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प्रेमिल संगीत

श्वेता सिन्हा

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प्रेमिल संगीत


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जबसे साँसों ने
तुम्हारी गंध पहचानानी शुरु की है
तुम्हारी खुशबू
हर पल महसूस करती हूँ
हवा की तरह,
ख़ामोश आसमां पर
बादलों से बनाती हूँ चेहरा तुम्हारा
और घनविहीन नभ पर
काढ़ती हूँ तुम्हारी स्मृतियों के बेलबूटे
सूरज की लाल,पीली,
गुलाबी और सुनहरी किरणों के धागों से,
जंगली फूलों पर मँडराती
सफेल तितलियों सी बेचैन
स्मृतियों के पराग चुनती हूँ,
पेड़ो से गिरती हुई पत्तियों से
चिड़ियों के कलरव में
नदी के जल की खिलखिलाहट में
बस तुम्हारी बातें ही सुनती हूँ
अनगिनत पहचाने चेहरों की भीड़ में
तन्हा मैं
हँसती, मुस्कुराती,बतियाती यंत्रचालित,
दुनिया की भीड़ में अजनबी
बस तुम्हें ही सोचती हूँ
शाम की उदासियों में
तारों की मद्धिम टिमटिमाहट में
रजत कटोरे से टपकती
चाँदी की डोरियों में
बाँधकर सारा प्रेम
लटका देती हूँ मन के झरोखे से
पवनघंटियों की तरह
जिसकी मधुर रुनझुन
विस्मृत कर जीवन की सारी कड़वाहट
खुरदरे पलों की गाँठों में
घोलती रहे
सुरीला प्रेमिल संगीत।

---श्वेता सिन्हा
जमशेदपुर
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अस्तित्व के मायने


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बड़ी हसरत से देखता हूँ
वो नीला आसमान
जो कभी मेरी मुट्ठी में था,
उस आसमां पर उगे
नन्हें सितारों की छुअन से
किलकता था मन
कोमल बादलों में उड़कर
चाँद के समीप
रह पाने का स्वप्न देखता रहा
वक़्त ने साज़िश किया
या तक़दीर ने फैसला लिया
जलती हवाओं ने
नोंचकर पंख सारे
फेंक दिया तपती मरूभूमि में
कहकर,भूल जा
नीले आसमां के ख़्वाबगाह में
नहीं उगते ख़नकदार पत्ते
टिमटिमाते सितारों से
नहीं मिटायी जा सकती है भूख,
और मैं
अपने दायरे के पिंजरें में
कैद कर दिया गया
बांधे गये पंखों को फड़फड़ाकर
मैं बेबस देख रहा हूँ
ज़माने के पाँव तले कुचलते
मेरे नीले आसमां का कोना
जो अब भी मुझे पुकारता है
मुस्कुराकर अपने बाहें पसारे हुये
और मैं सोचता हूँ अक़्सर
एक दिन
मैं छूटकर बंधनों से
भरूँगा अपनी उड़ान
अपने नीले आसमां में
और पा लूँगा
अपने अस्तित्व के मायने
--श्वेता सिन्हा
जमशेदपुर

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नये ख़्वाब


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साँझ की राहदारी में
क्षितिज की स्याह आँखों में गुम
ख़्यालों की सीढियों पर बैठी
याद के क़दमों की आहट टटोलती हूँ

आसमां की ख़ामोश बस्ती में
उजले फूलों के वन में भटकती
पलकों के भीतर डूबती आँखों से
पिघलते चाँद की तन्हाईयाँ सुनती हूँ

पागल समुंदर की लहरें
चाँद की उंगलियां छूने को बेताब
साहिल पर सीपियाँ बुहारती चाँदनी संग
रेत पर खोये क़दमों के निशां चुनती हूँ

मन की मरीचिका में
तपती मरुभूमि में दिशाहीन भटकते
बूँदभर चाहत लिए उम्र की पगडंडियों पर
बिछड़े क़दमों को ढूँढती नये ख़्वाब बुनती हूँ


---श्वेता सिन्हा
जमशेदपुर

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मत लिखो प्रेम कविताएँ


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मत लिखो प्रेम कविताएँ
महसूस होती प्रेम की अनुभूतियों को
हृदय के गोह से निकलते
उफ़नते भावों के
मुख पर रख दो
संयम का भारी पत्थर
और उन पत्थरों जैसे हो रहे
इंसानियत का आख्यान लिखो
फूल और कलियों की मुस्कान,
भँवरें और तितलयों का गान
ऋतुओं की अंगड़ाई
चिड़ियों का कलरव
चाँद की किरणें,
ओस की बूँदें
झरने का राग
नदियों का इठलाना,
व्यर्थ है तुम्हारा लिखना,
प्रकृति का कोमल स्पर्श
खोलो तुम आँखें
देखो न;
कोमल कलियों
फूल सी बेटियों पर दुराचार
तुम्हें क्यों नहीं दिखता?
प्रदूषित धुएँ में धुँधलाता आसमां,
अट्टालिकाओं में छुपा चाँद,
गुम होती गौरेय्या
नाला बनती नदियाँ
बूँद-बूँद पानी को तरसते लोग
तुम जानते नहीं क्या?
मानवता का गान
देशभक्ति का बखान
परोपकार का प्रवचन
प्रेम का मौसम
भाईचारा का उद्घोष
धर्मग्रंथों तक सीमित
शब्दकोश में सुशोभित है
मार-काट, ईर्ष्या-द्वेष,
बात-बात पर उबलता लहू,
सांप्रदायिकता की अग्नि में जलता धर्म,
स्वार्थ में लिप्त आत्मीयता
क्यों नहीं लिख पाते हो तुम?
अगर कहलाना है तुम्हें
अच्छा कवि
तो प्रेम और प्रकृति जैसे
हल्के विषयों पर
कलम से नक्काशी करना छोड़ो
मर्यादित रहो,
गंभीरता का लबादा ओढ़ो,
समाज की दुर्दशा पर लिखो,
गिरते सामाजिक मूल्यों पर लिखो,
वरना तुम्हारा
चारित्रिक मूल्य आंका जायेगा,
प्रेम जैसी हल्की अनुभूतियों को लिखना
तुम्हारी छवि को
भारी कैसे बना सकती है?
आखिर तुम कवि हो
अपने दायित्वों का बोध करो;
मत लिखो प्रेम कविताएँ
सभ्य मनुष्य और समाज को
बदसूरती का आईना दिखाकर
समाज में नवचेतना जागृत करो।

-श्वेता सिन्हा
जमशेदपुर
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