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व्यंग्य // पुरस्कार आलू का बोरा है // धर्मपाल महेंद्र जैन

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व्यंग्य पुरस्कार आलू का बोरा है - धर्मपाल महेंद्र जैन इन दिनों सम्मानदाताओं की बड़ी फ़जीहत हो रही है। लगता है सम्मान देने वालों और सम्मान लेने...

व्यंग्य

पुरस्कार आलू का बोरा है
- धर्मपाल महेंद्र जैन

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इन दिनों सम्मानदाताओं की बड़ी फ़जीहत हो रही है। लगता है सम्मान देने वालों और सम्मान लेने वालों पर शनि देव की महादशा लगी हुई है। इस साल अंतरंग प्रसंगों के कारण नोबेल साहित्य पुरस्कार स्थगित हो गया, तो अपने यहाँ पचपन कलाकारों ने राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों का ही बहिष्कार कर दिया। पिछले कुछ सालों से कलाकार बड़े संवेदनशील ही गए हैं, वैचारिक हो गए हैं। पहले तो जुगाड़ों और तिकड़मों का ताँता लगा कर राष्ट्रीय पुरस्कार पाते हैं, और जब पुरस्कार मिल जाता है तो उसे वापस कर देते हैं, उसका बहिष्कार कर देते हैं। उन्हें लगता है पुरस्कार पाने से ज़्यादा यश पुरस्कार लौटाने में है।

कई दशकों पहले नोबेल पुरस्कार लौटाते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार ज्यां पॉल सार्त्र ने कहा था, पुरस्कार आलू का बोरा है, वे पुरस्कार का बोझ ढोना नहीं चाहते। अपने महामहिम को यह बात पता लगी तो उन्हें बहुत ग्लानि हुई। कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों के प्रायोजक उन्हें आमंत्रित करते थे। बड़े-बड़े कलाकार उनके आगे सिर झुकाते थे, मुस्कुराते थे और फोटो शूट कराते थे। महामहिम को समझ आ गया कि लोग उन्हें हम्माल समझते थे। तीन-चार घंटों का समारोह कर उनसे कलाकारों को आलू के बोरे दिलवाते थे। महामहिम पद की अपनी प्रतिष्ठा है, वे अकेले कितने बोरे उठाएँ! उनका बहुत सारा समय जनतंत्र के बहुरूपिये खा जाते हैं, वे चाहें तो भी कलाकारों के लिए समय कहाँ से लाएँ। उन्होंने आयोजकों से साफ़ कहलवा दिया था, ऐसे लज्जास्पद कामों के लिए वे एक घंटे के लिए ही आ पाएँगे, और ग्यारह भारी बोरे उठवा देंगे। वे एक-अकेले राष्ट्रपति हैं, एक घंटे में उससे ज़्यादा लोगों को सम्मान देना उनके बस की बात नहीं है।

सम्मान या पुरस्कार कैसे भी हों, बड़े सोच-विचार के बाद दिए जाते हैं। सिर्फ अपने ही लोगों को दिए जाते हैं। और यदि पुरस्कार राष्ट्रीय स्तर के हों तो सम्मानदाता के पैमाने, निष्ठा और समर्पण से जुड़ जाते हैं। पुरस्कार-पाता की निष्ठा असंदिग्ध और समर्पित होनी चाहिए, अनुकरणीय होनी चाहिए। इस कूट वाक्य को मैं एक उदाहरण से समझाता हूँ। बचपन में मैं जब कोई सम्मानजनक काम करता था तो मास्टरजी मुझे कुछ समय के लिए मुर्गा बना देते थे। वे मेरी पीठ पर सम्मानरूपी किताबें रख देते थे। सम्मानमयी बना रहने के लिए मैं पीठ हिला-डुला नहीं सकता था। यथास्थिति में रहो तो अपनी किताबें अपनी, अन्यथा दंड पाओ। आज कलाकार और साहित्यकार की यही स्थिति है। स्थिर खड़े रहो तो आपका पुरस्कार आपका। शाकाहारी सरकार को हिलने-डुलने वाले मुर्गे पसंद नहीं हैं।

सम्मान-प्रार्थियों की लम्बी सूचियाँ हैं, लोग अपने ही हैं, पर बहुत हैं। ये सब वर्षों से उपेक्षित रहे हैं। पिछली सरकार इनके चचेरे भाइयों की थी, उसने वर्तमान सरकार के ममेरे भाइयों को सम्मान दिया ही नहीं। सरकार को नहीं मालूम कि उसके हिस्से में और कितने वसंत लिखे हैं। सत्ता का पतझड़ शुरू हो उसके पहले अपने लोगों को सम्मानित करना ही है। महामहिम ना-नुकुर करें, तो लघुमहिम से सम्मान दिला देंगे। दीर्घ शंका निवारण न हो पाए तो लघु शंका तो हो, लगना चाहिए कि सरकार कुछ कर रही है। सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने भी यही किया। मंत्रालय के अफसरों को लगा ये राष्ट्रीय पुरस्कार आलू के बोरे ही तो हैं, कोई भी हम्माल उठा देंगे। फिर उनके पास तो गरिमामयी लोग हैं, केंद्रीय मंत्री हैं, केन्द्रीय राजा मंत्री हैं, सुपर आईएएस सचिव हैं। सब मिल कर एक सौ बत्तीस सम्मान बाँट देंगे। दाता भी उपकृत, पाता भी उपकृत।

सरकारी सोच और सरकारी गणित बाबूनूमा होता है। बेचारा बाबू जो टीप लिखता है, वह टॉप तक ओके-ओके होते जाती है। बीच के सारे अफ़सर अपनी चिड़िया बिठाने के सिवाय ज़्यादा नहीं जानते। और
राष्ट्रीय पुरस्कारों के बारे में तो बाबू से लगा कर उपसचिव तक कोई कुछ नहीं जानता। उन्हें कभी कोई सम्मान-पुरस्कार मिला ही नहीं, वे क्या जाने पीर पराई।

इधर आलू के बोरे पाने वाले बड़े नाखुश हैं। आलू (सम्मान) तो वे कहीं से भी ले सकते हैं। सब्ज़ीमंडी में कितने ही कुंजड़े हैं, फेरी वाले हैं जो आलू बेचते फिरते हैं। थोड़े-से पैसे दो और आलू ले लो, ज़्यादा पैसे दो और बड़े आलू ले लो। पर उन्हें महामहिम से आलू लेने थे। महामहिम से आलू लेने में जो प्रतिष्ठा है, वह कुंजड़े से लेने में नहीं हैं। खफ़ा हो कर उन्होंने कुंजड़ों से आलू लेने से मना कर दिया, समारोह का बहिष्कार कर दिया। केंद्रीय मंत्री, केन्द्रीय राज्य मंत्री और केंद्रीय सचिव को चुल्लू भर पानी नहीं मिल रहा। अब वे आलू के इन बोरों का क्या करें?

हर कलाकार सम्मान का भूखा तो है नहीं कि जो मिल रहा है उसे सहृदयता से ले ले, उसका भी ठसके मारने को मन करता है। सरकार जानती है ये कलाकार हैं, फ़िल्मी कलाकार हैं, इन्होंने अपनी ज़िंदगी कला को दी है। क्या सरकार उन्हें पुरस्कार भी न दे। ये आलू इनकी ज़िंदगी भर की कमाई हैं। किसी को यह नहीं लगना चाहिए कि आलू में गड़बड़ है, या आलू देने वाले की नियत में गड़बड़ है। परमश्रेष्ठ हम्माल आलू के बोरे नहीं उठाए तो सरकार क्या करे, कलाकारों का सम्मान होना चाहिए। अब मंत्रालय भारतीय डाक विभाग की स्पीड-पोस्ट से कलाकारों को सम्मान भेज रहा है, लिख रहा है - तेरा तुझको अर्पण।

(1 जून 2018 के गंभीर समाचार में प्रकाशित)

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