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व्यंग्य // सुबह का उठना // हरीश कुमार ‘अमित’

सुबह का उठना

सुबह-सुबह बिस्तर छोड़कर उठना हमारे लिए हर रोज़ एक विशिष्ट अनुभव से कम नहीं होता. यूं कायदे से हमें हर रोज़ साढ़े पाँच बजे उठ जाना चाहिए ताकि हम आठ बजे घर से निकलकर नौ बजे अपने दफ़्तर की कुर्सी तोड़ते नज़र आएं, पर असल में ऐसा होता नहीं. दफ़्तर के लिए निकलने से पहले की अफरातफरी से गुजरते हुए हर रोज़ हम यही प्रण करते हैं कि अगले दिन वक़्त से उठेंगे और सभी काम वक़्त के हिसाब से निपटाएंगे, ताकि दफ़्तर के लिए हम उसी तरह पत्नी को अलविदा कहते हुए निकल पाए, जैसा कि फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता है. मगर हमारा यह सपना सपना ही रह जाता है, हकीकत नहीं बन पाता.

हाँ तो बात बिस्तर छोड़ने की हो रही थी. हम भी आपको न जाने कहाँ की सैर कराने निकल पड़े (बिस्तर छोड़े बिना ही!). ऐसा बहुत कम होता है कि हम श्रीमती जी के सुबह उठने से पहले ही उठ जाएं. आमतौर पर हमारी नींद श्रीमती की आवाज़ से ही खुलती है. जिस दिन उनका मूड अच्छा हो, उस दिन तो वे हमें मीठी आवाज़ में जगाती हैं, लेकिन जिस दिन उनका मूड अच्छा न हो, उस दिन ऐसे कटु वचन हमें सुबह-सुबह सुनने को मिल जाते हैं कि दफ़्तर में साहब की झिड़कियाँ भी मीठी लगने लगती हैं.

ऐसा भी नहीं कि हम श्रीमती जी के उठाने तक घोड़े बेचकर सोते रहते हों. दरअसल बचपन से ही हमारी आदत है कि नींद खुलने के बाद दस-पन्द्रह मिनट तक बिस्तर में लेटे-लेटे हम दिवास्वप्न देखा करते हैं. इन दिवास्वप्नों के सहारे हम वह सब पा जाते हैं जो असल जीवन में हमें अब तक नसीब नहीं हुआ (और शायद होगा भी नहीं!). अब श्रीमती जी का इन दिवास्वप्नों में टाँग अड़ाना हमें कितना अच्छा लगता होगा, यह आप अच्छी तरह महसूस कर सकते हैं.

कई बार तो यूँ भी होता है कि किसी ज़रूरी काम से हमें सुबह काफी जल्दी उठने की ज़रूरत होती है. सही समय पर मोबाइल फोन में लगाया अलार्म भी बज जाता है. हम अलार्म बन्द करके यह सोचते हुए आँखें बन्द करके बिस्तर में पड़े रहते हैं कि बस पाँच मिनट बाद उठ जाएंगे. कुछ मिनटों बाद जब हमें लगता है कि अब उठ जाना चाहिए, तभी हमारा दिल हमें बस दो मिनट और लेटे रहने की प्रार्थना करता है. इसी तरह ‘बस दो मिनट’, ‘बस एक मिनट’ करते-करते काफी समय निकल जाता है. आखि़र जब तक हम उठते हैं तब तक अक्सर वह वक़्त भी निकल चुका होता है जब हम आमतौर पर उठते हैं.

अब देखिये न, यह लेख पूरा करने की जुगाड़ में हम काफी समय से थे. दिन में तो समय मिलता नहीं, इसलिए सुबह जल्दी उठकर ही इसे पूरा करने की सोची थी. मगर हर रोज़ सुबह उठने में हमें देर हो जाती और यह लेख अधूरा ही रहता. आखि़र किसी तरह हमने वक़्त निकालकर इसे पूरा कर तो लिया है लेकिन अगर आपको यह लेख बासी-बासी-सा लगे तो शिकायत मत कीजिएगा. इसे पूरा करने में हमें पूरे चार साल जो लग गए हैं. वजह वही है, सुबह का उठना!

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नाम हरीश कुमार ‘अमित’

जन्म 1 मार्च, 1958 को दिल्ली में

शिक्षा बी.कॉम.; एम.ए.(हिन्दी);

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

प्रकाशन 700 से अधिक रचनाएँ (कहानियाँ, कविताएँ/ग़ज़लें, व्यंग्य, लघुकथाएँ, बाल कहानियाँ/कविताएँ आदि) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. एक कविता संग्रह 'अहसासों की परछाइयाँ', एक कहानी संग्रह 'खौलते पानी का भंवर', एक ग़ज़ल संग्रह 'ज़ख़्म दिल के', एक बाल कथा संग्रह 'ईमानदारी का स्वाद', एक विज्ञान उपन्यास 'दिल्ली से प्लूटो' तथा तीन बाल कविता संग्रह 'गुब्बारे जी', 'चाबी वाला बन्दर' व 'मम्मी-पापा की लड़ाई' प्रकाशित. एक कहानी संकलन, चार बाल कथा व दस बाल कविता संकलनों में रचनाएँ संकलित.

प्रसारण - लगभग 200 रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण. इनमें स्वयं के लिखे दो नाटक तथा विभिन्न उपन्यासों से रुपान्तरित पाँच नाटक भी शामिल.

पुरस्कार-

(क) चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट की बाल-साहित्य लेखक प्रतियोगिता 1994ए 2001ए 2009 व 2016 में कहानियाँ पुरस्कृत

(ख) 'जाह्नवी-टी.टी.' कहानी प्रतियोगिता, 1996 में कहानी पुरस्कृत

(ग) 'किरचें' नाटक पर साहित्य कला परिाद् (दिल्ली) का मोहन राकेश सम्मान 1997 में प्राप्त

(घ) 'केक' कहानी पर किताबघर प्रकाशन का आर्य स्मृति साहित्य सम्मान दिसम्बर 2002 में प्राप्त

(ड.) दिल्ली प्रेस की कहानी प्रतियोगिता 2002 में कहानी पुरस्कृत

(च) 'गुब्बारे जी' बाल कविता संग्रह भारतीय बाल व युवा कल्याण संस्थान, खण्डवा (म.प्र.) द्वारा पुरस्कृत

(छ) 'ईमानदारी का स्वाद' बाल कथा संग्रह की पांडुलिपि पर भारत सरकार का भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, 2006 प्राप्त

(ज) 'कथादेश' लघुकथा प्रतियोगिता, 2015 में लघुकथा पुरस्कृत

(झ) 'राट्रधर्म' की कहानी-व्यंग्य प्रतियोगिता, 2016 में व्यंग्य पुरस्कृत

सम्प्रति भारत सरकार में निदेशक के पद से सेवानिवृत्त


पता  - 304ए एम.एस.4ए केन्द्रीय विहार, सेक्टर 56ए गुरूग्राम-122011 (हरियाणा)

ई-मेल harishkumaramit@yahoo.co.in

व्यंग्य 8144255723298051432

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