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(बालकथा) गुस्‍से का परिणाम - अंकुश्री

एक थी दीयासलाई की तीली और एक थी पानी की बूंद. दोनों आसपास बैठी बातें कर रही थीं. तीली ने कहा, ‘‘मैं नन्‍हीं होती हुई भी बड़ी शक्‍तिशाली हॅू. चाहूं तो पूरी दुनिया को जला कर भस्‍म कर दूं.''

‘‘तुम्‍हें अपनी शक्‍ति का गलत अंदाज है.'' बूंद ने कहा, ‘‘ मैं चाहूं तो क्षण भर में तुम्‍हें शक्‍तिहीन बना दूं.''

‘‘बड़ी आई है तीसमार खां बनने ! तुम्‍हें पहले ही बता चुकी हॅू कि मैं दुनिया को भस्‍म कर सकती हॅू. तब तुम्‍हारी क्‍या औकात ? जब मैं अपनी शक्‍ति का प्रयोग करूंगी तो तुम पल भर में वाष्‍प बन कर आसमान का रास्‍ता पकड़ लोगी.'' बूंद की बात सुन कर तमतमाते हुए तीली ने कहा.

भला बूंद कब चुप रहने वाली थी. शांत स्‍वर में धीरे से बोली, ‘‘सब समय की बात है. बड़े-बड़े शक्‍तिशाली भी समय की मार खा कर शक्‍तिहीन हो जाते हैं. उसी प्रकार समय पाकर शक्‍तिहीन भी शक्‍तिशाली बन जाते हैं.''

‘‘जिसमें शक्‍ति ही नहीं हो वह भला क्‍या खा कर शक्‍ति दिखलायेगा ?'' तीली ने अकड़ कर कहा, ‘‘जिसमें शक्‍ति है, समय उसकी शक्‍ति कैसे खत्‍म कर सकता है ?''

‘‘खैर ! समय की बात समय आने पर पता चलेगा.'' बूंद ने बात समाप्‍त करने के गरज से कहा. लेकिन तीली अपनी शक्‍ति के गुमान में थी. बोली, ‘‘समय का रोना वे रोते हैं जो कमजोर होते हैं. तुम कमजोर हो, समय का राग अलापो !''

‘‘मैं बहस द्वारा अपनी शक्‍ति प्रमाणित नहीं करना चाहती.'' बूंद ने कहा.

‘‘क्‍या कहा ? मैं शक्‍ति प्रमाणित करने के लिये बहस कर रही हॅू ?'' तीली गुस्‍से में आ गयी थी, ‘‘जिसमें शक्‍ति ही नहीं हो, वह बहस से क्‍या प्रमाणित कर पायेगा ?''

‘‘अच्‍छा ! अब चुप रहो !! बहुत देर से गाल बजा रही हो.'' बूंद का यह कहना था कि तीली अपना संतुलन खो बैठी. वह गुस्‍से में कांपने लगी. बूंद की ओर बढ़ती हुई तीली ने कहा, ‘‘मैं गाल बजा रही हॅू ? मैं अभी तुम्‍हें खत्‍म किये बिना नहीं रहूंगी. आखिर तुमने अपने आप को समझा क्‍या है ?''

तीली गुस्‍से में अपना आपा खो चुकी थी. वह बूंद से टकरा गयी. बूंद से उसके टकराने भर की देर थी. उसका बारूद गीला हो गया. वह बेकार हो गयी थी. यह उसके गुस्‍से का परिणाम था. बूंद पूर्व की तरह शांत पड़ी हुई थी.

--0--

0 अंकुश्री

8, प्रेस कालोनी, सिदरौल,

नामकुम, रांची (झारखण्‍ड)-834 010


E-mail : ankushreehindiwriter@gmail.com

बालकथा 8451528261323364152

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