नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

लघु कहानी - होनी - अनहोनी // देवेन्द्र सोनी

P_20180418_094257_1_1_1
         सर्वगुण सम्पन्न रमाशंकर ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उनका स्वभाव ही उन्हें राजा से रंक बना देगा । वे हमेशा अपने मित्रों से कहते थे - होनी तो होकर रहती है फिर , फिकर किस बात की । जब जो होना होगा तब वह होकर रहेगा ।


       मित्रों के समझाने पर भी वे कभी इस बात को मानते ही नहीं थे कि - कई होनी हमारे स्वभाव या अभिमान के कारण अनहोनी में भी बदल जाया करती हैं जो परिवार से और समाज से विलग कर देती है ।       समय जब तक साथ देता है तब तक तो सब चल जाता है लेकिन बदलता समय अक्सर नारकीय जीवन जीने को भी मजबूर कर देता है । रिश्ते - नाते तो दूर की बात अपने ही बेटा - बहू भी इस अनहोनी को होनी मानकर मौन साध लेते हैं और फिर जो दुर्दशा होती है वह असहनीय और दारुण होती है।


       मित्रों की बात सुनकर वे ठहाका लगाते और कहते - मेरे साथ ऐसा कभी नहीं होगा । मैंने अपने बच्चों को कड़े अनुशासन में पाला - पोसा है। उन्हें उच्च शिक्षा दी है । वे मेरी हर बात को आज्ञा समझ कर मानते हैं और मेरी पत्नी की तो हिम्मत ही नहीं मेरी किसी बात का विरोध करने की । फिर भला - कोई मुझसे दूर क्यों होगा ? निश्चित ही मेरे संस्कार फलित होंगे।


     वे मित्रों से कहते - दरअसल मेरे जिस स्वभाव को तुम अभिमानी कहते हो वह मेरा कड़ा अनुशासन है। मित्र भी मुस्कुराकर कह देते - जब कोई पारिवारिक अनहोनी होगी तब पता चलेगा तुम्हें ,रमाशंकर ।अंदर ही अंदर सब खदक रहे हैं । समय रहते समझ जाओ पर वे इसे अनसुना कर देते और बात आई गई हो जाती ।


      .....लेकिन यही अभिमान जिसे वे कड़ा अनुशासन मानते थे कालांतर में उनके जीवन में अनहोनी बनकर सामने आया । उनके कथित संस्कारित और अभिमानी बच्चे धीरे - धीरे विषैले हो गए और एक - एक कर बेटा - बहू उन्हें अकेला छोड़ गए । रिश्ते नाते तो वैसे भी अच्छे समय तक ही साथ देते हैं मगर इन विपरीत परिस्थितियों में भी हारे नहीं , अडिग ही रहे और जब तक हाथ पैर चले रमाशंकर किसी के मोहताज नहीं हुए और न ही उन्होंने अपने स्वभाव में परिवर्तन कर कोई समझौता किया ।


           सामंजस्य न कर पाने से एक जानी - मानी प्रतिष्ठित हस्ती का हश्र यह हुआ कि जीवन का उत्तरार्ध उन्हें अकेले लड़ते - झगड़ते वृद्धाश्रम से शांतिधाम तक गुजारना पड़ा। जिस घर को चलाने के लिए वे जीवन भर संघर्ष करते रहे । अपनी अंतिम यात्रा में उन्हें वह भी नसीब न हुआ।


      अंतिमयात्रा से लौटते वक्त उनके मित्र यही चर्चा कर रहे थे - काश ! रमाशंकर अपने स्वभाव में बदलाव कर परिवार से सामंजस्य बैठा लेते तो यह नियत ( मृत्यु ) होनी - अनहोनी में न बदलती और वे परिवार के साथ नाती - पोतों के संग अपनी खुशहाल जिंदगी बिता लेते।


              - देवेन्द्र सोनी , इटारसी

1 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.