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समीक्षा // बिखरे अल्फ़ाज़ जीवन पृष्ठों पर

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पुस्तक समीक्षा ...

पुस्तक का नाम - बिखरे अल्फ़ाज़ जीवन पृष्ठों पर ....

कवि - मनोज कुमार सामरिया ‘मनु'

प्रकाशक - सहोदरी प्रेस एण्ड पब्लिसर्स , दिल्ली ।

संस्मरण -2017 प्रथम 

“बिखरे अल्फ़ाज़ जीवन पृष्ठों पर...." पुस्तक का  प्रथम संस्करण 2017  अपने आप में विभिन्न रसों को समाहित किए  हुए है ।  इस पुस्तक में सामाजिक सरोकारों से जुड़ी मानव मन को झकझोरती कुछ रचनाएँ हैं

यथा - चलो उस जिन्दगी को ढ़ूँढ़ने निकलते हैं ...,

सूने जीवन में जीवन मिलने दो .., 

बहती है तो बहने दो ...,

कुछ रचनाएँ जो पाठक को  नये सिरे से सोचने पर मजबूर करेगीं जैसे-

आदमी क्यों आदमी को मिटाने चला है ? ,

एक बालक ..,

जब मैं गया लौटकर मेरे बचपन के घर ...आदि  ।

तो कुछ अन्नदाता कृषक की पीड़ा को व्यक्त करती हैं - ताकता उम्मीद भर नयन ए-अब्र हलधर तुझे ... ,

हल चलाता जा ए हलधर तपती रेती में .... ।

समाज का वर्तमान यदि युवा हैं तो भविष्य है बच्चे  । जिनसे जुड़ी कुछ कविताएँ इस जिल्द में बन्द हैं जैसे-

रचना का सपना ,

नव चेतन सम्मान करें .., यह नव वर्ष का नवगान है ..आदि  ।

वीर रस कवि का  प्रिय विषय रहा है प्रस्तुत पुस्तक में वीर  रस से ओतप्रोत कुछ रचनाएँ हैं जो उत्साह के साभ देशभक्ति का जज्बा जगाती हैं वे क्रमशः -

माटी का निशान हूँ ,

जय हिन्दी हिन्दुस्तान है ...,

मैं उस माटी का पुतला हूँ ..,

महिमा भारत देश महान की  और सच पूछो तो भारत में .... ,आदि रचनाएँ हैं ।

शायद ही ऐसा कोई हृदय होगा जिसे श्रृंगार रस  रास न आए और कवि स्वांत सुखाय से स्वयं को बचा पाए ।  कवि मनु की  कलम भी इससे अछूती नहीं रही प्रस्तुत पुस्तक में श्रृंगार रस से सराबोर कुछ कविताएँ ली गई हैं - 

तुझसे मिलने मैं आउँगा ...,

जबसे हुई है तू रुसवा ..,

चंद लम्हें और ठहर जाते ....,

तुम हमसे जाने जाओ .. ,  तेरी तस्वीर ..आदि ।

इस पुस्तक में कुल 59 कविताओं का संकलन है। मैं समझता हूँ यह कवि के अन्तर्मन से फूटा भावों का अविरल सोता है  जो अनायास ही पाठक के मन को भीतर तक भीगो देता है ।

मैं जहाँ तक समझता हूँ प्रस्तुत पुस्तक हर आयु वर्ग के पठकों के लिए उपयोगी । पुस्तक  को पढ़ने के उपरान्त पाठकों में  सामाजिक सरोकारों से जुड़े नैतिक मूल्य  , कर्तव्यनिष्ठा , ईमानदारी , देशभक्ति ,त्याग और बलिदान जैसे गुणों का विकास  होगा ।  यह पुस्तक न केवल आपका  मनोरंजन ही करेगी वरन आपको समाज के प्रति नये दृष्टिकोण से सोचने , नये ज्वलन्त प्रश्नों के उत्तर खोजने को आतुर करेगी ।

                   कवि को इस खूबसूरत कविता रूपी गुलदस्ते हेतु   अनन्त  , अशेष  शुभकामनाएँ ।

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समीक्षक - रिखबचन्द राँका ‘कल्पेश’

हिंदी शिक्षक - जयपुर , राजस्थान ।

1 टिप्पणियाँ

  1. बहुत बहुत आभार आदरणीय कल्पेश जी का इतनी तार्किक समीक्षा के लिए ।

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