँ थी! सभी को नीरा का आकर्षक यौवन चाहिए। मनमोहक शरीर। नीरा खुद इस शरीर का सामर्थ्य देखकर विस्मित हो जाती है। इस शरीर के बदले नीरा प्रतिष्ठा, धन और भौतिक शरीर के सारे सुख हासिल कर लेती है। मगर अपने मातापिता को सामाजिक सम्मान और स्वीकृति नहीं दे पाती है।

एक वैश्या के माता-पिता होने के कारण उनके दुख, यंत्रणा, नैराश्य और हीन-भावना की कोई सीमा नहीं होती है।

काउल ने नीरा के साथ पांच-सितारा होटल में रात भले ही बिताई हो, मगर वह समाज में नीरा को फिर से प्रतिष्ठा दिलाते हैं। काउल की आर्थिक सहायता से नीरा गरीब और वैश्याओं के बच्चों के लिए एक आदर्श विद्यालय खोलती है। बुढ़ापे में नीरा के माता-पिता को नूतन समाज में एक स्निग्ध सूर्योदय दिखाई देता है। और उन्हें आत्म-सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार मिल जाता है।

काउल के विडंबित किशोर जीवन की कहानी इस उपन्यास का दूसरा अध्याय है। मुंबई की सड़कों और फुटपाथ पर अखबार बेचकर जीवन-यापन करने वाला काउल आधुनिक व्यवसाय के कौशल के गूढ-रहस्य को सीख लेता है। यहां पर सलीम के सहयोग से जीवन सीखते हुए काउल का परिचय एक वैश्यालय की माया से हो जाता है। नर्क का जीवन जी रही इस महिला की प्रत्यक्ष सहायता करने के लिए काउल स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई पूरी करता है। यहीं पर वह एक्सपोर्ट-इंपोर्ट के व्यवसाय की जटिल गणित भी सीखता है। यहीं पर काउल शेयर मार्केट, स्टॉक एक्सचेंज के सपने बुनना शुरू करता है। असीमित धन उपार्जन का सरल रास्ता और संक्षिप्त कर्म-सूची के रूप में वह इसे दिखता है। रास्ते के फुटपाथ से काउल ऊपर उठकर एक शीर्षस्थ उद्योगपति बन जाता है।

उपन्यास के परवर्ती तीसरे अध्याय में पाठकों का साक्षात्कार रेस-कोर्स के जुए, नशा में मदमस्त और उद्धत काउल से होता है। रेस-कोर्स में बाजी लगाकर बारंबार पराजित होने वाला काउल स्थविर और स्थितप्रज्ञ बना रहता है। इस जुए के नशे में सामायिक सहयोगी सुंदरी जैनी के कटाक्ष और उत्तेजित मंतव्य भी काउल को प्रभावित नहीं कर पाते। भयंकर आर्थिक क्षति झेलने के बाद जब काउल को विजय प्राप्ति का सुनिश्चित अवसर मिलता है। उस समय रेसकोर्स की बाजी लगाकर जीतने के सुनिश्चित अवसर का प्रत्याख्यान कर देता है। रेस-कोर्स के मैदान के एक परित्यक्त कोने में बड़ी यंत्रणा से छटपटाते एक असहाय बूढ़े की आर्त पुकार सुनकर वह गणित के सारे हिसाब-किताब को भूल जाता है। जब घोडे की बुकिंग काउल के पास आती है तो वह रोग-ग्रस्त बूढ़े की चिकित्सा के लिए चला जाता है। वह घोड़ा रेस कोर्स में विजयी हो जाता है। काउल निश्चिंत अर्थ प्राप्ति से वंचित होकर बहुत सारे पैसे हार कर भी सेवाभाव, जीवन-रक्षा और मनुष्यता का अतुलनीय अविश्वसनीय उदाहरण प्रस्तुत करता है।

अगले अध्याय में काउल पागल होकर सुंदरी रूपसी नृत्यांगना बाई जी के पास जाता है। बाई जी के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए लालायित काउल एक कामासक्त दुर्बल पुरुष के रूप में सामने आता है, मगर बहुत कम समय के लिए। बाईजी एक विवाहिता विधवा और एक बच्ची की मां है-यह बात पता चलने पर काउल का व्यक्तित्व अचानक रूपांतरित हो जाता है। नारीत्व और मातृत्व दोनों के प्रति सम्मान और कर्तव्य की प्रशंसनीय पदक्षेप काउल के व्यक्तित्व की उज्जवल दिशा को पाठकों के समक्ष रखता है।

इसी तरह फ़्लैश खेल में जीतने-हारने के दौरान काउल निर्वाचित होकर शहर के नगरपालिका का चेयरमैन बन जाता है। सारे शहर वाले काउल के व्यक्तित्व का आकलन कर उसे बड़ी-बड़ी उच्च पदवियों पर आसीन करते हैं, जिसे काउल कपटपूर्ण और मिथ्या समझता है। उसके लिए यह सिंहासन कांटो से भरा होता है। अपनी कलंकित जीवनधारा के सामने वह अत्यंत ही मलिन और क्षुद्र महसूस करता है। तुरंत ही जनता के सामने वह अपने मुखौटे को खोल देता है। निर्वाचन की जीत, शासन का प्रलोभन और शक्ति का प्रबल आकर्षण उसे क्षणिक और तुच्छ प्रतीत होते हैं। पीछे रह जाते है उद्धत अंहकार, शासन के प्रति कर्तव्य, शक्ति का लोभ विजयोल्लास और जनता की जय-जयकार ध्वनि।

बहुत दृष्टिकोण से उपन्यास का अंतिम अध्याय असाधारण और अनन्य है। यहां काउल से मुलाकात करते समय मन संवेदना से आर्द्र हो जाता है। त्याग, तितिक्षा, सेवा, मनुष्यता, प्रेम विश्वास और अभिमान सभी भीगकर काउल के प्रेम की विफलता पाठकों को उसकी तरफ अहैतुक भाव से आकर्षित करते हैं। एक जीवन को निश्चित मृत्यु के द्वार से लौटाकर लाने का गौरव काउल को महिमामंडित करता है, वही प्रेम की चरम विफलता पाठकों के मन में दया मिश्रित भाव पैदा करती है।

कैंसर पीड़ित मनीषा की चिकित्सा के लिए काउल उसे चेन्नई से स्विट्ज़रलैंड के ड्यूरीक शहर ले जाता है। मृत्यु का शीतल स्पर्श अनुभव करने वाली मनीषा ऑपरेशन के बाद पुनर्जीवन प्राप्त करती है, केवल काउल की विपुल आर्थिक सहायता और संवेदना के कारण। चिकित्साधीन कैंसर पीड़ित मनीषा के प्रेम में पड़कर असहाय काउल के मन में प्रचुर प्रत्याशा जाग उठती है। इधर नारी जीवन का सर्वस्व निशर्त काउल के पांवों तले समर्पण करने के लिए व्याकुल और व्यथित मनीषा के भीतर सलिता भभकने लगती है। मगर मनीषा भारतीय नारी है। लज्जा, संकोच, संभ्रमता और विनम्रता की प्रतिमूर्ति है वह। काउल के प्रति निशर्त प्रेम की सांद्रता प्रगाढ़ होने पर वह चुपचाप काउल के सामान्य इशारे का इंतजार करती है।

ईर्ष्या को छोड़ देने से प्रेम संभव नहीं है।

इसलिए मनीषा काउल के हृदय में उसके प्रति आकर्षण को परखने के लिए देसाई के साथ पूर्व संबंध और उसके साथ विवाह होने का एक कृत्रिम वातावरण पैदा करती है। मगर काउल नहीं समझ पाता है। जीवन का सर्वस्व त्याग कर नि:स्व काउल अंत में मनीषा के मिथ्या- प्रेम के खातिर अतुलनीय त्याग दिखाकर शहर से गायब हो जाता है। काउल के इस प्रकार के आचरण से मर्माहत होकर मनीषा अंत में मृत्यु की गोद में समा जाती है। मगर वह एक पत्र लिखकर करुण निवेदन करती है काउल को उसकी कोठरी में पर्दापण करने हेतु अनंत ऊष्म आमंत्रण देकर। यहीं पर उपन्यास ‘अमावस्या का चांद’ समाप्त होता है। इस उपन्यास का अंतिम बिन्दु है- हर रात आकाश में चंद्रमा रहता है। केवल अमावस्या को उसे नहीं देखा जा सकता है। मगर बैरिस्टर गोविंद दास केवल ओड़िया पाठकों के लिए यह दुर्लभ अवसर प्रदान किया है। आप भी उपन्यास को पढ़कर अमावस्या की घनी अंधेरी रात में चंद्र-दर्शन का स्वर्गिक आनंद और शाश्वत अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं।

-डॉ॰ प्रसन्न कुमार बराल,

संपादक-गोधूलि लग्न

तालचेर

(क्रमशः अगले भागों में जारी...)

उपन्यास 1821266059187847271

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