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काव्य (गीतिका) संग्रह // एक दिन किरन तो आएगी // डॉ. सुधीर कुमार शर्मा

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काव्य संग्रह एक दिन किरन तो आएगी डॉ. सुधीर कुमार शर्मा (डॉ. सुधीर कुमार शर्मा) एक दिन किरन तो आएगी (गीतिका-संग्रह) डॉ. सुधीर कुमार शर्मा ...

काव्य संग्रह

एक दिन किरन तो आएगी

डॉ. सुधीर कुमार शर्मा

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(डॉ. सुधीर कुमार शर्मा)


एक दिन किरन तो आएगी


(गीतिका-संग्रह)
डॉ. सुधीर कुमार शर्मा


अपने समय के तनावों से गुज़रते हुए

हिन्दी में इधर ग़ज़ल की ज़मीन अधिक उर्वर हुई है। ज़मीन की तासीर का असर उसकी उपज के स्वाद पर पड़ता है। इधर की हिन्दी ग़ज़लों में यह स्पष्ट हो रहा है कि उन्होंने अपने आंतरिक अनुभवों में जीवन-स्पन्दनों के अनेक ध्वनि बिम्बों को साकार किया है। अपने समकालीन आत्म संघर्ष और सामाजिक अंतर्विरोधों को हिन्दी ग़ज़ल ने अपना कथ्य बनाकर यह आशय सिद्ध  कर दिया है कि अब ग़ज़ल प्रेमालापी अनुभूतियों के केन्द्र से संप्रसारित होकर जीवन-वैविध्य के व्यापक सरोकारों की परिधि के चक्र की पदचाप को प्रकट करने में समर्थ हो रही है। डॉ. सुधीर कुमार शर्मा के प्रस्तुत ग़ज़ल संग्रह को पढ़ते हुए यह अनुभव होता रहा है कि यह विधा अपनी यात्रा के इस पड़ाव तक आते-आते भारतीय संदर्भों में अपना एक विशिष्ट मुहावरा गढ़ चुकी है।


कोई भी विधा जब अनेक सशक्त रचना धर्मियों की सृजन शक्ति के आश्रय का पाथेय लेकर गतिशील होती है, तब वह अपने व्यक्तित्व का स्वतंत्र स्वरूप भी निर्धारित कर लेती है। डॉ. शर्मा के यहां तक आते-आते यह विधा अपनी युग सापेक्ष एक स्वतंत्र पहचान बनाने में सफल हो सकी है।


डॉ. सुधीर कुमार शर्मा ने अपनी समकालीन सच्चाइयों को प्रकट करने के लिये ग़ज़ल जैसी विधा को हिन्दी में एक नया मुहावरा प्रदान करते हुए उसे हिन्दी काव्य के अजिर में एक तीखी और ऊष्मित रश्मि रेखा की तरह संपादित किया है। वे हिन्दी की उस शब्दावली का प्रयोग इस छन्द रचना में करते हैं जिसका अभ्यस्त यह छंद नहीं रहा है‘‘ आदमी और रोशनी के प्रति तिमिर मध्यस्थ है/ हर कली मसली हुई है हर नजर   अस्वस्थ है/ करना उच्चारण संभलकर ज़िंदगी के मंत्र का/ स्वार्थों का व्याकरण हर व्यक्ति को कंठस्थ है।“ यह व्याकरण जहां एक ओर हमारी जीवनगत विडंबनाओं को भाषाबद्ध  करता है वहीं दूसरी ओर यह कथन की उस भंगिमा की ओर भी संकेत करता है, जो हिन्दी की भाषिक शक्तियों का विस्फोट भी प्रकट करता है।


ग़ज़ल को गहरे सामाजिक तनावों से रूबरू करने के लिए भाषा के जिस तेवर की जरूरत होती है - वह डॉ. शर्मा के यहां आकार ले रहा है। यह तेवर भीतर-भीतर तिलमिलाने के लिये बाध्य कर देता है। ग़ज़ल में निहित यह आक्रोशपरक उद्वेलन पाठक को लंबे समय तक चैन नहीं लेने देता है। यह तनाव अनेक फरेबों के सामुख्य का परिणाम है। लेकिन रचनाकार ने इसे जिस भाषिक कौशल के माध्यम से प्रस्तुत किया है - वह सादगी के साथ गहरा वार करने का सलीका प्रस्तुत करता है - ‘‘सभ्यता के वक्ष पर बंदूक दागी आपने/किन्तु अपराधी बने हम आप अभिनन्दित हुए/शब्द जो सारी हमारी वर्णमाला पी गए/वे ही भाषा की सुरक्षा के लिये शंसित हुए“ भाषा-स्खलन का यह समय हमारे जीवन-स्खलनों के संदर्भों को ही उजागर करता है। इन ग़ज़लों में यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि रचनाकार अपनी भाषा पाने के लिये गहरी जद्दोजहद कर रहा है। दरअसल जीवन का बोध इतने स्वादों की जुगाली कर रहा है कि वह मनुष्य होने की शिनाख्त से भी वंचित हो रहा है - भोग का विकृत और अनर्गल सिलसिला जिस मानव विरोधी परिवेश को रच रहा है उसे व्यक्त करने के लिये एक नई बिम्ब शृंखला की ज़रूरत है। डॉ. सुधीर कुमार शर्मा यदि कहते हैं कि ‘‘आज वे ही सूर्य के बनकर चले हैं सारथी/हाथ जिनके रोशनी के रक्त से रंजित हुए।“ तो यह अनुभव तल्ख होने लगता है कि रचनाकार अपने विद्रूप समय को एक शक्ल देने के लिये बेताब है - और इसके लिये वह अपनी एक मुकम्मल कथन-प्रणाली तलाश रहा है।


कवि केवल निराशा बोध को ही मुखरित नहीं करता - वह अपनी सामर्थ्य का प्रयोग जीवनगत स्वीकृतियों को प्रकट करने में भी करता है। भले ही अँधेरे का क़ब्ज़ हमारी व्यवस्थाओं को उलट-पलट कर रहा है; भले ही अँधेरे की उठा-पटक हमारे जीवनगत अभिप्रायों को विरूपित कर रही हो किन्तु कविता के रन्ध्रों से एक प्रकाश की किरण झांकना ही चाहिये और वह किरण डॉ. शर्मा की इन ग़ज़लों में अपनी उजास गाहे-बगाहे फेंकती है। भले ही उपवन को उजाड़ने की, कलियों को मसलने की, खुशबू को क़ैद करने की, फूल की फरियाद को अनसुना करने की सतत् कोशिश हो रही है, किन्तु रचनाकार जब कहता है कि ‘‘देखना, पाएँगे बिरवे, शक्ल जिस दिन दरख्तों की/बगावत भी तभी होगी इन्हीं उत्पात को लेकर“ कवि की यह भविष्य दृष्टि मूल्यवान है। जीवन लाख विरोधों के बीच भी अपनी मूल्यवत्ता में सौभाग्य ही है। इन ग़ज़लों का यह विधाई स्वर एक आश्वस्ति लेकर आता है।


रचनाकार ने ग़ज़ल के मीटर में भी एकरसता को भंग किया है। रचनाकार लंबे मीटर में भी सांगरूपक साधने में सिद्ध हस्त हैं। यद्यपि यह परम्परित ग़ज़ल की शिल्प परंपरा को एक नया प्रयोग देने वाला प्रसंग है, किंतु यह है स्वागत योग्य ही। जहां ग़ज़ल अपने हर पदबंध में अलग-अलग कथ्य विमर्श को चमत्कारिक सांचे में ढालती रही है, वहीं रचनाकार ने उसे इकसार अनुभव की छलकती कटोरी बनाने की कलात्मक जुगत अपनी कुछ ग़ज़लों में की है। छोटे मीटर की ग़ज़लों में रचनाकार की भाषिक शक्तियों की विस्फोटक प्रणालियों का प्रस्फुटन यह दर्शाता है कि रचनाकार अपनी चेष्टाओं में अपनी एक भाषा तलाश रहा है।


रचनाकार के इस ग़ज़ल संग्रह में रचनाकार के कवि व्यक्तित्व की संभावनाओं की आहट को हम गौर से सुन सकते हैं। वे और अच्छा रचें और आगे बढें, यही मेरी मंगल कामना है।


  - डॉ. श्याम सुंदर दुबे
निदेशक, मुक्ति बोध सृजन पीठ
डॉ. हरि सिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय
सागर (म.प्र.)

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मनोगत


ग़ज़ल शब्द का अर्थ है प्रेमी या प्रमास्पद से प्रेमपूर्ण संभाषण करना।  इस तरह प्रारंभ में ग़ज़ल के केन्द्र में वैयक्तिक प्रेम रहा है। आज भी हिंदी  ग़ज़ल वैयक्तिक प्रेमानुभूति की अभिव्यक्ति से आगे निकलकर विविध  जीवन-संदर्भों से जुड़ गई है। आज हिन्दी ग़ज़ल सामाजिक वैषम्य  राजनीतिक विद्रूपता और जीवन विरोधी परिवेश से लड़ रही है।  कहा जाता है कि हिंदी-उर्दू साहित्य में ग़ज़ल का वही स्थान रहा है  जो अंग्रेजी में ‘सोनेट’ का। ग़ज़ल शब्द विदेशी भाषा मूल का हो सकता  है लेकिन आज जो इसका स्वरूप है वह पूर्णरूपेण भारतीय ही है। आज  ग़ज़ल की पदचाप क्षेत्रीय बोलियों के रचना-संसार में भी सुनाई दे रही  है।


हिंदी साहित्यकारों ने ग़ज़ल को बाह्यगत विधा के रूप में स्वीकार  किया है; ग़ज़ल को विदेशी काव्य-विधा के रूप में देखा है, इसीलिए ग़ज़ल  के छन्द की चर्चा शास्त्रीय छन्दों - दोहा, सोरठा, चौपाई आदि से दूर रखी  गई है। बाद में इस विधा के स्वदेशी नामकरण भी किए गए। कुछ  साहित्यकारों ने हिंदी ग़ज़ल को प्रगीतिका, मुक्तिका एवं अनुगीत आदि  नाम दिए। इसमें शोषण मूलक व्यवस्था के विरुद्ध  नया तेवर होने के  कारण इसे ‘तेवरी’ भी कहा गया। श्री गोपाल दास ‘नीरज’ ने हिंदी ग़ज़ल  को ‘गीतिका’ नाम दिया। हिंदी ग़ज़ल के छांदिक स्वरूप, शिल्प, गेयता  एवं गीतात्मकता की दृष्टि से ‘गीतिका’ नाम इसके लिए सर्वाधिक  उपयुक्त लगता है।


वर्तमान समय में भोगवाद की प्रवृत्ति इस तरह बढ़ी है कि समूचा  परिवेश जीवन-विरोधी हो गया है। सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों का    क्षरण तेजी से हो रहा है। मानवीय संवेदना पर संकट विकट है। पूरा  परिवेश धृतराष्ट्र की मुद्रा में है और संस्कृति का चीरहरण हो रहा है।  भौतिक साधनों की उपलब्धता एवं तकनीक के आधिक्य ने मानवीय  संवेदना को कुंद बनाकर रख दिया है। पीड़ा में पड़े और असहनीय दुःख  भोगते आदमी की मदद के लिए लोग आगे नहीं आते, उसका वीडियो  बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर अपनी विकृत और पीड़क  मनोवृत्ति का प्रसार करने में अपनी रुचि दिखाते हैं। वर्तमान का यही  भयावह सच है। इस सच को व्यक्त कर पाना भी बड़ा चुनौतीपूर्ण है  क्योंकि सामाजिक जड़ता इस सत्य को स्वीकार कैसे करेगी? वर्तमान में  सर्जना के लिए यही वातावरण है - विचलित करने वाला - मानव विरोधी  या कहें जीवन-विरोधी।


ऐसे गाढ़े समय में रचना कर्म कठिन भी है और चुनौतीपूर्ण भी।  प्रस्तुत गीतिका संग्रह में यही सब कुछ अभिव्यक्त हुआ है। संग्रह की  गीतिकाएँ वर्तमान व्यवस्था के विद्रूपीकरण से उत्पन्न प्रश्नों को ही नहीं  उठातीं वरन् ये गीतिकाएँ गहन अंधकार में उजलीकिरन की तलाश भी  करती हैं। गहन अंधकार के विरोध के बिना उजली किरन की तलाश  भला कैसे संभव है? संग्रह की गीतिकाओं में उजाले की प्रच्छन्न तलाश  है। जीवन-विरोधी शक्तियों का प्रतिरोध और जीवन-समर्थक शक्तियों की  प्रतिष्ठा कदाचित रचनाकर्म का यही उद्देश्य भी है। इस उद्देश्य को पूरा  करने में, मानवीय संवेदना के भाव को स्थापित कर पाने में ये गीतिकाएँ  कहाँ तक सफल हुई हैं इसके निर्णय का अधिकार तो सुधी पाठकों एवं  काव्य मर्मज्ञों का है।


  - डॉ. सुधीर कुमार शर्मा

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अनुक्रम


जिसने जीवन मूल्य ................................................................... 15
धुआँ भर गया है ..................................................................... 16
आग हाथों से बुझाएँ ............................................................... 17
दर्द इस पार है ........................................................................ 18
कोई सुनता नहीं ...................................................................... 19
बेवजह इस धूल में .................................................................. 20
आदमी और रोशनी .................................................................. 21
गीता है क़ुरान है ..................................................................... 22
काली परछाई-सी ...................................................................... 23
जब कभी हम मूल अधिकारों से ................................................ 24
किरणों को क़ैद किया .............................................................. 25
ज़िंदगी है तप्त मरुथल ............................................................. 26
उम्र दर्दों का क़िला है .............................................................. 27
तहक़ीक़ात कल होगी ............................................................... 28
उब उजाले को तलाशा ............................................................. 29
हम लेकर आए आज़ादी ........................................................... 30
एक ही ग़लती ........................................................................ 31
व्याकरण के नेत्र ...................................................................... 32

कैसा रातों का मौसम है ........................................................... 33
पास अपने जो भी ग़म है ......................................................... 34
आपकी कोठी कहे ................................................................... 35
रोशनी है क़ैद .......................................................................... 36
पग-पग चुभती कील ................................................................ 37
सागर का तट ......................................................................... 38
सीमेण्ट के जंगल मिले ............................................................. 39
हर नयन ................................................................................ 40
चरण चापन, दुष्टता ................................................................. 41
स्वाभिमानी को ठगा है ............................................................. 42
सभ्यता का आजकल ............................................................... 43
कब तक यही व्यथा ................................................................ 44
कुछ तो कम हो ...................................................................... 45
जैसे जल में रहे कमलिनी ......................................................... 46
मुक़द्दर से गिरकर .................................................................. 47
कहकहे, निश्च्छल हँसी ............................................................. 48
सच्चाइयाँ हैरान हैं ................................................................... 49
इस अभागी ज़िंदगी को ............................................................ 50
दंगा-कर्फ्यू .............................................................................. 51
मुक़द्दम ................................................................................. 52
इतनी घायल परवाज़ ................................................................ 53
मन में कमल .......................................................................... 54
बड़े विषैले तीर ........................................................................ 55
पेड़ काटे हैं ............................................................................. 56
फिर वही बात ......................................................................... 57
प्राण-खग पीर से ..................................................................... 58
यूँ उजाले खतम हो गए ........................................................... 59
देश जिस रस्ते चला है ............................................................. 60
एक दिन किरन तो आएगी ....................................................... 61
कभी जीत हुई ......................................................................... 62
पेड़ कटे या डाल है ................................................................. 63
गाँव जब से ............................................................................ 64
कैसा परिवर्तन भाई .................................................................. 65
कल का उजला दिवस .............................................................. 66
थक गए आज ........................................................................ 67
चल रही है लोकशाही .............................................................. 68
आओ सोचें ............................................................................. 69
तन के कपड़े ........................................................................... 70
बेटियाँ ................................................................................... 71
मॉल के सामने ........................................................................ 72
राजा सुखी है .......................................................................... 73
जिंदा हो तुम .......................................................................... 74
बढ़ती रही विकास दर .............................................................. 75
दीप ने सारे जग का ................................................................ 76
ये मेरा शहर है ........................................................................ 77
आतंक की जद में ................................................................... 78
खुशबू-से बिखरते हैं ................................................................. 79
हर हाथ में पत्थर है ................................................................ 80
सार्थक मधुभास होता है ........................................................... 81
ऊपर से मुस्कराए .................................................................... 82
पंखों में भी हौसला .................................................................. 83
पेड़ हरे उपवन होते हैं .............................................................. 84
स्वयं दीप बन जाएँ .................................................................. 85
ये किसकी बंदूक ..................................................................... 86
भीतर का दर्द ......................................................................... 87


जिसने जीवन मूल्य


जिसने जीवन मूल्य सिरे से त्यागे हैं।
भौतिक समृद्धि में वे ही आगे हैं ।।
जो पत्थर सत्ता का पारस छू आए
वे सोना बन गए वही सोहागे हैं ।।
वे श्रमशील जनों के भाग्य विधाता हैं
जिनके जीवन सुविधाओं में पागे हैं ।।
सारा तंत्र इन्हीं की ख़ातिर रचा गया
फिर भी इतने वंचित और अभागे हैं ।।
इनको  उलझाओगे  तो  ये टूटेंगे
इतने कोमल संबंधों के धागे हैं ।।
ये अपने सपनों की वो तस्वीर नहीं
जिसकी यादों में हम रातों जागे हैं ।।


धुआँ भर गया है


धुआँ भर गया है सुलगते सिमाने।
ये जीवन कहाँ जाएगा राम जाने ।।
नदी को निगलने लगी रेत अब तो
चली आग गहरा समन्दर सुखाने ।।
मयस्सर किसे चैन की ज़िन्दगी है
जिधर देखिए दर्द के ही ठिकाने ।।
ये चेहरा भला सूर्य का कौन-सा है
हम चले हैं यही रात में आजमाने ।।
आज संदर्भ से जो नज़र कट गई है
वही चल पड़ी है हक़ीक़त दिखाने ।।
जहाँ प्यार की झील लहरा रही थी
वहीं खुल गए द्वेष के कारखाने ।।
मिले नक़्श नाखून के लाश पर भी
कलम ने कहा वाह रे वाह ज़माने ।।

आग हाथों से बुझाएँ


आ रही हैं संगठित हो आपदाएँ।
आइए हम मूल कारण ढूँढ़ लाएँ ।।
आ न जाए रोशनी के द्वार पर ये
तम के पाँवों पर उछालो शृंखलाएँ ।।
दर्द से थोड़ी-सी राहत तो मिलेगी
चंद नगमे प्यार के ही गुनगुनाएँ ।।
उनसे कह दो ये रुई का आशियाँ है
तीलियों को फेंकने से बाज़ आएँ ।।
रात की आलोचना से तो भला है
एक दीपक ही सही आओ जलाएँ ।।
दमकलों की अब प्रतीक्षा छोड़िए भी
बढ़ रही है आग हाथों से बुझाएँ ।।


दर्द इस पार है


दर्द इस पार है चैन उस पार है।
बीच में बह रही साँस की धार है ।।
हमने देखा यही देह के गाँव में
नेह की कल्पना ही निराधार है ।।
हर हृदय पर चढ़े अनगिनत आवरण
प्यार है ही कहाँ सिर्फ व्यापार है ।।
छल के इस देश में एक भला आदमी
साँस लेना भी चाहे तो दुश्वार है ।।
खोजते हो यहाँ छाँह पागल हो क्या
इस ज़गह पर तो ज़र्रा भी अंगार है ।।
एक भटकन मिली है क़दम दर क़दम
ये सरलता का शायद पुरस्कार है ।।

कोई सुनता नहीं


कोई सुनता नहीं बात संगीन है।
ये शिकायत हमारी समीचीन है ।।
जिसने हमसे हमारी सुबह छीन ली
न्याय की पीठिका पै वो आसीन है ।।
आदमी से बड़ा जाति को मत कहो
ग़र खुदा है कहीं उसकी तौहीन है ।।
नव वधू-सी सजी राज अट्टालिका
गाँव की ये कुटी क्यों उदासीन है ।।
धर्म के नाम पर जो बहाते लहू
उनका कैसा धरम कौन-सा दीन है ।।
रक्तपायी  बता  ये  लहू देखकर
ये ख़ुदाबख्श है या गयादीन है ।।


बेवजह इस धूल में


बेवजह इस धूल में पंकज पड़े हैं।
पत्थरों के देश में अचरज बड़े हैं ।।
डालियों, कलियों, मुलायम पत्तियों पर
धूप के नाखून नाजायज़ गड़े हैं ।।
घूमती है हर दिशा, पृथ्वी हिली है
लग रहा शायद कहीं दिग्गज लडे़ हैं ।।
बाँबियों में विष-वमन फुँकार के स्वर
आप कहते हैं अमन के ध्वज गडे़ हैं ।।
आदमी की शक्ल में डस लें किसे कब
फन उठाए साँप के वंशज खड़े हैं ।।
मंत्र पढ़कर कौन फूँकेगा ज़हर को
वाइगीयों के अपाहिज़ फेंफड़े हैं ।।

आदमी और रोशनी


आदमी और रोशनी के प्रति तिमिर मध्यस्थ है।
हर कली मसली हुई है, हर नज़र अस्वस्थ है ।।
करना उच्चारण संभलकर ज़िंदगी के मंत्र का
स्वार्थ का व्याकरण हर व्यक्ति को कण्ठस्थ है ।।
कैसे  पनपेंगी  नई  नस्लें लुटे माहौल में
शिशु अंधेरे का व्यवस्था ने किया गर्भस्थ है ।।
सत्य का गढ़ अब सुरक्षित रह सकेगा बोलिए
मोर्चा ईमान का टूटा हुआ है, ध्वस्त है ।।
गहरी दहशत से भरा है अब शरीफों का शहर
आज अंधियारे ने दिन को कर लिया उदरस्थ है ।।


गीता है, क़ुरान है


गीता है, क़ुरान है।
व्यक्ति बेईमान है ।।
तिकड़में जो जानता
वही बुद्धिमान है ।।
ज़िंदगी   ग़रीब   की
आफतों की खान है ।।
आदमी  से  बेहतर
सेठ जी का श्वान है ।।
शहरों  में  भीड़ है
गाँव  सुनसान है ।।
मूल्य  भस्म  हो गए
कैसा  तापमान  है ।।

काली परछाईं-सी


काली  परछाईं-सी  है बंदनवारों  पर।
उल्टे सतिये छापे घर की दीवारों पर ।।
सुबह ये खबर तुमने पी चाय पढ़ी होगी
इक देह गई नोंची वर्दी के इशारों पर ।।
राशन-पानी सारा फसलों का खा जाते
कोई रोक नहीं लगती इन खरपतवारों पर ।।
अब भी चूल्हा जलता इकबार ही कहीं-कहीं
उत्पादन की सुर्खी आती अखबारों पर ।।
इन झोपड़ियों का तो ईश्वर ही मालिक है
उनकी  नज़रें जातीं  केवल  मीनारों पर ।।
इस शहर में भूखों को भाषण ही मिलते हैं
यहाँ राख का अनुशासन चलता है शरारों पर ।।


जब कभी हम मूल अधिकारों से


जब कभी हम मूल अधिकारों से भी वंचित हुए।
आप अखबारों में तब-तब और भी चर्चित हुए ।।
जिस भवन में संपदाएँ आप से व्याही गईं
उस भवन में पग हमारे जाने से वर्जित हुए ।।
जब कभी द्वारे हमारे आपके आए चरन
यूँ लगा ज्यूँ पुण्य पिछले जन्म के संचित हुए ।।
सभ्यता के  वक्ष पर  बन्दूक दागी आपने
किंतु अपराधी बने हम आप अभिनन्दित हुए ।।
शब्द जो सारी हमारी वर्णमाला पी गए
वे ही भाषा की सुरक्षा के लिए शंसित हुए ।।
आज वे ही सूर्य के बन कर चले हैं सारथी
हाथ जिनके रोशनी के रक्त से रंजित हुए ।।

किरणों को क़ैद किया


किरणों को कै़द किया, तम की राजधानी में।
अपनी आँखें मलता, सरज हैरानी में ।।
तेज़  निगाहों में, अधरों  पर  अंगारे
क्यों आग धधकती है अन्तस की हिमानी में ।।
आने दो झरोखों से खुशहाल हवाओं को
क्यों बंद खिड़कियों को करते नादानी में ।।
बचपन से रहा अपना, बस एक ही घर आँगन
दीवारें खड़ी कर लीं क्यों आज ज़वानी में ।।
जो चरण कुचलते हैं आशाओं का उपवन
क्यों बन्धु! खड़े हो तुम उनकी अगवानी में ।।
क्यों तुमको हिमालय की धरती से प्यार नहीं
क्या ज़हर मिला पावन गंगा के पानी में ।।
केसर की ज़मीं पर तुम बारूद उगाते हो
तारीख लिखे  कैसे इसको  क़ुर्बानी में ।।


ज़िंदगी है तप्त मरुथल


ज़िंदगी है तप्त मरूथल और तुम शीतल किरन।
उम्र के पतझर में तुम हो वसंती आगमन ।।
जो मधुरवाणी सदा नयनों से संप्रेषित हुई
प्रेम उस वाणी की भाषा तुम हो उसका व्याकरन ।।
तुम न थे तो एक बोझिल मौन फैला था यहाँ
मिल गए कितना मुखर होने लगा वातावरन ।।
कौन कहता है धरा-आकाश मिल पाते नहीं
उस क्षितिज पर देख लो धरती पै आ जाता गगन ।।
मैं भटकती रश्मि हूँ तुम ज्योति का संसार हो
यदि समा पाऊँ तुम्हीं में खत्म हो आवागमन ।।
ढूँढ़ता हूँ मैं तुझे प्रारंभ से ले आज तक
ओ अनागत! आ सुखद भविष्य का आधार बन ।।

उम्र दर्दों का क़िला है


उम्र  दर्दों का  क़िला है  सोचता  हूँ मैं।
फिर किसी से क्या ग़िला है सोचता हूँ मैं ।।
कुछ नहीं चाहा मगर विश्वास के बदले कभी
किससे-किससे क्या मिला है सोचता हूँ मैं ।।
ज़िदंगी की झील में अब जल नहीं बस रेत है
कब कमल मन का खिला है सोचता हूँ मैं ।।
आँख तो बस देखती है, जीभ पर प्रतिबंध हैं
हाथ पर रखी शिला है  सोचता हूँ मैं ।।
जो निरक्षर  राजसत्ता  की सुरंगों में घुसा
उसका घर बहुमंज़िला है  सोचता हूँ मैं ।।
कल बनी थी ये व्यवस्था तमचरों की सहचरी
आज तो ये हामिला है सोचता हूँ मैं ।।
स्याह-सन्नाटे में डूबी गाँव की पगडंडियाँ
राजपथ पर का क़ाफ़िला है सोचता हूँ मैं ।।


तहक़ीक़ात कल होगी


तहक़ीक़ात कल होगी जिन सवालात को लेकर।
हमीं लिख जाएँगे कलियों के हर हालात को लेकर ।।
जहाँ मिलती थी हरियाली वहाँ अब ठूँठ मिलते हैं
दिखा सकते नहीं दिल में उठे जज़्बात को लेकर ।।
सुना है और उपवन में चलेंगे आँधियाँ-अंधड़
यहाँ सब क्यारियाँ घबरा रहीं इस बात को लेकर ।।
चमन की हर नई खुशबू हवाएँ कैद करती हैं
फूल किससे करें शिकवे इन खुराफात को लेकर ।।
सभी माली यहाँ लिपटे हुए उजले लिबासों में
ये बातें कौन करता है अँधेरी रात को लेकर ।।
आज इस डाल की हत्या कल को उस पेड़ की बारी
मुद्दतें हो गईं सुनते इन्हीं ज़ुल्मात को लेकर ।।
देखना, पाएँगे बिरवे, शक्ल जिस दिन दरख्तों की
बग़ावत भी तभी होगी इन्हीं उत्पात को लेकर ।।

जब उजाले को तलाशा


जब उजाले को तलाशा यार मेरे।
सामने आया कुहासा यार मेरे ।।
जल गई शायद सुहागन फिर कोई
उस गली में है धुंआ-सा यार मेरे ।।
घास के  मानिंद  सबकी  ज़िंदगी
हो रहा कैसा तमाशा यार मेरे ।।
जी सकेगी रोशनी हर मोड़ पर
तम लिए बैठा गँड़ासा यार मेरे ।।
आदमी मर जाय  या  कुत्ता मरे
फ़र्क इसमें क्या ज़रा-सा यार मेरे ।।
ग़ौर से  देखो  ज़रा  हर आँख में
जम गया है हादसा-सा यार मेरे ।।


हम लेकर आए आज़ादी


हम लेकर आए आज़ादी घिरे रहे शमशीरों में।
लेकिन अपने नाम न आए आज़ादी के वीरों में ।।
अपने हाथ कुदाली तब थी अपने हाथ कुदाली आज
अपना जीवन बीत रहा है तकलीफों में पीरों में ।।
सारी खुशियाँ वरीं आपने सब सुख हुए आपके नाम
मेहनतकश का भाग्य हाथ की जर्जर हुई लकीरों में ।।
कहने को आज़ाद हो गए अपनी भाषा अपना देश
हिन्दी की अभिव्यक्ति बंधी अंग्रेजी की ज़जीरों में ।।
किसने घायल किया सूर्य को कौन पी गया सारी धूप
आाओ ढूँढ़े इन प्रश्नों को अँधियारी तक़दीरों में ।।
राजनीति शतरंज हो गई यहाँ करे जनसेवा कौन
सारा देश बँट गया जैसे राजा और बज़ीरों में ।।
कैसा है ये लोकतंत्र और कैसी है ये आज़ादी
बैठ गए अपराधी जाकर संसद के प्राचीरों में ।।

एक ही ग़लती


एक ही ग़लती मैंने बराबर की है।
सादगी अपने मन की उजागर की है ।।
कौन-सी आग से मुझको होगी जलन
मेरे दिल में रवानी समुन्दर की है ।।
इसको सावन मिला पर मरुस्थल उसे
बात ये अपने-अपने मुक़द्दर की है ।।
शाप दें याकि वर हम उन्हें क्या कहें
जिनके कारण घुटन ये उमर भर की है ।।
नाम मज़हब का लेकर के नफ़रत करो
क्या यक़ीनन ये मर्ज़ी पैग़म्बर की है ।।
उसकी जलती कुटी क्यों किरन के लिए
पास जिसके कि चुटकी महावर की है ।।
षोडशी पीर ने क्यों मुझे ही वरा-
ये ग़ज़ल तो इसी के स्वयंवर की है ।।


व्याकरण के नेत्र


व्याकरण के नेत्र रोते जा रहे।
खोखलापन वाक्य ढोते जा रहे ।।
प्रेम, सेवा, सत्य और ईमानदारी
शब्द अपना अर्थ खोते जा रहे ।।
कौन  संप्रेषित  करेगा भाव, गुम-
वर्तनी के चिह्न होते जा रहे ।।
व्यंजनों की दूरियाँ स्वर से बढ़ीं
फासले दस्तूर होते जा रहे ।।
एक वचन सुख से रहे बस इसलिए
बहुवचन सारे  डुबोते  जा रहे ।।
वाक्य मत कहिए निरर्थक हरध्वनि
पाठ्य पुस्तक में संजोते जा रहे ।।

कैसा रातों का मौसम है


कैसा रातों का मौसम है चर्चा नहीं सबेरों की।
नेकनीयत की बात न कोई सारी बात लुटेरों की ।।
कैक्टस, नागफनी का कुनवा फैल रहा है चारों ओर
भूल गए पनघट पर क्यारी तुलसी और कनेरों की ।।
धुँआ-धुंध के इस मौसम में कैसे उनको पहचानें
कहने को तो माली हैं पर सारी अदा सपेरों की ।।
नफ़रत से क्या हासिल साथी आओ अब तो बात करें
नरम कुन्तलों कमल नाल से कोमल-कोमल घेरों की ।।
इस निर्धन बस्ती की पीड़ा की बातें तो रहने दो
उनके यहाँ सुनी जाती है केवल बात कुबेरों की ।।
कामचोर धनिकों के सुख जैसे कोई भारी पत्थर
श्रमजीवी का सुख जैसे जाड़ों में धूप मुड़ेरों की ।।
लँगड़े हैं आदर्श नीतियाँ जैसे विधवा के आँसू
राजनीति है व्यथा-कथा अन्धों के हाथ बटेरों की ।।


पास अपने जो भी ग़म है


पास अपने जो भी ग़म है सेठ जी।
आपका रहमोकरम है सेठ जी ।।
डनलपों पर आप सो पाते नहीं
हमको पत्थर भी नरम है सेठ जी ।।
आपके  खाते  चढ़ा लौटा नहीं
आपका फ़रमान यम है सेठ जी ।।
सारे सुख तो आपके ही हो गए
दर्द अपना हमक़दम है सेठ जी ।।
लग रहा अब भोर का प्रारंभ है
क्योंकि अँधियारा चरम है सेठ जी ।।
इस अँधेरी रात की सुबह नहीं
ये उलूकों का भरम है सेठ जी ।।

आपकी कोठी कहे


आपकी कोठी कहे कुछ भी उसे अधिकार है।
सब सहेगी झोंपड़ी मज़बूर है लाचार है ।।
आदमी की आपको परवाह क्यों होगी भला
आपकी नज़रों में दुनिया इक बड़ा बाज़ार है ।।
धूल की मानिंद हमको पाँव से मत रौंदिए
मिट गए यदि हम तुम्हारी सभ्यता की हार है ।।
काम से छुट्टी हमें साहब कभी मिलती नहीं
मौज में हैं आप हर दिन आपका इतवार है ।।
लालबत्ती  सिर  चढ़ाए  चाटुकारों से घिरी
कार में जो घूमती है क्या यही सरकार है ।।
पेड़, नदियाँ, जानवर सबकुछ समाया पेट में
आदमी है या कदाचित दैत्य का अवतार है ।।


रोशनी है कै़द


रोशनी है कै़द तम आबाद हैं।
हैं कथन सच्चे न बेबुनियाद हैं ।।
चोट खाए एक पंछी ने कहा-
साधुओं के वेष में सैयाद हैं ।।
जल चुकेगा घर तभी आ पाएँगी
इस शहर में दमकलें आज़ाद हैं ।।
प्रेम की बारहखड़ी विस्मृत हुई
स्वार्थों के व्याकरण तो याद हैं ।।
कोयलें सद् आचरण की मौन हैं
छल-कपट के दादुरी संवाद हैं ।।

पग-पग चुभती कील


पग-पग चुभती कील ज़िंदगी मुश्किल है।
मंज़िल मीलों-मील ज़िंदगी मुश्किल है ।।
सेवा, त्याग, समर्पण जैसे शब्दों के
अर्थ हुए तब्दील ज़िंदगी मुश्किल है ।।
प्यार कै़द कर लिया किन्तु इस नफ़रत को
कितनी दे दी ढील ज़िंदगी मुश्किल है ।।
उन आँखों में अंगारे हैं जहाँ कभी
लहराती थी झील ज़िंदगी मुश्किल है ।।
स्वारथ की आँधी, तन-मन में चुभन-चुभन
रिश्ते हुए करील ज़िंदगी मुश्किल है ।।
संवेदन  की मीन  तड़पती  रेती पर-
ऊपर उड़ती चील ज़िंदगी मुश्किल है ।।


सागर का तट


सागर का तट नहीं दिखाई देता है।
मेरा स्वर असहाय सुनाई देता है ।।
रोकर-गाकर दुःख अपना बतलाता हूँ
लगता जैसे भाग्य जम्हाई लेता है ।।
सारा ग़म, सारा अपयश अपना साथी
वह तो अपने साथ भलाई लेता है ।।
सच बूढ़ा है और अपाहिज जैसा है-
झूठ युवा होकर अँगड़ाई लेता है ।।
दुःख आता है और पसर जाता मन में-
सुख तो बस अपनी परछाईं देता है ।।
एक अकेला मन बोझिल एकाकीपन
ओ समय बता तू क्यों तनहाई देता है ।।
जमी हुई है पीर पुरानी प्राणों में
क्रूर समय आकर पुरवाई देता है ।।

सीमेण्ट के जंगल मिले


इस क़दर से मानवी व्यवहार में भी छल मिले।
आज पहचाने नहीं जो दोस्त हमको कल मिले ।।
अपनी कुटिया में कभी उतरी किरन आकाश से-
देखकर अँधियार के माथे पै तीखे बल मिले ।।
जो तपन में थे मरुस्थल लीलता उनको रहा
थी नदी जिनकी उन्हीं के द्वार पर बादल मिले ।।
रीढ़ में जिनकी लचक है पा रहे समृद्धियाँ
फिर भी सीना तान कुछ चलते हुए पागल मिले ।।
चाचा, ताऊ, मामा, मौसा गुम हुए फूफा कहीं
मारकर तहज़ीब अपनी एक बस अंकल मिले ।।
आज का इंसान सच कितनी तरक्की कर गया
थे जहाँ पर वन वहाँ सीमेण्ट के जंगल मिले ।।


हर नयन


हर नयन चंद सपनों का शमशान है।
हर हृदय एक जलता हुआ यान है ।।
कोई हलचल नहीं कोई आहट नहीं-
ज़िन्दगी है कि जैसे बियाबान है ।।
आदमीयत यहाँ रोज घायल हुई-
इस क़दर स्वारथों का घमासान है ।।
सुख तो राजा का है या बज़ीरों का है-
बस उदासी लिए आम इंसान है ।।
फोन पर ही कहें काम हो जाएगा-
आपकी एक मंत्र से पहचान है ।।
आदमी बन के जीना बड़ी बात है
‘आदमी मैं भी हूँ’ कहना आसान है ।।
चाहता है अभी भी सभी का भला
मेरा दिल आज भी कितना नादान है ।।
दुश्मनी की जगह दोस्ती तो लिखो
हर समस्या का ये ही समाधान है ।।

चरण-चापन, दुष्टता


चरण-चापन दुष्टता, जिसका शगल है।
आजकल के दौर में बस तो सफल है ।।
चाटुकारों  ने  पिया  पीयूष सारा-
स्वाभिमानी को मिला केवल गरल है ।।
नाम कुछ लोगों के ऊपर तक गए हैं
शेष सूची में हुआ रद्दो बदल है ।।
दर्पणों के थोक इन व्यापारियों को
क्यूँ नज़र आती नहीं अपनी शकल है ।।
खास लोगों को मिली तक़दीर सारी-
आम जनता को मिला हर बार छल है ।।
मंच तो सादर समर्पित चारणों को
और सच नैपथ्य से भी बेदखल है ।।
पीर कम हो  इसलिए  ही गुनगुनाई-
शौकिया लिक्खी नहीं हमने ग़ज़ल है ।।


स्वाभिमानी को ठगा है


स्वाभिमानी को ठगा है अंधकारों ने।
धूप चोरी की हमेशा चाटुकारों ने ।।
झूठ जीता है सदा से सत्य के आगे
सत्य जीतेगा लिखा साहित्यकारों ने ।।
हिन्दुओ लड़ते रहो लड़ते रहो मुस्लिम
क्या ये कहा पैगम्बरों, परवरदिगारों ने ।।
पंथ तो सारे टिके हैं साधनाओं पर
पर वे भुनाए सर्वदा झण्डावरदारों ने ।।
मंच से बोला था कल बहुरूपिया देखो
उसकी भी जय बोल दी सारे अखबारों ने ।।
सिर झुकाओ तो दिखेगी झोंपड़ी अपनी-
अब तलक मीनार देखी है सरकारों ने ।।

सभ्यता का आजकल


सभ्यता का आजकल ऐसा वरण है।
वर्जना कल की हमारा आचरण है ।।
बढ़ गया है भोग की अंधी गली में-
ये अपाहिज सभ्यता का ही चरण है ।।
विश्व की नदियाँ, हवाएँ विषभरी हों
आदमी ने ले लिया जैसे कि प्रण है ।।
अब कुल्हाड़ी हो गई है क्रूर इतनी
वक्ष पर हर वृक्ष के गंभीर व्रण है ।।
सूर्य का सेवक दुखी बस वो सुखी है
जो अमावस के अंधेरे की शरण है ।।
सत्य कहना और रहना हाशिए पर
क्या करें फितरत हमारी आमरण है ।।


कब तक यही व्यथा सहनी है


कब तक यही व्यथा सहनी है।
बधिरों बीच कथा कहनी है ।।
तुम  उपहासों  से खेलोगे-
हमको मर्यादा सहनी है ।।
कब ये ग़ज़लों में पिघलेगी-
मन पर दुःख की बर्फ घनी है ।।
स्वारथ के हाथों में कैंची-
रिश्तों की नाजुक टहनी है ।।
कैसे मन को चुभन न होगी
अपनों का मन नागफनी है ।।
अय्याशी जनता के धन पर-
ये तो सचमुच राहजनी है ।।
सब के सिर की जो टोपी थी
चंद दलालों ने पहनी है ।।

कुछ तो कम हो


कुछ तो कम हो मन की पीर।
चलो चलें नदिया के तीर ।।
एक जगह कब रूकते हैं-
रमता जोगी बहता नीर ।।
कुछ सुविधाओं की खातिर
नीलामी पर लगा ज़मीर ।।
भूखी जनता दुःख ढोती-
खुश रहता है आलमगीर ।।
चैन  से सुनता  तकलीफें
राजा इतना  है गंभीर ।।
दम घुटता इस आलम में
ढूँढ़ो शीतल मंद समीर ।।
प्यार को जो नफ़रत समझे
किन लोगों में रहे सुधीर ।।


जैसे जल में रहे कमलिनी


जैसे जल में रहे कमलिनी वैसे दुनियादारी देख।
अपने आने के भीतर ही जाने की तैयारी देख ।।
दीपक हाथों में लेकर चलने में लोग झिझकते हैं-
अँधियारा दीए के ऊपर हो जाता है भारी देख ।।
मेरे मुँह पर मेरे जैसी, उसके मुँह पर उसकी-सी
कैसा तूने रचा चरित्तर तू अपनी अय्यारी देख ।।
मैं हिन्दू हूँ, वो मुसलिम है, वो सिख वो ईसाई है
मानवता के आँगन फैली नफ़रत की बीमारी देख ।।
हाय ग़रीबों की शोषण का ऊँचा महल जला देगी-
राख की इस ढेरी के भीतर दबी हुई चिंगारी देख ।।
दीमक चाट रही है घर के पुश्तैनी शहतीरों को
कल बनी थी आज ढह गई ये बिल्डिंग सरकारी देख ।।
संबंधों को लोग यहाँ कपड़ों की तरह बदलते हैं
लाभ-हानि के अंकगणित में उलझी रिश्तेदारी देख ।।
तू औरों के दोषों के कंकड़ क्यों चुनता फिरता है
सब के भीतर महक रही है तू तो वो फुलवारी देख ।।

मुक़द्दर से गिरकर


मुक़ददर से गिरकर के यूँ हो गया हूँ।
कभी ‘आप’ था आज ‘तू’ हो गया हूँ ।।
मेरे लिए जिसने तोरण धरे थे-
उसी द्वार पर फ़ालतू हो गया हूँ ।।
कभी मैं मुनादी सरीखा रहा हूँ-
मगर आजकल गुफ़्तगू हो गया हूँ ।।
मुझे मुश्किलें देने वालो जियो तुम
मैं कोमल हृदय जंगजू हो गया हूँ ।।
बताओ ज़रा पृष्ठ के चाटुकारो-
मैं हूँ हाशिया किंतु क्यूँ हो गया हूँ ।।
किसी देव का कोपभाजन बना हूँ
महाकाव्य था ‘हाइकू’ हो गया हूँ ।।


कहकहे, निश्च्छल हँसी


कहकहे, निश्च्छल हँसी अब तो पुरानी याद है।
मन तनावों से भरा है, हर तरफ अवसाद है ।।
लोग जे़हन में छिपाए ईर्ष्या, छल-छद्म को
आज भोलापन कहाँ, कलुषित कपट आबाद है ।।
रक्तचापी सभ्यता का दिल धड़कता बेलगाम
थरथराते मूल्य जीवन हो रहा बरबाद है ।।
एक पूरी नग्न पीढ़ी भोग के द्वारे खड़ी
हाँकता बाज़ार जिसको याकि अवसरवाद है ।।
आधुनिकता नाँचती है एक रस्सी पर तनी
भय, निराशा, त्रासदी का आदमी अनुवाद है ।।
धर्म-संस्कृति का करुण, क्रन्दन सुनेगा कौन जब
भीड़ में पाखण्ड के सिर पर चढ़ा उन्माद है ।।

सच्चाइयाँ हैरान हैं


पंख प्रतिभा के कटे कुंठित हुए विद्वान हैं।
आजकल के दौर में तो सूचनाएँ ज्ञान हैं ।।
ये सियासत की ज़मीं है या कि जादू की छड़ी
कल तलक जो थे अकिंचन आजकल धनवान हैं ।।
हर तरफ प्रतियोगिताएँ एक अँधी दौड़ है-
बेतहाशा दौड़ना इस दौर की पहचान है ।।
ईर्ष्या, निंदा, जलन, विद्वेष से लबरेज मन
बस्तियाँ इंसान की पर खो गए इंसान हैं ।।
आदमी के एक चेहरे पर मुखौटे नित नए
दो मुँहें व्यक्तित्व ज्यों पाखण्ड की सन्तान हैं ।।
ज़ख़्म सहलाने भी कोई द्वार तक आया नहीं-
झूठ से घायल हुईं सच्चाइयाँ हैरान हैं ।।

इस अभागी ज़िंदगी को


इस अभागी ज़िंदगी को दर-ब-दर करते हुए।
आ गए हम पेट को मद्दे नज़र करते हुए ।।
गाँव छोड़ा था कि सुख के चार पल मिले जाएँगे
जी रहे हैं ज़िंदगी को अब तलक मरते हुए ।।
एक अरसा हो गया है दूध के दर्शन किए
पल रहा बचपन भी चुस्की चाय की भरते हुए ।।
ये शहर है संगदिल इंसान का जंगल, यहाँ-
और हम मृग की तरह चरते हुए मरते हुए ।।
ये गगन चुम्बी महल, अस्पृश्य हम जिनके लिए
ये रचे हमने ही तन को तर-बतर करते हुए ।।
एक  गाली-सी  हमारी  हो  गई है ज़िंदगी
पंचवर्षी  योजना को  बेअसर  करते हुए ।।

दंगा-कर्फ्यू


दंगा-कर्फ्यू-गोली   सर।
आग जली ज्यों होली सर ।।
ढूँढ़ोगे   इन्सार   कहाँ-
हैवानों की टोली सर ।।
इज्ज़त  माता-बहनों  की
चाकुओं पर तोली सर ।।
जिसको जबरन अगवाया
वो बहना मुँहबोली सर ।।
जिसे  जलाया  गुंडों ने
रमजानी की खोली सर ।।
इंसानों  के  सीनों में
किसने वहशत घोली सर ।।
गुंडे  और  दरोगा  जी
जैसे दामन-चोली सर ।।
राजनीति के दल बोले
अपनी-अपनी बोली सर ।।
लाचारी के आलम में
हमने आँख भिगोली सर ।।
वादों से चुप हो जाती
जनता कितनी भोली सर ।।

मुक़द्दम


यूँ तो  सोने लगा  मुक़द्दम।
लहू बहा तब जगा मुक़द्दम ।।
सम्मेलनों-      समारोहों  में
करता है रतजगा मुक़द्दम ।।
इसको बस अपनी चिन्ता है
कब जनता का सगा मुक़द्दम ।।
जिस जनता के लिए बना है
करता  उससे दग़ा  मुक़द्दम ।।
खुशामदी,  लंपट,  लोलुप है
सुविधाओं में  पगा  मुक़द्दम ।।
जिस  दिन  जनता  हुंकारेगी
रह  जाएगा  ठगा  मुक़द्दम ।।


इतनी घायल परवाज़


इतनी घायल परवाज़ देख।
चिड़िया पर झपटा बाज देख ।।
झरते  अंगार  चिनारों से
ये मौसम के अंदाज़ देख ।।
ये खंजर  वाला  मंज़र है
जो कल देखा वो आज देख ।।
अज्ञातवास पर धर्मराज
दुर्योधन के सिर ताज देख ।।
आया धन पिछले द्वारे से
इस समृद्धि के राज़ देख ।।
सेठों  के  घर पर दीवाली
निर्धन पर गिरती गाज देख ।।
जन की आँखों में आँसू हैं
लुट रही तंत्र की लाज देख ।।
होगा  अँधियारा  लहू-लहू
अब सूरज का आगाज़ देख ।।


मन में कमल


उनके पास झूठ और छल है।
अपने पास सत्य का बल है ।।
मौन तिरस्कृत अपमानित है-
प्राण चीरता कोलाहल है ।।
खिलते फूलों की खुशबू को
बाँध सकी कोई साँकल है ।।
प्रेम और आँखों का पानी
सारी दुनिया का संबल है ।।
दर्दों  के  देवता  शुक्रिया
पत्थर-पत्थर वक्षस्थल है ।।
अगन जलाएगी क्या हमको
अपने अन्तस में बादल है ।।
मन में कमल खिलाते रहिए
चारों ओर भले मरुथल है ।।

बड़े विषैले तीर


बड़े विषैले तीर तुम्हारे तरकश में।
ये तरकश करना होगा अपने वश में ।।
कभी धर्म के टुकड़े आगे डाल दिए
कभी जाति के नाम लड़ाया आपस में ।।
तुमने तो दिन-रात उत्सवों में काटे
निर्धन की ज़िंदगी कट गई मावस में ।।
लाज, शरम, करुणा, क्रन्दन के व्यापारी
सिसक रही तहज़ीब घिनौनी साजिश में ।।
हमको उड़ना था स्वच्छन्द परिन्दों-सा
हम बनकर रह गए जमूरे सरकस में ।।
अब तो ये तस्वीर बदलनी है हमको
दौड़ रहा प्रतिकार हमारी नस-नस में ।।


पेड़ काटे हैं


पेड़ काटे हैं धरा की लाज लूटी है।
इसलिए क़िस्मत हमारी आज फूटी है ।।
केश लुंचित, मलिन वसना है फटी छाती
ये धरा है या कोई विधवा बहूटी है ।।
अब न आतीं द्वार पर ऋतुओं की सुंदरियाँ
आँख के जल में कलुष की गाँठ फूटी है ।।
तुम पुरातन को प्रयोजन हीन कहते हो
सभ्यता की दृष्टि से ये बात झूठी है ।।
मत गहो बढ़कर इसे ये भोग की बामा
तन से आकर्षक मगर मन से कलूटी है ।।
च़ाटते अय्याशियों की, भोग की पत्तल
जानते भी हो कि ये पश्चिम की जूठी है ।।
ये धरित्र अन्न-जल भरपूर देती थी
अब भला क्या दे कि जो लूटी-खसूटी है ।।

फिर वही बात


फिर वही बात सदियों पुरानी मिली।
प्रेम को पीर की राजधानी मिली ।।
झूठ सिंहासनों  पर  विराजित रहा
अंधी-गलियों में सच की कहानी मिली ।।
हैं महन्तों की बातें शिला पर लिखीं
पर भटकती कबीरा की बानी मिली ।।
जो मिला वो हठी मन को भाया नहीं
भा गई जो खुशी वो बिरानी मिली ।।
भोग के  बेशरम  आचरण  देखकर
सादगी शर्म से पानी-पानी मिली ।।


प्रान-खग पीर से


प्रान-खग पीर से कुलबुलाने लगे।
लोग समझे कि हम गुनगुनाने लगे ।।
दोस्तों की कलाकारियाँ देखकर
दुश्मनों के सबक याद आने लगे ।।
इस तरह वे प्रगति की चढ़े सीढ़ियाँ
टूटने प्यार  के  ताने-बाने लगे ।।
ज़िंदगी ने महावर भरा पाँव में
हादसे रोज उँगली उठाने लगे ।।
सिर झुकाते हुनरमंद जिनको यहाँ
दर असल गंदगी के मुहाने लगे ।।

यूँ उजाले ख़तम हो गए


हर तरफ तम ही तम हो गए।
यूँ उजाले खतम हो गए ।।
यूँ प्रगति की चढ़े सीढ़ियाँ
भ्रष्ट से भ्रष्टतम हो गए ।।
देखकर  रोशनी  की  दशा
नेत्र अपने भी नम हो गए ।।
वे तो केसर-से कोमल रहे
क्या हुआ जो वे बम हो गए ।।
हाथ जाते थे जिन तक स्वतः
वे चरन कितने कम हो गए ।।
मन की करुणा कुचलते रहे
बेरहम कितने हम हो गए ।।
वे तो खुशियाँ चुरा ले गए
अपने हिस्से में ग़म हो गए ।।
रिश्ते  नाजुक  बिखरते  रहे
स्वार्थ इतने अहम हो गए ।।


देश जिस रस्ते चला है


देश जिस रस्ते चला है।
मुक्त बाज़ारू बला है ।।
मर  रहा  है  अन्नदाता
साहबों का जलजला है ।।
आज भी उनका दुधारा
आज भी अपना गला है ।।
सेवकों की भीड़ है, या
लूटने की ये कला है ।।
साहबों  के  क्रूर  पंजों
में ग़रीबों का गला है ।।
खत्म हो अंधेर अब तो
वंचितों का होंसला है ।।

एक दिन किरन तो आएगी


एक दिन किरन तो आएगी आँगन बुहारिए।
लेकिन तमस के सामने हिम्मत न हारिए ।।
यदि कंटकों में वास हो तो हो गुलाब-सा
काँटों के अंतरंग में खुशबू उतारिए ।।
हर पाँखुरी पै बूँद भी तो मोती सरीखी हो
जल में कमल-सा दोस्तों जीवन गुज़ारिए ।।
मिलता रहे जो दर्द भी नेकी की राह में
उस एक दुःख पै सैकड़ों सुख-सार वारिए ।।
संघर्ष उजाले का सदा तम से रहा है
सूरज पै छा रहे जो सघन घन विदारिए ।।
कोई नहीं है साथ में फिर भी फ़िकर नहीं
अपने क़रीब बैठ के खुद को पुकारिए ।।


कभी जीत हुई


कभी जीत हुई कभी हार हुई।
जीवन की नैया पार हुई ।।
कभी पाँव चला सुख का सपना
कभी दुःख की खड़ी दीवार हुई ।।
स्वर्णिम  शिखरों  से दूर रहे
छोटी-सी खुशी संसार हुई ।।
हर बार भरोसा दिल पै किया
ये ग़लती सौ-सौ बार हुई ।।
जिनके तम से समझौते हैं
उनकी भी जय जयकार हुई ।।
स्वारथ की तपिश ये कैसी है
आदमियत जलकर क्षार हुई ।।
जिसे अहले सियासत कहते हो
इस दौर में तो व्यापार हुई ।।

पेड़ कटे या डाल है


पेड़ कटे या डाल है।
मुश्किल तो हर हाल है ।।
क्रूर  कुल्हाड़ी के आगे
जंगल तो बेहाल है ।।
मुर्दाघर-सी  लगती  है
जो लकड़ी की टाल है ।।
सहज सुलभ हो जाती थी
मुश्किल  रोटी-दाल  है ।।
निर्धन  दाने  को तरसे
धनिकों की टकसाल है ।।
जिसे व्यवस्था कहते हो
वो मछली का जाल है ।।


गाँव जब से


गाँव जबसे शहर हो गया।
गंगाजल से ज़हर हो गया ।।
लोग  घर में  अजनबी हुए
सभ्यता का असर हो गया ।।
सत्य  से  बदजुबानी  करे
झूठ कितना निडर हो गया ।।
वस्तुएँ  हैसियत  बन  गईं
आदमी तो सिफ़र हो गया ।।
मछलियाँ अब करें भी तो क्या
जल का राजा मगर हो गया ।।
सारे  फनकार  ग़ुम  हो  गए
एक मदारी ख़बर हो गया ।।
बस गया जब से बेटे का घर
बाप दर से बदर हो गया ।।

कैसा परिवर्तन भाई


कैसा  परिवर्तन  भाई।
सूखा है सावन भाई ।।
क्रूर कुल्हाड़ी सुने नहीं
जंगल का क्रंदन भाई ।।
चीर प्रकृति का खींच रहा
मानव-दुश्शासन भाई ।।
भोग के पीछे आदम का
कैसा पागलपन भाई ।।
ज्वर से तप्त हुई धरती
दुनिया कुंभकरन भाई ।।
भारत में षड्ऋतुएँ थी
ये है संस्मरण भाई ।।


कल का उजला दिवस


कल का उजला दिवस आज काला हुआ।
थी नदी जिस जगह आज नाला हुआ ।।
धन कमाना यही एक मक़सद रहा
ये जगत भोग की पाठशाला हुआ ।।
आज मुश्किल हुआ है मिटाना इसे
झूठ है सच के घर में ही पाला हुआ ।।
गाँव की ज़िंदगी है अँधेरी अभी
क्या हुआ जो शहर में उजाला हुआ ।।
पीर मन की किसी को बताएँ भी क्यों
ये रतन है जतन से सम्हाला हुआ ।।
क्यों तिमिर के समर्थन में जय घोष हैं
सूर्य का आजकल घर-निकाला हुआ ।।

थक गए आज


थक गए आज, कल काम होगा।
काम होगा तभी दाम होगा ।।
पेट को  चाहिए  चार  दाने
भाषणों से भला काम होगा ।।
आँकड़ों में तरक्की रखी है
बुद्धि का ही ये व्यायाम होगा ।।
लाइनों में लगे आमजन हैं
खास लोगों का ही काम होगा ।।
रोशनी  आपने  बेच  डाली
किन्तु हम पै ही इल्ज़ाम होगा ।।
हो  गए  हौंसले  इंकलाबी
जो भी होगा सरंजाम होगा ।।


चल रही है लोकशाही


चल रही है लोकशाही देखना।
हो रही फिर भी तबाही देखना ।।
रो नहीं सकता है बंदा चीखकर
मुस्कराने की मनाही देखना ।।
गाँव में छाई  हुई  है  मुर्दनी
राजपथ पर आवाजाही देखना ।।
धन के दम पर ही सरकती फाइलें
दफ़्तरों में ये उगाही देखना ।।
क़ातिलों की देहरी पर किस तरह
खौफ़ खाता है सिपाही देखना ।।
वक़्त का मुंसिफ करेगा फैसला
ये ग़ज़ल देगी गवाही देखना ।।

आओ सोचें


आओ सोचें क्या पाया है आज़ादी के सालों में ।
रामराज्य की रही कल्पना ख्वाबों और ख़यालों में ।।
रूखे-सूखे टुकड़े ही जनता के पास पहुँचते हैं
चुपड़ी रोटी बँट जाती सत्ता के चंद दलालों में ।।
पाँसे लिए हुए बैठे हैं, इनके अपने स्वारथ हैं
सेवा-देशप्रेम क्या होंगे इन शकुनि वाचालों में ।।
कुछ नेता हैं, कुछ अफसर हैं, कुछ दलाल, व्यापारी हैं
इनके चक्रव्यूह में जनता बदल गई कंकालों में ।।
ये छल है, धोखा है, चर्चा आज नहीं तो कल होगी
निर्धन का धन बंद पड़ा है धनिकों की टकसालों में ।।
जिनके हाथों सौंप दिया है हमने अपना मुस्तकबिल
डाल रहे हैं नाव देश की वही भँवर-जंजालों में ।।


तन के कपड़े


तन के कपड़े पारदर्शी जालियों तक आ गए।
इस तरह हम इन दिनों खुशहालियों तक आ गए ।।
परदेदारी   छोड़कर   तहज़ीब   बेपरदा  हुई
छोड़कर अफसोस हम भी तालियों तक आ गए ।।
पेड़ से गिरने का डर भी अपने मन से यूँ गया
फल के लालच में उछलकर डालियों तक आ गए ।।
इस तरह से पैरहन भाषा ने अपने कम किए
बुद्धिजीवी बात करते गालियों तक आ गए ।।
फूल, कलियों, कोंपलों का क्रूर क़ातिल कौन है
शक के छींटे बागवाँ के मालियों तक आ गए ।।
आदमी  सोता  रहा  वातानुकूलित  कक्ष  में
पाँव रेगिस्तान के हरियालियों तक आ गए ।।
जो रखे  थे  वंचितों  का पेट  भरने के लिए
वे निवाले साहबों की थालियों तक आ गए ।।

बेटियाँ


फूल-खुशबू-रंग का अवदान हैं।
बेटियाँ तहज़ीब की पहचान हैं ।।
इनके दम से ज़िंदगी धरती पै है
ये विधाता का अमर वरदान हैं ।।
ज़िंदगी के जो जटिलतम प्रश्न हैं
इनके आते ही सभी आसान हैं ।।
दो कुलों के बीच की सुरभित पवन
ये सुगन्धों से भरा उद्यान हैं ।।
सामने बाधा, अभावों का न डर
लक्ष्य के प्रति तीर का संधान हैं ।।
जिनके आँगन में नहीं इनकी हँसी
वे अजिर हैं ही नहीं श्मशान हैं ।।


मॉल के सामने


मॉल  के  सामने झोंपड़ी।
आँख में कंकड़ी गिरपड़ी ।।
योजनाओं को हम क्या कहें-
शेख चिल्ली की है घुड़चढ़ी ।।
पाँचतारा   हुई   नीतियाँ
उनकी नीयत में है गड़बड़ी ।।
भूख  मजलूम  के पेट की
उनके हाथों की है फुलझड़ी ।।
इसको छूकर वे स्वर्णिम हुए
ये सियासत है जादू-छड़ी ।।
तंत्र के  क़ातिलों  से कहो
पाप की  भरगई बावड़ी ।।
तख्त पर शेखचिल्ली न हो
उसके हाथों में हो हथकड़ी ।।


राजा सुखी है


राजा सुखी है दुखी आमजन है।
ये लोकशाही का कैसा चलन है ।।
सब ओर है झूठ  का  बोलबाला
जो साँच बोलेगा उसका मरन है ।।
ज़मीं पै यहाँ फूल खिलते नहीं हैं
व्यवस्था का कितना बड़ा बांझपन है ।।
जो दाम देगा समर्पित उसी को
सियासत यहाँ की बड़ी बदचलन है ।।
दफ्तर में फ़ाइल सरकती नहीं है
सरकती है वो जिसपै रखा वज़न है ।।
सब सुख यहाँ तंत्र ने ले लिए हैं
जन के लिये सिर्फ चिन्तन-मनन है ।।


ज़िंदा हो तुम


जिंदा  हो तुम  ज़िंदगानी लिखोगे।
ठहराव पर तुम रवानी लिखोगे ।।
असंभव यहाँ कुछ नहीं दोस्तो, तुम
मरुस्थल की छाती पै पानी लिखोगे ।।
घिरे कंटकों से मगर फूल हो तुम
महकती हुई रातरानी लिखोगे ।।
जहाँ पाँव रख दो तुम्हारी ज़मीं है
इरादे मगर आसमानी लिखोगे ।।
जहाँ नासमझ दुश्मनी लिख गए थे
वहीं दोस्ती तुम पुरानी लिखोगे ।।

बढ़ती रही विकास दर


बढ़ती रही विकास दर उनका ख्याल है।
लेकिन यहाँ ग़़रीब का जीना मुहाल है ।।
करते हैं कत्ल कलम से क़ातिल ये कसाई
गाँधी के प्यारे देश में आदम हलाल है ।।
मेहनत-मजूरी लिख गई जिनके नसीब में
वे क्या बताएँ किस तरह गुज़रा ये साल है ।।
हमने बचाया मुल्क ये ग़ैरों के हाथ से
अपनों ने क़त्ल कर दिया इसका मलाल है ।।
इन वंचितों की भूख से साहब ने खेलिये
इक दिन लहू ग़रीब का लेता उबाल है ।।
काजल की एक कोठरी सूरज निगल गई
भारत की राजनीति का कैसा कमाल है!!


दीप ने सारे जग का


दीप ने सारे जग का भला कर दिया।
ये उजाला स्वयं को जला कर दिया ।।
मेरी चाहत में शामिल थी उजली किरन
धूप ने मेरा तन साँवला कर दिया ।।
राह की मुश्किलों शुक्रिया-शुक्रिया
हारे मन में मेरे हौंसला भर दिया ।।
एक छोटी-सी घटना घटी थी यहाँ
मीडिया ने बड़ा मामला कर दिया ।।
आपसी रिश्ते-नातों की गर्मी गई
किसने इंसान को बावला कर दिया ।।
हर तरफ  एक बाज़ार  फैला हुआ
इसने तहज़ीब को खोखला कर दिया ।।

ये मेरा शहर है


ये  मेरा  शहर है  पुराना-पुराना।
बड़ा ही कठिन है इसे भूल पाना ।।
यहाँ साथ मेरे मेरी मुफ़लिसी थी
मगर साथ चलता था सपना सुहाना ।।
जब-जब में गुज़रा हूँ इसकी डगर से
तब-तब मेरा दिल हुआ शायराना ।।
यही सोचकर पीर मन में रखी है
सुनेगा न कोई हँसेगा ज़माना ।।
जो कहते थे तुम तो मेरी ज़िंदगी हो
बुरे दौर में उनको भी आजमाना ।।
जिसे आ गया अपने भीतर उतरना
वही पा गया है खुशी का ख़ज़ाना ।।
वहीं उड़के इसको तो जाना पड़ेगा
जहाँ पर दिखेगा परिंदे को दाना ।।


आतंक की ज़द में


आतंक की ज़द में संसद है।
फिर कौन-सी जगह निरापद है ।।
ये आग है माँ के सीने में
दुश्मन का दिल तो गद्गद है ।।
राष्ट्रीय हितों पर असहमति
ये मक्कारों की परिषद है ।।
तन की सीमा तो होती है
मन की भी कोई सरहद है ।।
एक ही  सत्य  की झंकारें
चाहे अज़ान या अनहद है ।।
तहज़ीब  हमारी  ताकत है
जे   धर्मंचर-सत्यंवद  है ।।
खुशहाल और महफूज़ हो माँ
ये नियम सभी पर आयद है ।।

ख़ुशबू-से बिखरते हैं


तम से नहीं डरते हैं।
उस पार उतरते हैं ।।
मरते हैं सभी एक दिन
सौ बार न मरते हैं ।।
ग़म के पर्वत पर भी
तो झरने झरते हैं ।।
बस एक कल्पना में
सौ चित्र उभरते हैं ।।
दिन-रात के दो चूहे
जीवन को कुतरते हैं ।।
फूलों के सहचर तो
खुशबू-से बिखरते हैं ।।


हर हाथ में पत्थर है


हर हाथ में पत्थर है।
ये  कैसा  मंजर है।
कलियाँ सहमी-सी हैं
ये कौन सितमगर है।
पत्थर  का  व्यापारी
कितना ताक़तवर है।
सुख का पीछा छोड़ो
सुख तो यायावर है।
कितने ग़म डूब गए
मेरा मन सागर है।
उम्मीदें    छलकाती
जीवन की गागर है।

सार्थक मधुभास होता है


तंत्र जिनके पास होता है।
जन तो उनका दास होता है ।।
आम जन की बात करने में
उनका मतलब ख़ास होता है ।।
ये  अमीरों  की  अमीरी है
निर्धन को आभास होता है ।।
क्या पता उनको कि जीने में
हमको कितना त्रास होता है ।।
पादुकाएँ   पूजते   जिनकी
उनको ही वनवास होता है ।।
सबको खुशबू बाँटने से ही
सार्थक मधुभास होता है ।।


ऊपर से मुस्कराए


ऊपर  से  मुस्कराए।
भीतर से बौखलाए ।।
हर शख्स इस शहर का
बाजीगरी दिखाए ।।
स्वारथ का साँप सबकी
सीरत  में सरसराए ।।
संदेह  पुर  असर है
विश्वास डगमगाए ।।
ये  दोस्त  है पुराना
चेहरा नया लगाए ।।
इंसानियत से फिसले
शोहरत पै चढ़ के आए ।।
रिश्तों की भीड़ ऐसी
रिश्ते नज़र न आए ।।
ये  रोशनी  है कैसी
कितने बड़े हैं साये ।।

पंखों में भी हौसला


दाना-पानी भी पहुँच से दूर है।
चिड़िया कितनी पिंजरे में मज़बूर है ।।
दर्द चिड़िया का इसे दिखता नहीं
दरअसल सैयाद तो मगरूर है ।।
मौज में अपनी शिकारी सो रहा
नींद चिड़िया की हुई काफूर है ।।
तोड़ना पिंजरा पड़ेगा चोंच से
क़ैद पलभर की नहीं मंज़ूर है ।।
रोशनी जिसने भी दी जलना पड़ा
ये ज़माने का बड़ा दस्तूर है ।।
तोड़ पिंजरा एक दिन उड़ जाएगी
पंखों में भी हौसला भरपूर है ।।


पेड़ हमें उपवन देते हैं


पेड़ हमें उपवन देते हैं।
सुरभित-सा सावन देते हैं ।।
इनसे सांसों का स्पन्दन।
पुलकित अन्तर्मन देते हैं ।।
जगती का सौभाग्य इन्हीं से।
धरती को यौवन देते हैं ।।
इनके बिना असंभव जीना।
सीने को धड़कन देते हैं ।।
पलना-पलंग-लकुटिया संबल।
अन्तसमय ईंधन देते हैं ।।
ये सचमुच शिवशंकर-से हैं।
विष पीकर जीवन देते हैं ।।

स्वयं दीप बन जाएँ


आओ दिये जलाएँ हम।
उजियारा  फैलाएँ हम ।।
प्रेम  के  सुंदर  फूलों से
जीवन को महकाएँ हम ।।
रेतीले   संबंधों    पर
फिर से प्यार उगाएँ हम ।।
याद की धूसर गलियों में
चुपके आएँ-जाएँ हम ।।
बूढ़े  बरगद  के  नीचे
फिर चौपाल सजाएँ हम ।।
मन का कलुष मिटाने को
स्वयं दीप बन जाएँ हम ।।


ये किसकी बंदूक


ये किसकी बंदूक खड़ी है।
लोकतंत्र की लाश पड़ी है ।।
भूखी जनता के अनशन पर
क्रूर सियासत टूट पड़ी है ।।
गांधी  और  विनोबा रोए
हिंसा सीना तान खड़ी है ।।
लोकतंत्र में लूट मची है
घोटालों की लगी झड़ी है ।।
कल्मष अपने पैर पसारे
सदाचार की खाट खड़ी है ।।
आज़ादी  के  संघर्षों  से
आज परीक्षा बहुत बड़ी है ।।
ये आज़ादी तो है लेकिन
ये तो लूली है, लँगड़ी है ।।

भीतर का दर्द


भीतर का दर्द छुपाना है।
ऊपर-ऊपर मुस्काना है ।।
सु-दुःख पैरों के नीचे है-
इनके ऊपर से जाना है ।।
काँटों को भी खुशबू देकर-
फूलों को फर्ज निभाना है ।।
जीवन की तकली ने काता
रिश्तों का ताना-बाना है ।।
आँगन से मरघट तक जाता
ये रस्ता बहुत पुराना है ।।
जो सबके भीतर रहता है-
अपना उससे याराना है ।।


--

प्रकाशक

ग्रंथ भारती
5/288, गली नं. 5,
वैस्ट कांति नगर दिल्ली-110051


मल्य : 150.00 रुपये
प्रथम संस्करण : 2017
शब्द संयोजन : प्रिंस कंप्यूटर्स, दिल्ली,
मुद्रक : तरुण ऑफसेट
दिल्ली-110053

---

परिचय :

डॉ. सुधीर कुमार शर्मा


जन्म तिथि : 04-05-1963
जन्म स्थान : गाँव-छछैना, जिला-एटा (उ.प्र.)
शिक्षा : स्नातक एवं स्नातकोत्तर (हिन्दी) एटा (उ.प्र.), परा स्नातकोत्तर डिप्लोमा अनुवाद, परा स्नातकोत्तर डिप्लोमा भाषा विज्ञान, एम.फिल, एवं पी-एच.डी. आगरा विश्वविद्यालय आगरा, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ‘नेट’ परीक्षा (1986) उत्तीर्ण।
रचनाएँ : स्वप्नपथ (काव्य संग्रह), संपादन-शोध-निकष-1, शोध-निकष-2, शोध-निकष-3, चेतना अभियान पत्रिका (त्रैमासिक)। रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित तथा आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से प्रसारित।
सेवाएँ : केन्द्रीय रेशम बोर्ड, वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार, केन्द्र पाम्पोर (कश्मीर) में अनुवादक। हिन्दी शिक्षण योजना, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय भारत सरकार, केन्द्र-इरोड (तमिलनाडु) में प्राध्यापक। 1994 से उच्च शिक्षा विभाग म.प्र. शासन की महाविद्यालयीन शाखा के अंतर्गत शासकीय रा.वि. महाविद्यालय मनासा (नीमच) तथा शासकीय महाविद्यालय आरोन (गुना) शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय गुना (म.प्र.) एवं शासकीय हमीदिया कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र.) में पदस्थ रहे।
संप्रति : हिन्दी विभाग, महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय, भोपाल म.प्र. में अध्यापनरत।
सम्पर्क :
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भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,676,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,52,साहित्यिक गतिविधियाँ,181,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,52,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: काव्य (गीतिका) संग्रह // एक दिन किरन तो आएगी // डॉ. सुधीर कुमार शर्मा
काव्य (गीतिका) संग्रह // एक दिन किरन तो आएगी // डॉ. सुधीर कुमार शर्मा
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