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पश्चाताप के आंसू (लघु कथा) // सुशील शर्मा

"बहु मुझे माफ़ कर दे मैंने न मालूम तुम्हें कितनी गालियां दी कितने श्राप दिए लेकिन तुमने उफ भी नहीं किया सब सहती रहीं "

माया देवी अपनी अंतिम साँसे गिन रहीं थीं बिस्तर पर पड़े पड़े उनकी आंखें भींज रहीं थीं। पश्चाताप के आंसू झर झर गिर रहे थे।

"नहीं अम्मा आप तो मेरी माँ है और माँ को तो अपनी औलाद से हर प्रकार से बोलने का हक़ है।

मैं तो आपको अपनी मम्मी मानती हूं इस लिए आपकी कोई बात बुरी नहीं लगी"

रश्मि ने मायादेवी के सिर पर प्रेम से हाथ फेरते हुए कहा।

मायादेवी के आंखों से झर झर आंसू गिर रहे थे उन्हें वो हर एक पल याद आ रहा था जब उन्होंने रश्मि और उसके पूरे मायके को जी भर कर गालियां दी थी।

"बेटा मुझे माफ़ कर दे मेरी कोई बेटी नहीं थी मैं अपने अहंकार में तुझे हमेशा नीचा दिखाने में लगी रही"

माया देवी ने रश्मि के हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा।

"नहीं माँ आप पश्चाताप मत करो आपका अधिकार था मुझे सिखाना मैं आपके अनुशासन में बहुत सारी बातें सीख गई जो मुझे नहीं मालूम थीं। मेरी माँ नहीं थी जो मुझे सिखाती वो आपने सिखा दीं। मुझे तो आपमें अपनी माँ ही दिखती है।" रश्मि ने बहुत प्यार से माया देवी को सहलाते हुए कहा।

"बेटा अभी तक तो मैं तेरी सास थी लेकिन आज से मैं तेरी माँ हूँ अब तुझे कोई कठिनाई नहीं आने दूंगी। "मायादेवी ने रश्मि को गले लगाते हुए कहा पश्चाताप के आंसू अभी भी उनके गालों पर से लुढक रहे थे।

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