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मानवते // बख्त्यार अहमद खान

मानवते

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यदि, बन कण ,हो असहाय, न तुम यूँ बिखरी होतीं
तो श्वासें अर्पित करता अपनी मैं तुझको
और पुष्प सजा वेदी पर जीवन की
पूजा करता मैं तुझको ...।
निकलता निडर हो ,प्रेरणा पा तेरी..
उघाड़ने निस्तब्ध तिमिर अंक में सोया सत्य
आश्रय पा तेरा नित नई क्रांति के मोर्चे लेता
रख लेता असीम क्षोभ भी हृदय में
क्योंकि तब..
तुम जीवित तो आशाएँ भी जीवित होतीं ...।
सजा वेदना शूल पांवों की फटी दरारों में
जाता लाने मैं जीवन तत्व....
हो लहू लुहान भी अनुभव करता गर्व
युद्ध में खो सर्वस्व,
सोचता i एक मैं ही तो गया
     आया तो वापस वह प्रेम और साहचर्य...,

समझाता ...
इस चिर निद्रा में तो सबको सोना होगा
यदि पाना है कुछ तो कुछ खोना होगा
   पाता  मैं, मर कर भी अमरत्व ..
यदि तुम ,ऐ मानवते ...!
बन कण ,हो असहाय, न यूँ बिखरी होतीं..
तो,तुम जीवित, तो आशाएँ भी जीवित होतीं....।
    

    ----बख्त्यार अहमद खान
      74- रानी बाग ,शम्साबाद रोड,आगरा -282001

        Mail-ba5363@gmail.com 

कविता 1609549003754743672

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