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व्यंग्य // त्यौहार और उपहार // हरीश कुमार ‘अमित’

त्यौहार और उपहार

त्यौहारों के मौसम पर शबाब आ रहा है. इस मौसम का उपहार-संस्कृति से चोली-दामन का-सा साथ है. यही वह मौसम है जब अपने काम बनवा सकनेवालों को खुश करने के लिए उपहार देने का काम बेधड़क और खुलेआम किया जा सकता है. जो चीज़ें साल के बाकी समय में ‘रिश्वत’ की परिभाषा में आती हैं, वही त्यौहारों के इस मौसम में उपहार की नकाब में छुपकर सिर उठाकर स्वीकार किए जाने लायक बन जाती हैं.

उपहार लेनेवाले को उपहार की कीमत भले ही कभी-कभी कुछ ज़्यादा लगे, पर सच तो यह है कि उपहार देनेवाला कभी घाटे में नहीं रहता. उसके शातिर दिमाग ने उपहार देने के लिए व्यक्तियों के नामों की सूची को अंतिम रूप देने से पहले ही अच्छी तरह यह हिसाब-किताब लगा लिया होता है कि कितनी राशि का उपहार देने के बदले कौन-सा व्यक्ति कितना लाभ दिला पाएगा.

उपहार लेनेवाले लोग शायद यह सोचते हैं कि उनकी योग्यता और बुद्धिमत्ता के कारण और उनसे अपनेपन और प्यार की भावना के वशीभूत होकर उन्हें उपहार दिया जा रहा है. पर यह सच नहीं होता. उपहार आमतौर पर दफ़्तर की उन कुर्सियों पर बैठनेवालों को दिया जाता है, जहाँ से किसी के काम निकल सकते हों. आज जिस व्यक्ति को उपहारों से लादा जा रहा है, हो सकता है कल को उसका किसी बेकार-सी सीट पर तबादला हो जाने पर उपहार देना तो दूर, उसे पहचाना भी न जाए.

किसी ज़माने में त्यौहारों पर मिठाई का एक अदद डिब्बा देकर ही काम चल जाया करता था. गली-मोहल्ले में तो लोग अपने अड़ोसियों-पड़ोसियों से प्लेट में डाले मिठाई के चन्द टुकड़ों का आदान-प्रदान करके ही इतिश्री मान लेते थे. मगर ये सब अब गुज़रे ज़माने की बातें हो गई हैं. अब तो त्यौहारों के मौसम की उपहार-संस्कृति ऐसी मँहगी हो गई है कि इस दौरान दिए जानेवाले उपहारों को उपहार कहने से पहले कई बार सोचना पड़ता है. उपहार की कीमत कुछ भी हो सकती है. यह लाखों तक का हो सकता है. उपहार में सोने-चाँदी के आभूषणों से लेकर विदेश यात्रा के टिकट तक दिए जाते हैं. अरे...रे...रे... यह सब पढ़ते हुए आप क्यों हसीन ख़्वाबों की वादियों में खोने लगे. ऐसे मँहगे उपहार हर किसी को नहीं, बल्कि कुछ ख़ास-ख़ास लोगों को ही बख्शे जाते हैं जनाब!

कीमत के अलावा उपहार में दी जानेवाली वस्तुओं की प्रकृति में भी बदलाव आया है. अब सिर्फ़ फल-मेवे-मिठाइयाँ और खाने-पीने की वस्तुएँ ही उपहार में नहीं दी जातीं. उपहारों में नवीनता लाने के लिए बर्तन, कपड़े, घड़ियाँ आदि भी दिए जाने लगे हैं. हमें तो लगता है कि कुछ नया करने की होड़ में आने वाले समय में त्यौहारों पर साबुन, जूते, झाड़ू, दवाइयाँ आदि भी उपहार स्वरूप बेधड़क दिए जाने लगेंगे.

त्यौहारों का मौसम आने से एक-दो महीने पहले ही ऐसी सूचियाँ बनने लगती हैं, जिनमें उन लोगों के नाम-पते होते हैं जिन्हें उपहार दिया जाना है. कुछ लोग इन दिनों विशेष सजग और उत्सुक रहते हैं कि उनका नाम ऐसी सूचियों में है या नहीं. जिन लोगों का घर का पता बदल गया हो, वे किसी-न-किसी बहाने से अपना पता बदलने की सूचना उपहार देनेवाली सब पार्टियों तक पहुँचाने की कोशिश करते दिखाई पड़ते हैं, ताकि उपहार उनके घर तक बग़ैर किसी झंझट के पहुँच सकें.

कुछ लोग ऐसे बेशरम होते हैं कि त्यौहारों का मौसम आते ही उपहार देनेवाली पार्टियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से यह जानने की कोशिश करने लगते हैं कि उन्हें उपहार में क्या मिलने वाला है. कई बार तो वे यह सलाह भी देने लगते हैं कि इस बार फलाँ चीज़ दी जाए या फलाँ चीज़ के बदले फलाँ चीज़ देना ज़्यादा ठीक रहेगा.

कुछ ऐसे तिकड़मबाज़ भी होते हैं जो ज़बरदस्ती उपहार वसूल कर लिया करते हैं. यह इस तरह कि उपहार मिलनेवाले व्यक्तियों की सूची में अगर उनका नाम नहीं होता, तो भी किसी-न-किसी तरह जुगाड़ करके वे अपना नाम उस सूची में शामिल करवा लिया करते हैं. कुछ लोग तो इससे भी ज़्यादा चतुर होते हैं और कोई तिकड़म भिड़ाकर अपने कुछ दोस्तों और रिश्तेदारों के नाम भी ऐसी सूचियों में शामिल करवा लेते हैं. ऐसे लोगों का न हींग लगता है, न फिटकरी और जहाँ तक रंग की बात है, वह तो चोखा हो ही जाता है.

उपहार देनेवालों के कुछ मातहत कर्मचारी भी ऐसे होशियार होते हैं कि त्यौहारों के मौसम में उपहारों की खरीदारी करते समय दुकानदारों से कमीशन वगै़रह लेकर या उपहारों की कीमत अधिक दिखाकर अपनी जेबें भारी कर लिया करते हैं. ‘बहती गंगा में हाथ धोना’ मुहावरे का इससे सटीक उदाहरण और क्या मिल सकता है.

उपहार एक ऐसा जादू है जिसका नशा पूरे साल छाया रहता है. त्यौहारों के मौसम में एक-दो बार उपहार देकर किसी कर्मचारी को पूरे साल के लिए गुलाम बनाया जा सकता है. यही नहीं, अगले वर्ष उपहार मिलने के लालच में ऐसे कर्मचारी ख़ुद ही आगे बढ़-बढ़कर ऐसी पार्टियों के काम निबटाते रहते हैं, जिनसे उपहार मिलने की आशा हो. इस तरह जनसेवकों का सेवाभाव जागृत करने में उपहारों का बड़ा महत्त्व है.

अच्छा, अब हम यह लेख यहीं समाप्त करते हैं. दरअसल हम ज़रा जल्दी में हैं. कारण यह है कि त्यौहारों के इस मौसम में, जितना ज़्यादा हो सके, हम घर में ही रहना पसन्द करते हैं. उपहार देने के लिए किसी के आने पर हमारा घर पर रहना ज़रूरी है कि नहीं?

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नाम हरीश कुमार ‘अमित’

जन्म 1 मार्च, 1958 को दिल्ली में

शिक्षा बी.कॉम.; एम.ए.(हिन्दी);

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

प्रकाशन 700 से अधिक रचनाएँ (कहानियाँ, कविताएँ/ग़ज़लें, व्यंग्य, लघुकथाएँ, बाल कहानियाँ/कविताएँ आदि) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. एक कविता संग्रह 'अहसासों की परछाइयाँ', एक कहानी संग्रह 'खौलते पानी का भंवर', एक ग़ज़ल संग्रह 'ज़ख़्म दिल के', एक बाल कथा संग्रह 'ईमानदारी का स्वाद', एक विज्ञान उपन्यास 'दिल्ली से प्लूटो' तथा तीन बाल कविता संग्रह 'गुब्बारे जी', 'चाबी वाला बन्दर' व 'मम्मी-पापा की लड़ाई' प्रकाशित. एक कहानी संकलन, चार बाल कथा व दस बाल कविता संकलनों में रचनाएँ संकलित.

प्रसारण - लगभग 200 रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण. इनमें स्वयं के लिखे दो नाटक तथा विभिन्न उपन्यासों से रुपान्तरित पाँच नाटक भी शामिल.

पुरस्कार-

(क) चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट की बाल-साहित्य लेखक प्रतियोगिता 1994ए 2001ए 2009 व 2016 में कहानियाँ पुरस्कृत

(ख) 'जाह्नवी-टी.टी.' कहानी प्रतियोगिता, 1996 में कहानी पुरस्कृत

(ग) 'किरचें' नाटक पर साहित्य कला परिाद् (दिल्ली) का मोहन राकेश सम्मान 1997 में प्राप्त

(घ) 'केक' कहानी पर किताबघर प्रकाशन का आर्य स्मृति साहित्य सम्मान दिसम्बर 2002 में प्राप्त

(ड.) दिल्ली प्रेस की कहानी प्रतियोगिता 2002 में कहानी पुरस्कृत

(च) 'गुब्बारे जी' बाल कविता संग्रह भारतीय बाल व युवा कल्याण संस्थान, खण्डवा (म.प्र.) द्वारा पुरस्कृत

(छ) 'ईमानदारी का स्वाद' बाल कथा संग्रह की पांडुलिपि पर भारत सरकार का भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, 2006 प्राप्त

(ज) 'कथादेश' लघुकथा प्रतियोगिता, 2015 में लघुकथा पुरस्कृत

(झ) 'राट्रधर्म' की कहानी-व्यंग्य प्रतियोगिता, 2016 में व्यंग्य पुरस्कृत

सम्प्रति भारत सरकार में निदेशक के पद से सेवानिवृत्त


पता  - 304ए एम.एस.4ए केन्द्रीय विहार, सेक्टर 56ए गुरूग्राम-122011 (हरियाणा)

ई-मेल harishkumaramit@yahoo.co.in

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