अंतरा सृजन समीक्षा - पत्रकारिता से लेखन तक देवेन्द्र सोनी // डॉ. प्रतिभा सिंह परमार राठौड़

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सृजक समीक्षा
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अंतरा सृजन समीक्षा - पत्रकारिता से लेखन तक देवेन्द्र सोनी

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डॉ. प्रतिभा सिंह परमार राठौड़


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         नर्मदांचल के जाने माने पत्रकार देवेन्द्र सोनी ने 'साप्ताहिक युवा प्रवर्तक' के प्रधान संपादक के रूप में अपनी एक अलग पहचान कायम की और बेहद कम समय में बतौर पत्रकार उल्लेखनीय ख्याति अर्जित की । जितना मैंने जाना है कि उन्हें पत्रकारिता करते हुए चार दशक पूर्ण हो गए हैं ।  वे मूलतः कहानीकार रहे हैं । किंतु इन दिनों लघुकथा के प्रति उनका रुझान बढ़ा है जिसके माध्यम से  देवेन्द्र सोनी जी निरन्तर , निर्बाध होकर अपनी बात पाठकों के सामने रख रहे हैं । यह भी सच है कि उनकी कवितायें वास्तव में 'जरा हट के' ही होती हैं । अंतरा शब्द शक्ति प्रकाशन , इंदौर ने विगत् दिनों देवेन्द्र सोनी की बहुचर्चित कविताओं पर केन्द्रित एकल किताब ' सृजन समीक्षा ' प्रकाशित की है । इसमें उनकी प्रतिनिधि कविताओं को शामिल किया गया है। किताब में अंतरा शब्दशक्ति प्रकाशन की संस्थापिका प्रीति सुराना की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
       ' देखते रहते हैं राह ' शीर्षक से देवेन्द्र जी की कविता में पिता की व्यथा उभर कर सामने आई है । वे बच्चों को इस कविता में अंत में चेतावनी नजर आते हैं । यही कि -
निर्णय तुमको करना है
वक़्त यहीं फिर - फिर लौटेगा
जिससे तुम्हें भी गुजरना है ।
       देवेन्द्र सोनी पशु पक्षियों के प्रति भी बेहद संवेदनशील हैं । 'एहसास' कविता में पाठकों को यह एहसास भी होता  है ।  वे केवल ऐसा लिख कर नहीं रह जाते बल्कि उस पर अमल भी करते हैं । आसानी से कभी उनकी छत पर आपको वह पक्षियों को दाना खिलाते हुए नजर आ जाएंगे।
      अपनी एक अन्य कविता 'मोबाइल' में देवेन्द्र सोनी जी मोबाइल के दुरुपयोग पर चिंता भी व्यक्त करते हैं । देखिये -
बना दिया है मोबाइल ने हमको भी
अस्थिर , चंचल और लती होना ।
        कविता लिखते हुए देवेन्द्र जी अक्सर अपने अतीत में चले जाते हैं जहां ' अब भी ' जैसी कविता में उनको माँ , नानी और दादी के हाथ का स्वाद याद आ जाता है ।
        इधर उनकी कविता ' हैं समान दोनों भी ' में वे घर और रिश्ते बचाने की जोरदार हिमायत करते हैं -
करना होगा मिलकर ही यह
हम सबको
बचाने अपना घर
बचाने अपना हर रिश्ता ।
         देवेन्द्र सोनी की ' धरती के देवता ' कविता राजनीति और नेताओं पर करारा व्यंग्य है । यह उनकी शैली रही है । इसी शैली के लिए वे जाने जाते हैं । वहीं दूसरी ओर उनकी ' विज्ञान और मानव ' कविता में परम्परागत बात ही उन्होंने दोहराई है ।
      पुस्तक के अंत में उनके ' सृजन की समीक्षा ' की गई है लेकिन मेरे विचार से इन समीक्षाओं के माध्यम से शायद ही उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व का सही आकलन किया जा सके ।
देवेन्द्र सोनी की कविताओं का सही आकलन आने वाला समय  करेगा । उनके सृजन की समीक्षा उतनी आसान  नहीं , मैंने भी मात्र एक प्रयास भर किया है ।
अंत में इतना ही कहूंगी कि वे पत्रकारिता में अपना वजूद कायम रखें क्योंकि देवेन्द्र सोनी की शख़्सियत पत्रकारिता के लिए ही बनी है । लघुकथा के साथ फिर से कहानियों की और लौटें जहां उनके पुराने पाठक आज भी उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं । इतिहास के पन्नों में आपका नाम सुनहरे हर्फ़ों में लिखा जाए इन्हीं दुआओं के साथ ।


  - डॉ. प्रतिभा सिंह परमार राठौड़
      माखननगर (बाबई ) म.प्र.

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