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प्रेरणा पथ - प्रेरक एवं शिक्षाप्रद कहानियाँ // राजेश माहेश्वरी

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प्रेरक एवं शिक्षाप्रद कहानियाँ राजेश माहेश्वरी प्रेरणा के स्रोत अपनी व्यथा को कथा मत बनाइये इसे दुनिया को मत दिखाइये कोई नहीं बांटेगा आपकी ...

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प्रेरक एवं शिक्षाप्रद कहानियाँ

राजेश माहेश्वरी


प्रेरणा के स्रोत

अपनी व्यथा को

कथा मत बनाइये

इसे दुनिया को मत दिखाइये

कोई नहीं बांटेगा आपकी पीड़ा

स्वयं को मजबूर नही

मजबूत बनाइये

संचित कीजिये

आत्म शक्ति व आत्म विश्वास

कीजिये आत्म मंथन

पहचानिये समय को

हो जाइये कर्मरत

बीत जाएगी व्यथा की निशा

उदय होगा सफलता का सूर्य

समाज दुहरायेगा

आपकी सफलता की कथा

आप बन जाएंगे

प्रेरणा के स्रोत।


ये रचनायें समर्पित हैं मेरी पत्नी श्रीमती पदमा माहेश्वरी को।

शुभकामनाओं के साथ।

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आत्म कथ्य

जीवन में जन्म की पहली श्वांस से मृत्यु की अंतिम श्वांस तक मानव संघर्षरत रहता है। हम कल्पनाओं को हकीकत में बदलने हेतु प्रयासरत रहते हैं।

कभी खुशी कभी ग़म के बीच जीवन के 62 बसंत बीत गये। जो कुछ देखा, सुना और समझा उन विचारों को कहानी के माध्यम से व्यक्त किया है। ये रोचकता के साथ साथ, प्रेरणास्पद भी रहें, ऐसा मेरा प्रयास है।

रचनाओं को सजाने, सँवारने में श्री राजेश पाठक ‘ प्रवीण ‘ एवं श्री देवेन्द्र राठौर का अमूल्य सहयोग प्राप्त होता रहा है। मैं उनका हृदय से आभारी हूँ।

राजेश माहेश्वरी

106, नयागांव हाऊसिंग सोसाइटी

रामपुर, जबलपुर ( मÛप्रÛ) 482008

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अनुक्रमणिका

क्रमांक कहानी का नाम

1* आत्मविश्वास

2* विद्यादान

3* लक्ष्य

4* उत्तराधिकारी

5* निस्वार्थ सेवा

6* असली सुंदरता

7* श्रममेव जयते

8* चापलूसी

9* नकलची

10* सुबह का भूला

11* आदमी और संत

12* अच्छे दिन

13* अंतिम इच्छा

14* नाविक

15* प्रजातंत्र

16* जीवन का सत्य

17* स्वर्ग एवं नर्क

18* मोक्ष का आनंद

19* सच्ची तीर्थयात्रा

20* कचौड़ी वाला

21* लक्ष्मी जी का वास

22* चयन

23* प्रायश्चित

24* अंतिम दान

25* आनंद

26* बुद्धिमानी और अवसरवादिता

27* पतंग

28* विश्वास

29* घोड़ी वाला

30* संस्कार

31* विदाई

32* सेवा

33* श्रेष्ठ कौन

34* विनम्रता

35* जिद

36* चीकू

37* स्वार्थपूर्ण मित्रता

38* स्वरोजगार

39* सच्ची मित्रता

40* दीपावली पूजन

41* पागल कौन

42* संयम

43* अहंकार

44* हृदय परिवर्तन

45* हिम्मत

46* व्यथा

47* हार जीत

48* मानव सेवा

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1* आत्मविश्वास

कुछ वर्षों पूर्व नर्मदा के तट पर एक नाविक रहता था। वह नर्मदा के जल में दूर-दूर तक सैलानियों को अपनी किश्ती में घुमाता था। यही उसके जीवन यापन का आधार था। वह नाविक बहुत ही अनुभवी, मेहनती, होशियार एवं समयानुकूल निर्णय लेने की क्षमता रखता था। एक दिन वह किश्ती को नदी की मझधार मेंं ले गया। वहाँ पर ठंडी हवा के झोंकों एवं थकान के कारण वह सो गया।

उसकी जब नींद खुली तो वह, यह देखकर भौंच्चका रह गया कि चारों दिशाओं में पानी के गहरे बादल छाए हुए थे। हवा के तेज झोंकों से किश्ती डगमगा रही थी। आँधी-तूफान के आने की पूरी संभावना थी। ऐसी विषम परिस्थिति को देखकर उसने अपनी जान बचाने के लिए किसी तरह किश्ती को एक टापू तक पहुँचाया और स्वयं उतरकर उसे एक रस्सी के सहारे बांध दिया। उसी समय अचानक तेज आँधी-तूफान और बारिश आ गई। उसकी किश्ती रस्सी को तोड़कर नदी के तेज बहाव में बहती हुई टूटकर टुकड़े-टुकड़े हो गयी।

नाविक यह देखकर दुखी हो गया और उसे लगा कि अब उसका जीवन यापन कैसे होगा ? वह चिंतित होकर वहीं बैठ गया। उसकी किश्ती टूट चुकी थी और उसका जीवन खतरे में था। चारों तरफ पानी ही पानी था। आंधी, तूफान और पानी के कारण उसे अपनी मौत सामने नजर आ रही थी। उसने ऐसी विषम परिस्थिति में भी साहस नहीं छोड़ा और किसी तरह संघर्ष करते हुये वह किनारे पहुँचा। उसकी अंतरात्मा में यह विचार आया कि नकारात्मक सोच में क्यों डूबे हुए हो ? जब आंधी, तूफान और पानी से बचकर किनारे आ सकते हो तो फिर इस निर्जीव किश्ती के टूट जाने से दुखी क्यों हो ? इस सृष्टि में प्रभु की सर्वश्रेष्ठ कृति मानव ही है, तुम पुनः कठोर परिश्रम से अपने आप को पुनर्स्थापित कर सकते हो।

यह विचार आते ही वह नई ऊर्जा के साथ पुनः किश्ती के निर्माण में लग गया। उसने दिनरात कड़ी मेहनत करके पहले से भी सुंदर और सुरक्षित नई किश्ती को बनाकर पुनः अपना काम शुरू कर दिया। वह मन ही मन सोचता था कि आँधी-तूफान मेरी किश्ती को खत्म कर सकते हैं परंतु मेरे श्रम एवं सकारात्मक सोच को खत्म करने की क्षमता उनमें नहीं हैं। मैंने आत्मविश्वास एवं कठिन परिश्रम द्वारा किश्ती का नवनिर्माण करके विध्वंस को सृजन का स्वरूप प्रदान किया है।

2* विद्यादान

परिधि एक संभ्रांत परिवार की पुत्रवधू थी। वह प्रतिदिन अपने आस-पास के गरीब बच्चों को निशुल्क पढ़ाती थी। उसकी कक्षा में तीन चार दिन पहले ही एक बालक बब्लू आया था। बब्लू की माँ का देहांत हो चुका था और पिता मजदूरी करके किसी प्रकार अपने परिवार का पालन पोषण करते थे। वह प्रारंभिक शिक्षा हेतू आया था। बब्लू शिक्षा के प्रति काफी गंभीर था। वह मन लगाकर पढ़ना चाहता था।

एक दिन अचानक ही उसका पिता नाराज होता हुआ आया और बच्चे को कक्षा से ले गया। वह बड़बडा रहा था, कि मेडम आपके पढ़ाने का क्या औचित्य है, मैं गरीब आदमी हूँ और स्कूल की पढ़ाई का पैसा मेरे पास नहीं है। इसे बड़ा होने पर मेरे समान ही मजदूरी का काम करना है। यह थोडा बहुत पढ़ लेगा तो अपने आप को पता नहीं क्या समझने लगेगा। हमारे पड़ोसी रामू के लड़के को देखिए बारहवीं पास करके दो साल से घर में बैठा है। उसे बाबू की नौकरी मिलती नहीं और चपरासी की नौकरी करना नहीं चाहता क्योंकि पढ़ा लिखा है। आज अच्छी अच्छी डिग्री वाले बेरोजगार है जबकि बिना पढ़े लिखे, छोटा मोटा काम करके अपना पेट पालने के लायक धन कमा लेते है। आप तो इन बच्चों को इकट्ठा करके बडे-बडे अखबारों में अपनी फोटो छपवाकर समाजसेविका कहलाएँगी परंतु मुझे इससे क्या लाभ? इतना कहते हुए वह परिधि की समझाइश के बाद भी बच्चे को लेकर चला गया।

एक माह के उपरांत एक दिन वह बच्चे को वापिस लेकर आया और अपने पूर्व कृत्य की माफी माँगते हुए बच्चे को वापिस पढ़ाने हेतु प्रार्थना करने लगा। परिधि ने उससे पूछा कि ऐसा क्या हो गया है कि आपको वापिस यहाँ आना पड़ा? मैं इससे बहुत खुश हूँ कि आप इसे पढ़ाना चाहते हैं, पर आखिर ऐसा क्या हुआ?

बब्लू के पिता ने बताया कि एक दिन उसने लाटरी का एक टिकट खरीद लिया था, जो एक सप्ताह बाद ही खुलने वाला था। इसकी नियत तिथि पर सभी अखबारों में इनामी नंबर की सूची प्रकाशित हुयी थी। उसने एक राहगीर को समाचार पत्र दिखाते हुए अपनी टिकट उसे देकर पूछा कि भईया जरा देख लो ये नंबर भी लगा है क्या? मैं तो पढ़ा लिखा हूँ नही, आप ही मेरी मदद कर दीजिए। उसने नंबर को मिलाते हुए मुझे बधाई दी कि तुम्हें पाँच हजार रूपए का इनाम मिलेगा परंतु इसके लिए तुम्हें कार्यालय के कई चक्कर काटने पडेंगे तब तुम्हें रकम प्राप्त होगी। यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हें पाँच हजार रूपए देकर यह टिकट ले लेता हूँ और आगे की कार्यवाही करने में स्वयं सक्षम हूँ। यह सुनकर मैंने पाँच हजार रूपए लेकर खुशी खुशी वह टिकट उसको दे दी और अपने घर वापस आ गया।

उसी दिन शाम को मेरा एक निकट संबंधी मिठाई फटाके वगैरह लेकर घर आया। उसने मेरी टिकट का नंबर नोट कर लिया था। मुझे बधाई देते हुए उसने कहा कि तुम बहुत भाग्यवान हो, तुम्हारी तो पाँच लाख की लाटरी निकली है। मैं यह सुनकर अवाक रह गया। जब मैंने उसे पूरी आप बीती बताई तो वह बोला कि अब हाथ मलने से क्या फायदा यदि तुम कुछ पढ़े लिखे होते तो इस तरह मूर्ख नहीं बनते इसलिए कहा जाता है कि जहाँ सरस्वती जी का वास होता है वहाँ लक्ष्मी जी का निवास रहता है। यह कहकर वह दुखी मन से वापस चला गया।

“ मैं रात भर सो न सका और अपने आप को कचोटता हुआ सोचता रहा कि बब्लू को शिक्षा से वंचित रखकर मैं उसके भविष्य के साथ खिलवाड कर रहा हूँ। मैने सुबह होते होते निश्चय कर लिया था कि इसको तुरंत आप के पास लाकर अपने पूर्व कृत्य की माफी माँगकर आपसे अनुरोध करूँगा कि आप जितना इसे पढ़ा सके पढ़ा दे उसके आगे भी मैं किसी भी प्रकार से जहाँ तक संभव होगा वहाँ तक पढ़ाऊँगा।“ परिधि ने उसे वापिस अपनी कक्षा में ले लिया और वह मन लगाकर पढ़ाई करने 0लगा।

बीस वर्ष उपरांत एक दिन परिधि ट्रेन से मुंबइ्र्र जा रही थी। रास्ते में टिकट निरीक्षक आया तो उसे देखते ही उसके चरण स्पर्श करके बोला, माँ आप कैसी है ? परिधि हतप्रभ थी कि ये कौन है और ऐसा क्यों पूछ रहा है? तभी उसने कहा कि आप मुझे भूल रही है, मैं वही बब्लू हूँ जिसे आपने प्रारंभिक शिक्षा दी थी। जिससे उत्साहित होकर पिताजी से अथक प्रयासों से उच्च शिक्षा प्राप्त करके आज रेल्वेेेेे में टिकट निरीक्षक के रूप में कार्यरत हूँ। परिधि ने उसे आशीर्वाद दिया एवं मुस्कुरा कर देखती रही। उसके चेहरे पर विद्यादान के सुखद परिणाम के भाव आत्मसंतुष्टि के रूप में झलक रहे थे।

3* लक्ष्य

रामनगर शहर का एक युवक गोविंद, मनमौजी किस्म का व्यक्ति था। वह एक सफल व्यापारी बनकर धन एवं मान सम्मान पाने की लालसा रखता था। उसने अपने जीवन में कई तरह के व्यवसाय करने का प्रयास किया परंतु अपने स्वभाव के अनुसार कुछ समय बाद ही वह उस व्यवसाय को छोडकर किसी दूसरे क्षेत्र में कार्यरत् हो जाता था। इस प्रकार उसका काम आधा अधूरा रहकर उसे भारी आर्थिक हानी उठानी पड़ती थी। उसके साथियों ने उसको ऐसी जीवनशैली बदलने का सुझाव दिया परंतु वह इसे अनदेखी करके अपना सारा धन गँवा बैठा और आर्थिक बदहाली की हालत में आ गया

एक रात उसने सोचा मेरा जीवन तो व्यर्थ हैं। मैं एक असफल व्यक्ति हूँ जो कि किसी भी व्यवसाय में न धन कमा पाया और न ही मान सम्मान प्राप्त कर सका। मुझे अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेनी चाहिये इस विचार से वह नदी की ओर चल पडा। उसे रास्ते में एक संत ध्यान में लीन बैठे दिखे। उसके मन में विचार आया कि मैं मृत्यु पथ पर तो जा ही रहा हूँ मरने से पहले इनका दर्शन लाभ ले लूँ। ऐसा विचार करके वहाँ पर उनके ध्यान समाप्ति का इंतजार करने लगा। ध्यान समाप्ति के पश्चात स्वामी जी ने उससे आगमन का प्रयोजन पूछा तब उसने स्वामी जी को अपने विषय में पूरी बातें विस्तारपूर्वक बता दी।

महात्मा जी उसकी बातें ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। वे बोले कि तुम्हारी सोच सिर्फ यहाँ तक ही सही है कि इंसान को जीवन में उल्लेखनीय कार्य करके अपनी पहचान अवश्य बनाना चाहिये परंतु इसे पाने का तरीका तुम्हारा पूर्णतः गलत था। तुम तो बिना लक्ष्य का निर्धारण किये ही आगे बढते रहे जिस कारण तुम दिग्भ्रमित होकर कही भी नहीं पहुँच सके। तुमने अपने जीवन का अमूल्य समय बेवजह नष्ट किया और अब मृत्यु की बात सोचकर और भी गलत दिशा में कदम बढ़ा रहे हो। तुमने अपने लक्ष्य को पाने के लिये कितनी साधना की ? यह जीवन अमूल्य है एवं प्रभु की दी हुई सर्वोत्तम कृति है, तुम वापस जाओ और अपने पैतृक व्यवसाय में ही अपनी सफलता का लक्ष्य निर्धारित करके कड़ी मेहनत एवं कठोर परिश्रम से उसे प्राप्त करो।

स्वामी जी के निर्देश पर गोविंद वापस शहर आकर अपने पैतृक व्यवसाय में रूचि लेने लगा। उसकी कडी मेहनत और पक्के इरादे से उसका व्यवसाय चमक उठा जिससे धनोपार्जन के साथ साथ उसे र्कीर्ति भी प्राप्त होने लगी। इसलिये कहा जाता है कि व्यक्ति को जीवन में सफल होने के लिये अपने विवेक से लक्ष्य का निर्धारण करके उसे प्राप्त करने की दिशा में सतत प्रयासरत रहना चाहिये।

4* उत्तराधिकारी

मुंबई में एक प्रसिद्ध उद्योगपति जो कि कई कारखानों के मालिक थे, अपने उत्तराधिकारी का चयन करना चाहते थे। उनकी तीन संतानें थी, एक दिन उन्होंने तीनों पुत्रों को बुलाकर एक मुठ्ठी मिट्टी देकर कहा कि मैं देखना चाहता हॅँ कि तुम लोग इसका एक माह के अंदर क्या उपयोग करते हो।

एक माह के बाद जब पिताजी ने तीनों को बुलाया तो उन्होने अपने द्वारा किये गये कार्य का विवरण उन्हें दे दिया। सबसे पहले बड़े पुत्र ने बताया कि वह मिट्टी किसी काम की नहीं थी इसलिये मैंने उसे फिंकवा दिया। दूसरे पुत्र ने कहा कि मैंने सोचा कि इस मिट्टी में बीजारोपण करके पौधा उगाना श्रेष्ठ रहेगा। तीसरे और सबसे छोटे पुत्र ने कहा कि मैने गंभीरता पूर्वक मनन किया कि आपके द्वारा मिट्टी देने का कोई अर्थ अवश्य होगा इसलिये मैंने तीन चार दिन विचार करने के पश्चात उस मिट्टी को प्रयोगशाला में भिजवा दिया जब परिणाम प्राप्त हुआ तो यह मालूम हुआ कि साधारण मिट्टी ना होकर फायर क्ले ( चीनी मिट्टी ) है जिसका औद्योगिक उपयोग किया जा सकता है। यह जानकर मैंने इस पर आधारित कारखाना बनाने की पूरी कार्ययोजना तैयार कर ली है।

उस उद्योगपति ने अपने तीसरे पुत्र की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा करते हुये उसे अपनी संपत्ति का उत्तराधिकारी बना दिया और उससे कहा कि मुझे विश्वास है कि तुम्हारे नेतृत्व एवं कुशल मार्गदर्शन में हमारा व्यापार दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति करेगा। मेरा विश्वास है कि तुम जीवनपथ में सभी को साथ लेकर चलोगे और सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुँचोगे। मेरा आशीर्वाद एवं शुभकामनाएँ सदैव तुम्हारे साथ है।

बेटा एक बात जीवन में सदा ध्यान रखना कि जरूरी नहीं कोई बहुत छोटी चीज छोटी ही हो। मिट्टी का क्या मोल ? लेकिन तुम्हारी तीक्ष्ण बुद्धि और विचारशीलता ने मिट्टी में भी बहुत कुछ खोज लिया। जीवन में सफलता पाने के लिये यह आवश्यक है कि हम छोटी से छोटी चीज के अंदर समाहित विराटता को खोजने का प्रयत्न करें।

5* निस्वार्थ सेवा

कुछ वर्ष पूर्व गुजरात राज्य में भीषण अकाल पड़ा था जिसमें मानव के साथ साथ जानवर भी भोजन के अभाव में काल कलवित हो रहे थे। इसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव गो वंश पर हो रहा था क्योंकि उनके रखवाले मालिक ही जब स्वयं अपनी व्यवस्था नहीं कर पा रहे थे, तो वे पालतू गायों के लिये चारे की व्यवस्था कैसे करते ?

ऐसी विकट परिस्थितियों की जानकारी राजकोट के सांसद द्वारा जबलपुर के अपने कुछ मित्रों को दी गयी। इससे द्रवित होकर उन्होने एक रैक रेलगाडी का चारे से भरकर गो माता की सेवा के लिये भेजने का संकल्प लिया। रेल विभाग द्वारा रेल वेगन एवं किराया आदि इस पुनीत कार्य के लिये माफ कर दिया गया। परंतु समय सीमा भी दो सप्ताह की दी गयी थी।

इस अभियान से जुडे सभी सेवकों ने यह प्रण लिया था कि वे चारे, भूसे को गांव गांव जाकर इकट्ठा करके नियत समय पर उसे भेज देंगे। जब उन्होने गो माता की रक्षार्थ भूसा दान देने का अनुरोध किया तो क्षेत्र के हर छोटे बडे किसान ने अपने दिल और आत्मा से इसका स्वागत करते हुये मुक्त हस्त से दान देना प्रारंभ कर दिया। उन्होने रेल्वे स्टेशन तक भूसा पहुँचाने का बीडा भी अपने कंधो पर ले लिया, और एक सप्ताह के अंदर ही रेल्वे का पूरा प्लेटफार्म भूसे के ढेर से भर दिया। हम सभी यह देखकर बहुत प्रसन्न थे परंतु जब भूसा वेगनों में भरा गया तो पूरा भूसा भरने के बाद भी आधी वेगने खाली थी यह मालूम होते ही हम सभी के चेहरों पर हवाइयाँ उडने लगी कि अब इतना भूसा और कहाँ से आयेगा हम जितना प्रयास कर सकते थे उतना कर चुके थे हम सभी निराशा से भरकर इस पर चिंतन कर रहे थे परंतु मन में कही न कही एक उम्मीद की किरण अवश्य थी कि इस पुनीत कार्य में निस्वार्थ भाव से सेवा का उद्देश्य अवश्य पूरा होगा।

शाम का समय हो गया था तभी साइकिल पर एक दानदाता भूसे का गट्ठा लेकर आया और उसने वह भूसा वेगन में डाल दिया। वह हम लोगों के पास आकर बोला कि ईश्वर करे आपका यह निस्वार्थ मनोरथ पूरा हो ऐसी भावना व्यक्त करके वापिस चला गया। हम उसे दूर जाते हुये देख रहे थे। अंधेरा घिर आया था मैंने अपने साथियें से कहा कि देखो ये दूर छोटी छोटी टिमटिमाती हुयी रोशनीयाँ जैसे इसी तरफ आती हुयी महसूस हो रही है। इसके कुछ देर बाद ही एक के बाद एक भूसे से भरी बैलगाडीयाँ आने लगी और वे स्वयं ही भूसे को वेगनों मे भरने लगे हम यह देखकर भौंचक्के रह गये कि चार पाँच घंटे के अंदर ही पूरे वेगन भूसे से ठसाठस भर चुके थे। हम उस साइकिल से आने वाले दानदाता के बारे में विचार कर रहे थे जैसे कोई देवदुत आकर हमारी निराशा को आशा में बदलकर चला गया हो।

दूसरे दिन ही रेल्वे ने उस रेलगाडी को गुजरात के राजकोट शहर की ओर रवाना कर दिया। हम लोग भी प्रसन्नता पूर्वक यह सोचते हुये रवाना हुये कि निस्वार्थ भाव से किये गये संकल्प अनेकों कठिनाइयों के बाद भी पूरे होते हैं।

6* असली सुंदरता

जबलपुर के महाविद्यालयों में ग्रीष्म ऋतु का अवकाश होने वाला था। छात्रावास में रहने वाली छात्राएँ अपने अपने घर जाने की तैयारी कर रही थी। एक दिन मेंहंदी लगाने वाला कॉलेज के सामने से जा रहा था, छात्राओं ने उसे रोककर अपने अपने हाथों में मेंहंदी लगवाना शुरू कर दिया। इस प्रकार 15 से 20 छात्राओं ने अपने हाथों पर विभिन्न प्रकार से मेंहंदी लगवाई। अब उनमें आपस में एक प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हो गई कि किसके हाथ सबसे सुंदर दिख रहें हैं। वे आपस में किसी निर्णय पर नहीं पहुँच सकीं तभी एक शिक्षिका वहाँ से गुजर रही थी। उन सबने मिलकर उनसे निवेदन किया कि हम लोगों के हाथों को देखकर आप यह बतायें कि सर्वाधिक सुंदर किसका हाथ है।

शिक्षिका ने देखा कि कुछ ही दूरी पर एक प्याऊ लगा हुआ है जिसमें लगभग 20 वर्षीय एक लड़की वहाँ बैठकर आत्मीय एवं प्रेम भाव से प्यासे लोगों को पानी पिला रही है। उसके चेहरे पर संतुष्टि का भाव दृष्टिगोचर हो रहा था। शिक्षिका ने लडकियों को कहा कि देखो तुम्हारे सामने वह लड़की कितना कृत संकल्पित होते हुये निस्वार्थ सेवाभाव से इतनी भीषण गर्मी में हर आने जाने वाले प्यासे को पीने का पानी उपलब्ध कराकर उनकी प्यास बुझा रही है। तुम लोग मेंहंदी लगाकर सिर्फ बाहरी सुंदरता के विषय में सोच रही हो। उसे देखो वह मन से कितनी सुंदर है। शिक्षिका ने कहा कि उनके हाथ सुंदर होते हैं जो मन में सेवा का भाव रखते हुये अच्छे कार्य करते हैं। यही जीवन की सफलता का उद्देश्य एवं रहस्य है।

7* श्रममेव जयते

मुंबई महानगर की एक चाल में रमेश एवं महेश नाम के दो भाई अपनी माँ के साथ रहते थे। रमेश अपनी पढ़ाई पूरी करके शासकीय सेवा में शिक्षक के पद पर चयन का इंतजार कर रहा था। वह बचपन से ही पढ़ाई में काफी होशियार था और शिक्षक बनना चाहता था। महेश का बचपन से ही शिक्षा के प्रति कोई रूझान नहीं था वह बमुश्किल ही कक्षा दसवीं तक पढ़ पाया था। वह क्या काम करता था इसकी जानकारी उसके घरवालों को भी नहीं थी परंतु उसे रूपये की तंगी कभी नहीं रहती थी।

एक दिन अचानक पुलिस उसे पकड़ कर ले गई। रमेश और उसकी माँ को थाने में पहुँचने पर पता चला कि वह एक पेशेवर जेबकतरा है। यह सुनकर उनके पाँव तले जमीन खिसक गई। वे महेश की जमानत कराकर वापस घर लौट आये। माँ ने उससे इतना ही कहा कि यदि तुम यहाँ रहना चाहते हो तो यह घृणित कार्य छोड़ दो। बेटा क्या कभी तुमने सोचा कि जिसक जेब काटी उसके वह रूपये किस काम के लिये थे, हो सकता है कि वह रूपये उसकी माँ के इलाज के लिये हों, उसकी महीने भर की कमाई हो या फिर उसकी त्वरित आवश्यकता के लिये हों। उन्होंने नाराजगी व्यक्त करते हुये उससे बात करना भी बंद कर दिया।

महेश अपनी माँ और भाई से बहुत प्यार करता था। उनके इस बर्ताव से उसे अत्याधिक मानसिक वेदना हो रही थी। वह आत्मचिंतन हेतु मजबूर हो गया और इस नतीजे पर पहुँचा कि बिना मेहनत के आसानी से पैसा कमाने का यह तरीका अनुचित एवं निंदनीय है। उसने मन में दृढ़ संकल्प लिया कि अब वह यह काम नहीं करेगा बल्कि मेहनत से पैसा कमाकर सम्मानजनक जीवन जियेगा चाहे इसके लिये उसे छोटे से छोटा काम भी क्यों ना करना पड़े तो वह भी करेगा।

दूसरे दिन से उसकी दिनचर्या बदल गयी थी, उसने एक चौराहे पर बूट पालिश का काम शुरू कर दिया था। यह जानकर उसकी माँ अत्यंत प्रसन्न हुयी और बोली कि कोई भी काम छोटा नहीं होता है। अपनी मेहनत एवं सम्मानजनक तरीके से कमाये हुये एक रूपये का मूल्य मुफ्त में प्राप्त सौ रूपये से भी अधिक रहता है।

8* चापलूसी

सेठ पुरूषोत्तमदास शहर के प्रसिद्ध उद्योगपति थे। जिन्होंने कड़ी मेहनत एवं परिश्रम से अपने उद्योग का निर्माण किया था। उनका एकमात्र पुत्र राकेश अमेरिका से पढ़कर वापिस आ गया था और उसके पिताजी ने सारी जवाबदारी उसे सौंप दी थी। राजेश होशियार एवं परिश्रमी था, परंतु चाटुरिकता को नहीं समझ पाता था। वह सहज ही सब पर विश्वास कर लेता था।

उसने उद्योग के संचालन में परिवर्तन लाने हेतु उस क्षेत्र के पढ़े लिखे डिग्रीधारियों की नियुक्ति की, उसके इस बदलाव से पुराने अनुभवी अधिकारीगण अपने को उपेक्षित महसूस करने लगे। नये अधिकारियों ने कारखाने में नये उत्पादन की योजना बनाई एवं राकेश को इससे होने वाले भारी मुनाफे को बताकर सहमति ले ली। इस नये उत्पादन में पुराने अनुभवी अधिकारियों को नजरअंदाज किया गया।

इस उत्पादन के संबंध में पुराने अधिकारियों ने राकेश को आगाह किया था कि इन मशीनों से उच्च गुणवत्ता वाले माल का उत्पादन करना संभव नहीं है। नये अधिकारियों ने अपनी लुभावनी एवं चापलूसी पूर्ण बातों से राकेश को अपनी बात का विश्वास दिला दिया। कंपनी की पुरानी साख के कारण बिना सेम्पल देखे ही करोंडो का आर्डर बाजार से प्राप्त हो गया। यह देख कर राकेश एवं नये अधिकारीगण संभावित मुनाफे को सोचकर फूले नहीं समा रहे थे।

जब कारखाने में इसका उत्पादन किया गया तो माल उस गुणवत्ता का नहीं बना जो बाजार में जा सके। सारे प्रयासों के बावजूद भी माल वैसा नहीं बन पा रहा था जैसी उम्मीद थी और नये अधिकारियों ने भी अपने हाथ खड़े कर दिये थे। उनमें से कुछ ने तो यह परिणाम देखकर नौकरी छोड़ दी। राकेश अत्यंत दुविधापूर्ण स्थिति में था। यदि अपेक्षित माल नहीं बनाया गया तो कंपनी की साख पर कलंक लग जाएगा। अब उसे नये अधिकारियों की चापलूसी भरी बातें कचोट रही थी।

राकेश ने इस कठिन परिस्थिति में भी धैर्य बनाए रखा तथा अपने पुराने अधिकारियों की उपेक्षा के लिए माफी माँगते हुए, अब क्या किया जाए इस पर विचार किया। सभी अधिकारियों ने एकमत से कहा कि कंपनी की साख को बचाना हमारा पहला कर्तव्य है अतः इस माल के निर्माण एवं समय पर भेजने हेतु हमें उच्च स्तरीय मशीनरी की आवश्यकता है, अगर यह ऊँचे दामों पर भी मिले तो भी हमें तुरंत उसे खरीदना चाहिये। राकेश की सहमति के उपरांत विदेशों से सारी मशीनरी आयात की गई एवं दिनरात एक करके अधिकारियों एवं श्रमिकों ने माल उत्पादन करके नियत समय पर बाजार में पहुँचा दिया।

इस सारी कवायद से कंपनी को मुनाफा तो नहीं हुआ परंतु उसकी साख बच गई जो कि किसी भी उद्योग के लिये सबसे महत्वपूर्ण बात होती है। राकेश को भी यह बात समझ आ गई कि अनुभव बहुत बड़ा गुण है एवं चापलूसी की बातों में आकर अपने विवेक का उपयोग न करना बहुत बड़ा अवगुण है और हमें अपने पुराने अनुभवी व्यक्तियों को कभी भी नजर अंदाज नहीं करना चाहिये क्योंकि व्यवसाय का उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं होता यदि व्यवसाय को भावना से जोड़ दिया जाये तो इसका प्रभाव और गहरा होता है।

9* नकलची

दुबई के एक रेस्टारेंट में, मैं अपने मित्र रमेश के साथ बैठा हुआ अपने छात्र जीवन की भूली बिसरी यादों के बारे में बातें कर रहे थे। उसे वह दिन अच्छे से याद था जब परीक्षा में अधिकांश छात्र नकल कर रहे थे और वह नकल ना करने के सिद्धांत पर अडिग था। उसका सोचना था कि नकल करके पास होने से अच्छा तो परीक्षा में अनुत्तीर्ण होना है और दुर्भाग्यवश ऐसा ही हुआ वह वार्षिक परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया। उसने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार कर मन लगाकर अध्ययन करना प्रारंभ किया। इसके बाद वह आगे की कक्षाओं में हमेशा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता गया। अपनी पढ़ाई समाप्त करने के बाद वह दुबई आ गया और अपनी ईमानदारी और कठोर परिश्रम से आज वहाँ की एक विख्यात कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत है।

वह आज भी कहता है यदि मैं उस दिन नकल करके पास हो जाता तो जीवन में इतनी तरक्की नहीं कर पाता क्योंकि वह नकल करना मेरी आदत बनकर स्वभाव में आ जाती और मेरा बौद्धिक विकास एवं नैतिक चरित्र अवरूद्ध हो जाता। उसे आज भी अपने पिंटू सर की बातें याद है। वे कहा करते थे कि नकल करने में भी अक्ल की जरूरत होती है। एक बार परीक्षा में पंडित जवाहरलाल नेहरू की जीवनी पर प्रश्न आया तो एक नकलची ने उनकी जगह पर महात्मा गांधी की जीवनी लिख दी। कोई भी नकल क्यों करता है क्योंकि पढ़ाई करने में उसका मन नहीं लगता है और परीक्षा में पास होना चाहता है नकल करके पास हुआ जा सकता है परंतु आज तक कोई भी नकल करके प्रथम श्रेणी प्राप्त नहीं कर सका है। ऐसा व्यक्तित्व जीवन के वास्तविक धरातल पर आने वाली कठिनाईयों से जूझने में असफल रहता है। इसलिये हमेशा ध्यान रखना कि जीवन में नकल करके पास होने से अच्छा तो परीक्षा में अनुत्तीर्ण होकर पुनः प्रयास करना है।

यही जीवन की सफलता का मूलमंत्र है। जीवटता एवं जिजिविषा के साथ संघर्ष करें, आगे बढ़े और अपने लक्ष्य को प्राप्त करें।

10* सुबह का भूला

राजकुमार अपनी पत्नी दो बेटों एवं अपने माता पिता के साथ अपने दो कमरों के मकान में बड़ी कठिनाई से रहता था। उसका बड़ा बेटा बारह बरस का था जो कुछ समझदार हो गया था, छोटा अभी सात बरस का ही था।

राजकुमार की पत्नी बहुत महत्वाकांक्षी थी। वह अपना एकाधिकार चाहती थी। वह प्रायः अपने पति से कहा करती थी कि या तो किसी बड़े घर की व्यवस्था करो या फिर माता-पिता के अलग रहने का प्रबंध कर लो ताकि सारी समस्याओं का हल निकल आए। उसकी हमेशा की इस बात से परेशान होकर एक दिन उसने अपने माता पिता से इस कठिनाई के विषय में चर्चा की। बेटे की परेशानी के देखते हुये उन्होंने सहर्ष ही वृद्धाश्रम में रहने की सहमति व्यक्त करते हुये कुछ दिन पश्चात् वहाँ चले गये।

राजकुमार के दोनों बेटे दादा दादी के चले जाने से बहुत उदास हो गये क्योंकि वे उन्हें बहुत प्यार करते थे। अवकाश के दिन वह उन्हें अपने दादा दादी से मिलवाने ले गया। वे जाकर उनसे लिपट गये। फिर उन्होंने अपने दादा-दादी से पूछा कि वे यहाँ रहने क्यों चले आए। दादा-दादी से कोई उत्तर देते नहीं बना। उन्होंने कहा कि यह तुम अपने पापा से ही पूछ लेना। घर आकर दोनों बेटे अपने माता-पिता के पीछे पड़ गये तो पिता ने उन्हें समझाया कि घर छोटा होने के कारण उन्हें ऐसा करना पड़ा।

रात को जब सब लोग सो रहे थे तब भी उसके बड़े बेटे को नींद नहीं आ रही थी। वह सोचते-सोचते रोने लगा। उसकी सिसकियां सुनकर उसकी माँ की नींद खुल गई। उसने बेटे से रोने का कारण पूछा पर उसने कोई उत्तर नहीं दिया, तब माँ ने उसके पिता को जगाया। पिता ने भी अपने बेटे से जब पूछा तो वह बोला- मैं दो कारणों से रो रहा हूँ। मुझे बहुत दुख हो रहा है। आप तो अपने पिता जी के अकेले पुत्र हैं फिर भी आपको उन्हें घर छोटा होने के कारण वृद्धाश्रम भेजना पड़ा। हम तो दो भाई हैं हमें तो आपको और भी जल्दी वृद्धाश्रम भेजना पडे़गा और फिर जब मेरी संतान होगी तो वह मुझे भी इसी प्रकार वृद्धाश्रम भेज देगी। न तो मैं आपको वृद्धाश्रम भेजना चाहता हूँ और न ही मैं स्वयं वृद्धाश्रम जाना चाहता हूँ। यही सोच-सोचकर मुझे रूलाई आ रही है।

उसकी बात सुनकर उनकी आँखें खुल गईं और वे अपने माता-पिता से क्षमा माँगते हुये उन्हें वापस अपने घर ले आए। हमारे रहने की जगह कितनी भी छोटी हो पर हमें अपने दिल को बड़ा रखना चाहिए।

11* आदमी और संत

नर्मदा नदी के तट पर एक महात्मा जी रहते थे। उनके एक शिष्य ने उनसे निवेदन किया कि मुझे आपकी सेवा करते हुये दस वर्षों से भी अधिक समय हो गया है और आपके द्वारा दी हुई शिक्षा भी अब पूर्णता की ओर है। मैं भी अब संत होना चाहता हूँ और आपके आशीर्वाद की अपेक्षा रखता हूँ।

महात्मा जी ने मुस्कुराकर कहा - पहले इंसान बनने का गुण समझो फिर संत बनने की अपेक्षा करना।

इंसान का गुण है कि धर्म, कर्म, दान के प्रति मन में श्रद्धा का भाव रखे। उसके हृदय में परोपकार एवं सेवा के प्रति समर्पण रहे। ऐसे सद्पुरूष की वाणी में मिठास एवं सत्य वचन के प्रति समर्पण हो। उसका चिंतन सकारात्मक एवं सदैव आशावादी रहे। वह जुआ, सट्टा व परस्त्रीगमन से सदैव दूर रहते हुये अपने पूज्यों के प्रति आदर का भाव रखता हो। ऐसा चरित्रवान व्यक्ति क्रोध, लोभ एवं पापकर्मों से दूर रहे। जीवन में विद्या ग्रहण एवं पुण्य लाभ की हृदय से अभिलाषा रखे एवं अपने गुणों पर कभी अभिमान न रखे। इन गुणों से मानव इंसान कहलाता है।

संत बनने के लिये पुण्य की भावना, पतित-पावन की सेवा, उनकी मुक्ति की कामना जीवन का आधार रहे। मन में सद्विचार पर्वत के समान ऊँचे एवं सागर की गहराई के समान गंभीर हों। वह अपने भाग्य का स्वयं निर्माता बनने की क्षमता रखे तथा आत्मा को ही अपना सर्वोत्तम साथी रखे। उसके कर्मों का फल उसकी आत्मा को पाप और पुण्य का अहसास कराने की शक्ति उत्पन्न कर दे। सत्य से बड़ा धर्म नहीं, झूठ से बड़ा पाप नहीं, इसको वह जीवन का सूत्र बना ले। आत्म बोध सदा उपकारी मित्र होता है, इसे अंतर आत्मा में आत्मसात् करे। वह कामना ही मन में संकल्प को जन्म देती है और लोकसेवा से ही जीवन सार्थक होता है, इसे वास्तविक अर्थों में अपने जीवन में अंगीकार करें। इतने गुणों से प्राप्त सुकीर्ति संत की पदवी देती है।

मैंने तुम्हें इंसान और संत बनने की बातें बता दी हैं। अब तुम अपनी राह अपने मनन और चिंतन से स्वयं चुनो। यह कहकर महात्मा जी नर्मदा में स्नान करने हेतु चले गये। इतना सुनने के बाद वह शिष्य पुनः महात्मा जी की सेवा में लग गया।

12* अच्छे दिन

मैं प्रतिदिन की तरह कार्यालय जाने के लिये बस का इंतजार कर रहा था। एक भिखारी मैले कुचैले कपड़े पहने हुये दीन भाव से मेरे सामने हाथ फैलाकर भीख माँगने लगा। मैंने जेब से कुछ चिल्ल्र पैसे निकालकर दे दिये और कौतुहलवश उससे पूछा कि “ बाबा क्या तुम जानते हो कि अच्छे दिन आने वाले है? विदेशों में जमा काला धन वापिस लाने और भ्रष्टाचार खत्म करने के लिये सरकार कृत संकल्पित है। काला धन वापिस आने के बाद आपको इतना कष्टपूर्ण जीवन नहीं जीना पड़ेगा। “ वह बोला बाबूजी मैं तो सिर्फ रोटी और कपड़े को जानता हूँ। मैं अपने शरीर को ढ़ंकने वाले इन फटे पुराने कपड़ों को और जेब में पड़ी कुछ रेजगारी को ही अपनी पूँजी मानता हूँ। मुझे अच्छे से मालूम है कि मैं कल भी भिखारी था, आज भी हूँ और कल भी रहूँगा। मेरे लिये तो बासी रोटी, फटे पुराने कपड़े और टूटा फूटा झोपड़ा ही मेरी संपत्ति है। ये काला धन तो बड़ी बड़ी बातें हैं, जब आयेगा इन्हीं नेताओं और इनके बड़े बड़े मित्रों के बीच में ही बँट जायेगा। इतना कह कर वह मुझे दुआयें देता हुआ आगे बढ़ गया और मैं वही खड़ा खड़ा देश के भविष्य के विषय में सोचने लगा कि कब आयेंगे अच्छे दिन ?

13* अंतिम इच्छा

राजा विक्रम सिंह की सेना में अजय सिंह व विजय सिंह नाम के दो बहादुर सैनिक थे। उनमें से अजय सिंह, विजय सिंह से 10 वर्ष पुराना एवं सेनापति का अत्यंत वफादार व करीबी था। इस कारण विजय सिंह मन ही मन में उससे जलता था। उसके मन में ईर्ष्या व द्वेष इतना बढ़ गया था कि वह अजय सिंह को खत्म करने की योजना बनाने लगा। वे दोनों प्रतिदिन प्रातःकाल साथ-साथ घूमने के लिये जाते थे। उनके रास्ते में नदी को पार करने के लिये एक छोटा सा कच्चा पुल बना था जिसके ऊपर बहुत सावधानीपूर्वक चलना पड़ता था। विजय ने एक दिन रात्रि के समय उस पुल को एक स्थान पर इतना कमजोर कर दिया कि उस पर पाँव रखते ही व्यक्ति नदी में गिर जाए और उसकी मृत्यु हो जाए।

दूसरे दिन दोनों प्रतिदिन की तरह प्रातः के समय पुल के पास पहुँचे। विजय ने अजय से कहा कि आप आगे चलो मैं लघुशंका से निवृत्त होकर आपके पीछे-पीछे आता हूँ। अजय अपनी रफ्तार से पुल पर आगे बढ़ता जा रहा था, उसने पीछे मुड़कर देखा तो विजय धीरे-धीरे आ रहा था। पुल को जिस जगह से कमजोर किया गया था, वहाँ पर पहुँचकर अजय रूक गया और विजय की प्रतीक्षा करने लगा। उसके वहाँ पहुँचने पर उसने विजय को आगे चलने के लिये कहा, विजय बहुत असमंजस में था। यदि आगे बढ़ता है तो जान से हाथ धो बैठेगा, यदि नहीं जाता है तो पकड़ा जायगा और यह सोचकर उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी, उसकी मनःस्थिति को भांपकर अजय ने उसका गिरेबान पकड़ लिया और कहा- मैं बहुत समय से तुम्हारी गतिविधियों पर नज़र रखे हुये था। परंतु तुम इतना गिर जाओगे यह मैंने सोचा भी नहीं था। कल रात जब तुम चुपचाप यहां आ रहे थे, तो तुम्हें यहाँ आते देखकर मुझे आभास हो गया था कि तुम कुछ बुरा करने की योजना बना रहे हो, तभी से मैं तुम्हारा पीछा कर रहा था। मेरा अनुभव तुमसे कहीं अधिक है। अब तुम सच सच बताओ, तुमने ऐसा क्यों किया ? वरना यह खबर मैं सेनापति एवं राजा तक पहुँचा दूँ तो तुम्हें निश्चित मृत्युदंड मिलेगा ?

यह सुनकर विजय के होश उड़ गये और वह गिड़गिड़ाकर रोते हुये अजय के पाँव में गिर गया और बोला, मैंने आपसे ईर्ष्यावश ऐसा कुकृत्य किया। मेरे घर में मेरी पत्नी और दो अबोध बच्चे हैं, यदि मैं जीवित नहीं रहा तो मेरे बच्चे अनाथ हो जायेंगे और उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं हैं। वह फूट फूट कर रो रहा था और उसके मन में पश्चाताप के आंसू थे। यह देखकर अजय का मन द्रवित हो गया उसने विजय को उठाकर कहा कि चलो मैंने तुम्हें माफ कर दिया। यह बात सिर्फ तुम्हारे और मेरे बीच में ही रहना चाहिये। विजय इस उपकार के प्रति हृदय से कृतज्ञ था और उसका मन साफ होकर वह वास्तव में अजय का सच्चा मित्र बन गया था।

कुछ माह के उपरांत पड़ोसी राज्य ने आक्रमण कर दिया। दोनों सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। दुर्भाग्यवश अजय दुश्मनों से लड़ते हुये चारों ओर से घिर गया। उसे आभास होने लगा था कि अब उसकी मृत्यु करीब है। तभी अचानक से विजय दहाड़ता हुआ दुश्मनों के चक्रव्यूह को तोड़कर अजय को सुरक्षित स्थान पर ले गया। इस दौरान विजय गंभीर रूप से घायल हो गया और उसने अजय से कहा कि मेरा बचना नामुमकिन है, मेरे मरने के बाद मेरे परिवार का ख्याल रखना। इतना कहकर उसकी मृत्यु हो गयी।

युद्ध समाप्त होने पर अजय उसके घर पहुँचा। अपना परिचय देकर उसकी पत्नी को विजय द्वारा कही गयी अंतिम इच्छा से अवगत कराया। उसकी पत्नी की आँखों से आंसू बंद नहीं हो रहे थे। अजय ने कहा कि बहन ईश्वर के विधान के आगे हम सभी नतमस्तक है, मैं विजय को वापस तो नहीं ला सकता परंतु आपका भाई बनकर उसकी अंतिम इच्छा को पूरा करना चाहता हूँ। मैं एक सच्चा सैनिक हूँ और मेरे द्वारा दिये गये वचन के अनुसार आपके परिवार की देखरेख करना मेरा फर्ज एवं धर्म है जिसे मैं आजीवन निभाऊँगा। यह सुनकर विजय की पत्नी अत्यंत भावुक हो उठी और अजय से बोली कि परमात्मा ने आपको भाई के रूप में देवदूत बनाकर भेज दिया है अब मैं सभी चिंताओं से निश्चिंत हो गयी हूँ।

14* नाविक

नर्मदा नदी के किनारे राजन नाम का एक कुशल गोताखोर एवं नाविक रहता था। उसने कई लोगों की जानें बचाई थी। वह एक ईमानदार एवं स्पष्टवादी व्यक्ति था,उसने लालच में आकर कभी अपनी नौका में क्षमता से अधिक सवारी नहीं बैठाई, कभी किसी से तय भाड़े से अधिक राशि नहीं ली।

एक बार नेताजी अपने समर्थकों के साथ नदी के दूसरे ओर जाने के लिए राजन के पास आए। नेताजी के साथ उनके समर्थकों की संख्या नाव की क्षमता से अधिक थी। राजन ने उनसे निवेदन किया कि वह उन्हें दो चक्करों में पार करा देगा। लेकिन नेताजी सबको साथ ले जाने पर अड़ गए। जब राजन इसके लिए तैयार नहीं हुआ तो नेताजी, एक दूसरे नाविक के पास चले गए। नेताजी के रौब और पैसे के आगे वह नाविक राजी हो गया और उन्हें नाव पर बैठाकर पार कराने के लिए चल दिया।

राजन अनुभवी था। उसने आगे होनेवाली दुर्घटना को भाँप लिया। उसने अपने गोताखोर साथियों को बुलाया और कहा- हवा तेज चल रही है और उसने नाव पर अधिक लोगों को बैठा लिया है। इसलिए तुम लोग भी मेरी नाव में आ जाओ। हम उसकी नाव से एक निश्चित दूरी बनाकर चलेंगे। वह अपनी नाव को उस नाव से एक निश्चित दूरी बनाकर चलाने लगा।

उसके साथियों में से किसी ने यह कहा कि हम लोग क्यों इनके पीछे चलें। नेताजी तो बड़ी पहुँच वाले आदमी हैं, उनके लिए तो फौरन ही सरकारी सहायता आ जाएगी। राजन ने उन्हें समझाया कि उनकी सहायता जब तक आएगी तब तक तो सब कुछ खत्म हो जाएगा। हम सब नर्मदा मैया के भक्त हैं, हमें अपना धर्म निभाना चाहिये। उसकी बातों से प्रभावित उसके साथी उसके साथ चलते रहे।

जैसी उसकी आशंका थी, वही हुआ। तेज बहाव में पहुँचने पर नाव तेज हवा और बहाव के प्रभाव से डगमगाने लगी। हड़बड़ाहट में नेताजी और उनके चमचे सहायता के लिए चिल्लाने लगे और उनमें अफरा-तफरी मच गई। इस स्थिति में वह नाविक संतुलन नहीं रख पाया और नाव पलट गई। सारे यात्री पानी में डूबने और बहने लगे। जिन्हें तैरना आता था वे भी तेज बहाव के कारण तैर नहीं पा रहे थे। राजन और उसके सभी साथी नाव से कूद पड़े और एक-एक को बचाकर राजन की नाव में पहुँचाने लगे, तब तक किनारे के दूसरे नाव वाले भी आ गए। सभी का जीवन बचा लिया गया।

पैसे और पद के अहंकार में जो नेताजी सीधे मुँह बात नहीं कर रहे थे अब उनकी घिग्घी बँधी हुई थी। अपनी खिसियाहट मिटाने के लिए उन्होंने राजन और उनके साथियों को ईनाम में पैसे देने चाहे तो राजन ने यह कहकर मना कर दिया कि हमें जो देना है वह हमारा भगवान देता है। हम तो अपनी मेहनत का कमाते हैं और सुख की नींद सोते हैं। आपको बचाकर हमने अपना कर्तव्य पूरा किया है इसका जो भी ईनाम देना होगा वो हमें नर्मदा मैया देंगी।

15* प्रजातंत्र

नगर की एक शाला में बारहवीं कक्षा के छात्रों के लिये हम और हमारे जनप्रतिनिधि विषय पर निबंध प्रतियोगिता आयोजित हुई इसमें पुरस्कृत रचना बड़े रोचक ढंग से लिखी गयी थी। जनता ने जनसेवा, जनकल्याण, एवं जनहितार्थ हेतु जनमत से अपने जनप्रतिनिधि का चयन किया। जनता की सोच थी कि अब विकास की गंगा बहेगी। वह जनप्रतिनिधि कुछ दिनों में ही राजनीति के दांवपेंच सीखकर नेता बन गया और अब जनता को भूलकर अपने ही विकास में लग गया। सरकार बदल गई पर सर और कार जहाँ थी वहीं रह गये। जनता की अपेक्षायें धूमिल हो गई और उन्होंने संकल्प किया कि अगले चुनाव में इसे नहीं चुनेंगे। वक्त तेजी से भागता है और देखते ही देखते पाँच वर्ष बीत गये और चुनाव आ गये।

जनता के दरबार में वह वापिस हाजिर हो गया उसके विपक्षियों ने समझा कि सब इससे बहुत नाराज है इसलिये इसकी हार सुनिश्चित है। इसकी परवाह ना करते हुये वह सभी को कहता था कि वह ऐसी चाल चलेगा कि विपक्षी धराशायी हो जायेंगे और वह पुनः बहुमत से जीतेगा।

उसने चुपचाप जाति और धर्म के आधार पर मतदाताओं को आकर्षित करना शुरू किया और अपने आप को उसी जाति और धर्म का होने के कारण उनका प्रतिनिधि बताने लगा। जनता ने भी विकास की बात भूलकर जातिगत आधार पर उसके पक्ष में मतदान कर दिया और वह पुनः विजयी हो गया। कुछ समय पश्चात वह पहले की तरह ही जनता को भूल गया। हमारे देश में प्रजातंत्र की यहीं विडम्बना है कि विकास की बात भूलकर लोग, धर्म और जाति को अधिक महत्व देने लगते हैं। देश के अधिकांश नेता जनता को इसी प्रकार मूर्ख बनाकर राज कर रहे थे, कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे ?

जीवन में सफलता के लिये यह आवश्यक है कि हम अपने लक्ष्य और मंजिल का स्वयं निर्माण करें। जीवन में कौन क्या कर रहा है, कैसे कर रहा है इस पर ध्यान ना देकर हम क्या कर रहें हैं, इस चिंतन पर ध्यान दें और इसी तरह के कर्म को महत्व दें। यही प्रजातंत्र की सफलता है।

16* जीवन का सत्य

एक नेताजी की भाषण देते समय अचानक मृत्यु हो गयी, उन्हें यमराज के सन्मुख लाया गया। उन्होंने यमराज से कहा कि हे यमराज आपने असमय ही मुझे यहाँ पर बुला लिया है। मुझे अभी जनसेवा के बहुत कार्य पूरे करने थे। अब जनता मेरे ना रहने के कारण विकास से वंचित रह जायेगी। यमराज ने उनकी बात सुनकर कहा कि नेताजी प्रकृति का नियम है कि समय के साथ व्यक्ति भुला दिया जाता है और जो जीवन में अच्छे कर्म करता है उसे याद रखा जाता है।

मैं आपको, आपके घर एवं आसपास होने वाली गतिविधियों को यही से दिखा देता हूँ। आप नीचे पृथ्वी की ओर झाँककर देखिये। नेताजी ने नीचे की ओर झाँककर देखा कि उनके दाह संस्कार के पहले ही घरवाले तिजोरी की चाबियाँ खोज रहें हैं जिसमें विदेश में जमा करोड़ों रूपयों के कागजात हैं। वे जनता को दिखाने के लिये रो रहे हैं परंतु अपना समय वसीयत और बँटवारे के संबंध में जानकारी प्राप्त करने हेतु व्यतीत कर रहें हैं। उनके अनुयायी दूसरे नेताओं के चमचें बन गये हैं एवं उनकी जगह कोई दूसरा नेता नियुक्त कर दिया गया है और वह मन ही मन उनकी मृत्यु से प्रसन्न हो रहा है। जो धन व्यापारियों के पास लगा हुआ था वे उसको हड़प चुके हैं। जनता भी उन्हें भ्रष्टाचारी और हरामखोर कहकर कोस रही है।

यह सब देखकर नेताजी व्यथित होकर कहते हैं कि हे यमराज मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि मैनें जीवन का सत्य देख लिया है मैं अपनी सारी सजायें भुगतने के लिये तैयार हूँ, आप कृपा कर मुझे वापस भूलोक मत भेजियेगा। मैं भूलोक के पाखंड से अत्याधिक द्रवित हूँ, वहाँ मक्कारी एवं लापरवाही के साथ और भी बहुत कुछ है किंतु आपके चरण सान्निध्य में केवल आप ही आप है, अतः प्रभु मेरी प्रार्थना स्वीकारीये।

17* स्वर्ग एवं नरक

सेठ सुजानमल अपने जीवन को आनंद से गुजार रहे थे। एक दिन उन्हें रात्रि में स्वप्न देखा कि यमराज के दूत उन्हें मारते पीटते हुये कहीं ले जा रहे हैं। वे हड़बड़ाकर उठ बैठे और प्रातःकाल अपने धर्मगुरू संत हरिदास जी के पास पहुँचकर उन्हें इस घटना का विवरण दिया। संत जी ने कहा कि जीवन में कर्मों के फल से ही प्राणी अपने जीवनकाल में ही स्वर्ग और नरक का अनुभव करता है यह सुनकर सेठ जी ने उनसे विनम्रता पूर्वक आग्रह किया कि स्वर्ग और नरक कहाँ पर स्थित है एवं उनका अनुभव कैसे हो सकता है ? संत जी बोले कि मैं आपको अभी अपने साथ ले जाकर इसका अनुभव करा देता हूँ।

स्वामी जी सेठ जी को सबसे पहले एक कसाई के घर ले जाते है, कसाई का काम प्रतिदिन जीवों का संहार करना रहता है उनके रक्त से उसका शरीर सना हुआ रहता है। उस पर मक्खियाँ मँडराती रहती है और वह एक बदबूदार वातावरण में दूषित हवा में साँस लेकर जीवन जीता है। उसके घर में भी सभी लोगों का स्वभाव कर्कश एवं झगडालू प्रवृत्ति का रहता है वे आपस में झगडा करते हुये जीवन यापन करते हैं। इसके बाद स्वामी जी और सेठ जी एक वकील के घर पहुँचते है। वह वकील न्यायप्रिय, ईमानदार एवं जनहित के कार्यों के लिये समर्पित व्यक्तित्व था। वह कई जरूरतमंदों को बिना किसी सेवा शुल्क के मुकदमों में सहायता करता था। वह कई जनहितकारी मामलों को समाज के हित में न्यायालय में ले जाकर समुचित मार्गदर्शन दिलाकर समाज में सकारात्मक विचारधारा लाने हेतु गतिशील रहता था। वह मान सम्मान पूर्वक परिवार में शांति एवं सुख के साथ दिन बिता रहा था।

स्वामी जी ने अब सेठजी को कहा कि मैंने तुम्हें जीवन में सुख और दुख दोनों दिखा दिये। पहले व्यक्ति का जीवन नरक के समान है और दूसरे व्यक्ति का जीवन स्वर्ग का अनुभव कराता है। इन्हें अपने कर्मो के अनुसार यही पर स्वर्ग एवं नर्क मिला हुआ है। व्यक्ति अपने कर्मों से ही इसी धरती पर स्वर्ग या नरक का जीवन जीता है। सेठ जी स्वामी जी का आशय समझ गये थे।

18* मोक्ष का आनंद

प्रयाग में भागीरथी के तट पर एक सन्त से मेरी मुलाकात हो गई। मैंने मन की जिज्ञासा की संतुष्टि के लिये उनसे विनम्रता पूर्वक आग्रह सहित पूछा- मोक्ष क्या है ? उन्होंने स्नेहपूर्ण वाणी में समझाया- मोक्ष दुनियां के विवादास्पद विषयों में से एक है। यह क्या है ? किसी ने इसे देखा है ? इस पथ के विषय में कोई भी व्यक्ति आज तक दावे के साथ नहीं कह सकता कि वह रास्ता मोक्ष तक जाता है। इसका रुप व स्वरुप किस प्रकार का है। हमारे धार्मिक ग्रन्थों में इसकी व्यापक व्याख्या है। यदि हम गम्भीरता से मनन और चिन्तन करें तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि मोक्ष की प्राप्ति लगभग असंभव है। मेरा व्यक्तिगत विचार तो यह है कि मृत्यु के बाद मोक्ष की कल्पना समाज को अनुशासन में रखने एवं सामाजिक दायरों में व्यक्ति को बांधे रखने के लिये धर्मग्रन्थों के माध्यम से स्थापित की गई व्यवस्था है।

मोक्ष की मृगतृष्णा में व्यक्ति धर्म पूर्वक कर्म करता रहे एवं मानवीय दृष्टिकोण रखते हुए जीवन व्यतीत करे। उसके मन में मोक्ष की कामना सदैव बनी रहे। मेरा तो दृढ़ विश्वास है कि मोक्ष हमें इसी जीवन में प्राप्त हो सकता है।

जीवन में मोक्ष का दूसरा स्वरुप आनन्द है। अब आनन्द क्या है? दुख में भी आनन्द की अनुभूति हो सकती है और सुख में भी आनन्द का अभाव हो सकता है। जीवन में कठिनाइयों और परेशानियों से घबरा कर भागने वाला जीवन को बोझ समझ कर निराशा के सागर में डूबता उतराता रहता है। वह कठिनाइयों और अवसादों को घोर घना जंगल समझता है। परन्तु साहसी व्यक्ति कर्मठता के साथ सकारात्मक सृजन करता है एवं परेशानियों से जूझकर उन्हें हल करता है। यह संघर्ष उसे उत्साहित करता है।

वह सफलता की हर सीढ़ी पर अनुभव करता है एक अलौकिक संतुष्टि के साथ स्वयं पर आत्मविश्वास। वह अनुभव करता है एक अलौकिक सौन्दर्य युक्त संसार का यही आनन्द है। धन संपदा और वैभव से हम भौतिक सुख तो प्राप्त कर सकते हैं किन्तु आनन्द की तलाश में मानव जीवन भर भागता रहता है। भौतिक सुख बाहरी हैं परन्तु आनन्द आन्तरिक है। सुख की अनुभूति शरीर को होती है किन्तु आनन्द की अनुभूति हमारे अंतरमन को होती है। आनन्द का उद्गम हैं, हमारे विचार, हमारे सद्कर्म और हमारी कर्मठता। यही मोक्ष है जो आनन्द का दूसरा स्वरुप है।

19* सच्ची तीर्थयात्रा

सेठ राममनोहरदास अपनी पत्नी के साथ सुखी जीवन व्यतीत कर रहे थे। वे ईश्वर के प्रति विश्वास तो रखते थे पर उनकी आस्था भक्ति के प्रति अधिक थी उनका विश्वास था कि मंदिर में दर्शन करने, साधु संतों के साथ सत्संग से ही मोक्ष प्राप्ति की आकांक्षा पूरी होती है। उनकी पत्नी में भी भगवान के प्रति गहरी आस्था और श्रद्धा थी। उनका मत था कि कर्म भावना प्रधान होना चाहिये। यदि जीवन में सच्ची भावना से कर्म नहीं किये गये हों तो ईश्वर की आराधना एक दिखावा है और मोक्ष प्राप्ति की आकांक्षा सपने के समान है।

एक बार सेठ जी चारों धाम की यात्रा पर जाने का मन बना बैठे क्योंकि उन्हें किसी महात्मा ने बताया था कि सिर्फ चारों धाम के दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। उन्होने अपनी पत्नी को भी चलने के लिये आग्रह किया परंतु उसने यह कह कर मना कर दिया कि मन चंगा तो कठौती में गंगा।

सेठ जी अकेले ही अपने नौकर को साथ लेकर यात्रा पर निकल गये। प्रत्येक तीर्थ स्थल पर भगवान के दर्शन, पूजन आदि हेतु उनकी मुलाकात वहाँ के पंडे, पुजारियों से होती है। उनकी कार्यशैली पूर्णतया धनोपार्जन की थी। जो भी यजमान उनको मुँह माँगा धन देता था उसे वे येन केन प्रकारेण भगवान की मूर्ति के निकट तक जाने का प्रबंध करा देते थे। वहाँ पर सामान्य भक्तों की कोई पूछ नहीं थी, उन्हें घंटों खड़ा रहने के बाद क्षणिक दर्शन करने का अवसर मिलता था। ऐसा प्रतीत होता था कि वहाँ पर भक्ति एवं श्रद्धा की भावनाओं का पूर्णतया अभाव था। यही सब उन्होने पवित्र नदियों में स्नान के दौरान देखा कि जो लोग पुण्य लाभ हेतु स्नान कर रहे थे वे अपने क्रिया कलापों से नदियों को प्रदूषित कर रहे थे। यह देखकर सेठ जी व्यथित हो गये। वे जिस सुख और शांति की खोज में आये थे वह तो प्राप्त नहीं हुयी अपितु ऐसा वातावरण देखकर मन खिन्न हो गया।

उन्हें अब अपनी पत्नी की बातें याद आने लगी कि पूजा, श्रद्धा और भक्ति पर आधारित होती है जिसमें भावनाओं का प्रभु के प्रति समर्पण ही सच्ची आराधना है और इसी से जीव को सच्चा सुख और सद्गति की प्राप्ति होती है। सेठ जी अपनी तीर्थ यात्रा पूरी करके वापस अपने गृहनगर लौट आते है। उन्होंने अपनी यात्रा का वृतांत पत्नी को बताते हुये स्वीकार किया कि कर्म में भावनाओं का होना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। सेठ जी अब धर्म से कर्म करने में विश्वास करने लगे।

20* कचौड़ी वाला

जबलपुर शहर में एक सुप्रसिद्ध कचौड़ी बनाने वाले रामलोटन महाराज नामक व्यक्ति रहते थे। उसकी बरगद के वृक्ष के नीचे छोटी सी दुकान थी जिसमें वह स्वयं कचौड़ी बनाते थे। उसके हाथों में ना जाने क्या हुनर था कि वैसी स्वादिष्ट एवं मनभावन कचौड़ी और कोई भी नहीं बना पाता था। उनकी दुकान में सुबह से लेकर रात तक ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी जिनमें गरीब से लेकर अमीर तक सभी उनकी कचौड़ी का लुत्फ उठाने आते थे।

नगर के सुप्रसिद्ध सेठ करोडीमल उनके प्रतिदिन के ग्राहक थे। एक दिन उन्होने रामलोटन महाराज से पूछा कि तुम इतनी अच्छी कचौडी के साथ विभिन्न प्रकार की चटनियाँ एवं सब्जियाँ इतने कम दाम में कैसे दे देते हो? इसमें तुम क्या बचा पाते होगे? मेरा सुझाव है कि तुम शहर के मध्य में कोई उचित स्थान लेकर वहाँ पर कचौडियों का निर्माण वृहद् रूप में करो इससे तुम्हें यहाँ से कहीं अधिक दाम मिलेगा और तुम्हारा व्यापार भी बढ़ता जायेगा। यदि तुम कहो तो मैं तुम्हें उचित स्थान उपलब्ध करा सकता हूँ।

रामलोटन महाराज ने सेठ जी के प्रति आभार व्यक्त करते हुये उनके सुझाव को विनम्रतापूर्वक अस्वीकर कर दिया। उनका कहना था कि धन कमाने की कोई सीमा नहीं है और इससे लोभ की प्रवृत्ति बढती जाती है। वह अपनी छोटी सी दुकान में ही पूर्ण संतुष्ट है, उनकी कमाई भले ही कम है परंतु उनकी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है। उन्होनें सेठ जी को कहा कि मैं तो इस दोहे को जीवन का यथार्थ मानता हूँ -

“ साईं इतना दीजिये, जा में कुटुंब समाए।

मैं भी भूखा uk रहूँ और अतिथि भी भूखा uk जाये। “

आप जैसे बडे बडे लोग अपना कीमती समय निकालकर स्वयं यहाँ आते हैं यहीं मेरे लिये सबसे बड़ा संतोष धन है। उनकी उच्च विचारधारा, सादगी, और संतोष से प्रभावित होकर सेठ जी उनकी भूरि भूरि प्रशंसा करते हुये चले गये।

21* लक्ष्मी जी का वास

एक धनवान व्यक्ति को स्वप्न में लक्ष्मी जी के साक्षात दर्शन हुये। वे भाव विभोर हो गये परंतु लक्ष्मी जी द्वारा यह कहने पर कि अब मैं तुम्हारे पास कुछ दिन की ही मेहमान हूँ फिर मैं विदा होकर दूसरे स्थान जा रही हूँ, उनके होश उड़ गये और वे हडबडाकर नींद से उठकर बैठ गये। वे दिनभर ऊहापोह की स्थिति में मनन करते रहे कि अब ऐसी परिस्थिति में क्या करना चाहिये। वे संशय की स्थिति में अपने पारिवारिक गुरू जी के पास जाते है और उन्हें सब बातों से अवगत कराकर उनसे मार्गदर्शन माँगते हैं। गुरू जी ने उनसे कहा कि लक्ष्मी जी विदा होने के पहले एक बार और अवश्य ही दर्शन देंगी तब तुम उनके पैर पकडकर कहना कि हे माँ जाने से पहले मेरे परिवार के ऊपर एक कृपा कर दीजिये हमें यह आशीर्वाद देकर जायें कि हमारे परिवार के सभी सदस्यों में आपस में प्रेम, सद्भाव, विश्वास एवं नैतिकता हमेशा बनी रहे।

कुछ समय पश्चात एक रात्रि पुनः स्वप्न में उसे लक्ष्मी जी के दर्शन हुये। लक्ष्मी जी ने विदा होने से पूर्व उसकी मनोकामना पूछी, तब उसने गुरूजी के कहे अनुसार उनके पाँव पकड़कर अपनी मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना की । यह सुनकर लक्ष्मी जी ने मुस्कुरा कर कहा कि यह सब माँगकर तुमने मुझे रूकने पर विवश कर दिया है। जहाँ पर ये सब गुण होते है वहाँ पर ही मेरा वास रहता है किंतु एक बात का ध्यान रखना कि यदि तुम्हारे परिवार में लालच, द्वेष, बेईमानी, अनैतिकता आदि दुर्गुणों का प्रवेश हुआ तो मैं तुम्हें बिना बताये ही चुपचाप चली जाऊँगी।

22* चयन

प्रोफेसर अग्निहोत्री राजनीतिशास्त्र के बड़े विद्वान थे। एक दिन उन्होंने अपने उद्बोधन में विद्यार्थियों को वृक्ष का उदाहरण देते हुये समझाया कि जब हम वृक्षारोपण करते हैं तो अच्छे बीज का चयन करते हैं। उसके भूमिरोपण के बाद उसकी देखभाल करते है वही बीज जब वृ़क्ष बनता है तो उसकी शाखाएँ चारों ओर फैलने लगती है तथा उस पर फल एवं फूल आने लगते हैं। हम जिस गुणवत्ता का बीज बोते है उसी प्रकार के फल प्राप्त होते है। आज देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुये युवा अपने भविष्य के प्रति चिंतित हैं। आपको पता ही है कि निकट भविष्य में चुनाव आने वाले है। आपको मतदान करते समय वृक्ष के उदाहरण को अपने ध्यान में रखना चाहिये। यदि अच्छे बीज के समान सही प्रत्याशी का चयन करें तो वृक्ष में अच्छे फलों के समान उस व्यक्तित्व के द्वारा देश का समग्र विकास रूपी फल हमें मिलेगा अन्यथा वर्तमान परिस्थितियों से तो आप वाकिफ ही हैं।

धर्म तथा राजनीति को व्यापार बनाकर अपने आचरण से आदर्शों का अवमूल्यन करने वाले दुर्जन येन केन प्रकारेण सत्ता पर काबिज हो जाते है। जनता अपने भुलक्कड़ स्वभाव के कारण इन शैतानों की धूर्तता को अनदेखा कर देती है। ईमानदार व्यक्ति इनके निरंतर और तीखे प्रहारों को न सह पाने के कारण हार मानकर मैदान ही छोड़ देता है तथा तिकड़मी, आवारा और अवसरवादी राजनेता सत्ता में आ जाते है। इसलिये हमें मनन, चिंतन एवं मंथन द्वारा अपने और राष्ट्रहित में ऐसा चयन करना चाहिये जो कि हमारी कठिनाईयों को समझकर निराकरण कर सके व अपनी विचारधारा से राष्ट्र के विकास को गति एवं दिशा देने की क्षमता रखता हो।

सभी विद्यार्थियों पर प्रोफेसर जी के विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने निश्चय किया कि वे स्वयं शत प्रतिशत मतदान तो करेंगे ही और दूसरों को भी इसके लिये प्रेरित करेंगे। वे योग्य प्रत्याशी को ही अपना बहुमूल्य मत देकर उसका चयन करेंगे।

23* प्रायश्चित

एक कस्बे में एक गरीब महिला जिसे आँखें से कम दिखता था, भिक्षा माँगकर किसी तरह अपना जीवन यापन कर रही थी। एक दिन वह बीमार हो गई, किसी दयावान व्यक्ति ने उसे इलाज के लिये 500रू का नोट देकर कहा कि माई इससे दवा खरीद कर खा लेना। वह भी उसे आशीर्वाद देती हई अपने घर की ओर बढ़ गई। अंधेरा घिरने लगा था, रास्ते में एक सुनसान स्थान पर दो लड़के शराब पीकर ऊधम मचा रहे थे। वहाँ पहुँचने पर उन लड़कों ने भिक्षापात्र में 500रू का नोट देखकर शरारतवश वह पैसा अपने जेब में डाल लिया, महिला को आभास तो हो गया था पर वह कुछ बोली नहीं और चुपचाप अपने घर की ओर चली गई।

सुबह दोनों शरारती लड़कों का नशा उतर जाने पर वे अपनी इस हरकत के लिये शर्मिंदा महसूस कर रहे थे। वे शाम को उस भिखारिन को रूपये वापस करने के लिये इंतजार कर रहे थे। जब वह नियत समय पर नहीं आयी तो वे पता पूछकर उसके घर पहुँचे जहाँ उन्हें पता चला कि रात्रि में उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गयी और दवा न खरीद पाने के कारण वृद्धा की मृत्यु हो गई थी। यह सुनकर वे स्तब्ध रह गये कि उनकी एक शरारत ने किसी की जान ले ली थी। इससे उनके मन में स्वयं के प्रति घृणा और अपराधबोध का आभास होने लगा।

उन्होंने अब कभी भी शराब न पीने की कसम खाई और शरारतपूर्ण गतिविधियों को भी बंद कर दिया। उन लडकों में आये इस अकस्मात और आश्चर्यजनक परिवर्तन से उनके माता पिता भी आश्चर्यचकित थे। जब उन्हें वास्तविकता का पता हुआ तो उन्होंने हृदय से मृतात्मा के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुये अपने बच्चों को कहा कि तुम जीवन में अच्छे पथ पर चलो और वक्त आने पर दीन दुखियों की सेवा करने से कभी विमुख न होओ, यहीं तुम्हारे लिये सच्चा प्रायश्चित होगा।

24* अंतिम दान

सेठ रामसजीवन नगर के प्रमुख व्यवसायी थे जो अपने पुत्र एवं पत्नी के साथ सुखी जीवन बिता रहे थे। एक दिन अचानक उन्हें खून की उल्टी हुयी और चिकित्सकों ने जाँच के उपरांत पाया कि वे कैंसर जैसे घातक रोग की अंतिम अवस्था में हैं एवं उनका जीवन बहुत कम बचा है। यह जानकर उन्होंने अपनी सारी संपत्ति अपनी पत्नी एवं बेटे के नाम कर दी। कुछ माह बाद उन्हें महसूस हुआ कि उनके हाथ से बागडोर जाते ही उनकी घर में उपेक्षा आरंभ हो गई है। यह जानकर उन्हें अत्यंत दुख हुआ कि उन पर होने वाला दवाइयों, देखभाल आदि का खर्च भी सभी को एक भार नजर आने लगा है। जीवन का यह कड़वा सत्य उनके सामने था और एक दिन वे आहत मन से किसी को बिना कुछ बताये ही घर छोड़कर एक रिक्शे में बैठकर विराट हास्पिटल की ओर रवाना हो गये। किसी का भी वक्त और भाग्य कब बदल जाता है, इंसान इससे अनभिज्ञ रहता है।

रास्ते में रिक्शे वाले ने उनसे कहा कि यह जगह तो कैंसर के मरीजों के उपचार के लिये है यहाँ पर गरीब रोगी रहते है जिन होने वाला खर्च उनके परिवारजन वहन करने में असमर्थ होते हैं आप तो वहाँ पर दान देने जा रहे होंगे। मैं एक गरीब रिक्शा चालक हूँ परंतु मेरी ओर से भी यह 50 रू वहाँ दे दीजियेगा। सेठ जी ने रूपये लिये और उनकी आँखें सजल हो गयी।

उन्होंने विराट हास्पिटल में पहुँचकर अपने आने का प्रयोजन बता दिया। वहाँ के अधीक्षक ने अस्पताल में भर्ती कर लिया। उस सेवा संस्थान में निशुल्क दवाईयों एवं भोजन की उपलब्धता के साथ साथ निस्वार्थ भाव से सेवा भी की जाती थी। एक रात सेठ रामसजीवन ने देखा कि एक मरीज बिस्तर पर बैठे बैठे रो रहा है वे उसके पास जाकर कंधे पर हाथ रखकर बोले हम सब कि नियति मृत्यु है जो कि हमें मालूम है तब फिर यह विलाप क्यों? वह बोला मैं मृत्यु के डर से नहीं रो रहा हूँ। अगले सप्ताह मेरी बेटी की शादी होने वाली है मेरे घर में मैं ही कमाऊ व्यक्ति था अब पता नहीं यह शादी कैसे संपन्न हो सकेगी। यह सुनकर सेठ जी बोले कि चिंता मत करो भगवान सब अच्छा करेंगे तुम निश्चिंत होकर अभी सो जाओ। दूसरे दिन प्रातः सेठ जी ने अधीक्षक महोदय को बुलाकर कहा मुझे मालूम है मेरा जीवन कुछ दिनों का ही बाकी बचा है। यह मेरी हीरे की अंगूठी की अब मुझे कोई आवश्यकता नहीं है। यह बहुत कीमती है इसे बेचकर जो रूपया प्राप्त हो उसे इस गरीब व्यक्ति की बेटी की शादी में दे दीजिये मैं समझूँगा कि मैंने अपनी ही बेटी का कन्यादान किया है और बाकी बचे हुये धन को आप अपने संस्थान के उपयोग में ले लें। इस प्रकार सेठ जी ने अपने पास बचे हुये अंतिम धन का भी सदुपयोग कर लिया। उस रात सेठ जी बहुत गहरी निद्रा में सोये। दूसरे दिन जब नर्स उन्हें उठाने के लिये पहुँची तो देखा कि वे परलोक सिधार चुके थे।

25* आनंद

स्वामी हरिदास जी से उनके शिष्य ने पूछा कि आनंद क्या है ? उनका कहना था कि आनंद एक अद्भुत अनुभूति का आभास है। व्यक्ति के जीवन में सुख रहते हुये भी उसे आनंद का अभाव महसूस हो सकता है और दुख में भी वह आनंदित महसूस कर सकता है। जीवन में जो भी कठिन परिस्थितियों से घबराकर भागता है जीवन उसके लिये बोझ हो जाता है। उसका मन निराशा से भर जाता है और वह संसार को नकारात्मक दृष्टि से देखता हुआ अपने जीवन को निरर्थक समझने लगता है। परंतु जिस व्यक्ति में साहस कर्मठता एवं सकारात्मक सोच होती है वह उत्साह पूर्वक संघर्ष करता हुआ परेशानियों एवं कठिनाइयों का निदान करते हुये सफलता की सीढी पर चढता जाता है। यह सफलता उसे अलौकिक संतुष्टि प्रसन्नता आत्मविश्वास का अनुभव कराती है। यही उसके लिये आनंद है। आनंद की तलाश में मानव जीवन भर भागता रहता है और धन, संपदा और वैभव जैसे भौतिक सुखों को ही आनंद समझ बैठता है। ये सुख बाहरी है इनसे शरीर को संतुष्टि प्राप्त होती है परंतु आनंद एक आध्यात्मिक पहेली है जो कि हमारे हृदय एवं आत्मा को अद्भुत तृप्ति का अनुभव कराता है यही आनंद का उद्गम है जो हमारे विचार सत्कर्म और कर्मठता पर निर्भर रहता है।

26* बुद्धिमानी और अवसरवादिता

एक विख्यात संत से उनके एक शिष्य ने पूछा कि वर्तमान समय में बुद्धिमानी और अवसरवादिता में कौन अधिक श्रेष्ठ है ?

संत बोले जीवन में बुद्धिमानी एवं अवसरवादिता में जब टकराव होता है तो प्रतीत होता है कि वक्त एवं भाग्य भी ठहर गये हैं। मानव जीवन अपने उद्देश्यों से भटककर कल्पनाओं में खो जाता है और हकीकत से दूर होकर खुशी एवं प्रसन्नता से विमुख हो जाता है। बुद्धिमानी आकाश के समान है जिसका प्रारंभ और अंत हम नहीं जानते हैं परंतु अवसरवादिता का प्रारंभ और अंत दोनों हमारे हाथों में है। अवसरवादिता कभी बुद्धिमानी पर हावी नहीं हो सकती, वह केवल कुछ क्षण के लिये मानसिक तनाव कम कर देती है परंतु बुद्धिमानी में निहित चतुरता हमारे पूरे जीवन को सुखी, समृद्धशाली एवं महान बनाती है तथा जीवन के अंत तक हमारा साथ देती है। बुद्धिमत्ता जहाँ पर वहाँ पर मानवीयता व आत्मा में सच्चाई एवं ईमानदारी रहेगी। जहाँ ये गुण हैं वहाँ पर लक्ष्मी व सरस्वती का वास रहता है।

हमें चतुराई और बुद्धिमत्ता पर निर्भर रहना चाहिये और अवसरवादिता का त्याग करना चाहिये। शिष्य को यह सुनकर जीवन का यर्थाथ समझ में आ गया और वह संतुष्ट होकर वापस चला गया।

27* पतंग

आकाश में विभिन्न रंगों की पतंगें उड रही थी जिससे आकाश बहुत सुंदर प्रतीत हो रहा था, तभी दो पतंगों में आपस में पेंच हुये और एक कट कर नीचे गिरने लगी उस पतंग को प्राप्त करने के लिये लड़कों का झुंड दौड़ पड़ा। एक साथ बहुत सारे हाथ उसे झपटने के लिये लपके उनमें से एक बच्चा पतंग को लपक कर भाग गया। वह बच्चा अपनी इस उपलब्धि से बडा खुश हो जाता हैं।

कुछ दिन बाद वह बच्चा इसी पतंग को आकाश में उडा रहा था तभी एक दूसरी पतंग ने उसकी पतंग काट दी जिसके साथ उसका काफी धागा भी चला गया इस कारण वह बहुत दुखी हो गया तभी उसके पिता वहाँ आ जाते हैं एवं उसे दुखी देखकर समझाते है कि कल जब तुम्हें किसी दूसरे की पतंग मिली थी सोचो उसे कितना दुख हुआ होगा? यह पतंग लूटने की प्रक्रिया में बच्चों की भीड़ कितनी बुरी तरह से भागती है और आपस में लड़ती है। इस कारण बच्चों को चोट भी लग जाती है। कई बार पतंग किसी के हाथ में भी नहीं आती है और इस लूटमार के दौरान फट जाती है।

पतंग कटी नहीं कि उसका धागा लूटने की प्रवृत्ति ना जाने कैसे चालू हो गई और धागे के छोटे छोटे टुकड़े पाकर कौन सी संतुष्टि प्राप्त होती है, बचपन में ही यह लूटमार की प्रवृत्ति बड़े होने पर हमारे चरित्र के लिये घातक हो सकती हैं।

28* विश्वास

मुम्बई की एक बहुमंजिला इमारत में मोहनलाल जी नाम के एक बहुत ही सज्जन व दयालु स्वभाव के व्यक्ति रहते थे। उसी इमारत के पास एक महात्मा जी दिन भर ईश्वर की आराधना में व्यस्त रहते थे। मोहनलाल जी के यहाँ से उन्हें प्रतिदिन रात का भोजन प्रदान किया जाता था। यह परम्परा काफी समय से चल रही थी। एक दिन उन महात्मा जी ने भोजन लाने वाले को निर्देश दिया कि अपने मालिक से कहना कि मैंने उसे याद किया है। यह सुनकर मोहनलाल जी तत्काल ही उनके पास पहुँचे और उन्हें बुलाने का प्रयोजन जानना चाहा। महात्मा जी ने कहा कि मुझे आप पर आने वाली विपत्ति का संकेत प्रतीत हो रहा है। क्या आप कोई बहुत बड़ा निर्णय निकट भविष्य में लेने वाले हैं ? मोहनलाल जी ने बताया- मैं अपने दोनों पुत्रों के बीच अपनी संपत्ति का बंटवारा करना चाहता हूँ। मैं और मेरी पत्नी की आवश्यकताएं तो बहुत सीमित हैं जिसकी व्यवस्था वे खुशी-खुशी कर देंगे। महात्मा जी ने यह सुनकर कहा कि आप अपनी संपत्ति के दो नहीं तीन भाग कीजिये और एक भाग अपने लिये बचाकर रख लीजिये। इससे आप दोनों जीवन में किसी पर भी निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

मोहनलाल जी यह सुनकर बोले कि हम सभी आपस में बहुत प्रेम करते है। उन्होंने महात्मा जी की बात पर ध्यान न देते हुये बाद में जब संपत्ति का वितरण किया तो उसके दो ही हिस्से किए।

कुछ समय तक तो सब कुछ सामान्य रहा फिर उन्हें धीरे धीरे अनुभव होने लगा कि उनके बच्चे उद्योग-व्यापार और पारिवारिक मामलों में उनकी दखलन्दाजी पसन्द नहीं करते हैं। कुछ माह में उनकी उपेक्षा होना प्रारम्भ हो गयी और जब स्थिति मर्यादा को पार करने लगी तो एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी के साथ दुखी मन से अनजाने गन्तव्य की ओर प्रस्थान करने हेतु घर छोड़ दिया। वे जाने के पहले उन महात्मा जी के पास मिलने गए। उन्होंने पूछा आज बहुत समय बाद कैसे आए ? तो मोहनलाल जी ने उत्तर दिया कि मैं प्रकाश से अन्धकार की ओर चला गया था और अब वापिस प्रकाश लाने के लिये जा रहा हूँ। मैं अपना भविष्य नहीं जानता किन्तु प्रयासरत रहूँगा कि सम्मान की दो रोटी प्राप्त कर सकूं। महात्मा जी ने उनकी बात सुनी और मुस्कराकर कहा कि मैंने तो तुम्हें पहले ही आगाह किया था। तुम कड़ी मेहनत करके सूर्य की प्रकाश किरणों के समान प्रकाशवान होकर औरों को प्रकाशित करने का प्रयास करो।

मेरे पास बहुत लोग आते हैं जो मुझे काफी धन देकर जाते हैं जो मेरे लिये किसी काम का नहीं है। तुम इसका समुचित उपयोग करके जीवन में आगे बढ़ो और समाज में एक उदाहरण प्रस्तुत करो। ऐसा कहकर उन महात्मा जी ने लाखों रूपये जो उनके पास थे वह मोहनलाल जी को दे दिये।

मोहनलाल जी ने उन रूपयों से पुनः व्यापार प्रारम्भ किया। वे अनुभवी एवं तो बुद्धिमान तो थे ही, बाजार में उनकी साख भी थी। उन्होंने अपना व्यापार पुनः स्थापित कर लिया।

इस बीच उनके दोनों लड़कों की आपस में नहीं पटी और उन्होंने अपने व्यापार को चौपट कर लिया। इधर मोहनलाल जी पहले से भी अधिक समृद्ध हो चुके थे। व्यापार चौपट होने के कारण भारी आर्थिक संकट का सामना कर रहे दोनों पुत्र उनके पास पहुँचे और सहायता मांगने लगे।

मोहनलाल जी ने स्पष्ट कहा कि इस धन पर उनका कोई अधिकार नहीं है। वे तो एक ट्रस्टी हैं जो इसे संभाल रहे हैं। जो कुछ भी है उन महात्मा जी का है। तुम लोग जो भी सहायता चाहते हो उसके लिये उन्हीं महात्मा जी के पास जाकर निवेदन करो। जब वे वहाँ पहुँचे तो महात्मा जी ने उनकी सहायता करने से इन्कार कर दिया और कहा कि जैसे कर्म तुमने किये हैं उनका परिणाम तो तुम्हें भोगना ही होगा।

29* घोडी वाला

घुंघरूओं की झंकार और घोड़ी के पैरों की थाप से मन को आनंद की अनुभूति हो रही थी। उस पर सवार सईस आज बहुत खुश और गौरवान्वित महसूस कर रहा था, क्योंकि आज की घटना ने उसका मान सम्मान बढ़ा दिया था। वह एक शादी में बग्घी लेकर गया था, वहाँ से बारात लगने के बाद लौट रहा था तभी उसकी नजर बग्घी में छूट गये एक बैग पर पडी। उसने रूककर बैग को खोलकर देखा तो उसके होश उड गये। उस बैग में कीमती गहनों के साथ साथ नकद धनराशि भी रखी हुई थी।

यह देखकर वह हतप्रभ था और उसने तुरंत अपनी बग्घी को वापस लौटाया एवं विवाह स्थल पर वापस पहुँचा। उसने वहाँ देखा कि बारातियों के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ रही हैं और उन सबके चेहरे उतरे हुये थे। वे बग्घी वाले से उसके वापस लौटने का प्रयोजन पूछते उससे पहले उसने स्वयं ही उसे प्राप्त थैला उन्हें सौंपते हुये कहा कि यह शायद गलती से छूट गया था, इसे आप संभाल ले। दूल्हे के पिता ने बैग खोलकर देखा और सभी सामान सुरक्षित देखकर खुशी के मारे उनकी आँखों में आँसू आ गये।

उन्होंने सईस के कंधे पर हाथ रखकर कहा कि ऐसी ईमानदारी वर्तमान समय में अकल्पनीय है। तुम्हारे प्रति आभार व्यक्त करने के लिये मेरे पास शब्दों का अभाव हैं। यह उपकार मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकता हूँ। सभी बारातियों ने उसकी भूरि भूरि प्रशंसा करते हुये ईनाम देने की पेशकश की किंतु उसने यह कहकर कि यह तो मेरा कर्तव्य था, लेने से इंकार कर दिया। दूल्हे के पिता के विनम्रतापूर्वक हठ ने सईस को सोचने के लिये मजबूर कर दिया। वह बोला कि अच्छा आप लोग इतना आग्रह कर रहे हैं तो जो मैं माँगूंगा क्या वह आपको देना स्वीकार होगा? लडके के पिता यह सुनकर गंभीर हो गये और मन में सोचने लगे कि आखिर इसके मन में क्या चाह छिपी हुई है? उन्होने कहा कि यदि मेरे सामर्थ्य में होगा तो मैं जरूर दूँगा।

सईस ने विनम्रतापूर्वक कहा कि यह दुल्हन मेरी बेटी के समान है, मेरी आप से यही प्रार्थना है कि आप इसे आजीवन सुखी रखें एवं इसे कभी कोई दुख ना होने दे। यही वचन में अपनी माँग के रूप में आप से और दूल्हे से चाहता हूँ। यह सुनकर सारे लोग भावविभोर होकर आश्चर्यचकित भाव से उसे देखने लगे। लडके के पिता ने उसे सीने से लगा लिया और सजल नेत्रों से उसे वचन दिया कि वह दुल्हन को बिल्कुल अपनी बेटी के जैसा रखेंगे। लड़की के पिता भी यह सुनकर अत्यंत भावविहल हो गये और कहने लगे कि आप मानव के रूप में देव तुल्य हैं। इसके बाद दूल्हा और दुल्हन ने भी उन्हें अपना पिता तुल्य मानते हुये आर्शीवाद लिया। सईस सभी के प्रति आदर भाव व्यक्त करता हुआ अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा।

30* संस्कार

एक बालक ने अपने पिता से पूछा कि पिताजी मनुष्य का जन्म एक जैसा होता है उसकी बनावट भी एक जैसी रहती है, परंतु जब वह बड़ा होता है तो किसी का बहुत नाम, मान सम्मान होता है और कोई पतन के गर्त में डूब कर अपना अस्तित्व ही खो बैठता है, ऐसा क्यों होता है ? उसके पिता उसे अपने साथ में लेकर एक गुब्बारे वाले के पास जाते है, और उससे कहते है कि तुम दो अलग अलग गुब्बारों में एक ही मात्रा में हवा भरकर उसे एक साथ छोड दो। गुब्बारे वाला ऐसा ही करता है। दोनों गुब्बारे थोडा ऊपर जाते ही अलग अलग दिशाओं में अलग अलग ऊँचाई पर उड़ने लगते हैं। अब पिता अपने बेटे को समझाते हुये कहते हैं कि इसी प्रकार मनुष्य का जन्म तो एक सा होता है परंतु भिन्न भिन्न सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों में पल्लवित होने के कारण उसके विकास और स्वभाव में अंतर हो जाता है। जिसे अच्छे संस्कारों का मार्गदर्शन मिलता है वह निरंतर जीवन में प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होता है परंतु जो दुष्प्रवृत्तियों के चंगुल में फँस जाता है वह पतन के गर्त में गिरकर अपने जीवन को बर्बाद कर बैठता हैं। हमारा नैतिक कर्तव्य एवं दायित्व है कि बच्चों के सर्वांगीण विकास का ध्यान रखते हुये उन्हें अच्छे संस्कार देने का प्रयास करें ताकि वे जीवन में प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकें।

31* विदाई

विश्व में हमारी सभ्यता, संस्कृति व संस्कारों का बहुत मान-सम्मान है। इसका मूलभूत कारण हमारी प्राचीन शिक्षा पद्धति है। मैं जिस पाठशाला में पढ़ता था वहां की परम्परा थी कि बारहवीं कक्षा में उत्तीर्ण होने के पश्चात शाला की शिक्षा समाप्त होकर छात्र महाविद्यालय में प्रवेश लेकर आगे अध्ययन करते थे। शाला की ओर से ऐसे सभी विद्यार्थियों के लिये एक विदाई समारोह का आयोजन होता था। इसमें शाला के प्राचार्य अपना अंतिम आशीर्वचन छात्रों को देते थे। मुझे आज भी उनके द्वारा दिया गया उद्बोधन प्रेरणा देता है। उन्होंने उस समय कहा था कि जीवन में पढ़ने-पढ़ने में भी फर्क होता है। कुछ छात्र खूब पढ़ते हैं बहुत सारे ग्रन्थ पढ़ डालते हैं किन्तु उन्हें स्मरण कुछ भी नहीं रहता है। कुछ दूसरे छात्र पढ़े को खूब स्मरण रखते हैं किन्तु उन्हें उपयोगी तथ्य के ग्रहण और अनुपयोगी के त्याग का विवेक नहीं होता। अध्ययन लक्ष्य प्राप्ति का एक साधन है और इसका मुख्य उद्देश्य हमारे भीतर विद्यमान गुणों व योग्यताओं व्यवहारिक उपयोग कर सकता है और जीवन की उलझनों को सुलझाने में समर्थ हो सकता है। इसीलिये विवेक पूर्ण किया गया अध्ययन ही सार्थक और उपयोगी होता है। ऐसे छात्र द्वारा अध्ययन से प्राप्त ज्ञान उसके मानस पर अंकित हो जाता है और किसी व्यवहारिक समस्या के समाधान की आवश्यकता पड़ने पर ज्ञान के संचित भण्डार से स्मृति समुचित जानकारी प्रस्तुत कर उस व्यक्ति को समाज में सम्मानित एवं प्रतिष्ठित करती है। इसके विपरीत विवेक सम्मत अध्ययन न करने वाला छात्र परिस्थिति विशेष से घबराकर किनारा करता हुआ अपने को लज्जित अनुभव करता है को विकसित करना होता है। ज्ञान का विश्लेषण करने वाला छात्र ही उचित समय पर उसका और फिर अपमान के भय से समाज से पलायन करने में ही अपना हित समझने लगता है।

शिक्षा जीवन के हर पल को दिशा देती है और विद्यार्थी हर पल से एक नयी शिक्षा लेता है। मनुष्य का भाग्य, हानि, लाभ सभी कुछ विधाता के हाथ में होता है। जो ईमानदारी और परिश्रम से जीवन जीता है विधाता भी उसी का साथ देता है। ऐसे व्यक्तित्व को परिवार समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्यों के पालन का संकल्प, तत्परता और समर्पण का बोध रहता है। उसे ही जीवन में सफलता, शान्ति और सौहार्द्र प्राप्त होता है जो कि जीवन के मूल तत्व हैं। वह अपने जीवन को सार्थक बनाता है।

प्राचार्य महोदय के इस भाव पूर्ण उद्बोधन के उपरान्त हम सभी छात्रों ने सामूहिक रुप से प्राचार्य जी एवं शाला के सबसे वरिष्ठ शिक्षक महोदय को सम्मान स्वरुप गुरु दक्षिणा के रुप में स्मृति चिन्ह की भेंट दी। उन्होंने भी सभी छात्रों को गुलाब के पुष्प के साथ शाला स्थानान्तरण पत्र देकर हमारे सुखी, समृद्ध एवं स्वस्थ्य भविष्य का अशीर्वाद देते हुए हमें शाला से भावभीनी विदाई दी।

32* सेवा

एक दिन विभिन्न रंगों के फूलों से लदी हुयी झाडी पर एक चिडिया आकर बैठी और फूलों से बोली तुम लोग कैसे मूर्ख हो कि अपना मकरंद भंवरों को खिला देते हो। वह अपना पेट भरके तुम्हें बिना कुछ दिये ही उड जाता है। फूलों ने मुस्कुराकर कहा कि कुछ देकर उसके बदले में कुछ लेना तो व्यापारियों का काम है। निस्वार्थ भाव से किया गया कार्य ही सच्ची सेवा एवं त्याग है। यही जीवन का उद्देश्य होना चाहिये कि दूसरों के लिये काम आने में ही जीवन की सार्थकता हैं।

33* श्रेष्ठ कौन ?

“ अरे राकेश ! यह देखो, ये फूल कितने सुंदर और प्यारे हैं, इन्हें देखकर ही हमारा मन कितना प्रफुल्लित हो रहा है।“ यह बात शाला की क्यारी में लगे हुये फूलों को देखकर आनंद ने राकेश से कही। यह सुनकर फूल तने से बोला- देखो मुझे देखकर सब लोग मेरी कितनी तारीफ करते हैं, और मानव को मेरी कितनी आवश्यकता है। उसे जन्म से लेकर अंतिम यात्रा तक मेरी जरूरत रहती है। मैं पूजा स्थलों में परम पिता परमेश्वर के चरणों में स्थान पाता हूँ। ये सब बताते हैं कि मैं कितना श्रेष्ठ हूँ।

यह सुनकर तने ने कहा- मेरी ड़ाल पर ही तेरा जन्म होता है। यदि ये न हो तो तेरा अस्तित्व ही नहीं रहेगा, मेरी छाल का उपयोग अनेक औषधियों के निर्माण में होता है। मेरे से टिककर ही राह के पथिक विश्राम करते हैं। इन्हीं सब कारणों से मैं तुझसे ज्यादा श्रेष्ठ हूँ। अब दोनों में अपनी श्रेष्ठ को लेकर तू तू- मैं मैं होने लगी।

एक संत प्रतिदिन दोपहर को पेड़ की छाया में विश्राम करते थे। दोनों ने उनको अपनी व्यथा बतलाई और उनसे इस विषय पर अपना निर्णय देने का निवेदन किया। संत जी ने दोनों को समझाया कि अभिमान कभी नहीं करना चाहिए। इससे हमारा मान कम होता जाता है। फिर भी हम अपने को दंभ में महान समझने लगते हैं। आप दोनों यह सोचिये कि जल जिसके बिना आप दोनों का जीवन संभव नहीं है, उसे इस बात का कभी घमंड नहीं हुआ कि उससे ही जीवन है। वह बिना किसी स्वार्थ के सबको लाभ पहुँचाता है और मन में कभी महानता का दंभ नहीं रखता है।

हमें निर्विकार भाव से अपना कर्तव्य निभाना चाहिये। अब तुम दोनों खुद ही सोचो कि जल के सामने तुम क्या हो, यह सुनकर तने और फूल दोनों को अपनी गलती का अहसास हुआ और उनकी श्रेष्ठ बनने की भावना समाप्त हो गयी।

34* विनम्रता

एक शिक्षक से विद्यार्थी ने प्रश्न किया कि जब तेज आंधी तूफान एवं नदियों में बाढ़ आती है तो मजबूत से मजबूत वृक्ष गिर जाते हैं परंतु इतनी विपरीत एवं संकटपूर्ण परिस्थितियों में भी तिनके को कोई नुकसान नहीं पहुँचता, जबकि वह बहुत नाजुक एवं कमजोर होता है। शिक्षक महोदय ने उससे कहा कि जो अड़ियल होते हैं और झुकना नहीं जानते हैं वे विपरीत परिस्थितियों में टूट कर नष्ट हो जाते हैं। तिनके में विनम्रता पूर्वक झुकने का गुण होता है इसी कारण वह अपने आप को बचा लेता है। हमें भी अपने जीवन में विपरीत परिस्थितियाँ आने पर विनम्रतापूर्वक झुककर उचित समय का इंतजार करना चाहिये।

35* जिद

एक जंगल में एक बन्दर पेड़ की एक डाल से चिपटकर सो रहा था। उसी जंगल में एक बहुत शक्तिशाली एवं बलवान हाथी रहता था। वह घूमता-घूमता उसी पेड़ के नीचे जा पहुँचा। वहां पहुँचकर वह पेड़ के नीचे खड़ा-खड़ा चिंघाड़ने लगा। हाथी की आवाज से बन्दर की नींद खुल गई। विश्राम में खलल पड़ने के कारण वह कुपित हो गया। उसने हाथी को सबक सिखाने का निश्चय कर लिया। वह पेड़ से कूदकर उसकी पीठ पर आ गया। फिर उसने उसे गुदगुदी लगाना प्रारम्भ कर दिया।

हाथी ने अपनी सूंड़ से बन्दर को पकड़ कर पटकने का प्रयास किया लेकिन बन्दर उछल कर फिर पेड़ पर चढ़ गया। वह लगातार इस प्रक्रिया को दोहराता रहा। जब हाथी बहुत परेशान हो गया और बन्दर को नहीं पकड़ पाया तो वहां से रवाना हो गया।

यह सारी हरकत एक पिता और पुत्र दूर से देख रहे थे। पिता ने पुत्र से कहा- कोई कितना भी शक्तिशाली व बलवान हो उसे कमजोर प्राणी भी अपनी बुद्धिमत्ता और चतुराई से पराजित कर सकता है। उस हाथी को अपनी ताकत का बहुत घमण्ड था। उसे यह गुमान था कि अन्ततः बन्दर को पकड़ लेगा और उसे अच्छा सबक सिखाएगा, किन्तु जी भरकर प्रयास करने पर भी वह इसमें सफल नहीं हो सका और अन्त में हारकर वहां से चला गया।

हमें उस हाथी के समान अपनी शक्ति का अपव्यय नहीं करना चाहिए। इसे संचित करके सही समय व स्थान पर उसका उपयोग करना चाहिए। तभी हम जीवन में सफलता प्राप्त कर सकेंगे और हमारा उद्देश्य पूरा हो सकेगा। हमारा प्रतिद्वंदी कितना भी शक्तिशाली हो हम उसे अपनी बुद्धि और चातुर्य से पराजित कर सकते हैं।

36* चीकू

राममनोहर नाम के एक प्रसिद्ध व्यवसायी अपने व्यापार से ज्यादा पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम के कारण विख्यात थे। उनका एक कुत्ता चीकू जिसे उन्होंने बचपन से पाला था उनके प्रति समर्पित एवं वफादार था, वह उन्हें बहुत अधिक प्यार करता था और राममनोहर जी भी उसे बहुत चाहते थे।

उनके परिवार के सदस्यों का चीकू के प्रति कोई प्रेम भाव नहीं था। वे प्रतिदिन उसकी कोई न कोई शिकायत करते रहते थे। राममनोहर उनकी इन बातों को नजर अंदाज कर देते थे। लगातार शिकायतों के कारण उनके मन में भी खीझ उत्पन्न हो रही थी।

एक दिन वे इसी खीझ के कारण क्रोधित होकर चीकू को काफी दूर छोड़ आये। वापिस आने के बाद उन्हें अपने कृत्य पर बहुत पछतावा हुआ। उन्हें लगने लगा कि क्षणिक आवेश में आकर उन्होंने बहुत ही अमानवीय कार्य कर दिया है। वे चीकू को लाने के लिये वापस गये, परंतु बहुत खोजने के बाद भी वह उन्हें नहीं मिला। वे भारी मन से आँखों में आँसू लिये वापस लौट आये। उनका मन बहुत व्यथित था, वे बिना किसी से बात किये चुपचाप अपने कमरे में चले गये। परिवार के अन्य सदस्य चीकू के चले जाने से बहुत खुश थे।

दूसरे दिन सुबह राममनोहर जी बगीचे में दुखी मन से चाय पी रहे थे तभी उन्होंने चीकू को बंगले के अंदर प्रवेश करते देखा। उसे देखकर वे अत्यंत भावुक हो गये और उसे गोद में उठा लिया। चीकू को देखकर उन्हें महसूस हुआ, जैसे वह पूछ रहा हो कि आखिर मेरी क्या गलती थी, जिसकी आपने मुझे इतनी कठोर सजा दी। वे उससे आँखे नहीं मिला पा रहे थे। परिवार के अन्य सदस्य उसके लौट आने से भौचक्के थे।

रात के समय सब लोग गहरी नींद में सो रहे थे, तभी चोरों के एक गिरोह ने बंगले में प्रवेश किया और चीकू भौंककर दौडता हुआ उनके पास पहुँचा। चीकू की आवाज सुनकर चौकीदार भी उस तरफ दौड़ पड़े, चीकू ने भागते हुये एक चोर का पैर पकड़ लिया उसने अपने को छुडाने के लिये चाकू से वार किया। चाकू के वार के कारण चीकू घायल हो गया था परंतु उसने चोर का पैर नहीं छोड़ा तब तक चौकीदारों ने आकर उस चोर को पकड़ लिया। इस चीख पुकार से परिवार के सभी सदस्य बाहर की ओर दौडे और पूरा माजरा जानने के बाद चोर को पुलिस के हवाले कर दिया गया।

अब सबका ध्यान गंभीर रूप से घायल चीकू की ओर गया और उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया। जहाँ चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। चीकू की इस बहादुरी एवं वफादारी की तारीफ सारा मुहल्ला कर रहा था। राममनोहर जी दुखी मन से चीकू को दफनाते हुये सोच रहे थे कि वो मेरा अहसानमंद था या मैं उसका अहसानमंद हूँ ?

37* स्वार्थपूर्ण मित्रता

एक जंगल में शेर, लोमड़ी एवं गिद्ध रहते थे। लोमड़ी बहुत चालाक थी और ऐसे उपाय की खोज में थी जिससे उसके भोजन के लिये मेहनत नहीं करना पड़े और व्यवस्था भी हो जाए। उसने एक योजना बनाई और उसके अनुसार उसने गिद्ध को कहा कि गिद्ध भाई तुम मेरे मित्र बन जाओ। गिद्ध ने पूछा क्यों ? लोमड़ी बोली तुम्हारे लिए बिना परिश्रम के जानवरों के मांस की व्यवस्था हो जाएगी तुम्हें बस इतना काम करना है कि आकाश में उड़ते हुये यह बताना है कि जानवर कहाँ पर विचरण कर रहें हैं। गिद्ध ने उसकी बात को स्वीकार कर लिया। अब लोमड़ी शेर के पास पहुँची और बड़ी चतुराई के साथ बोली महाराज अब आप काफी वृद्ध हो गये हैं और आपको भोजन प्राप्ति के लिये भी काफी भटकना पड़ता है इसमें आपका बहुत समय एवं ऊर्जा नष्ट होती है, मेरे पास एक उपाय है जिससे मैं आपकी मदद कर सकती हूँ। मैं आपको जानवर कहाँ पर विचरण कर रहे हैं वह बता दिया करूँगी ताकि आप आसानी से सीधे वहाँ पहुँचकर शिकार कर सके। लोमड़ी की बात शेर को भी अच्छी लगी। इस प्रकार लोमड़ी की चतुराई, चालाकी एवं कुटिलता से तीनों के बीच स्वार्थपूर्ण मित्रता स्थापित हो गयी। जिससे वे अपने समय एवं मेहनत की बचत करते हुये भोजन प्राप्ति के लक्ष्य को आसानी से प्राप्त करने लगे। शेर अपना शिकार करके मांस खाकर चला जाता था और गिद्ध और लोमड़ी बचा हुआ मांस खाकर अपना पेट आसानी से भर लेते थे। लोमड़ी की शेर से मित्रता के कारण उसका जंगल में भी प्रभाव बढ़ गया था।

जंगल के अन्य प्राणियों को जब लोमड़ी की इस चालाकी का पता चला तो उन्होंने एक सभा करके गिद्ध से निवेदन किया कि आपको तो आसानी से भोजन प्राप्त हो जाता है फिर इस मित्रता से आपको क्या लाभ मिल रहा है। लोमड़ी आपका लाभ उठाकर अपना हित साध रही है और आरामदायक जीवन बिता रही है। यह सुनकर गिद्ध ने लोमड़ी की मदद करना बंद दिया। कुछ दिनों तक भोजन ना मिलने पर भूख एवं क्रोध से पागल शेर ने लोमड़ी को ही अपना शिकार बना लिया। इसलिये कहा जाता है कि स्वार्थपूर्ण मित्रता अधिक दिनों तक स्थायी नहीं रहती हैं।

38* स्वरोजगार

विधायक अमर सिंह अपने क्षेत्र वासियों के ऊपर बहुत ध्यान देते थे। वे चाहते थे कि उनके क्षेत्र में गरीबी दूर होकर संपन्नता आये इसलिये वे प्रतिदिन शासकीय योजनाओं के अंतर्गत प्रतिदिन अत्यंत गरीब लोगों को धन प्रदान करके मदद करते थे। उन्हें विश्वास था कि इससे संपन्नता के साथ साथ मतदाता भी उनसे प्रभावित होंगे।

कुछ माह के बाद वे अपने मित्र विधायक सुमेर सिंह से मिलने पहुँचे, उन्होंने महसूस किया कि उनके क्षेत्र की जनता अपेक्षाकृत ज्यादा संपन्न है, उन्होंने इसका राज जानने हेतु सुमेर सिंह से पूछा कि तुम भी शासकीय योजना के अंतर्गत धन का उपयोग करते हो फिर तुम्हारे और मेरे विधानसभा क्षेत्र में इतनी असमानता क्यों है ?

सुमेर सिंह ने कहा कि तुम्हारी और मेरी कार्यशैली में अंतर है तुम मुफ्त में धन लुटाते हो मैं गरीब लोगों को स्व सहायता समूह बनाकर उन्हें भिन्न भिन्न किस्म के रोजगार सिखाता हूँ जैसे अगरबत्ती बनाना, माचिस बनाना, कपडे सिलना, मैकेनिक, इलेक्ट्रीशीयन आदि। वे मेहनत करके अपना कार्य करते हैं एवं उसके एवज में उन्हें यह धन प्राप्त होता हैं, जिससे उनमें स्वावलंबन की भावना भी विकसित होती है।

विधायक अमर सिंह भी इस योजना को अपने क्षेत्र में लागू करने का प्रयास करते है परंतु वे इसमें असफल हो जाते हैं क्योंकि उनके क्षेत्र के लोगों को मुफ्त में धन प्राप्त करने की आदत हो गयी थी।

आगामी चुनाव में आशा के विपरीत अमरसिंह चुनाव हार जाते हैं परंतु उनके मित्र सुमेर सिंह भारी मतों से विजयी होते हैं। इसका जब विश्लेषण हुआ तो पाया गया कि अमर सिंह द्वारा मुफ्त में धनराशि बाँटने का उन्हें कोई फायदा प्राप्त नहीं हुआ जबकि सुमेर सिंह की स्वरोजगार की योजना से प्रभावित होकर जनता ने उन्हें समर्थन दिया।

39* सच्ची मित्रता

जबलपुर के पास नर्मदा किनारे बसे रामपुर नामक गाँव में एक संपन्न किसान एवं मालगुजार ठाकुर हरिसिंह रहते थे। उन्हें बचपन से ही पेड़-पौधों एवं प्रकृति से बड़ा प्रेम था। वे जब दो वर्ष के थे, तभी उन्होंने एक वृक्ष को अपने घर के सामने लगाया था। इतनी कम उम्र से ही वे उस पौधे को प्यार व स्नेह से सींचा करते थे। जब वे बचपन से युवावस्था में आए तब तक पेड़ भी बड़ा होकर फल देने लगा था। गाँवों में शासन द्वारा तेजी से विकास कार्य कराए जा रहे थे, और इसी के अंतर्गत वहाँ पर सड़क निर्माण का कार्य संपन्न हो रहा था। इस सड़क निर्माण में वह वृक्ष बाधा बन रहा था, यदि उसे बचाते तो ठाकुर हरिसिंह के मकान का एक हिस्सा तोड़ना पड़ सकता था। परंतु उन्होंने वृक्ष को बचाने के लिए सहर्ष ही अपने घर का एक हिस्सा टूट जाने दिया। सभी गाँव वाले इस घटना से आश्चर्यचकित थे एवं उनके पर्यावरण के प्रति लगाव की चर्चा करते रहते थे।

पेड़ भी निर्जीव नहीं सजीव होते है, ऐसी उनकी धारणा थी। इस घटना से मानो वह पेड़ भी बहुत उपकृत महसूस कर रहा था। जब भी ठाकुर साहब प्रसन्न होते तो वह भी खिला-खिला सा महसूस होता था। जब वे किसी चिंता में रहते तो वह भी मुरझाया सा हो जाता था।

एक दिन वे दोपहर के समय पेड़ की छाया में विश्राम कर थे। वहाँ के मनोरम वातावरण एवं ठंडी-ठंडी हवा के कारण उनकी झपकी लग गयी और वे तने के सहारे निद्रा में लीन हो गये। उनसे कुछ ही दूरी पर अचानक से एक सांप कही से आ गया। उसे देखकर वह वृक्ष आने वाले संकट से विचलित हो गया और तभी पेड़ के कुछ फल तेज हवा के कारण डाल से टूटकर ठाकुर साहब के सिर पर गिरे जिससे उनकी नींद टूट गयी। उनकी नींद टूटने से अचानक उनकी नजर उस सांप पर पडी तो वे सचेत हो गये। गाँव वालों का सोचना था, कि वृक्ष ने उनकी जीवन रक्षा करके उस दिन का भार उतार दिया जब उसकी सड़क निर्माण में कटाई होने वाली थी।

समय तेजी से बीतता जाता है और जवानी एक दिन बुढ़ापे में तब्दील हो जाती है इसी क्रम में ठाकुर हरिसिंह भी अब बूढ़े हो गये थे और वह वृक्ष भी सूख कर कमजोर हो गया था। एक दिन अचानक ही रात्रि में ठाकुर हरिसिंह की मृत्यु हो गयी। वे अपने शयनकक्ष से भी वृक्ष को कातर निगाहों से देखा करते थे। यह एक संयोग था या कोई भावनात्मक लगाव का परिणाम कि वह वृक्ष भी प्रातः काल तक जड़ से उखड़कर अपने आप भूमि पर गिर गया।

गाँव वालों ने द्रवित होकर निर्णय लिया कि उस वृक्ष की ही लकड़ी को काटकर अंतिम संस्कार में उसका उपयोग करना ज्यादा उचित रहेगा और ऐसा ही किया गया। ठाकुर साहब का अंतिम संस्कार विधि पूर्वक गमगीन माहौल में संपन्न हुआ जिसमें पूरा गाँव एवं आसपास की बस्ती के लोग शामिल थे और वे इस घटना की चर्चा आपस में कर रहे थे। ठाकुर साहब का मृत शरीर उन लकड़ियों से अग्निदाह के उपरांत पंच तत्वों में विलीन हो गया और इसके साथ-साथ वह वृक्ष भी राख में तब्दील होकर समाप्त हो गया। दोनों की राख को एक साथ नर्मदा जी में प्रवाहित कर दिया गया। ठाकुर साहब का उस वृक्ष के प्रति लगाव और उस वृक्ष का भी उनके प्रति प्रेमभाव, आज भी गाँव वाले याद करते हैं।

40* कर्म पूजा

अवध के राजा महेन्द्र प्रताप सिंह बहुत ही धार्मिक, दयालु एवं नीतिवान व्यक्तित्व के धनी थे। वे अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखते थे और उनका हाल जानने के लिये अक्सर रात में वेश बदलकर निकलते थे। एक बार वे दीपावली की रात्रि को भी वेश बदलकर महल के पिछवाडे से निकल पड़े।

दीपावली के त्यौहार के कारण समस्त नगर में जगह जगह दीप जगमगा रहे थे। बच्चे आतिशबाजी कर रहे थे। लोग एक दूसरे का अभिवादन कर उन्हें बधाइयाँ दे रहे थे। राजा अपनी प्रजा को हँसी-खुशी त्यौहार मनाते देखकर अत्यंत प्रसन्न थे। प्रजा की खुशहाली को वह राज्य की समृद्धि का प्रतीक मानते थे। राजा नगर भ्रमण के बाद महल की ओर लौट रहे थे तभी रास्ते में एक अंधेरी झोपड़ी देखकर वे चौंक गये।

झोपड़ी का दरवाजा अधखुला था। वे दरवाजे के पास गये। अंदर एक वृद्ध व्यक्ति टिमटिमाते दीपक के पास माथे पर हाथ रखे बैठे थे। उनके पास ही एक थाली में पूजा का सामान रखा हुआ था। वे वृद्ध व्यक्ति उनसे बोले - महाशय मैं कब से आपकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ। मैं वृद्ध होने के कारण अकेले पूजा करने में असमर्थ हूँ। क्या आप मेरी सहायता करेंगे ?

राजा असमंजस में पड़ गये और सोचने लगे कि यदि मैं यहाँ रूकता हूँ तो महल पहुँचने में देर हो जाएगी और पूजन का मूहुर्त निकल जायेगा। उस वृद्ध के पुनः निवेदन करने पर राजा मना नहीं कर सके और उन्होंने उसके साथ बैठकर पूजन का प्रारंभ किया। उन्होंने राजा से कहा कि पूजा कि थाली से रोली और चावल उठाकर आँख बंद कर लो। राजा ने वैसा ही किया। जैसे ही राजा ने आँखें खोली वह सामने का दृश्य देखकर हैरान हो गये।

जिस झोपड़ी में वह बूढ़े के पास बैठे थे, उस जगह पर बूढ़े के स्थान पर साक्षात् कुबेर जी एवं लक्ष्मी जी विराजमान थी। राजा ने रोली और चावल दोनों के मस्तक पर लगाये और प्रणाम किया। कुबेर जी ने आशीर्वाद देते हुये कहा कि जहाँ का राजा, प्रजा की इच्छा और आवश्यकताओं का स्वयं के परिवार जैसा ध्यान रखता हो उस राज्य में कभी कोई कमी नहीं हो सकती है। इसी प्रकार लक्ष्मी जी ने भी आशीर्वाद देते हुये कहा- राजन ! तुम्हारा प्रजा के प्रति प्रेम देखकर मैं प्रसन्न हूँ। जहाँ का शासक प्रजा प्रेमी हो वह राज्य सदा धन धान्य से भरा रहता है। इसी कारण मैं पिछले कई सालों से तुम्हारे राज्य में हूँ। जब तक इस राज्य में प्रजा प्रेमी शासक रहेंगे तब तक मैं भी यहाँ विद्यमान रहूँगी।

41* पागल कौन

एक अर्द्धविक्षिप्त वृद्ध महिला मैले कुचैले कपड़े पहने किसी तरह अपने शरीर को ढके हुये सड़क पर जा रही थी। उसे देखकर बच्चे पागल पागल कहकर उसे चिढाने लगे, वह भी चिढ़कर विचित्र हरकतें करने लगी और बच्चों के मनोरंजन का केंद्र बन गयी। उसी समय अचानक एक लड़के ने उसकी ओर पत्थर फेंका जो कि उसके माथे पर लग गया और गहरी चोट के कारण वह वही बैठकर रोने लगी उसकी ऐसी स्थिति देखकर एक बुजुर्ग दंपती उसके पास पहुँचे और उसे सहारा देकर मरहम पट्टी करके, उन्होंने बच्चों से कहा कि यह तो पागल है तुम लोग तो पढ़ लिख रहे हो ऐसी हरकतें जिससे किसी को कष्ट पहुँचे और वह दुखी हो जाये क्या उचित है? इस महिला को चोट लग जाने से तुम्हें क्या लाभ प्राप्त हुआ ? इससे तुमने कौन सा बहादुरी का काम कर दिखाया यदि ऐसी चोट तुममें से किसी को लगती तो कितनी पीड़ा सहन करनी पड़ती?

सभी बच्चों पर उनकी इन बातों का प्रभाव पड़ा और उन्हें अपनी गलती का अहसास होकर उनके मन में करूणा का भाव जाग्रत हुआ। वे उसकी सहायता के लिये उसके पास आ गये इससे वह महिला भयभीत होकर पीछे खिसकने लगी। बुजुर्ग दंपति उसे यह आभास कराने लगे कि ये बच्चे उसे परेशान नहीं बल्कि उसकी मदद करने हेतु आगे आ रहे हैं। उसने इशारे से बताया कि वह बहुत भूखी है, यह देखकर बच्चे अपने घर से भोजन एवं पानी ले आये। वह भोजन करके अपनी तृप्त एवं कातर आँखों से बच्चों को ऐसे देख रही थी मानो उन्हें अंतरआत्मा से धन्यवाद दे रही हो।

42* संयम

एक कारखाने में प्रबंधकों एवं मजदूरों के बीच विवाद चल रहा था, इसे खत्म करने के लिये प्रबंधकों ने अपने दूसरे कारखाने के एक उच्च पदाधिकारी को नियुक्त किया जिससे श्रमिक और ज्यादा भडक उठे और उसे भगाने के उपाय सोचने लगे। एक दिन उन्होंने उस पदाधिकारी का अर्थी जूलुस निकालने का कार्यक्रम बनाया ताकि वह विचलित होकर भाग जाये। यह खबर जब प्रबंधकों तक पहुँची तो उन्होंने उसको पुलिस का सहयोग लेकर इसे रोकने का सुझाव दिया।

वह पदाधिकारी बहुत अनुभवी व्यक्ति था वह किसी भी रूप में पुलिस का हस्तक्षेप नहीं चाहता था। उसका स्पष्ट मत था कि यह मजदूर भी हमारे परिवार के एक अंग के समान है, इन्हें प्रताडित करना हमारे लिये हानिकारक हो सकता है। हमारा उद्देश्य अशांति को समाप्त करना है ना कि उसे और बढ़ाना। दूसरे दिन अर्थी जुलूस के नियत समय पर पहुँचकर वह स्वंय अपनी ही अर्थी को कंधा देने के लिये तैयार हो जाता है यह देखकर सारे लोग यह सोचने लगते हैं कि यह कैसा जुलूस है जिसमें जीवित व्यक्ति स्वयं अपनी अर्थी को कंधा दे रहा हो। इसलिये सारे मजदूर अर्थी जुलूस का कार्यक्रम स्थगित कर देते है।

इसके उपरांत उसी समय वह पदाधिकारी बिना किसी औपचारिकता के श्रमिकों से उनकी माँगों के संबंध में बातचीत आरंभ कर देता है। वह उनसे विनम्रतापूर्वक आग्रह करता है कि हमारा प्रयास होना चाहिये कि “ हम करेंगे अधिक काम और पायेंगे अधिक वेतन, सुविधा और सम्मान ।“ उसके अथक प्रयासों से दोनों पक्षों के बीच सम्मानजनक समझौता होकर हड़ताल समाप्त हो जाती है। जीवन में संयम, धैर्य और बुद्धिमत्ता से कठिन परिस्थितियों में भी सफलता प्राप्त की जा सकती है।

43* अहंकार

महेश अपने माता पिता का इकलौता बेटा था। वह पढ़ाई में भी बहुत होशियार था। उसके माता पिता को उससे काफी आशायें थी। उनकी हार्दिक अभिलाषा थी कि वह आइ.ए.एस में उत्तीर्ण होकर उच्च अधिकारी के रूप में देश की सेवा करे। उसकी शिक्षा के लिये उन्होंने अपना घर गिरवी रखकर धन का प्रबंध किया। वे नौकरी पेशा व्यक्ति थे जो किसी तरह अपना घर चला रहे थे। उनकी पत्नी, बेटे की सफलता के लिये प्रतिदिन ईश्वर से प्रार्थना करती थी।

महेश के कठोर परिश्रम और प्रभु कृपा से उसका चयन आइ.ए.एस में हो गया जिससे उसके माता पिता अत्यंत प्रसन्न हो गये। विशेष प्रशिक्षण पाकर जब वह घर वापस आता है तो अपनी माता का अभिवादन तो करता है परंतु पिता से अनमने ढंग से बात करता है। उसके इस व्यवहार से माता पिता को दुख पहुँचता है और वे महसूस करते है कि उसे पद का घमंड हो गया है। वह मन में सोचता था कि उसके पिता का पद उसके सामने कुछ भी नहीं है।

एक दिन जब माँ के द्वारा उसकी शिक्षा हेतु पिताजी के द्वारा किये गये त्याग का पता होता है तो उसका घमंड खत्म होकर उसे स्वयं के व्यवहार पर अत्यंत दुख एवं लज्जा महसूस होती है। अब वह अपने पिता से सामान्य व्यवहार करने लगता है परंतु पिता उसे उपेक्षित करने लगते है वह समझ जाता है कि उसकी बातों से पिता को बहुत दुख पहुँचा है।

वह अपने पिता के चरण छूकर माफी माँगता है और कहता है कि उनका ऋण वह कभी नहीं चुका सकता। पिता अपने सब गिले शिकवे भूलकर उसे गले से लगाकर कहते है कि अहंकार ही सबसे बडी कठिनाई है जो व्यक्ति के पतन का कारण बनता है, तुमने समय रहते इसे पहचान लिया है। अब जीवन में सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी।

44* हृदय परिवर्तन

भारत के मगध राज्य में वीरसिंह नाम के एक राजा राज्य करते थे। वे बहुत ही कठोर, निर्दयी और अहंकारी व्यक्ति थे। उनका निर्देश था कि उनके महल के सामने से जो भी निकले वह महल की ओर देखकर, सिर झुकाकर राजगददी के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करते हुये अपने पथ पर आगे जाये।

एक महात्मा जी वहाँ से एक दिन अपना सिर झुकाये बिना ही अपने गंतव्य की ओर जा रहे थे। यह देखकर पहरेदार उन्हें पकड़कर राजा के सामने ले आये। राजा तो घमंड में चूर चूर था उसने असभ्यता पूर्वक कडे शब्दों में महात्मा जी से सिर ना झुकाने का कारण पूछा।

महात्मा जी बोले राजन मेरा सिर सिर्फ प्रभु के सामने ही झुकता है यह सुनकर राजा ने कहा कि आपको यदि दंडस्वरूप सिर कलम करने की सजा दे दी जाये तो आपको कैसा लगेगा ? स्वामी जी ने निर्भयता पूर्वक चेहरे पर बिना किसी शिकन के अपनी पहले कही गई बात को ही दोहरा दिया। उनकी दृढता, साहस और आत्मबल को देखकर राजा भी चौंक गया। उसने दंभ पूर्वक महात्मा जी को कहा कि मेरे पास तो सब कुछ है धन,संपत्ति,वैभव,बल का साम्राज्य हैं। मैं भी तो प्रभु के समकक्ष हूँ, ऐसा क्या है कि जो उनके पास है और मेरे पास नहीं हैं, जिसके कारण तुम्हें अपनी जान की भी परवाह नहीं है। तम्हारी निडरता देखकर मैं आश्चर्य चकित हूँ।

महात्मा जी बोले राजा तुम्हें कोई प्रेम नहीं करता है तुम अपनी शक्ति के बल पर प्रजा का सर तो झुकवा तो सकते हो परंतु उनके मन में अपने प्रति प्रेम का प्रार्दुभाव नहीं कर सकते। राजा ने कहा कि मैं इसकी जाँच करूँगा तब तक के लिये इन्हें कारागार में बंद कर दिया जाये। उसी रात्रि में राजा अपना भेष बदलकर अपनी प्रजा के पास उनके बीच जाता है उसे यह जानकर बहुत दुख होता है कि उसकी प्रजा, उसके प्रति बहुत दुर्भावना रखती है एवं उससे घृणा करती है उनके मन में राजा के प्रति डर था और इसी कारण जनता जय जयकार करती थी, परंतु दिल से कोई भी अपने राजा को नहीं चाहता था बल्कि उसकी मृत्यु की प्रार्थना करते थे। यह सब कुछ जानने के पश्चात राजा का हृदय विषाद से भर गया और उसकी आँखों में आँसू आ गये, उसे अपनी कठोरता, अन्यायपूर्ण व्यवहार पर पश्चाताप होने लगा और उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है।

वह तुरंत भागता हुआ कारागार में पहुँच कर महात्मा जी के चरणों पर गिरकर अपने कृत्य के लिये माफी माँगता है उसकी आँखों में पश्चाताप के आँसू देखकर महात्मा जी कहते है कि तुम प्रेमपूर्वक,सदभावना के साथ अपनी प्रजा की देखभाल करते हुये राजकाज को संभालो। राजा महात्मा जी को वचन देता है कि वह उनके बताये मार्ग पर ही अब चलेगा और उन्हें स्वयं अपने साथ आदर एवं सम्मान पूर्वक अपने राज्य की सीमा तक छोड़ने जाता है।

45* हिम्मत

विपुल लगभग एक माह से तेज ज्वर से पीड़ित था। वह इतना कमजोर हो चुका था कि बिना किसी सहारे के उठ भी नहीं पाता था। आज रात वह बहुत बैचेनी महसूस करते हुए कराह रहा था। उसकी यह हालत देखकर उसकी माँ उसके पास आयी और उसके माथे पर हाथ रखकर महसूस कि हिदायत दी।

विपुल दवा पीकर बड़बडाने लगा कि माँ, तुम मेरे लिए इतने दिनों से कितना कष्ट उठाकर मेरी सेवा, सुश्रुषा कर रहीया कि उसे बुखार बहुत तेज है। उसने विपुल को दवा पिलायी और आराम करने की हो, मुझे ऐसा महसूस होता है कि मेरा जीवन का समय पूरा हो चुका है और तुमसे बिछुड़ने का समय नज़दीक आता जा रहा है। माँ ने उसकी बात सुनकर उसके माथे पर हाथ रखकर समझाया कि जब तक साँस है जीवन में आस है। विपुल बोला, मैं सभी आशाएँ छोड़ चुका हूँ, आज की रात मुझे गहरी नींद में सोने दो, मैं कल का सूरज देख पाता हूँ या नहीं, ये नहीं जानता हूँ। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मेरी आत्मा के द्वार पर चाँद का दूधिया प्रकाश दस्तक दे रहा है। मैं अंधकार से प्रकाश की ओर प्रस्थान कर रहा हूँ। मुझे भूत, वर्तमान और भविष्य के अहसास के साथ पाप और पुण्य का हिसाब भी दिख रहा है। मैंने धर्म से जो कर्म किये हैं वे ही मेरे साथ जाएँगे, माँ तू ही बता यह मेरा प्रारंभ से अंत है या अंत से प्रारंभ ?

विपुल की करूणामय बातें सुनकर माँ का मन भी विचलित हो गया, उसने अपनी आँखों में आए, आँसुओं के सैलाब को रोकते हुए अपने बेटे से कहा कि देखो तुम हिम्मत मत हारना, यही तुम्हारा सच्चा मित्र है। सुख-दुख में सही राह दिखलाता है और विपरीत परिस्थितियों में भी तुम्हारा साथ निभाकर तुम्हें शक्ति देकर तुम्हारे हाथों को थामे रहता है, डॉक्टर साहब ने तुम्हारा रोग पहचान लिया है और उन्होंने दवाईयाँ भी बदल दी हैं। जिनके प्रभाव से तुम कुछ ही दिनों में ठीक हो जाओगे। आज में तुम्हें एक कविता सुना रही हूँ जिसे तुम ध्यान से सुनकर इसपर गंभीरतापूर्वक मनन करना।

भंवर में, मंझधार में, ऊँची लहर में

नाव बढ़ती जा रही है।

दुखों से, कठिनाइयों से

जूझकर भी सांस चलती जा रही है।

स्वयं पर विश्वास जिसमें

जो परिश्रमरत रहा है

लक्ष्य पर थी दृष्टि जिसकी

और संघर्षों में जो अविचल रहा है

वह सफल है

और जिसका डिग गया विश्वास

वह निश्चित मरा है।

विपुल पर माँ की बातों का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। और उसके अंदर असीमित ऊर्जा, दृढ़ इच्छा शक्ति व आत्म विश्वास जागृत हो गया। यह ईश्वरीय कृपा थी, माँ का आर्शीवाद, स्नेह एवं प्यार था या विपुल का भाग्य कि वह कुछ दिनों में ही ठीक हो गया। आज वह पुनः ऑफिस जा रहा था। उसकी माँ उसे दरवाजे तक विदा करने आयी, उसका बैग उसे दिया और मुस्कुरा कर आँखों से ओझल होने तक उसे देखती रही।

46* व्यथा

राममनोहर जी एक प्रसिद्ध कवि थे जो कि समाज में हो रहे परिवर्तन एवं सामयिक विषयों पर कविताओं का सृजन कर उन्हें रोचक ढंग से श्रोताओं को सुनाते थे। जब वे उन्हें सुनकर प्रशंसा करते थे तो राममनोहर जी की आत्मा प्रसन्न्ता से तृप्त हो जाती थी। उन्हें अपनी काव्य रचनाओं से प्रसिद्धि तो बहुत मिलती थी परंतु धनोपार्जन अधिक नहीं हो पाता था। इससे उनकी पत्नी दुखी रहती थी एवं सुझाव देती थी कि आप कहीं अच्छी नौकरी कर लीजिये और इसके बाद कविताओं के सृजन पर ध्यान दे। आपको प्राप्त होने वाली सम्मान राशि से घर चलाना बहुत मुश्किल होता है। राममनोहर जी यह सुनकर मुस्कुरा कर चुप रह जाते थे।

एक बार मुंबई के एक कवि सम्मेलन में उनकी प्रस्तुति सुनकर एक काव्यप्रेमी उद्योगपति राकेश आनंद बहुत प्रसन्न हुये। सम्मेलन के पश्चात् उन्होंने राममनोहर जी से मिलकर कहा कि वे उनके बहुत बड़े प्रशंसक हैं और उन्हें अगले दिन अपने घर आने का निमंत्रण दिया। दूसरे दिन वे सज्जन स्वयं उन्हें लेने के लिये आये। रास्ते में चर्चा के दौरान उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में नवागंतुकों के लिये एक ऐकेडमी बनाने की इच्छा बताते हुये कहा कि इसका उद्देश्य साहित्य के विभिन्न आयामों से साहित्य प्रेमियों को अवगत कराते हुये आम लोगों में साहित्य के प्रति रूचि जागृत करना है। उन्होंने राममनोहर जी से उनके मार्गदर्शन में इसके गठन का अनुरोध करते हुये समस्त आर्थिक व्यय को वहन करने हेतु आश्वस्त किया। राममनोहर जी की स्वीकृति के उपरांत राकेश आनंद ने उन्हें सवैतनिक पद देकर इसका कार्यभार सौंप दिया। इस प्रकार राममनोहर जी आर्थिक समस्या का निदान होकर उनकी बौद्धिक क्षमता से साहित्यप्रेमी लाभान्वित होने लगे।

47* हार-जीत

सुमन दसवीं कक्षा में एक अंग्रेजी माध्यम की शाला में अध्ययन करती थी। वह पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद में भी गहन रूचि रखती थी और लम्बी दूरी की दौड़ में हमेशा प्रथम स्थान पर ही आती थी। उसको क्रीड़ा प्रशिक्षक, प्रशिक्षण देकर यह प्रयास कर रहे थे कि वह प्रादेशिक स्तर पर भाग लेकर शाला का नाम उज्ज्वल करे। इसके लिये उसके प्राचार्य, शिक्षक, अभिभावक और उसके मित्र सभी उसे प्रोत्साहित करते थे। वह एक सम्पन्न परिवार की लाड़ली थी। वह क्रीड़ा गतिविधियों में भाग लेकर आगे आये इसके लिये उसके खान-पान आदि का ध्यान तो रखा ही जाता था उसे अच्छे व्यायाम प्रशिक्षकों का मार्गदर्शन दिये जाने की व्यवस्था भी की गई थी। उसके पिता सदैव उससे कहा करते थे कि मन लगाकर पढ़ाई के साथ-साथ ही खेल कूद में भी अच्छी तरह से भाग लो तभी तुम्हारा सर्वांगीण विकास होगा।

सुमन की कक्षा में सीमा नाम की एक नयी लड़की ने प्रवेश लिया। वह अपने माता-पिता की एकमात्र सन्तान थी और एक किसान की बेटी थी। वह गाँव से अध्ययन करने के लिये शहर में आयी थी। उसके माता-पिता उसे समझाते थे कि बेटी पढ़ाई-लिखाई जीवन में सबसे आवश्यक होती है। यही हमारे भविष्य को निर्धारित करती है एवं उसका आधार बनती है। तुम्हें क्रीड़ा प्रतियोगिताओं में भाग लेने से कोई नहीं रोकता किन्तु इसके पीछे तुम्हारी शिक्षा में व्यवधान नहीं आना चाहिए।

एक बार शाला में खेलकूद की गतिविधियों में सुमन और सीमा ने लम्बी दौड़ में भाग लिया। सुमन एक तेज धावक थी। वह हमेशा के समान प्रथम आयी और सीमा द्वितीय स्थान पर रही। प्रथम स्थान पर आने वाली सुमन से वह काफी पीछे थी।

कुछ दिनों बाद ही दोनों की मुलाकात शाला के पुस्तकालय में हुई। सुमन ने सीमा को देखते ही हँसते हुए व्यंग्य पूर्वक तेज आवाज में कहा- सीमा मैं तुम्हें एक सलाह देती हूँ तुम पढ़ाई लिखाई में ही ध्यान दो। तुम मुझे दौड़ में कभी नहीं हरा पाओगी। तुम गाँव से आई हो। अभी तुम्हें नहीं पता कि प्रथम आने के लिये कितना परिश्रम करना पड़ता है। तुम नहीं जानतीं कि एक अच्छा धावक बनने के लिये किस प्रकार के प्रशिक्षण एवं अभ्यास की आवश्यकता होती है।

मेरे घरवाले पिछले पाँच सालों से हजारों रूपये मेरे ऊपर खर्च कर रहे हैं और मैं प्रतिदिन घण्टों परिश्रम करती हूँ तब जाकर प्रथम स्थान मिलता है। यह सब तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के लिये संभव नहीं है इसलिये अच्छा होगा कि तुम अपने आप को पढ़ाई-लिखाई तक ही सीमित रखो। इतना कहकर वह सीमा की ओर उपेक्षा भरी दृष्टि से देखती हुई वहाँ से चली गई।

सीमा एक भावुक लड़की थी उसे सुमन की बात कलेजे तक चुभ गई। इस अपमान से उसकी आँखों में आंसू छलक उठे। घर आकर उसने अपने माता-पिता दोनों को इस बारे में विस्तार से बताया।

पिता ने उसे समझाया- बेटा! जीवन में शिक्षा का अपना अलग महत्व है। खेलकूद प्रतियोगिताएं तो औपचारिकताएं हैं। मैं यह नहीं कहता कि तुम खेलकूद में भाग मत लो किन्तु अपना ध्यान पढ़ाई में लगाओ और अच्छे से अच्छे अंकों से परीक्षाएं पास करो। तुम्हारी सहेली ने घमण्ड में आकर जिस तरह की बात की है वह उचित नहीं है लेकिन उसने जो कहा है वह ध्यान देने लायक है। तुम हार-जीत की परवाह किए बिना खेलकूद में भाग लो और अपना पूरा ध्यान अपनी शिक्षा पर केन्द्रित करो। उसकी माँ भी यह सब सुन रही थी। उसने सीमा के पिता से कहा- पढ़ाई-लिखाई तो आवश्यक है ही साथ ही खेलकूद भी उतना ही आवश्यक होता है। इसमें भी कोई आगे निकल जाए तो उसका भी तो बहुत नाम होता है।

सीमा के पिता को उसकी माँ की बात अनुचित लगी। वह भी सीमा को बहुत चाहते थे। उनकी अभिलाषा थी कि बड़ी होकर वह बड़ी अफसर बने। सीमा दोनों की बातें ध्यान पूर्वक सुन रही थी। उसकी माँ ने उससे कहा- दृढ़ इच्छा शक्ति और कठोर परिश्रम से सभी कुछ प्राप्त किया जा सकता है।

सीमा अगले दिन से ही गाँव के एक मैदान में जाकर सुबह दौड़ का अभ्यास करने लगी। वह प्रतिदिन सुबह जल्दी उठ जाती और दैनिक कर्म करने के बाद दौड़ने चली जाती। एक दिन जब वह अभ्यास कर रही थी तो वह गिर गई जिससे उसके घुटने में चोट आ गई। वह कुछ दिनों तक अभ्यास नहीं कर सकी, इसका उसे बहुत दुख था और वह कभी-कभी अपनी माँ के सामने रो पड़ती थी। जब उसकी चोट ठीक हो गई तो उसने फिर अभ्यास प्रारम्भ कर दिया। अब वह और भी अधिक मेहनत के साथ अभ्यास करने लगी। वह उतनी ही मेहनत पढ़ाई में भी कर रही थी। इसके कारण उसे समय ही नहीं मिलता था। वह बहुत अधिक थक भी जाती थी। उसके माता-पिता दोनों ने यह देखा तो उन्होंने यह सोचकर कि विद्यालय आने-जाने के लिये गाँव से शहर आने-जाने में उसका बहुत समय बरबाद होता है। उन्होंने उसके लिये शहर में ही एक किराये का मकान लेकर उसके रहने और पढ़ने की व्यवस्था कर दी। शहर में उसके साथ उसकी माँ भी रहने लगी। इससे उसके पिता को गाँव में अपना कामकाज देखने में बहुत परेशानी होने लगी किन्तु उसके बाद भी उन्हें संतोष था क्योंकि उनकी बेटी का भविष्य बन रहा था।

शहर आकर सीमा जिस घर में रहती थी उससे कुछ दूरी पर एक मैदान था। लोग सुबह-सुबह उस मैदान में आकर दौड़ते और व्यायाम करते थे। सीमा ने भी अपना अभ्यास उसी मैदान में करना प्रारम्भ कर दिया। एक बुजुर्ग वहाँ मारनिंग वॉक के लिये आते थे। वे सीमा को दौड़ का अभ्यास करते देखते थे। अनेक दिनों तक देखने के बाद वे उसकी लगन और उसके अभ्यास से प्रभावित हुए। एक दिन जब सीमा अपना अभ्यास पूरा करके घर जाने लगी तो उन्होंने उसे रोक कर उससे बात की। उन्होंने सीमा के विषय में विस्तार से सभी कुछ पूछा। उन्होंने अपने विषय में उसे बतलाया कि वे अपने समय के एक प्रसिद्ध धावक थे। उनका बहुत नाम था। वे पढ़ाई-लिखाई में औसत दर्जे के होने के कारण कोई उच्च पद प्राप्त नहीं कर सके। समय के साथ दौड़ भी छूट गई। उन्होंने सीमा को समझाया कि दौड़ के साथ-साथ पढ़ाई में उतनी ही मेहनत करना बहुत आवश्यक है। अगले दिन से वे सीमा को दौड़ की कोचिंग देने लगे। उन्होंने उसे लम्बी दौड़ के लिये तैयार करना प्रारम्भ कर दिया।

शाला में प्रादेशिक स्तर पर भाग लेने के लिये चुने जाने हेतु अंतिम प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। इसमें 1500 मीटर की दौड़ में प्रथम आने वाले को प्रादेशिक स्तर पर भेजा जाना था। प्रतियोगिता जब प्रारम्भ हो रही थी सुमन ने सीमा की ओर गर्व से देखा। सुमन पूर्ण आत्मविश्वास से भरी हुई थी और उसे पूरा विश्वास था कि यह प्रतियोगिता तो वह ही जीतेगी। सुमन और सीमा दोनों के माता-पिता भी दर्शक दीर्घा में उपस्थित थे। व्हिसिल बजते ही दौड़ प्रारम्भ हो गई।

सुमन ने दौड़ प्रारम्भ होते ही अपने को बहुत आगे कर लिया था। उसके पैरों की गति देखकर दर्शक उत्साहित थे और उसके लिये तालियाँ बजा-बजा कर उसका उत्साह बढ़ा रहे थे। सीमा भी तेज दौड़ रही थी किन्तु वह दूसरे नम्बर पर थी। वह एक सी गति से दौड़ रही थी। 1500 मीटर की दौड़ थी। प्रारम्भ में सुमन ही आगे रही लेकिन आधी दौड़ पूरी होते-होते तक सीमा ने सुमन की बराबरी कर ली। वे दोनों एक दूसरे की बराबरी से दौड़ रहे थे। कुछ दर्शक सीमा को तो कुछ सुमन को प्रोत्साहित करने के लिये आवाजें लगा रहे थे। सुमन की गति धीरे-धीरे कम हो रही थी जबकि सीमा एक सी गति से दौड़ती चली जा रही थी। जब दौड़ पूरी होने में लगभग 100 मीटर रह गये तो सीमा ने अपनी गति बढ़ा दी। उसकी गति बढ़ते ही सुमन ने भी जोर मारा। वह उससे आगे निकलने का प्रयास कर रही थी लेकिन सीमा लगातार उससे आगे होती जा रही थी। दौड़ पूरी हुई तो सीमा प्रथम आयी थी। सुमन उससे काफी पीछे थी। वह द्वितीय आयी थी।

सीमा की सहेलियाँ मैदान में आ गईं थी वे उसे गोद में उठाकर अपनी प्रसन्नता जता रही थीं। वे खुशी से नाच रही थीं। मंच पर प्राचार्य जी आये और उन्होंने सीमा की विजय की घोषणा की। सीमा अपने पिता के साथ प्राचार्य जी के पास पहुँची और उसने उनसे बतलाया कि वह प्रादेशिक स्तर पर नहीं जाना चाहती है। उसकी बात सुनकर प्राचार्य जी और वहाँ उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये थे। प्राचार्य जी ने उसे समझाने का प्रयास किया किन्तु वह टस से मस नहीं हुई।

सीमा ने उनसे कहा कि वह आईएएस या आईएफएस बनना चाहती है। इसके लिये उसे बहुत पढ़ाई करने की आवश्यकता है। दौड़ की तैयारियों के कारण उसकी पढ़ाई प्रभावित होती है इसलिये वह प्रादेशिक स्तर पर नहीं जाना चाहती। अन्त में प्राचार्य जी स्वयं माइक पर गये और उन्होंने सीमा के इन्कार के विषय में बोलते हुए सुमन को विद्यालय की ओर से प्रादेशिक स्तर पर भेजे जाने की घोषणा की। यह सुनकर सुमन सहित वहाँ पर उपस्थित सभी दर्शक भी अवाक रह गये। सुमन सीमा के पास आयी और उसने पूछा कि तुमने ऐसा क्यों किया। सीमा उसे भी वही बतलाती है जो उसने प्राचार्य से कही थी। उसने सुमन को एक ओर ले जाकर उससे कहा कि मेरा उद्देश्य क्रीड़ा प्रतियोगिता में आने का नहीं था वरन मैं तुम्हें बताना चाहती थी समय सदैव एक सा नहीं होता। कल तुम प्रथम स्थान पर थी आज मैं हूँ कल कोई और रहेगा। उस दिन पुस्तकालय में तुमने जो कुछ कहा था उसे तुम मित्रता के साथ भी कह सकती थी किन्तु तुमने मुझे नीचा दिखाने का प्रयास किया था जो मुझे खल गया था। मेरी हार्दिक तमन्ना है कि तुम प्रादेशिक स्तर पर सफलता प्राप्त करो।

नियत तिथि पर सुमन स्टेशन पर प्रतियोगिताओं में भाग लेने जाने के लिये उपस्थित थी। विद्यालय की ओर से प्राचार्य और आचार्यों सहित उसके अनेक साथी एवं उसके परिवार के लोग भी उसे विदा करने के लिये आये हुए थे। प्राचार्य जी ने उसे शुभकामनाएं देते हुए कहा- सच्ची सफलता के लिये आवश्यक है कि मन में ईमानदारी, क्रोध से बचाव, वाणी में मधुरता किसी को पीड़ा न पहुँचे, अपने निर्णय सोच-समझकर लेना ईश्वर पर भरोसा रखना और उसे हमेशा याद रखना यदि तुम इन बातों को अपनाओगी तो जीवन में हर कदम पर सफलता पाओगी। जीवन में सफलता की कुंजी है वाणी से प्रेम, प्रेम से भक्ति, कर्म से प्रारब्ध, प्रारब्ध से सुख लेखनी से चरित्र, चरित्र से निर्मलता, व्यवहार से बुद्धि और बुद्धि से ज्ञान की प्राप्ति होती है। मेरी इन बातों को तुम अपने हृदय में आत्मसात करना ये सभी तुम्हारे लिये जीवन में प्रगति की आधार शिला बनेंगे।

सुमन सभी से मिल रही थी और सभी उसे शुभकामनाएं दे रहे थे किन्तु उसकी आँखें भीड़ में सीमा को खोज रही थीं। ट्रेन छूटने में चंद मिनिट ही बचे थे तभी सुमन ने देखा कि सीमा तेजी से प्लेटफार्म पर उसकी ओर चली आ रही है। वह भी सब को छोड़कर उसकी ओर दौड़ गई। सीमा ने उसे शुभकामनाओं के साथ गुलदस्ता भेंट किया तो सुमन उससे लिपट गई। दोनों की आँखों में प्रसन्नता के आंसू थे।

48* मानव सेवा

मानस एक मध्यम परिवार का लड़का था। वह मानव सेवा को ही अपना धर्म एवं कर्म मानता था। उसे पूजा पाठ, मंदिर दर्शन आदि में कम विश्वास था परंतु वह सेवा कार्यों में निरंतर अपना समय देता था। वह एक शासकीय अस्पताल में प्रतिदिन शाम के वक्त दो घंटे देकर वहाँ भर्ती मरीजों के हालचाल पूछकर उन्हें सांत्वना देकर उनका उत्साहवर्धन भी करता था। उनके छोटे मोटे कार्यों में उनकी सहायता कर देता था और सप्ताह में एक दिन मरीजों को अपनी ओर से पौष्टिक नाश्ता उपलब्ध कराता था।

एक बार नगर के एक संपन्न व्यवसायी को अस्पताल में कुछ दिन के लिये भर्ती किया गया। वह मानस की गतिविधियों से आश्चर्यचकित थे कि बिना किसी स्वार्थ के वह ऐसा क्यों करता है ? एक दिन उन्होंने उससे पूछ ही लिया कि तुम्हें ऐसा करने से क्या लाभ होता है ? उसने विनम्रतापूर्वक कहा कि मैं मानव सेवा को ही ईश्वर की सेवा मानता हूँ तथा अपने सामर्थ्य के अनुसार ही यह पुनीत कार्य कर पाता हूँ। सेठ जी उसकी भावना से बहुत प्रभावित हुये। कुछ दिनों बाद उनकी अस्पताल से छुट्टी हो गई। एक दिन उन्होंने मानस को बुलाकर कहा कि तुम्हारे विचारों ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। अब तुम प्रतिदिन मरीजों को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराओ इस पर होने वाला सारा व्यय मैं वहन करूँगा।

तुमने मेरे व्यापार के सिद्धांतों को नई विचारधारा दे दी है। मैं अभी तक धन कमाता था एवं उसे अपने परिवार की आवश्यकताओं पर खर्च करके जो बचता था उसका कुछ भाग सेवा में खर्च कर देता था परंतु अब मैं सेवा करने के लिये धन कमाऊँगा, एवं अपनी आवश्यकताओं को सीमित करते हुये उसे सत्कार्यों में खर्च करूँगा।

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