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पुस्तक समीक्षा // मन की आँखें:समाज की आँखें // डॉ हरिश्चन्द्र शाक्य डी0 लिट0

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पुस्तक समीक्षा मन की आँखें:समाज की आँखें डॉ हरिश्चन्द्र शाक्य डी0 लिट0 मन की पाँखें कविता, गीत ,ग़ज़ल,मुक्तक,निबन्ध,कहानी,उपन्यास तथा हाइकु आ...

पुस्तक समीक्षा

मन की आँखें:समाज की आँखें

डॉ हरिश्चन्द्र शाक्य डी0 लिट0

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मन की पाँखें कविता, गीत ,ग़ज़ल,मुक्तक,निबन्ध,कहानी,उपन्यास तथा हाइकु आदि विधाओं में कलम चलाने वाले बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व के धनी साहित्यकार डॉ राजीव कुमार पाण्डेय का सद्य प्रकाशित हाइकु संग्रह है जिसमें उनके विविध विषयों के 435 हाइकु संग्रहीत किये गए हैं।पुस्तक की भूमिका हाइकु जगत में वैश्विक पहचान रखने वाली प्रख्यात साहित्यकार डॉ मिथिलेश दीक्षित ने लिखी है। उन्होंने भूमिका में सच ही लिखा है,”हमारे देश की प्रकृति परक अध्यात्म साधना बौद्ध धर्म तथा ध्यान सम्प्रदाय के माध्यम से चीन कोरिया था जापान तक पहुँचकर विस्तार को प्राप्त हुई तथा वहाँ के वांग्मय में जेन सन्तों की सूत्रात्मक , संकेतात्मक लघु कविता के रूप में आकार ग्रहण कर’हाइकु’के रूप में प्रसिद्ध को प्राप्त हुई ।“

हाइकु 5-7-5अक्षर(वर्ण) कर्म का मात्र17 अक्षरीय छन्द है जो तीन पँक्तियों में लिखा जाता है।और इसे विश्व की सबसे छोटी कविता के रूप में स्वीकारा गया है। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि मात्र 5-7-5 वर्ण कर्म का ढाँचा ही हाइकु नहीं हो जाता। हाइकु तो वह तभी बन पाता है जब उसमें भाव पक्ष की दृष्टि से गागर में सागर भरने वाली बात हो। हाइकु का जापानी भाषा में अर्थ ‘नट भंगी या नट भंगिमा’ या जल्दी की कविता है।जापानी भाषा या अन्य विदेशी भाषाओं में 5-7-5 वर्ण क्रम जी बजाय 5-7-5 के ध्वनि घटक (syllables) क्रम में हाइकु लिखे जाते हैं। विश्व की अन्य भाषाओं में हाइकु का स्वरूप कुछ भी हो किंतु भारत में 5-7-5 के अक्षर क्रम को ही सार्वजनिक मान्यता प्राप्त हुई है।

हाइकु क्या है इस सम्बंध में कुछ अन्य हाइकुकार विदानों के विचारों पर दृष्टि डालना समीचीन है। नीलमेंदु सागर का कथन है,”हाइकु रचना कोई चलताऊ काम नहीं है एक साधना है। हाइकु का प्रत्येक शब्द अपने क्रम में विशिष्ट अर्थबोध रखते हुए एक समन्वित प्रभाव की सृष्टि में सक्षम होता है।“ नलिनी कांत कहना है,”मूलतः हाइकु प्राकृतिक सौन्दर्य की कमनीय ,रमणीय और कोमल सुकुमार कविता है इसमें अध्यात्म का पावन स्पर्श रहता है। मानव के आचरणगत निर्मल वैशिष्ट्य का भी इसमें उन्मेष रहता है। डॉ रामनिवास मानव का विचार है,”हाइकु वस्तुतः किसी बच्चे के गाल पर ढुलकते अश्रुकण अथवा पल्लव पर पड़ी ओस की बूँद के समान होता है। इसमें बिजली की कौंध नहीं,जुगनू की चमक होती है।

डॉ सुरेन्द्र वर्मा का कथन है,” हाइकु एक स्वतःपूर्ण और स्वतंत्र विधा है। वह एक चिदणु की तरह होता है..पूरी तरह गवाक्ष हीन….वह दूसरी रचनाओं में ताक झाँक नहीं करता, जैसे कि दोहा ….जैसे कि गज़ल का एक शेर।“

प्रस्तुत कृति ’मन की पाँखें’ के समस्त हाइकुओं का भाव पक्ष देखने पर पता चलता है कि डॉ राजीव कुमार पाण्डेय ने जो शिल्प विधान लिया है वह जापानी है किन्तु उनके हाइकुओं की भाव भूमि भारतीय है।

डॉ सत्यभूषण वर्मा ने 5-7-5 वर्ण कर्म में 17 अक्षरीय शिल्प विधान और ऋतुबोधक शब्द ‘हाइकु’ के दो प्रमुख और अनिवार्य लक्षण माने थे। डॉ राजीव कुमार पाण्डेय ने इस मिथक का कहीं समर्थन किया है तो कहीं कहीं उसे तोड़ा भी है। उनके हाइकुओं में वर्तमान साहित्य की जो प्रवृत्तियां हैं वे सर्वत्र दृष्टिगोचर होती हैं।जीवन और प्रकृति का अविच्छिन्न सम्बन्ध होता है। डॉ राजीव कुमार पाण्डेय के कतिपय हाइकु द्रष्टव्य है-

अपनी थाली/देख देख मुस्कायी/गेहूँ की बाली।

सरसों पीली/चितवन रसीली/बाँहें पसारे।

ओस में नहा/उषारानी चलती/कँपकँपाती।

नदी विकल/करती कल कल/पड़ी निकल।


प्रकृति में ऋतुओं का भी अपना महत्व होता है। डॉ राजीव कुमार पाण्डेय ने अपने हाइकुओं में विभिन्न ऋतुओं का चित्रण किया है। उनके कतिपय हाइकुओं में ऋतुवर्णन दृष्टव्य है-

वसन्त

कोहरा थमा/पतझड़ भी चला/ देख वसन्त।

मनभावन/वसुधा का यौवन/ फूला आँगन।

सरसों पीली/मँडराते भ्रमर/दृष्टि रसीली।

पीली चूनर/प्रकृति ओढ़कर/चली मटक।

रंग बिरंगी/तितलियाँ उड़तीं/मन मगन।


शिशिर

ठौर ढूँढता/काँपता बचपन/पुलिया नीचे।

ठंडी हवायें/न डरता बिल्कुल/हल्कू का कुत्ता।

कँपकँपाती/गरीब की रजाई/खुले आकाश।

शीत लहर/पूरे यौवन पर/ढाती कहर।


पावस

पावस ऋतु/ भींगते छत पर/ नवयुगल।

चढ़ा अषाढ़/रिमझिम यौवन/दिल में बाढ़।


ग्रीष्म

ताप सताये/आम्रफल निर्मित/पना बचाये।

मिट्टी का घड़ा/ग्रामीण जीवन में/ फ्रिज से बड़ा।

ढाती कहर/तपती दुपहर/दुःखी शहर।


आज हमारा पर्यावरण प्रदूषित हो गया है। वर्तमान साहित्य की प्रवृत्तियों मे दलित विमर्शस्त्री विमर्श की भाँति पर्यावरण विमर्श पर भी लेखन हो रहा है। प्रदूषण के कारण ग्लोबल वार्मिंग की समस्या खड़ी हो गयी है जिसके कारण ग्लेशियर पिघल रहें है और समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है। इन सभी कारणों से भूकम्प, सुनामी,जीव जंतुओं पर कुप्रभाव जैसी देवी आपदाएं घटित हो रही हैं। हाइकुकार डॉ राजीव कुमार पाण्डेय के कतिपय हाइकुओं में पर्यावरण प्रदूषण के कुप्रभावों के दर्शन करें-

आया तूफ़ान/ ह्रदय विदारक/ मिली चीत्कार।

जहाँ भी छाया/धरती का कम्पन/ सभ्यता नष्ट।

आम बौराया/प्रदूषित व्यवस्था/फल न आया।

भू का स्खलन/दरकतीं चट्टानें/दुःखी मुहाने।

पड़ा अकाल/दुखियों के सवाल/ काल के गाल।

कैसा शहर/कल कारखानों से/ फैला जहर।

आँधी के झौंके/प्राकृतिक कहर/ किसने रोके।


स्त्री विमर्श पर भी हाइकुकार डॉ राजीव कुमार पाण्डेय ने जमकर कलम चलाई है। स्त्री विमर्श के कतिपय पहलुओं पर उनके हाइकु दृष्टव्य हैं-

नारी सम्मान

माँ की ममता/ न जिसकी समता/ किसी युग में।

माँ की ममता/ न जिसकी समता/ भक्त वत्सला।

आसमान में उड़ने की आतुर/ आज लडक़ी।

बेटों से कम/ कहाँ आज बेटियाँ/दिखातीं दम।

नारी सम्मान/जगत का उत्थान/ मर्यादा जन्म।

जहाँ बेटियाँ/महकता आँगन/स्वर्ग सरीखा।


कन्या भ्रूण हत्या

अजन्मी कन्या /गर्भ में डरकर/लगी काँपने।

जन्म से पूर्व/बेटियों को मिलता/क्यों शमशान।

भ्रूण पुकार/देखने दो मुझको/देहरी द्वार।

बड़ी लाचार/कूड़ेदान की चीख/कुत्तों ने सुनी।

मुझे आने दो/मर्दों की दुनिया में/खिल जाने दो।

मत लो जान/ मुझसे मिलेगा/तुम्हें सम्मान।

मारोगे भ्रूण/फिर शादी को होंगे/कितने खून।


बलात्कार

विवश नारी/अस्मत को गँवाया/है माँ कुँआरी।

पूछिये मत सुरक्षा कवच में/छेद कितने।


दहेज

दहेज बिना/आज की लड़की/सिर्फ ईंधन।

युग बदला/दहेज की खातिर/जलती होली ।


फैशनपरस्त नारी

परम्परायें/टाँगती खूँटी पर/ये अप्सरायें।

आँखों का पानी/जिसका मर गया/बेशर्मी लादी।

बड़े विचित्र/ये आधुनिक चित्र/न पूछो मित्र।

रंग बिरंगी/तितलियाँ उड़ती/मन मगन।


डॉ राजीव कुमार पाण्डेय ने रसराज श्रृंगार के संयोग पक्ष का चित्रण रीतिकालीन कवियों की तरह ही किया है।जिसमें नायिका के नख शिख वर्णन को भी स्थान मिला है। उनके कतिपय हाइकुओं में श्रृंगार का संयोग पक्ष दृष्टव्य है-

तिरछी दृष्टि/नयनों का काजल/प्रिय बुलाये।

छटा बिखेरे/कमर करधनी/मटक चले।

पाँव पैंजनी/छम छम वादन/आ जा साजन।

मुझे तो मेरा/वो चाँद दिख जाये/ईद हो जाये।

नजरें झुकीं/उनको देखकर/यथार्थ प्रेम।

ऋतु हो पावस/तिथि हो अमावस/प्रिय मिलन।

स्पर्श उनका/रोमांचित करता/आज भी हमें।

सरसों पीली/मंडराते भ्रमर/दृष्टि रसीली।


श्रृंगार के वियोग पक्ष पर भी हाइकुकार ने अपनी कलम चलायी है।उनके कतिपय हाइकुओं में वियोग पक्ष दृष्टव्य है-

गहन तम/बिछुड़े प्रियतम/दिल का गम।

स्वाति नक्षत्र/बरसता सर्वत्र/पपीहा प्यासा।

बिरही मन/चौखट पर बैठा/सुबह सायं।


प्रेम के ऐसा भाव है जो दूसरे के प्रति जाग्रत होता है।सारा संसार प्रेम के शहतीरों पर ही टिका हुआ है।

यदि यह प्रेम न होता तो संसार कबका नष्ट हो गया होता। डॉ राजीव कुमार पाण्डेय ने भी प्रेम की डगर को सदा अमर रहने वाली बताया है।अंग्रेजी में प्रेम को सिर्फ लव(love)कहा जाता है किंतु भारतीय संस्कृति में प्रेम के चार रूप अनुराग,स्नेह,प्यार व वासना मिलते हैं जिनमें थोड़ा बहुत अंतर होता है। डॉ राजीव कुमार पाण्डेय के हाइकुओं में प्रेम के दर्शन करें।

प्रेम डगर/चलकर बनती/सदा अमर।

अमर प्रेम/समर्पण पाकर/श्रीबृद्धि पाता।

दीप से जला/समर्पण या प्रेम/पतंगा जाने।

प्रेम बढ़े तो/महके उपवन/बिना बहाने।


15अगस्त1947 को भारत आजाद तो हो गया किन्तु हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने जिस आजाद भारत सपना देखा था उसके दर्शन आज तक नहीं हुए। आज का भारत गरीबी,महँगाई, भ्रष्टाचार, बेईमानी, रिश्वतखोरी, दबंगई शोषण,असमानता,जातिवाद, दलबदली,हिंसा, बलात्कार आदि का शिकार हो गया है। डॉ राजीव कुमार पाण्डेय ने इस भारत दुर्दशा के कतिपय चित्र अपने हाइकुओं में खींचे हैं-

चूल्हा भी ठंडा/ त्यौहार भी निकला/कटोरे संग।

ठौर ढूँढता/काँपता बचपन/पुलिया के नीचे।

बिकते देखे/अपनी व्यवस्था में/सत्यवादी भी।

अटकी नैया/महँगाई की मार/कैसे हो पार।

भारतमाता/ढूँढती आजकल/भाग्यविधाता।

प्रहरी बने/जिनका आजकल/चोरी से रिश्ता।

किस्मत जगी/गधा भी बन गया/पहलवान।

होटलों पर/भारतीय भविष्य/वर्तन धोता।

सत्य है बात/रो रहे फुटपाथ/महँगाई में।

आज भेड़िये/पहनकर चले शेर की खाल।

डरते लाल/किस हाथ में होगा/कैसा गुलाल।

बिकती शिक्षा/घटते रोजगार/द्रवित युवा।

रंग बेढंगा/फहराना मुश्किल/आज तिरंगा।

भारी हैं बस्ते/बचपन दबता/उपाय खोजें।

न्याय मिलेगा/न्यायाधीश के सने/ हाथ खून में।


14 सितम्बर 1949 को संसद के केन्द्रीय कक्ष में हिन्दी को राजभाषा घोषित किया गया था। राजभाषा का मतलब सरकारी कामकाज की भाषा अंग्रेजी ही बनी रही। हिन्दी आजतक राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन नहीं हो पायी है इसके लिए किसे दोष दिया जाये।प्रतिवर्ष सितम्बर के महीने में हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह, हिन्दी पखवाड़ा आदि मनाकर हम हिन्दी के प्रति अपना प्रेम दर्शाकर हिन्दी की दुर्दशा पर घडियाली आँसू बहा देते हैं। हिन्दी को जब तक राष्ट्रभाषा घोषित नहीं किया जाएगा और सरकारी कामकाज की भाषा अंग्रेजी को नहीं हटाया जायेगा तब तक हिन्दी इसी तरह आँसू बहाती रहेगी। हाइकुकार डॉ राजीव कुमार पाण्डेय ने हिन्दी की दुर्दशा पर कतिपय हाइकु रचे हैं-

हिन्दी के लोग/हस्ताक्षर अंग्रेजी/पालते हैं रोग।

हिन्दी दिवस/सेलिब्रेट करने/ हैं एकत्रित।

हिन्दी प्रयोग/दैनिक जीवन में/है लुप्तप्राय।


हाइकुकार डॉ राजीव कुमार पाण्डेय अंग्रेजी लेखक मुल्कराज आनन्द की बाल मनोविज्ञान की कहानी ‘द लॉस्ट चाइल्ड’से प्रभावित रहें हैं इसलिए उनके हाइकुओं में उसी कहानी का छायानुवाद देखा जा सकता है।

मेला दर्शन/बलवती इच्छाएँ/अपार खुशी।

रंग बिरंगी/तितलियाँ उड़तीं/मन मगन।

खिलौने देख/मचलता बालक/ डाँटते पापा।

माँगी मिठाई/दिशा परिवर्तन/करते पापा।

झूला झूलने/उद्वेलित इच्छाएँ/कह न पाता।

साँप का खेल/बाँसुरी का लुभाना/माँ का इन्कार।

वस्तु अनेक/मनभावन देख/इच्छा मर्दन।

भीड़ का रेला/बिछुड़ता बालक/माता पिता से।

एक अज्ञात/तनिक धनवान/चुपाता बच्चा।

बालक हित/अनेक प्रलोभन/सभी बेकार।

रुदन तेज/विलुप्त प्रायः इच्छा/पापा चाहिए।


हाइकुकार डॉ राजीव कुमार पाण्डेय कर्मयोग में विश्वास करते हैं।उनका मानना है कि कर्म के बिना हाथों की रेखाएँ किसी का भाग्य नहीं लिख सकतीं-

कर्म बिना क्या/भाग्य लिख सकेंगी/ हस्तरेखाएँ।

कर्मयोग का/ जिसने पाठ पढ़ा/ग्रहों से बड़ा।


संसार में दो तरह के लोग होते हैं।एक वो होते हैं जो पानी से आधे भरे गिलास को आधा भरा मानते हैं तथा दूसरे वे होते हैं जो उसे आधा खाली मानते हैं वे आशावादी होते हैं। और कर्मयोग में विश्वास करते हैं।संसार में जो भी निर्माण हुआ है सब ऐसे ही लोगों ने किया है। दूसरे लोग जो गिलास को आधा खाली मानते हैं वे निराशावादी होते हैं और वे भाग्य को कोसने के सिवा और कुछ नहीं करते। हाइकुकार डॉ राजीव कुमार पाण्डेय आशावादी हैं। उनका आशावाद उनके हाइकुओं में देखें।

मन की पाँखें/वसुधा से अम्बर/उड़ान भरें।

मन की पाँखें/अनुपम उड़ान/अम्बर नापें।

आसमान में/उड़ने को आतुर/ आज की लड़की।

मन का पंक्षी/छोड़कर घरौंदा/भरे उड़ान।

भागिये मत/मुसीबतों से दूर/संघर्ष करें।


हमारी राजनीति कितनी भ्रष्ट हो गयी है इसके चित्र भी हाइकुकार डॉ राजीव कुमार पाण्डेय ने उकेरे हैं-

दल बदल/मिले सूटकेश में/निश्चित फल।

लोकतंत्र भी/असहाय मिलता/भीड़तंत्र में।

मुफ्त बँटेंगे/चावल लेपटॉप/देश गिरवी।

विकास हारा/चुनाव में केवल/ जातियाँ जीती।

रंग बदलें/चुनावी मौसम में/गिरगिट सा।


डॉ राजीव कुमार पाण्डेय के हाइकुओं में कहीं कहीं प्रगतिवाद के भी दर्शन हुए हैं।परम्परागत रूढ़ियों में विश्वास नहीं करते। पितृ अमावस्या को भी वे निरर्थक मानते हैं-

आज जो श्रद्धा/उस समय होती/आशीष पाते।

गया भी गया/पितृ तर्पण किया/मिली न शांति।

सेवा करना/जीवित अवस्था में/सच की श्राध्द।


डॉ राजीव कुमार पाण्डेय के प्रस्तुत हाइकुओं में यदि महानगरीय भीड़-भाड़ का शोर है तो ग्रामीण संस्कृति की सौंधी गन्ध भी है। उनके कतिपय हाइकुओं में ग्रामीण संस्कृति के दर्शन करें-

पीपल पास/ जनश्रुति है खास/ ब्रह्म निवास

वट के तले/ ग्रामीण पंचायत/हल मामले।

रंग बिरंगी/तितलियाँ उड़तीं/मनभावन।

आज स्वार्थपरता के युग में रिश्ते नातों की मर्यादा खूँटी पर टाँग दी गयी है।


अपने ही अपनों के खून के प्यासे बने डोल रहे है। हाइकुकार डॉ राजीव कुमार पाण्डेय का मन भी ऐसे अपनेपन से व्यथित है।उनके कतिपय हाइकुओं में यह भाव द्रष्टव्य है –

विस्वासघात/अपने ही करते/आहत मन।

घनिष्ठ बन/आस्तीन में पलते/वही खलते।

लिये खंजर/नकाब ओढ़कर/अपने खड़े।

बेवजह क्यों/आज अपने बने/खून के प्यासे।

घात लगाये/बहेलिये छिपते/हम कँपते।


कोई भी रचनाकार अपने उस युग का इतिहास गढ़ता है जिसमे उसकी काया पली होती है।रचनाकार के युग के समसामयिक बोध के दर्शन भी उसकी रचनाओं में हो जाते हैं। डॉ राजीव कुमार पाण्डेय के प्रस्तुत हाइकुओं में समसामयिक बोध देखें-

है खाली पेट/पर चाहिये इन्हें/इण्टरनेट।

ईमानदारी / देखकर हर्षित/नोट की बन्दी।

शिशु का हक/स्तनपान करना/छीने कुमाता।

बेटों से कम/कहाँ आज बेटियाँ/ दिखाती दम।


हाइकुकार डॉ राजीव कुमार पाण्डेय ने जीवन के कड़वे मीठे स्वाद को स्वयं चखा है और उसकी अनुभूति को हाइकुओं में प्रस्तुत किया है,देखें-

जीवन जिया/कड़वा मीठा स्वाद/स्वीकार किया।

पुनर्जन्म में भी हाइकुकार का विस्वास है। उनका मानना है कि किसी भी प्राणी की मृत्यु के बाद पुनः नूतन जन्म होता है-

मृत्यु नदी में/डुबकी लगाकर/नूतन जन्म।

माटी पावन/पुनर्जन्म अपना/हो भारत में।


इस धरा पर पाप कितना भी बढ़ जाये किन्तु उसका अन्त होना निश्चित है। इस धारणा को डॉ राजीव कुमार पाण्डेय ने भी अपने एक हाइकु में प्रस्तुत किया है

पापों का घड़ा/चाहे कितना बड़ा/फूटना तय ।


प्रस्तुत कृति के कला पक्ष पर यदि हम दृष्टि डाले तो पाते हैं कि भाव पक्ष के साथ-साथ प्रस्तुत कृति का कलापक्ष भी उत्तम बन पड़ा है। प्रस्तुत कृति की भाषा आम बोलचाल की खड़ी बोली है। समस्त हाइकुओं में हाइकु छंद के व्याकर 5-7-5 के अक्षर क्रम का कड़ाई से पालन किया गया है।

जापानी हाइकु तो अतुकान्त कविता होती है भारत में इसे रायबरेली के स्व0 शंभुशरण दद्विवेदीजी ‘बन्धु’ ने इसे तुकान्त बनाकर प्रस्तुत किया था और ऐसे तुकान्त हाइकु को इन्होंने त्रिशूल नाम दिया था । वे प्रथम व तृतीय या द्वितीय व तृतीय पंक्ति में तुक अपरिहार्य मानते थे। डॉ राजीव कुमार पाण्डेय के कतिपय हाइकुओं में भी ऐसी तुकांतता के दर्शन होते हैं।

मिट्टी का घड़ा/ग्रामीण जीवन में/फ्रिज से बड़ा।

प्यार के बीज/करुणा की फसल/हृदय स्थल।

भृकुटी तान/भगवान भास्कर/करते गान।

लगा गुलाल/सुमन से खिलते/गोरी के गाल।


हाइकु के लिए यह मान्यतायें भी गढ़ी गयीं कि उसे त्रिवाक्यीय व क्रियात्रित भी होना चाहिए। डॉ राजीव कुमार पाण्डेय के हाइकुओं में ये मान्यताएँ प्रायः नहीं पायी जाती किन्तु कतिपय हाइकुओं में वे अनायास ही आ गयी हैं।–

प्यासी धरती/न तर्पण करती/इसे बचायें।

ओस में नहा/उषा रानी चलती/कँपकँपाती।

घनिष्ट बन/आस्तीन में पलते/वही खलते।

बजी बाँसुरी/बेसुध वृन्दावन/मयूरा झूमे।

माटी में खेले/बड़े हुए खाकर/कर्ज चुकायें।

लिए खंजर/नकाब ओढ़कर/अपने खड़े।

डॉ राजीव कुमार पाण्डेय की प्रस्तुत कृति के हाइकुओं में अभिधा, लक्षणा व व्यंजना तीनों शब्द शाक्तियाँ तथा ओज, माधुर्य व प्रसाद तीनों ही गुण विद्यमान हैं।

अलंकारों की ज्यादा गुंजाइश हाइकुओं में नहीं होती है किंतु फिर भी प्रस्तुत कृति के हाइकुओं में कुछ अलंकार अनायास ही आ गये है—

अनुप्रास अलंकार

हंस वाहिनी/माँ धवल धारिणी/कृपया रस दो।

भृकुटी तान/भगवान भास्कर/करते गान।

चम्पा चमेली/करती अठखेली/भ्रमर देख।

स्वाति नक्षत्र/बरसता सर्वत्र/पपीहा प्यासा।

बजी बाँसुरी/बेसुध वृन्दावन/मयूरा झूमे।


यमक अलंकार

गया भी गया/पितृ तर्पण किया/मिली न शांति।


मानवीयकरण अलंकार

ओस में नहा/उषा रानी चलती/कँपकँपाती।

खड़े बबूल/जलते देखकर/खिलते फूल।

वापस गाँव/भागते पतझड़/देख बसन्त।

मोबाईल जी/ छीनते प्रतिदिन/अपनापन।


विरोधाभास अलंकार

हिन्दी के वक्ता/धारा प्रवाह बोले/आंग्लभाषा में।

पीकर विष/नीलकंठ बनते/दुःख हरते।

स्वाति नक्षत्र/बरसता सर्वत्र/पपीहा प्यासा।

सुरक्षाहित/खींचते मिले चीर/दायित्ववान


सन्देह अलंकार

तेल या बाती/किसका त्याग बड़ा/प्रश्न गूढ़ है।


उपमा अलंकार

जहाँ बेटियाँ/महकता आँगन/स्वर्ग सरीखा।


रूपक अलंकार

मन आँगन/झूमकर हँसता/गाता सावन।


ध्वनि अलंकार (नाद सौन्दर्य)

पाँव पैंजनी/छम-छम वादन/आजा साजन।

दुखी यामिनी/कड़कती दामिनी/कहाँ रागिनी।

बड़े बतायें/जो दादुर टर्रायें/सावन आयें।

प्यासा पपीहा/पीऊ-पीऊ करता/देख बादल।

उत्प्रेक्षा अलंकार

पार्क की सीटें/नयन भर रोयीं/ज्यों खोया कोई।

पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार

बड़ी है भूख/रह-रह मन में/उठती हूक।

चौखट बैठी/करती कल-कल/पड़ी निकल।

प्याजी छिलके/देख-देख मचले/डिगे धर्म से।

नदी विकल/करती कल-कल/पड़ी निकल।


पदमैत्री अलंकार

शनि पूजन/मंगल अमंगल/हो न दंगल।

सन्त महन्त /डिगे निज पथ से/देख बसन्त।

कविता आयी/नीड से भीड़ तक/श्रेय हमारा।

जस के तस/हालात अभी तक/वोटर दुखी।


अन्त में निष्कर्षतः यही कहा जा सकता है कि हाइकुकार डॉ राजीव कुमार पाण्डेय की यह कृति ‘मन की पाँखें’ हिन्दी हाइकु जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनायेगी। ‘मन की पाँखें’ सचमुच ही समाज की आँखे साबित होगी ऐसा मेरा विश्वास है। कृतिकार डॉ राजीव कुमार पाण्डेय को मेरी शुभकामनाएँ।

समीक्ष्य कृति मन की पाँखें ( हाइकु संग्रह )


लेखक - डॉ राजीव कुमार पाण्डेय

प्रकाशक - हर्फ़ मीडिया, बी -84 ग्राउंड फ्लोर, सेवक पार्क,पटेल गार्डन,एक्सटेंशन

द्वारका मोड़,नई दिल्ली-110059

मूल्य - 175 रुपये

पृष्ठ - 105

समीक्षक- डॉ हरिश्चंद्र शाक्य

कवि,लेखक कथाकार,हाइकुकार

शाक्य प्रकाशन, क्लबघर,घण्टाघर,

मैनपुरी(उत्तर प्रदेश) 205001

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रचनाकार: पुस्तक समीक्षा // मन की आँखें:समाज की आँखें // डॉ हरिश्चन्द्र शाक्य डी0 लिट0
पुस्तक समीक्षा // मन की आँखें:समाज की आँखें // डॉ हरिश्चन्द्र शाक्य डी0 लिट0
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