बदलते परिवेश में माँ की भूमिका // श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता

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बदलते परिवेश में माँ की भूमिका

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श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता

(एम.ए. संस्कृत )

विश्व के जितने भी महापुरूष हुए हैं उन सब के व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी जन्मदात्री माँ का ही सर्वोपरि स्थान है । संस्कृत साहित्य के महान नाटककार भास ने कहा है -

माता परं दैवतम्

श्रीराम, श्रीकृष्ण, गौतमबुद्ध, महावीर स्वामी, ईसा मसीह, महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, बाल गंगाधर तिलक, गाँधी, नेहरू, दयानंद सरस्वती तथा स्वामी विवेकानंद आदि के जीवन का निर्माण ममतामयी माँ ने ही किया है। माँ के गर्भ में ही उनकी महानता के अंकुर का प्रस्फुटन हुआ है।

भारतीय संस्कृति में मानव जीवन को चार आश्रम में विभाजित किया है -1-ब्रह्मचर्य 2-गृहस्थ 3-सन्यास, 4-वानप्रस्थ। इनमें गृहस्थ आश्रम में दम्पत्ति कठोर श्रम करते है। अपनी संतानों का पालन-पोषण करके उन्हें जीवन में उन्नति के पथ पर अग्रसर होने की शिक्षा देते हैं।

गृहस्थ आश्रम भोग-विलास तथा विलासिता पूर्ण जीवन जीने के लिये ही नहीं है वरन् भावी पीढी़ को संस्कारित कर उनके मार्ग को प्रशस्त करने के लिये है। संस्कृत भाषा के कवि ने कहा है -

माता शत्रुः पिता बैरी, येन बालो न पठितः।

सुनने पढ़ने में यह पंक्ति बेशक कर्ण कटु लगे परन्तु वास्तविकता के समीप है। प्रत्येक जागरूक माता-पिता को इस ओर ध्यान देना चाहिये ‘‘किसी विद्वान ने कहा है ’’यदि आप एक महिला को शिक्षित करते है तो इसका अर्थ है कि आप एक सम्पूर्ण परिवार को शिक्षित करते है ‘‘ एक भारतीय माता अपनी संतान चाहे वह पुत्र या पुत्री हो उसके लिए वह पूर्ण रूप से समर्पित रहती है। अपनी सारी सुख सुविधाएँ त्याग कर वह संतान के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में सर्वदा तत्पर रहती है। यदि वह किसी पद पर आसीन है तो भी अपनी नवजात संतान के लिये लम्बे समय तक अवकाश लेकर उसे संस्कारवान बनाने का कठिन कार्य करती है। बालक की प्रथम गुरू माता ही है विद्यालयीन शिक्षा के पूर्व माँ ही उसे अंक और अक्षर का ज्ञान कराती है। महानता के अंकुर किसी कारखाने में नहीं माँ के गर्भ में ही प्रस्फुटित होते हैं । अभिमन्यु ने माँ के गर्भ में ही चक्रव्यूह में प्रवेश करने की युद्ध कला सीखी थी। महाकवि कालिदास रचित ‘‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’’ में शंकुन्तला का पुत्र सर्वदमन सिंह शावक को देखकर भयभीत नहीं होता है वरन् कहता है ’’जम्भृस्व सिंह! दन्तास्ते गणयिष्यामि’’ कितनी निडरता है इस बालक में ! वह माँ धन्य है जिसने उसे इतना निडर बनाया। राजा दुष्यन्त भी उसकी वीरता से अभिभूत है।

ममता की मूर्ति माता अपने बालक को जब वह शैववास्था में होता है तब उसमें अच्छी आदतों का निर्माण करती है । समय पर उठना, ब्रश करना ,शौच जाना, स्नान करना,कुछ भी खाने के पूर्व हाथ धोना आदि आदि। माता बालक को सच बोलने की, चोरी आदि न करने की आदत डालती है । कई बालक बात-बात पर झूठ बोलते हैं ।माँ उन्हें ऐसा करने से रोकती है दोस्तों के घर खेलते समय उनके खिलौने चुराकर अपने घर ले आते हैं । माँ उन्हें ऐसा करने से रोकती है और कहती है कि सॉरी बोलकर उन्हें खिलौना वापस दे दो। ये बातें बालक के चरित्र को उच्च कोटि का बनाती है और वह समाज में सम्मान जनक स्थान प्राप्त करता है ।

एक माँ के संस्कार बालक को सर्वोच्च पद दिला सकते हैं तो उन्हें निम्न कोटि का नागरिक भी बना सकते हैं। माँ बालक की मित्र मण्डली पर भी निगाह रखती है। दोस्त जीवन को संवार सकते है तो बिगाड़ भी सकते हैं। इसलिये संगति पर निगरानी आवश्यक है। आदि कवि वाल्मीकि पहले डाकू थे और उनका नाम रत्नाकर था सप्तऋषियों की संगति ने उनके जीवन में परिवर्तन कर दिया।

गुरू, माँ, कुम्हार इन तीनों की भूमिका प्रकारान्तर से एक समान ही है । कुम्हार माटी से घड़े की रचना करता है। उसे अपने हाथों की अंगुलियों से सुन्दर रूप प्रदान करता है। गुरू भी शिष्य की बुराईयों को डाँट फटकार से दूर करता है और माँ भी अपनी संतान की सभी प्रकार की बुराईयों को उसे डांटकर ,पीटकर तथा प्यार भरी बातों से समझाकर दूर करती है।

आजकल कई पालक अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य बनाने की होड़ में अपनी संतानों को होस्टल के हवाले कर देते हैं और अपने कर्तव्य की इतिश्री समझते है। पर आये दिन हम समाचारों में किशोरवय बालकों की आत्महत्या करने के समाचार से द्रवित हो जाते हैं। इसके लिये जिम्मेदार कौन है ? माता-पिता या बालक? सभी अंधाधुन्ध प्रतिस्पर्धा के युग में जीवन यापन कर रहे हैं । अर्थोपार्जन करना ही हमारा ध्येय नहीं होना चाहिये। अर्थोपार्जन से भी बढ़कर ईश्वर ने हमें जीवन प्रदान किया है उसे हम परमपिता परमेश्वर का वरदान मानें और उत्तरोत्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर होकर शान्ति पूर्ण जीवन यापन करें। जिससे माता-पिता का नाम भी रोशन होगा और भावी पीढ़ी को भी उचित मार्ग दर्शन मिलेगा इसलिये किसी विद्वान ने कहा है -

माँ में त्रिमूर्ति का निवास है । माँ हमें जन्म देती है इसलिये ब्रह्मा है। वह हमारा पालन-पोषण करती है अतः विष्णु है। माता हमारी बुराईयों दुष्प्रवृत्तियों को दूर करती है इसलिये वह रूद्र है। अतः त्रिषु लोकेषु नास्ति मातृसमो गुरूः

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श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता

एम.ए. संस्कृत

Sr. MIG-103, व्यास नगर, ऋषिनगर विस्तार

उज्जैन (म.प्र.)456010

Email:drnarendrakmehta@gmail.com

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